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क्या नेता, क्या नीतियाँ, क्या सत्ता, क्या तंत्र । सारे बनकर रह गये, लूटपाट का मंत्र ।।
फसल उगाई राम ने, काट ले गया श्याम । होता क्यों हर बार ये, बोलो मेरे राम ।।
पक्ष धरे पाखंड का, झूठी करे दलील । 'कल्चर' को पंक्चर करे, वही तो प्रगतिशील ।।
बार-बार लिखकर थकी, थककर हुई उदास । कब लिख पाई लेखनी, आँसू का इतिहास ।।
रफ़्ता-रफ़्ता सब गये छंद और लय-तान । जीवन-सी कविता हुई, बेरौनक-बेजान ।। o डॉ. रामनिवास मानव अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग, सीआरएम जाट पीजी कॉलेज हिसार, हरियाणा - 125001
रपट लिखाई गिद्ध ने, काग लूटते माल । दिया कबूतर जेल में, कोतवाल ने डाल ।।
घर-घर पलते हादसे खून-खराबा आम । कफ़न लिये चलता शहर, कौन सुबह कब शाम ।।
कहीं दुकानें बन गई, ऊँचे कहीं मकान। दसों दिशा मन पूछता, उस घर की पहचान ।।
उड़ी न चिड़िया पाँख भर, सहमी सी परवाज । कहीं बाज तकता रहा, लिये नए अंदाज ।।
बचपन कैसे सीखता, पढ़ना आम अनार । कानों में बजती रही, लाला की फटकार ।। o भारत भूषण आर्य मकान न. 122, गली नं. 5 ईस्ट आज़ाद नगर दिल्ली - 110051
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