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और राधा कृष्ण हो गयीं : आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ======================================================= आचार्य जानकीबल्लभ शास्त्री यानी एक साहित्य साधक। जीवन के इक्यान्बें (91) वसंत देख चुका यह तपस्वी, महाकवि आज भी साहित्य साधना से विरत नहीं है। साहित्य की हर क्यारी में नये-नये रंग-बिरंग सुगन्धित पुष्पों के विरवे रोपते रहने वाले इस श्रद्धेय साधक की सृजन उत्कण्ठा आज भी बनी हुई है। अपनी सोच, चिंतन एवं भावनाओं को सुनहरे शब्दों के फ्रेम में जड़ने में नहीं चुकता है यह गीत-मर्मज्ञ। चमचमाते चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान, स्वर में माधुर्य, केवल जीवों से हीं नहीं, सम्पूर्ण प्रकृति से रागात्मक रिश्ता इस महापुरुष की पहचान है। मुजफ्फरपुर का ‘निराला-निकेतन’ यानी ‘लघु वृंदावन’, जहाँ प्रकृति अपनी सम्पूर्णता में समायी दीखती बसेरा है इस राधा-कृष्ण के पुजारी का। द्रुम-लता, गाय-बछड़े, कुत्ते-बिल्लियाँ, कोयल-कबूतर, तीतर-बटेर,आम्र-लीची, कदम-कदली, पुष्प-पराग, भौंरे-मधुमक्खियाँ, जलस्रोत-जलाशय सब कुछ तो है इस लघु वृंदावन में। तभी तो महाकवि के कण्ठ से फूटा- ‘किसने बाँसुरी बजायी...।’, ‘तीखे काँटों को फूलों का श्रृंगार बनादो तो जानूँ।’ यहीं से कवि ने नभ से मंडलाते बादलों को खेत में उतरने के लिए ललकारा है। इस ‘लघु, ‘वृंदावन’ के रमणिक, सारस्वत एवं गीतिल-स्नेहिल वातावरण में आचार्य श्री से राम, कृष्ण एवं राधा के साथ-साथ हिन्दी साहित्य के बारे में लम्बी बातचीत की है पत्रकार वाल्मीकि विमल ने । यहाँ प्रस्तुत है लम्बी बातचीत का मुख्य अंशः =======================================================
-राम आदर्श हैं, कृष्ण यथार्थ। यही कारण है कि कृष्ण जल्दी मन पर चढ़ते हैं। राम आसानी से हृदय में बसते नहीं, क्योंकि आदर्श आचरण में सहजता से नहीं उतरता, उसे स्थापित करना पड़ता है। यथार्थ सहज ही ग्राहय होता है इसलिए हृदयगम्य हो जाता है। वैसे आदर्श और यथार्थ कल्पना की चीज नहीं, आचरण में लाने की चीज़ हैं।
-यथार्थ आदर्श का विरोधी नहीं । आदर्श और यथार्थ में से किसी एक को लेकर राम या कृष्ण को मन में बसाया जा सकता है। मनुष्य के स्वभाव को मद्देनजर रखकर ऐसा भेद किया जाता है, यथार्थ वह नहीं है। आदर्श शब्द ही जैसे कृत्रिम से बचने का प्रयास होता है। गीता वाले कृष्ण अच्छे नहीं लगते राधा वालो कृष्ण सबको भाते हैं।
-मेरी दृष्टि में कृष्णा से राधा श्रेष्ठ हैं। कृष्ण गीता का उपदेश ढोये फिरते है। राधा ने ‘रामायण’ या ‘गीता’ के सहारे नहीं अपनाया कृष्ण को । राधा आदर्श की कायल नहीं हैं। इसलिए तो जीवन के यथार्थ में उन्होंने कृष्ण को एकाकार कर लिया। तर्क के द्वारा उनको मोहित करना उनका लक्ष्य नहीं रहा वही होकर उन्होंने कृष्ण को आत्मसात कर लिया। कृष्ण ऋषि-महर्षि की दृष्टि में महापुरुष हों, कर्मयोगी हों श्रंगारी-सहजमन, किंतु राधा में अकात्मता का भाव मात्र है। वह वहीं हो गयी हैं, उनके कृष्ण गुणों से अपने को आच्छादित नहीं किया । यों कहें कि कृष्ण राधा नहीं हो सकें, राधा कृष्ण हो गयीं । वह उनके अतिरिक्त किसी को नहीं जानतीं। तर्कशास्त्र, पुराण आदि में चर्चा चाहे जितनी बार की जाय, कृष्ण राधा से श्रेष्ठ नही सिद्ध किये जा सकते । सच तो यह है कि कृष्ण ने तर्कों का आश्रय लिया पर राधा ने किसी का नहीं। वह तो कृष्णमय हो गयीं तो, उसमें तर्क की गुंजाइश कहाँ ! राधा कृष्ण में खाली प्रेम नहीं है जैसे सीता–राम में । राधा को लौकिकता को भी संभावना पड़ा । आरंभ से ही अलग-थलग रहीं, उन्होंने कृष्ण से कुछ नहीं चाहा । यह भी नहीं कि वह उन्हीं के पास रहें। सच्ची बात तो यह है कि उन्हीं (कृष्ण) में तन्मय होने के कारण उनको अलग से जानने की जरूरत ही नहीं समझीं। स्वयं वही हो गयीं। राजनीति ने कृष्ण को भिन्न-भिन्न रूपों में बांटा, पर एकमात्र प्रणय ने राधा को कृष्णमय बना दिया।
-कविताएँ जनाभिमुखी होने के बावजूद पाठ्यक्रम में आने या पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने, अथवा चर्चा होने पर ही पाठक को अपनी ओर मुखातिब कर पाती हैं। हाँ, कुछ ऐसे भी भाग्यशाली होते हैं, जिनकी रचनाएँ अपने आप लोगों के मन में बस जाती हैं । नयी प्रेरणा देती हैं, नवनिर्माण की ओर उत्प्रेरित करती हैं । आजकल ऐसी रचनाएँ पाठ्यक्रम में नहीं दी जाती हैं । परीक्षा पास करने के लिए छात्र को इच्छा के विरुद्ध उनमें अपने को लगाना पड़ता है। निश्चय ही इससे कोई लाभ होता, लेकिन मन को कुछ उपपटांग विचारों से अलग रखने में सहायक होती हैं।
-सच्ची बात यह है कि लोगों के जीवन से ही छंद, लालित्य और ऊँचाई का ध्यान कम होता गया है। सब कुछ क्षणिक मनोरंजन के लिए होने लगा है। नित्य नये-नये आनेवाले विचारों को कविता का रूप दिया जाने लगा है, लेकिन जो अपने आप भीतर की प्रेरणा से प्रकट होता है उसमें गद्य-गद्य का ऐसा भेद नहीं रह जाता है बल्कि पद्य से अधिक गद्य प्रश्रय पाने लग जाता है। छंद और लय कविता के श्रृंगार हैं। इनकी वापसी संभव है।
-जहाँ तक में देख रहा हूँ जीवन से लालित्य या औदात्य घटता जा रहा है। जो इच्छा के विरुद्ध लिखा जा रहा है उसमें लालित्य तो लालित्य मन को छूने की शक्ति ही नहीं होती। ज्यों-त्यों मन बहलाव चलता है। रचना ललित रही हो और उद्दात् भी, सहज भी हो और सर्वोच्च भी, यह सब कठिन साधना से ही संभव है। मनोरंजन के युग में उन गहराईयों तक उतरने की आंकाक्षा ही खत्म होती गयी है। कुछ लिखने के लिए लिखा जा रहा है। इतनी पत्र-पत्रिकाएँ हैं, उनको कुछ न कुछ चाहिए, जो दिया जाता है। वह लालित या उच्च औदात्य वाली हो संभव नहीं । मेरा मानना है कि लालित्य का जो चक्कर है, उसमें प्रदर्शन की भावना भी घुली रहती है। सहज भाव से जो प्रकट होता है वह लोलित नहीं भी हो सकता है, परन्तु आवश्यक है। लालित्य हर समय जीवन के लिए उपयोगी नहीं भी होता है, लेकिन मन को उलझाने में समर्थ होता है इसलिए प्रचलित है।
-गद्य के प्रति मेरा अपेक्षा भाव नहीं, किंतु जो बातें अनुभूति की तरह हृदय में बस जाती हैं, वही काव्यात्मक होती हैं, जिनमें काट-छांट की गुंजाइश नहीं। गद्य खोलकर बोलने के लिए है। गंभीर से गभीर विषय को छिछला बनाने का प्रयास है क्योंकि उसमें भिन्नताओं को जोर देकर कहने की गुंजाइश है, कविता में ऐसा नहीं। संत गोस्वामी तुलसीदास एक के लिए कवि बाकी के लिए कवि नहीं, ऐसा नहीं हो सकता । सच्ची बात तो यह है कि मन की विविधता ने तरह-तरह की कल्पनाओं को जन्म दिया । अपने तर्कों के द्वारा लोगों ने उन्हें गद्य में प्रतिष्ठापित करना चाहा । लेकिन कविता में, जैसे कोयल की बोली को दुहराया नहीं जा सकता, उसका आनंद लिया जा सकता है । गद्य में किसी साधारण बात को विस्तार से कहने की गुंजाइश है जबकि पद्य में असाधारण के लिए मात्र संकेत पर्याप्त है । गद्य में आप जिसे खोलकर कह सकते हैं, उसे दूसरा उसी सामर्थ्य से काट सकता है पर जो स्वर हृदय से छिड़ता और हृदय में ही बसता है, उसे भिन्न रूपों में दुहराया ही जा सकता है, नकारा नहीं जा सकता ।
-आजकल के कवि साहित्यकार अपने समय के अनुसार लिख रहे हैं। उनकी रचनाओं में भावनाएँ नहीं विचारों की प्रधानता है। किसी न किसी वाद या विचारधारा से जुड़ जाने के चलते दिल की बात लिखने से रह जाते हैं। राजनीतिक उथल-पुथल उनका मुख्य विषय बन गया है । अर्थात उनकी रचनाएँ राजनीति में पगी है।
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