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ग़ज़लकारः देवी नागरानी/अक्षय गोजा/संजीवन मंयक
जीने से बेहतर कोई मौसम नहीं
या
बहारों
का
ही
ये
मौसम
नहीं
स्वप्न आँखों
में
सजाया
था
कभी
हम बहारों
के
न
थे
आदी
कभी
आशियाना दिल
का
है
उजड़ा
हुआ
जश्न
खुशियों
का
भी
अब
बेकार
है
मौत का
क्यों
ख़ौफ़ ‘देवी’
दिल
में
हो मौजों की गोद में अब कश्ती संभल रही है तारों का नूर लेकर ये रात ढल रही है दम तोड़ती हुई इक शम्अ जल रही है।
नींदों की ख्वाहिशों में रातें गुज़ारती हूँ सपनों की आस अब तक दिल में ही पल रही है।
ऐसे न डूबते हम पहले जो थाम लेते मौजों की गोद में अब कश्ती संभल रही है।
तुम जब जुदा हुए तो सब कुछ उजड़ गया था तुम आ गए तो दुनियां करवट बदल रही है।
इस ज़िंदगी में रौनक कम तो नहीं है ‘देवी’ बस इक तेरी कमी ही दिन रात खल रही है।
देवी नागरानी दुनिया बड़ी अब हो रही छोटी बहुत
इंसान की उललब्धियाँ यों कम नहीं ये भी कि संहारक बना खुद यम नहीं
उन दूर नक्षत्रों में जा कर खुश हुए पर पास गंदी बस्तियों का ग़म नहीं
यों दायरा समृद्धि का बढ़ ही रहा पर भूख का होता कभी भी कम नहीं
दुनिया बड़ी अब हो रही छोटी बहुत लेकिन हदें बीतर की होतीं कम नहीं
आगे सितारों के जहां तो खोजते कैसे स्वयम् को खोज लें ये दम नहीं
रही कभी मुलाक़ात ये कुछ कुछ शूरू हुई बरसात से कुछ कुछ अकाल पर आघात ये कुछ कुछ
टूट गई ज़ुल्मों की सीमा मुक़ाबले की बात ये कुछ कुछ
चुनाव के दिन पास आए जब प्रकट हुए जज़्बात ये कुछ कुछ
लगे नहीं यारी ऊबाऊ मिलें हमें सौग़ात ये कुछ कुछ
हुए मकां घर टूटे जब-जब रही कभी मुलाक़ात ये कुछ कुछ
घर में सुख तो सब मुसकाए
जब दिल ख़ुश हो लब मुसकाए चाँद उगे तो शब मुसकाए
भूले हैं दुख के साये में ते पहले हम कब मुसकाए
कोई हँसता कोई रोता घर में सुख तो सब मुसकाए
हर ओर सफलता मिलती हो तब आकाश ग़ज़ब मुसकाए
जब-जब होती है जय सच की हर इक कण में रब मुसकाए
पर्व आते ही वे व्याकुल हो गए विश्वव्यापी हो के ख़ुद में खो गए प्रियजनों से कट के लघुतम हो गए
बन गए बच्चे बड़ों से भी बड़े पर बड़े भी यूँ न छोटे हो गए
हर्ष क्या उत्साह क्या और क्या उमंग पर्व आते ही वे व्याकुल हो गए
गप से ऊबे तों यों ही लड़ने लगे लड़ते-लड़ते ऊबने पर सो गए
एक दिन जाना है समझा जबसे ये ज़िंदगी बदली ख़ुदा में खो गए
साँस की आवारगी अच्छी लगे फूल जैसी ताज़गी अच्छी लगे भौंरे की दीवनगी अच्छी लगे
चाँदनी की सेज कोमल सुख-भरी धूप की मर्दानगी अच्छी लगे
लक्ष्य-उन्मुख है प्रकृति-व्यवहार नित ये ग्रहों की बंदगी अच्छी लगे
चित्रकारी शाम के आकाश की वो सुबह की ताज़गी अच्छी लगे
रोशनी ही रोशनी ब्रह्मांड में साँस की आवारगी अच्छी लगे
oअक्षय गोजा चांदपोल गेद के पास, जोधपुर 342001 सजीवन मयंक की दो (व्यंग्य)ग़ज़लें
आज उनके लिये बंद हैं खिड़कियाँ जो नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ उनके हाथों की सारी कटी उंगलियाँ
तेज रफ्तार से सो चले थे कभी क्या खड़े होंगे फिर से कटी उंगलियाँ
बात लाखों की खुलकर मिली खाक में चाहकर न दुबारा बंधी मुठि्ठयाँ
द्वार स्वागत के जिन्के लिये थे खुले आज उनके लिये बंद हैं खिड़कियाँ
जिनकी खबरों से आकाश गुंजिरा रहा। अब भटकते हैं ज्यों वे पते चिट्ठियाँ
इस तरह वक्त बदला है हम क्या कहें आसमां पर गिरी लौटकर बिजलिंयाँ
अंगुलियाँ घी में हैं सर कढ़ाई में कुएं से बचकर गिरे हैं खाई में लौटकर वे आ गए फिर आई में
मानसिक विकलांग हैं तो क्या हुआ अंगुलियाँ घी में हैं सर कढ़ाई में
हम हमारा हाल यारों क्या कहें जबकि खुद सुप्रीम हैं कठिनाई
लोग दारू पी मरे अच्छा हुआ इससे सस्ती मौत क्या महंगाई में
जिनको मैया से नहीं कुछ भी मिला उनको आशा दिख रही भौजाई में
सुलह करने के लिये जिनको चुना लग गये वे लोग हाथापाई में
वे महेशा ही घिरे हैं भीड़ में हमें उनसे काम है तनहाई में
o संजीवन मयंक 251- शनिचरा वार्ड-1, नरसिंह गली, होशंगाबाद (म.प्र.)
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