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इस अंक में पढिए ।। कविताएँ ।।
।। छंद ।। दोहेकार ग़ज़लकार
।। शेष- विशेष ।। शिक्षा...
मीडिया-विमर्श.....
इन दिनों...
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।। संपादकीय ।। अंतरजाल से वैश्विक होते हिंदी गीत प्रागैतिहासिक कालीन गुफाओं और कंदराओं की जो मानव लिपियाँ है वे गवाही देती हैं कि मनुष्य शुरू से ही जीवन में ताल, छंद, लय और रस की फ़िराक में था । जब उसे लिपि या अक्षरों का वरदान मिल गया तब ताड़-पत्रों, ताम्र-पत्रों आदि माध्यमों में उसकी अभिव्यक्ति संपन्न होने लगी । और जब मनुष्य को कागज़ का उपहार मिला तो वह अपनी अनुभूतियों की कोमलतम् और सूक्ष्मतम् अभिव्यक्ति करने लगा । तब से आज तक गीत की धारा सतत् प्रवहमान है । कभी किताबों में, कभी पत्र-पत्रिकाओं में । कभी आडियो सीड़ी में तो कभी वीडियो या वीसीड़ी में ।
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