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चूहे-बिल्ली का खेल (भोजपुरी कहानी) -मूल-कृष्णानन्द कृष्ण -अनु.-पुष्यमित्र आज उसका मन बहुत बेचैन था। रह-रहकर वह कलाई में बंधी घड़ी की ओर देखता। घड़ी की सुई बिना विराम के भागी जा रही थी। और उसका मन सूई की तेजी से भी तेज भाग रहा था। उसके मन के भीतर विचारों की टकराहट चल रही थी। वह संशय की स्थिति में अपनी कोठरी के भीतर ही चक्कर काट रहा था। समय तेजी से भागा जा रहा था। किंतु वह अभी तक निर्णय नहीं कर पाया था कि वह आज की पार्टी मीटिंग में जाए या नहीं। विचारों की उलझन में उलझा वह कुछ तय नहीं कर पा रहा था। एक तरफ पार्टी का आदर्श , अनुशासन और उसका अतीत था, तो दूसरी तरफ मार-काट, आतंक, लूट-पाट, हत्या और चीखते-चिल्लाते लोगों की निर्दोष ऑंखों की चमक थी। विचारों के इसी उहा-पोह में वह कुछ भी निर्णय नहीं ले पा रहा था। बाहर साँय-साँय पछिया हवा चल रही थी।चारों तरफ घुप्प ऍंधेरा छाया हुआ था। हवा के तेज झोंके से खिड़की का पल्ला झटके के साथ खुल गया था। एकबारगी हवा का तेज रेला कोठरी के भीतर घुस आया। हवा के तेज झोंके से टेबुल पर रखा लैम्प भकभका कर बुझ गया। समूचा कमरा एकाएक ऍंधेरे मे डूब गया। कुछ देर तक वह चुपचाप उसी तरह अँधेरे में बैठा रहा। यह अँधेरा, पता नहीं क्यों आज उसे अच्छा लग रहा था।
खिड़की एक बार फिर खड़की। वह थोड़ा सतर्क होकर होकर बैठ गया। कहीं पार्टी के लोग तो नहीं आ पहुँचे। नहीं! ऐसा नहीं हो सकता । वह उठकर खिड़की के नजदीक गया। ग्रिल के नज़दीक से बाहर झाँक कर देखने की कोशिश की, किंतु सिवाय अंधकार के और कुछ नज़र नहीं आया। खिड़की बंद कर वह फिर चौकी पर बैठ गया। सोचने का सिलसिला बदस्तूर जारी था। आज की मीटिंग में नहीं जाने पर यदि लोगों ने उस पर शक कर लिया तो क्या होगा ? ऐसी स्थिति में तो बहुत बुरा होगा। पार्टी के खिलाफ जाने का अंजाम बहुत बुरा होता है। ऐसा सोचते ही वह भीतर तक सिहर उठा। उसके भीतर से आवज आई-नहीं! नहीं!! ऐसा नहीं हो सकता। क्या पार्टी उसके बीस वर्षों की ईमानदारी और वफादारी का ऐसा इनाम देगी ? होने के लिए तो कुछ भी हो सकता है। हालांकि आज की तारीख में उसके पास अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं है। लोगों की हँसी के लिए तो उसने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था। पार्टी का उद्देश्य ही उसके जीवन का मिशन बन गया था। वही ओढ़ना-बिछौना सबकुछ हो गया था। किंतु वह अपने इस चंचल मन का क्या करे ? यह जो देखता-सुनता है उसको झूठा कैसे साबित कर दे। उसका मन उसे बार-बार विचलित करता रहता है, उसका क्या करे वह ? कोठरी में बैठे-बैठे उसका मन उब गया था।कमरे में चारो तरफ अँधेरा पसरा हुआ था। हाथ को हाथ नहीं दिखाई दे रहा था। अंधेरे में उसने माचिस खोजी। काठी निकालकर जलाया। काठी के जलने से समूचा कमरा भक् से प्रकाश में नहा उठा। उसके भीतर भी कुछ भक् से जल उठा। उसने लेम्प का शीशा उतार कर उसे जलाया। कलाई में बँधी घड़ी पर उसकी नज़र गई तो वह उछल पड़ा। बाप रे! टब तो समय बिल्कुल नहीं है। अब क्या करे वह ? यह तो ग़जब हो गया। अब तो वह समय पर किसी भी हालत में नहीं पहुँच पायेगा। और पार्टी मीटिंग में अनुपस्थित रहने का अर्थ वह अच्छी तरह से जानता था। उसने मन में आते बुरे विचारों को एक झटका देकर बाहर किया और म नही मन बुदबुदाया- अच्छा जो होगा देखा जायेगा। किंतु अब उससे यह तांडव नृत्य और नहीं देखा जाता, यह नर संहार और रक्तपात आखिर उनका उद्देश्य यह तो नहीं था ? उनका उद्देश्य तो सिर्फ़ आदमी के बेहतरी के लिए लड़ना था। यह आतंक और रक्तपात तो था नहीं। और उसने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था इस तरह की बातों के बारे में। इसलिए अब वह इन कुकर्मों में शामिल नहीं होगा। जो होगा देखा जायेगा। किंतु अब वह अपने मन के खिलाफ कुछ भी नहीं करेगा । इस निर्णय के बाद वह कोठरी से बाहर जाने की तैयारी करने लगा। क्योंकि अब उसका यहाँ रहना किसी भी तरह से ठीक नहीं था। रिवाल्वर में गोली भरकर उसे बेल्ट के साथ कमर में लटका लिया। साथ में गोलियों से भरा पट्टा भी ले लिया और लैम्प बुझाकर दरवाजे के बाहर अंधेरे में गुम हो गया।
गाँव के दक्षिण में हरिजन टोली है, और उसके दक्षिण है बड़की बाग।बड़की बाग में दिन में भी अंधेरा रहता है। उसी बड़की बाग के बीच में अवस्थित है झमाट बरगद और पीपल का जोड़ा पेड़ । उसी के नीचे है ब्रह्म बाबा का चबूतरा। ब्रह्म बाबा का कुलशील अज्ञात है। इसलिए लोग उन्हें 'अनजान ब्रह्म' के नाम से जानते हैं। गाँव-जवार में उनकी बड़ी चलती है। किंतु दिन में भी अंधेरा रहने के कारण लोग इधर अकेले नहीं आते। पूजा-भखौटी उतारने के लिए भी लोग झुंड में ही आते हैं। लोगों के मन में एक अज्ञात भय समाये रहता है कि अकेले जाने पर कहीं भूत-प्रेत नहीं पकड़ ले। उसी ब्रह्म बाबा के चबूतरे पर सुनसान अंधेरी रात में पार्टी मीटिंग हो रही थी। करीब-करीब सारे लोग आ चुके थे सिवाय कामरेड विजय के। घड़ी की तरफ देखते हुए कामरेड मिश्रा ने कहा-'' अब हमें मीटिंग शुरू कर देनी चाहिए। '' '' किंतु अभी कामरेड विजय नहीं आए हैं। थोड़ी प्रतीक्षा और कर लें ?'' कामरेड रवीन्द्र ने अपनी बात कही। '' पार्टी का काम किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं रोका जा सकता। और एक बात मैं फिर से साफ कर देना चाहता हूँ और वो यह कि हमलोग पार्टी के सिर्फ सिपाही भर हैं। नीति निर्धारक नहीं। हमारा काम पार्टी के आदेश को अंजाम देना भर है। उसमें मीन-मेख निकालने का अर्थ तो सबको मालूम ही है। '' कामरेड मिश्रा की गंभीर आवाज अंधेरे में गूंजी।
कामरेड मिश्रा की आवाज से कुछ देर तक चुप्पी छाई रही। कोई कुछ नहीं बोला। सबलोग प्रतीक्षारत थे अगले आदेश के लिए तभी कामरेड रवीन्द्र ने कहा-'' कामरेड मैं कुछ कहना चाहता हूँ।'' '' कहो , क्या कहना चाहते हो ? '' कामरेड मिश्रा ने कहा। '' कामरेड विजय की गैरहाजिरी को हमें छोटी बात मानकर टाल नहीं देना चाहिए। अगर यही स्थिति बनी रही तो पार्टी का जनाधार खिसक जाएगा। इसलिए यह जरूरी हो गया है कि वैसे तत्वों की पहचान की जाय, जिनके चलते पार्टी की स्थिति कमजोर होती जा रही है।'' कामरेड रवीन्द्र ने सबके सामने अपनी बात रखी।
अंधेरी रात में किसी को किसी का चेहरा तक नजर नहीं आ रहा था। कारेड रवीन्द्र का बात से कामरेड मिश्रा को उसकी ऑंखों में तैरती आशंका की परछाइयों का अहसास हो गया था। कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने कहना शुरू किया-'' इन सवालों पर मैं कुछ फैसला नहीं कर सकता । हाँ इतना जरूर करूँगा कि आपकी इन बातों को मैं उपर की कमिटी में भेज दूँगा विचार के लिए। अभी हमारे पास इन बातों के लिए कोई समय नहीं है और न मैं इन पर कोई निर्णय ही दे सकता हूँ। हमलोगों को अब असली मुद्दे पर आना चाहिए, जिसके लिए हम इकट्ठा हुए हैं। इधर कुछ दिनों से सामंती प्रवृतियाँ फिर जोर मारने लगी हैं। उनका मन फिर बढ़ गया है। अब तो स्थिति ऐसी हो गयी है कि वे भी ताल ठोक कर आमने-सामने आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। इसी का नतीज़ा है, चुरामनपुर की घटना। वह घटना आज भी हमारी छाती पर पत्थर के बौझ की तरह है। कमजोर, बेसहारा सर्वहारा का सरेआम कत्लेआम। उसका बदला होगा , जान के बदले जान। और इस मिशन का कमान अब कामरेड विजय के स्थान पर कामरेड रवीन्द्र संभालेंगें। कहते हुए कामरेड मिश्रा ने सभा खत्म कर दी।
कोठरी से निकलने के बाद कामरेड विजय धीरे-धीरे गाँव के उत्तर की तरफ स्थित रेलवे लाइन के और उत्तर चलिसहा पुल से पछिमाहुते पकवा इनार की तरफ चल पड़े। चलिसहा पुल और पकवा इनार की अपनी कहानी है जो इस इलाके के हर व्यक्ति की जुबान पर विराजमान है। चलिसहा पुल की याद स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों की स्मृति से जुड़ी है, तो पकवा इनार इस इलाके की प्राचीनता की याद दिलाता है। पाकेट से टार्च निकाल कर उसने सावधानी पुर्वक जगह देखी और कुएँ की जगत् पर बैठ गया। यह इस इलाके का प्राचीनतम कुऑं है। हालांकि अब इसका पानी सूख गया है। तब भी लोग आज तक इसे इसी नाम से जानते हैं। उसे जब-जब एकांतवास की जरूरत हुई है, उसने इसी का सहारा लिया है। बिना किसी को बताये वह हप्तों यहाँ अकेले छिपा रहता था। दिन में भी इधर कोई नहीं आता। इसकी दीवारों में उगे पीपल, पाकड़ के पौधों के चलते नीचे कुछ भी दिखाई नहीं देता। इसके अलावा एक कारण और है जो चुरामनपुर के इलाके में प्रसिद्ध है वो ये कि यह इनार भूतहा है। इसलिए रात्रि में कौन कहे दिन में भी कोई इधर आया तो लौटा नहीं। लाश तक का पता नहीं चला। लोग कहते हैं जिन्नों का अखाड़ा हो गया है यह कुऑं। और जिन्न तो कुछ भी कर सकते हैं। इसीलिए दिन में भी लोग इधर आने से कतराते हैं। यही वज़ह है जिसके चलते उसने इस जगह को चुना है।
कुएँ की जगत पर बैठक-बैठे उसे याद आता है । हाईस्कूल पास करने के बाद जब वह गाँव से बाहर आया था, उसे सीधा-सादा जानकर लोग उसे निरा बुद्धू समझते थे। कुछ लोग उसे किताबी कीड़ा कह कर मजाक भी उड़ाते थे, किंतु वह कभी भी किसी से कुछ नहीं कहता था। चुपचाप उन लोगों की बातें सुनता और मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाता। उसका तो एक मात्र लक्ष्य था पढ़ना। बचपन से ही पता नहीं क्यों गरीबों के प्रति उसके मन में अगाध प्रेम पैदा हो गया था। कमजोर का पक्ष लेना और अन्याय का विरोध तो जैसे उसका स्वभाव बन गया था। उसके इसी गुण ने उसे कालेज का हीरो बना दिया था। वह घटना उसे जब याद आती है तो वह रोमांचित हो उठता है। जाड़े का दिन था । वह प्लेग्राउन्ड में बैठा पढ़ रहा था तभी उसका ध्यान लड़कियों की आवाज सुनकर टूटा। सड़क पर खड़ी दो लड़कियों के साथ कालेज के कुछ शोहदे किस्म के लड़के छेड़ रहे थे। वी उठकर वहाँ गया था। उसने लड़कों को मना भी किया किंतु दादा किस्म के लड़कों ने उसकी भी बात नहीं मानी और उससे उलझ गये। वह स्थिति को संभालने की कोशिश करता रहा किंतु जब बात बिगड़ती नज़र आयी तो और उन लोगों ने उस पर हाथ छोड़ दिया। उसके बाद तो स्थिति ही बदल गयी थी। उसने उन दोनो हीरो टाइप के लड़कों की अच्छी धुनाई कर दी थी। और फिर वह अपने कालेज का हीरो बन गया था।
इस घटना के बाद एक दिन संध्या समय लाइब्रेरी में के रीडिंग रूम में उसकी मुलाकात कामरेड मदन गुप्ता से हुई थी। कामरेड मदन गुप्ता उसकी बहादुरी, जुझारूपन, संघर्षशील व्यक्तित्व और इमानदारी के चर्चे सुनकर काफी प्रभावित थे। उससे अपना परिचय बढ़ाते हुए कामरेड ने कुछ बातें की। उस दिन कामरेड मदन गुप्ता को लगा था जैसे उस आदमी के भीतर एक आग की नदी बह रही है। अगर उसकी धार को मोड़ दिया जाये तो कुछ भी किया जा सकता है। इसे उपयोगी बनाया जा सकता है। उसके बाद तो कारेड गुप्ता से उसकी मुलाकात करीब-करीब रोज होने लगी। वाद-विवाद होता। चर्चायें होती। कमजोर, गरीब, दबे-कुचले ग्रामीण परिवेश में जानवरों की ज़िंदगी जी रहे लोगों के जीवन स्तर को सुधारने की बाते होती। उसे ये सारी बातें बड़ी अच्छी लगती। क्योंकि वह खुद एक सीमांत किसान परिवार का सदस्य था।
सोनभद्र के किनारे पर बसा गाँव चुरामनपुर । गाँव की अधिकांश खेती योग्य ज़मीनें बलुआही। इन खेतों में अधिकतर जटही के काँटे और राढ़ी के पौधे सालों भर उगे रहते थे। वहाँ के लोगों के दु:ख-दर्दों का वह सहभागी और सहयात्री दोनों था। कभी-कभी फोड़े का टभकना भी बहुत अच्छा लगता है। यह वही समय था जब उसके भीतर कुछ बदल रहा था। कुछ छूट रहा था। कुछ नया जुट रहा था। बातचीत के घेरे से निकल कर वह मार्क्स, लेनिन और माओत्सेतुंग की दुनिया में घुसा तो फिर कभी पलट कर पीछे देखने का मौका नहीं मिला। किंतु वह उनके विचारों को अंधविश्वास की तरह यहाँ की राजनीति में औरों की तरह ऑंख मूंद कर नहीं उतारना चाहता था। उसके सामने सम्पूर्ण भारतीय समाज का ढाँचा था। वह अपने परिवेश के अनुसार उनकी अच्छाइयों को अमल में लाना चाहता था। इन बिंदुओं पर कामरेड गुप्ता से बातचीत करता। कामरेड गुप्ता विजय की बातों से भीतर ही भीतर प्रसन्न होते । उन्हें लगता था जैसे विजय केरूप् में उन्हें अनगढ़ हीरा मिल गया था। वह कामरेड गुप्ता के साथ पार्टी मीटिंग में आने-जाने लगा था। कभी कभार वह परिचर्चाओं में भी भाग लेता । उसकी वाचाशक्ति और विलक्षण बुद्धि के सब लोग कायल हो चुके थे। धीरे-धीरे पार्टी में उसका आना-जाना बढ़ने लगा था। और वह विजय से कामरेड विजय बन गया था। कामरेड विजय का सम्बोधन सुनकर उसे गौरवबोध हुआ था। उसके बाद तो उसके जीवन का उद्देश्य ही बदल गया था। अब उसकी अपनी कोई निजी ज़िंदगी नहीं थी। उसने अपने स्व को लोक में तिरोहित करने का व्रत ले लिया था।
कामरेड गुप्ता के साथ एक दिन वह जिला कमिटी के कार्यालय गया था। वहाँ उसका परिचय बहुत सारे लोगों से हुआ था। बातचीत के बाद कामरेड सुखराम सिंह द्वारा कामरेड गुप्ता के रिकोमेन्डेसन पर उसे बजाप्ता पार्टी का मेम्बर बना लिया गया था। वह दिन उसके लिए अति प्रसन्नता का दिन था। उसके भीतर दलितों और अपने हक से मरहूम कमजोर लोगों के जीवन स्तर को सुधारने का अदम्य उत्साह था। कामरेड सिंह ने उसे अपने पास बुलाते हुए कहा था, '' कामरेड कामरेड विजय आज से तुम पार्टी के सदस्य हो। पार्टी के अपने नियम कानून हैं। पार्टी का सबसे बड़ा उसूल है, पार्टी के आदेश को बिना किसी हील-हुज्जत के तामिल करना। इसको तुम पहले सबक के रूप में याद रखोगे।'' उसके बाद तो उसका एक डेग पार्टी मिटींग और दूसरा पैर अपने इलाके में रहता था। इसलिए पार्टी कार्यालय में उसका आना-जाना बढ़ गया था। शुरू-शुरू में उसे पार्टी के लिए परचा तैयार करने का काम लिया जाता था। वह बड़े मनोयोग से जा भी काम उसे दिया जाता करता था। रच-रच कर परचा तैयार करता। उसकी अपीलें सीधे लोगों के दिल में उतर जाती। इसके चलते पार्टी का जनाधार मजबूत हो रहा था। और पार्टी में उसकी कद्र की जाने लगी थी। कुछ दिनों के बाद उसे अत्याधुनिक हथियारों के संचालन की ट्रेनिंग भी दी गयी। पहली बार हाथ में राइफल्स पकड़ते ही उसका रोआँ - रोंआँ गनगना उठा था। बगल में रेलवे लाइन पर ट्रेन के गुजरने की आवाज़ से उसके सोचने का सिलसिला टूट गया।
पटरी पर से रेल के गुजरने के बाद फिर वही नीरवता, वही सन्नाटा चारों तरफ पसर गया था। उसके सोचने का सिलसिला फिर शुरू हो गया था। अब वह आस-पास के गाँवों में आने-जाने लगा था। लोगों को एक जगह इकट्ठा करता, उन्हें अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों का ज्ञान कराता। अपनी ज़िंदगी की बेहतरी के लिए संघर्ष की प्रेरणा देता। गरीबों के बीच जाकर उसके मन को सुकून मिलता था। सब कुछ करने के बाद भी उसके भीतर कुछ-कुछ खाली सा रह जाता था, ठीक वैसे ही जैसे गर्मी में ठंढा पानी पीने के बाद भी प्यास नहीं मिटती। नई जवानी, नया खून और सबसे ऊपर कुछ कर गुजरने का जुनून उसे चैन से नहीं बैठने देता। अब उसका समय इसी काम में बीतने लगा था। उसे लगता था जैसे वह अपने मंजिल के करीब पहुँचता जा रहा है। उसकी ईमानदारी, कर्त्तव्यनिष्ठता से प्रभावित होकर कामरेड सिंह ने उसे आपरेशन दल का सदस्य बना लिया दिया था।
आपरेशन दल में शामिल होने के बाद उसकी मुलाकात कामरेड मिश्रा और कामरेड रवीन्द्र से हुई थी। कामरेड मिश्रा आपरेशन दल के भोजपुर जिला इकाई के प्रधान थे और कामरेड रवीन्द्र उनके सहायक थे। उसको इन्हीं लोगो के साथ काम करना था। पहली बार जब उसे आपरेशन में शामिल होने के लिए कहा गया था तो उसका मन रोमांचित हो उठा था। उसके भीतर एक अजीब किस्म का उत्साह हिलोरें मार रहा था। पहली बार आपरेशन में वह सकरी गाँव में गया था। इस आपरेशन में वह सीधे-सीधे तो शामिल नहीं हुआ था, किंतु उसे जो कार्य सौंपा गया था वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं था। आपरेशन शुरू होने से पहले कामरेड मिश्रा ने गाँव का नक्शा रखते हुए सबको समझाया था-'' कामरेड विजय विजय तुम गाँव के मुख्य मार्ग की निगरानी करोगे। किसी भी संकट की आशंका होने पर तुम एक बार सीटी बजाओगे। पुलिस आने पर तीन बार। अपनी सुरक्षा के लिए किसी को भी बिना किसी हिचक के गोली मार दोगे। कामरेड रवीन्द्र पूर्व दिशा की तरफ से अपने साथियों के साथ गाँव में प्रवेश करेंगे। कामरेउ जगन पश्चिम की तरफ अपने दल के साथ चढ़ाई करेंगे। करीब दस-पन्द्रह लोग भेष बदल कर पहले से गाँव में रहेंगे। संकेत मिलते ही चारो तरफ से एक साथ अटैक कर देना होगा। आपरेशन खत्म होते ही सब लोग अपने गंतव्य पर पहुँच जाएंगें।''
इसके बाद की तो कहानी ही कुछ और है। गाँव में घुसने के बाद जो तांडव नृत्य शुरू था उसके वर्णन सुनकर तो रोंगटे खड़े हो जाते हें। ब्राह्मण टोली और राजपूत टोली में कुहराम मचाने के बाद सब लोग हवा में गोली छोड़ते अंधेरे में गुम हो गये थे। आपरेशन के बाद समीक्षा गोष्ठी में उस पर विचार किया गया था। कामरेड मिश्रा सबके कार्यों से खुश थे। इस अभियान में वह सीधे तो नहीं शामिल नहीं हुआ था किंतु उस जीत में उसकी भी भागीदारी थी। इस भागीदारी ने उसे भीतर से गुदगुदा दिया था।
मीटिंग खत्म होने के बाद से कामरेड रवीन्द्र भीतर से काफी बेचैन थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कामरेड विजय को आखिर क्या हो गया था। आज की मीटिंग काफी महत्वपूर्ण थी। इसमें उसका नहीं आना कई लोगों को खल गया था। यह सवाल उसे बार-बार मथ रहा था। कामरेड मिश्रा की बात से उसे कामरेड विजय पर गिरने वाले गाज का अंदाज़ हो गया था। वह कुछ तय नहीं कर पा रहा था कि क्या करे ? क्या न करे ? अब | ||||||||||