रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 11, अप्रैल, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

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कथोपकथन

 

बौद्धिक सृजन का काम जारी रहना चाहिए- ज्ञानेन्द्र पति

 

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हिंदी के वरिष्ठ एवं महत्वपूर्ण कवि ज्ञानेन्द्र पति को इस वर्ष साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है - उनके चौथे संग्रह ‘संशयात्मा’ (२००४) पर। जन्म - झारखण्ड के एक गाँव पथरगामा  में । दसेक वर्षॊं तक बिहार सरकार में अधिकारी । सम्प्रति, कुलवक्ती कवि। प्रकाशित- आँख हाथ बनते हुए’  (१९७०), शब्द लिखने के लिए ही यह कागज़ बना है’  (१९८१), गंगातट’  (२०००), संशयात्मा’  (२००४), भिनसार’  (२००६) - सभी कविता-संग्रह । एकचक्रानगरी’  (काव्य-नाटक), पढ़ते-गढ़ते’  (कथेतर गद्य : २००५) भी प्रकाशित । कई पुरस्कारों से सम्मानित ।  आवास-बी-  ३/१२, अन्नपूर्णानगर, विद्यापीठ मार्ग, वाराणसी-221002 । हम सृजनगाथा के पिछले अंकों में उनकी कविताएं छाप चुके हैं । प्रस्तुत से उनसे एक खास साक्षात्कार का अंश- संपादक

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प्रश्न :  सामान्य मनुष्य के पास जो ज्ञान है उसके प्रति आज साहित्य की क्या संवेदनायें हैं ?

उत्तर : हमारे मस्तिष्क पर नव यौवन काल में पढ़े गए माओ त्से तुंग - जिन्हें आजकल माउजे दोंग लिखा कहा जाता है - के विख्यात येनान भाषण की गहरी छाप है । इसमें उन्होंने साहित्य - संस्कृतिकर्मियों को सम्बोधित करते हुए व्यापक जनता के पास जाने का आह्वान किया था - उससे सीखने के लिए और तब जनता से पाई गई चीजों को ही सँवार कर वापिस उसे लौटाने के लिए । सच पूछा जाय तो मानवता की सर्वोत्तम उपलब्धियाँ श्रमशील जनता के हाथों ही सम्भव हुइ हैं।आग को किसने पालतू बनाया था ? चक्के का अविष्कार किसने किया था, जिसके बल पर सभ्यता ने अग्रतर यात्रा की ? मिट्टी को पकाकर किसने पहली ईंट बनाई ? पहली नाव किसने सागर में उतारी ? पशुता को सभ्यता का वसन पहनाने वाली सूई का आविष्कारक कौन था ? श्रमगीतों को लोकगीतों में ढा़लने वाले कण्ठ किनके थे ? जिनकी मानस-भूमि मिथकों की जन्मभूमि बनी, वे अनाम हैं ।यह व्यापक जन समुदाय ही है, जिसने अपने सामूहिक जीवन-संघर्ष के दौरान तमाम उपयोगी और कलात्मक वस्तुओं का सृजन किया । अविष्कार के रूप में अपना नाम चलाने की कोई चिन्ता हमारे इन महान पूर्वजों के मन में नहीं पलती थी। जीवनव्यापी प्रयोगशीलता से इन्होंने अनाजों की हजारों किस्में विकसित कीं । यदि केवल - एशिया के मुख्य खाद्य - धान/चावल को ही देखा जाय तो इसकी हजारों किस्में विकसित की गईं । इसी तरह विभिन्न भाषाएँ और मुख़्तलिफ़ संस्कृतियाँ आकार ले पाईं । आज इन सब पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों/निगमों की लालची-लुटेरी निगाहें गड़ी हैं । जैविक विविधताएँ और साथ ही सांस्कृतिक विविधताएँ नष्ट हो रही हैं । जिस प्रजाति के बीज अब हमारे खेतों में उगते नहीं मिलेंगे वे पश्चिमी जीन बैंकों में सुरक्षित हैं, और संकर बीजों को बनाने के काम आ रहे हैं, आने वाले हैं। भारतीय खेतों के लिए निरबंसिया बीजों को बेचने की ही तैयारी है । बहरहाल जहाँ तक मेरी बात है, अपने सर्जनात्मक अनुभवों के सहारे मैं जिस निष्कर्ष तक पहुँचा हूँ उसे एक पद के रूप में व्यक्त करूँ तो वह है - उपयुक्त प्रथम श्रोता का सिद्धान्त।' कोई रचना पूरी होते ही उसे पहले-पहल सुनाने के लिए मैं किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करता हूँ जिसके जीवनानुभव - क्षेत्र से उसका सम्बन्ध हो । गंगातट में शामिल मेरी कविताएँ बनारस के सबसे बूढ़े मल्लाह शिवनाथ माँझी - मेरे शिवनाथ बाबा - को सुनाने के बाद उन्नत हुई हैं । उसी तरह, मुझे याद है, मेरी एक  ‘थनैलीशीर्षक कविता - जो चलती ट्रेन में लिखी गयी थी - जो सूजे हुए थनों वाली - थनैली से पीड़ित - एक गाय से और उसकी देशीय चिकित्सा से सम्बन्धित है, तभी मुकम्मल हो पाई जब मैंने उसे अपने गाँव में बूढ़े ग्वाल दादा को सुनाया । सच पूछिए तो वस्तुनिष्ठ जीवन - दृष्टि वाले रचनाकार की हर रचना उसके लिए सीखने का एक अवसर होती है, ग्रहणशीलता के बगैर रचना सम्भव नहीं होती । जीवन-संघर्ष में लगे हुए हर व्यक्त के पास वह संजीवनी है, जो हमारी जिजीविषा को धार दे सकती है ।

 

    यह सच है कि हमारे साहित्यिक- सृजन-संसार में एक बड़ा हिस्सा ऐसी रचनाओं का है, जो अपनी प्रकृति में आत्मनिष्ठ हैं और उनका आत्म व्यापक समाज से तदात्म नहीं है । ऐसे रचयिता अपने वाक-विलास को उच्चभ्रू वर्गों की सेवा में नियोजित करते हैं । उन्हें दरकिनार किया जाय तो जनता से बावस्तगी रखने वाला साहित्य जन-चिन्ताओं को अपनी बौद्धिक शिराओं में धारण करता है । पिछले वर्षों - इसे उत्तर आधुनिक परिदृश्य भी कह सकते हैं - समाज के दलित वर्गों से अनेक लेखक प्रमुखतया अपनी आत्मकथात्मक रचनाएँ लेकर सामने आए हैं जिनमें सामुदायिक व्यथा बोलती है । आधी मनुष्यता - जिसकी व्यथा-कथा को कहने का जिम्मा भी मर्द लेखकों ने ही लिया हुआ था - की प्रामाणिक दास्तान कहने के लिए बड़ी संख्या में नारियों ने अपना संतप्त कंठ खोला है । मुख्यधारा से बाहर रहते आए आदिवासी समाजों के भीतर से भी अनेक लेखक ध्यानपूर्वक सुने जाने लगे हैं। गोया, व्यापक समाज के अधिकतर तबकों की अभिव्यक्तियाँ साहित्य में लोकतान्त्रिक स्पेस पा रही हैं ।

 

प्रश्न : वैश्वीकरण व बाजार का अनन्त-सा विस्तार, सूचना व संचार प्रौद्योगिकी का विकास व विस्तार तथा अमेरिकी युद्धों के चलते जो उथल-पुथल दुनिया में हो रही है उसे मनुष्य के वर्तमान और भविष्य की दृष्टि से आप कैसे देख रहे हैं ?

उत्तर : यह सुहाने झूठों का समय है : जिसे वैश्वीकरण कहा जा रहा है, वह वस्तुत:   भू-बाजारीकरण है , अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी व्यापारी शक्तियों द्वारा एशिया, अफ्रीका, लतिनी अमेरिका, के देश-समाजों को नव-उपनिवेशन की गिरफ्त में जकड़ने का प्रयास । दूसरे शब्दों में, यह नव साम्राज्यवाद का दौर है । इसमें प्रमुख भूमिका संचार माध्यमों को निभानी है । साठ के दशक में ही अन्डरस्टैडिंग मीडियाके लेखक मार्शल मैक्लुहान ने ग्लोबल विलेज - विश्वग्राम-की अवधारणा रखी थी । इस विश्व ग्राम का चौधरी अमेरिका है । सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को आगे किए नव साम्राज्यवाद विश्व-विजय को आतुर है । ज्ञान का स्थान सूचना ने ले लिया है । सूचना-संजाल का इस्तेमाल विभिन्न देश-समाजों की विविधताओं को मिटाकर एक बाजारू एकरूपता लाने में किया जा रहा है । अभी यूनेस्को ने दो (अमेरिका और इज़राइल) के विरुद्ध एक सौ अड़तालीस देशों के बहुमत से देशीय सांस्कृतिक विशिष्टता के विशेष प्रावधानों के द्वारा रक्षा किए जाने का प्रस्ताव पारित किया है । गोया, पश्चिमी पूँजीवादी देशों में भी अमेरिका की हालिवुडीय संस्कृति के आक्रामक प्रसार को लेकर चिन्ता व्यापने लगी है । बहुत पहले ही फ्रांस की संसद ने राइट टू कल्चर’-संस्कृति का अधिकार विषयक प्रस्ताव पारित किया था । युद्ध को आँखों का भोज्य बनाने का - इन्फ़ोटेनमेंटका हिस्सा बनाने का - सिलसिला पिछले खाड़ी युद्ध (१९९१) से ही शुरु हो गया था । चाक्षुष माध्यमों के द्वारा रचे जा रहे माया जगत में युद्ध और मनोरंजन एक-मेक हो गये हैं । ऐसे में , मानवीय संवेदना का क्षरण महसूस भी नहीं होता । पश्चिमी पूँजीवाद संकट ग्रस्त है और अपने परोपजीवी अस्तित्व को बनाए रखने के लिए के लिए खनिज-संपदा और जन-श्रम से समृद्ध तथाकथित तीसरी दुनिया के देशों के शोषण और युद्ध-सामग्री के विपणन पर निर्भर है । आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध शुरु होने से पहले, और आज भी, पूरी दुनिया में आतंकवाद-और राज्य-आतंकवाद भी- को प्रश्रय देने की नीति अमेरिका की विदेश नीति का प्रमुख हिस्सा रही ताकि युद्ध का वातावरण बना रहे और हथियारों का बाजार गर्म रहे । युद्ध के पैरोकार - हंटिंग्टन जैसे लोग क्लैशेस आव सिविलाइजेशनसभ्यताओ के संघर्ष की बात कह रहे हैं । वे यह नहीं देखते कि पूंजीवादी सभ्यता के बलात आरोपण के प्रतिक्रियास्वरूप मुख़्तलिफ़ देश-समाजों में मूल गामी-फंडामेंटलिस्ट-तत्त्वों के उदय और सामाजिक वर्चस्व का घना सम्बन्ध है । नॊम चॊम्स्की ने बहुत पहले ही इस बात को लक्षित किया था कि अमेरिकी प्रभाव वाले अरब देशों यथा सउदी अरब और कुवैत में धार्मिक कट्टरता, अनाधुनिकता और स्त्रियों की बदहाली सर्वाधिक है । कहना न होगा कि मानवता के भविष्य के लिए यह गम्भीर संकट का दौर है ।मुझे अस्तित्ववादी दार्शनिक कीर्केगार्द की कही एक बात याद आ रही है । उनका कहना है : जो स्वतन्त्रता हमारे पास नहीं होती, हम उसकी चिन्ता और माँग करते हैं, जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता । लेकिन जो स्वतंत्रता हमे मिली होती है हम प्राय: उसका इस्तेमाल नहीं नहीं कर पाते , मसलन वैचारिक स्वतंत्रता । अमेरिका स्वयं को मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वैश्विक संरक्षक घोषित करता है,लेकिन लोकतंत्रकी स्थापना के लिए रेजीम-चेंजके नाम पर संप्रभु सरकारों का तख्तापलट कर कठपुतली सरकारों का आरोपण उसका सहज दानवाधिकार है । बहुत पहले, हिन्दी के कवि-कथाकार गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी एक कहानी में बताया था कि भारत के हर बड़े शहर में एक अमेरिका है । अमरीका की विश्व-विजय हमारे मस्तिष्क को एक खास साँचे में ढालकर ही सम्भव और सम्पूर्ण होगी । गोया, जब हम अपनी वैचारिक स्वतंत्रता का भी इस्तेमाल करने के काबिल नहीं बचेंगे । यह एक बड़ा खतरा है जिसको बूझे और जिससे जूझे बिना मानवता का भविष्य सँवर नहीं सकता ।

 

प्रश्न : काफी समय से हम साहित्यकारों से चर्चा कर रहे हैं , उसमें उनकी यह समझ उभरकर आती है कि आज उनके शब्द सामान्य जन तक नहीं पहुँच रहे हैं । इसमें आपका क्या कहना है ?

उत्तर : पहले तो जनता को मोहविष्ट रखने के लिए धर्म की अफीम (बकौल मार्क्स) ही थी अब उसे मदहोश रखने के लिए निरन्तर मनोरंजन की अफीम चटायी जा रही है, बल्कि इधर तो मनोरंजन में धर्म मिला देने से नशा खासा मादक बल्कि मारक हो गया है । पूरी तरह आधुनिक बनने से पहले हम उत्तर आधुनिक युग में पहुँच चुके हैं । जनता टुकुर-टुकुर ताकने की अभ्यस्त हो गयी है - टेलीविजन के पर्दे को, अखबारों के रंगीन कभी-कभी तो रक्त-रंजित पृष्ठों को, अपने नेताओं के वाचाल मुँह को जिससे झूठे आश्वासनों की माया-वर्षा होती रहती है, या फिर क्रिकेट-खिलाड़ियों और फिल्मी सितारों के कृत्य-नृत्य को । इस महिमामयी चित्रशाला में किसी एक कोने में भी लेखक की ब्लैक एण्ड व्हाइट तस्वीर की भी जगह नहीं है। लेखन या कि लेखक ने जनता से किनारा नहीं किया है,जनता ने ही आँखें फेर ली हैं ।जनता की आँखें बँधी हैं ।संस्कृति के सर्जक को संस्कृति के उपभोक्ता में बदल दिया गया है ।आज भी सामान्य जन के जीवन-संघर्ष की, उसके लहूलुहान होते हुए भी अपराजेय जीवट की महागाथा साहित्यिक विधाओं में ही लिखी जा रही है- वह चाहे कविता हो या कहानी-उपन्यास या नाटक-निबन्ध । यह भी गौरतलब है कि आज का लेखक धर्म के राजरथ पर सवारी नहीं कर रहा है । और न ही उसे टेलीविजन-वीडियो माध्यम का आशुगामी अश्व नसीब है । वह निहत्था है और उसे तमाम सत्ताओं से जूझना है - संगठित धर्म की सत्ता से,दिनोदिन नृशंस होती राजसत्ता से, लोलुप धन सत्ता से । नई विश्व-व्यवस्था में एक तरफ तो भारतीय जनता की बौद्धिक सम्पदा की डकैती बहुराष्ट्रीय कंपनियों व निगमों द्वारा तरह-तरह के पेटेन्टों के माध्यम से खुलेआम जारी है,दूसरी तरफ़ जनता और साहित्य के बीच मुफलिसी और निरंतर मनोरंजन के अवरोध खड़े कर। ऊपर से, जनता और साहित्य के बीच पुल बनाने की जिम्मेदारी लाभ-लोभ की व्यावसायिकता से ढक गई है : कवि सम्मेलनों और मुशायरों का मंच मनोरंजन-उद्योग के व्यापारियों के हत्थे चढ़ गया है, जहाँ चुटकुलों-पगे हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलन ही गुंजायमान रहते हैं; हिन्दी के प्रकाशन जनता की आर्थिक समाई में आने लायक जनसुलभ संस्करण न छाप किताबों के राजसी संस्करण सरकारी पुस्तकालयों की ओर मुँह किये धड़ाधड़ छाप रहे हैं। जबकि पुस्तकालय मर रहे हैं, जो बमुश्किल बचे हैं वे किताबों के कारागार भर हैं, वे खुलते नहीं,खुलते हैं तो खिलते नहीं,उबासी लेती हुई एक मलिन उदासीनता वहाँ आपका स्वागत करती है - अनिच्छापूर्वक। बावजूद इसके, भारतीय भाषाओं के साहित्य में बखूबी दर्ज हो रहा है, जिसकी कुछ झलक-भर भारतीय अंग्रेजी साहित्य में मिलती है जो पश्चिमी या पश्चिममुखी देसी बाजार में मंहगे दामों में बिकने में सफल है । बाजार की मुखालफत भी सच्चे साहित्य को मंहगी पड़ रही है।लेकिन इससे क्या ? ’जनता का साहित्य कैसा होशीर्षक निबन्ध में मुक्तिबोध ने बताया है कि जनता का साहित्य जरूरी नहीं कि तत्काल उसे हस्तगत हो जाय याकि पूरा-पूरा समझ में ही आ जाय । बौद्धिक सम्पदा के सृजन का काम तमाम बाधाओं के बावजूद अनवरत जारी रहना चाहिए- वह जनता की ही सम्पत्ति है, आज नहीं तो कल वह उसे बरतेगी । (साभारः लोकविद्या-संवाद, सारनाथ, वाराणासी)

 

 

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 सत्य अमर है - महात्मा गाँधी

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति

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