रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 11, अप्रेल, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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कविता

 

माधव पंडित की कविताएँ

 

आँच

बचपन में

सर्दी

मुझे बहुत सताती थी

फटी कमीज में

घुस जाती थी।

 

मैं

रोटी और चटनी लेकर

चरवाहे आजा

वो पास जाता था

उन्हें

पेड़ तल बैठा पाता था।

 

जैरे ही

वे मुझे

फटा कंबल ओढ़ाते थे

सर्दी

गायब हो जाती थी

आत्मयिता की आँच के आगे

वह

टिक नहीं पाती थी।

 

बेचैनी

रात

मुझे

जगाती है

बतियाती है।

 

एक

शर्मीला चेहरा

मेरे सामने आता है

जिससे

अब तक

जुड़ा नहीं नाता है।

 

वह

बोल नही पाता है

और

मैं खुल नहीं पाता हूँ।

 

एक बेचैनी

मुझे खा रही है

लेकिन

भा रही है।

 

रहस्य

प्रभु

दाँतों से सूका नारीयल काटे

और

भक्त को डाटे-

लड्डू, पेड़ा, मोदक

..फूल, अगरबत्ती

सब घट रहें हैं

कारण बताओ ?

न घबराओ !

 

वह रोया

सत्य बोया

वीर वशीरोमाठी !

तीर धनुस उठाइए !

मँहगाई को मार भगाइए !

 

वे डोले

फुसफुसा बोले-

तू तो बड़ा नादान है

वह तो

मुझसे अधिक बलवान है !

 

असहाय

गिद्धों से .............कर

मैंने

गाँव छोड़ा

और

शहर से नाता जोड़ा।

 

शहर में भी

वे

ऊंची जगहों पर बैठे हैं

अपनी ....चोंच पर रोंठे हैं।

 

इस दस बहाने

वे

मुझे

नोंच रहे हैं

यहाँ वहाँ कोंच करे हैं।

 

मैं

जब भी

अपने हाथों में

पत्थर उठाता हूँ

उन्हें

टूटा हुआ पाता हूँ।

 

डॉ. माधव पंडित

रीडरःहिंदी विभाग

मुंबई विश्विवद्यालय, मुबंई - 400098

 

 

आपकी प्रतिक्रिया

 सत्य अमर है - महात्मा गाँधी

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