रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

अंक - 11, अप्रैल, 2007

  संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण कथोपकथन भाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

बचपनहलचलविशेषांकसृजनधर्मीलेखकों सेसंपादक बनेंचतुर्दिकशेष-विशेषपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 
 
दोहा

 

डॉ. रामनिवास मानव के दोहे

 

क्या नेता, क्या नीतियाँ, क्या सत्ता, क्या तंत्र ।

सारे बनकर रह गये, लूटपाट का मंत्र ।।

 

फसल उगाई राम ने, काट ले गया श्याम ।

होता क्यों हर बार ये, बोलो मेरे राम ।।

 

पक्ष धरे पाखंड का, झूठी करे दलील ।

'कल्चर' को पंक्चर करे, वही तो प्रगतिशील ।।

 

बार-बार लिखकर थकी, थककर हुई उदास ।

कब लिख पाई लेखनी, आँसू का इतिहास ।।

 

रफ़्ता-रफ़्ता सब गये छंद और लय-तान ।

जीवन-सी कविता हुई, बेरौनक-बेजान ।।

o डॉ. रामनिवास मानव

अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,

सीआरएम जाट पीजी कॉलेज

हिसार, हरियाणा - 125001

 

 

 

भारत भूषण आर्य के दोहे

 

रपट लिखाई गिद्ध ने, काग लूटते माल ।

दिया कबूतर जेल में, कोतवाल ने डाल ।।

 

घर-घर पलते हादसे खून-खराबा आम ।

कफ़न लिये चलता शहर, कौन सुबह कब शाम ।।

 

कहीं दुकानें बन गई, ऊँचे कहीं मकान।

दसों दिशा मन पूछता, उस घर की पहचान ।।

 

उड़ी न चिड़िया पाँख भर, सहमी सी परवाज ।

कहीं बाज तकता रहा, लिये नए अंदाज ।।

 

बचपन कैसे सीखता, पढ़ना आम अनार ।

कानों में बजती रही, लाला की फटकार ।।

o भारत भूषण आर्य

मकान न. 122, गली नं. 5

ईस्ट आज़ाद नगर

दिल्ली - 110051

 

 

आपकी प्रतिक्रिया

 सत्य अमर है - महात्मा गाँधी

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