प्राथमिक शिक्षा की समस्याएं...

प्रकाशन :27-11-2011
डॉ. शशांक मिश्र ‘भारती’
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शिक्षा का स्तर कोई भी हो शिक्षक के बिना उसके अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। प्राथमिक शिक्षा में शिक्षक का महत्व अत्यधिक हैं। माता-पिता के बाद बालक सीधे प्राथमिक शिक्षक के सम्पर्क में ही आता हैं। ऐसे में घर परिवार की परिस्थितियों से विद्यालय को समांजस्य बिठाना पड़ता है जोकि अत्यन्त कठिन कार्य है। घरेलू वातावरण के लाभों को उठाते हुए बुराइयों पर अंकुश लगाते हुए बालक में अध्ययन के प्रति रुचि जाग्रत करना, उसके क्रिया-कलापों में निरन्तरता लाना, दिनचर्या को व्यवस्थित व नियमित करवाना और विद्यालय हेतु आकर्षण उत्पन्न करना महान दायित्व होते हैं। जो कोई बालक इनमें पिछड़ जाता है उसका शिक्षा के लिए किया गया श्रम व्यर्थ हो जाता है। धीरे-धीरे माता-पिता की मनःस्थिति भी वैसी ही हो जाती है। वह बच्चों को समझाना छोड़ देते है।

इधर बच्चे अनेक दुर्व्यसनों का आश्रय विद्यालय समय में ही लेने लगते हैं। तरह-तरह की समाज विरोधी गतिविधियों में सहभागी बनने लगते हैं।

यक्ष प्रश्न यही उठता है कि किस तरह इनको बिगड़ैल न होने दिया जाये ? इन पर प्राथमिक स्तर पर ही नियन्त्रण रखा जाये। इनकी स्थिति को आवश्यकतानुसार, समझकर, सुधाकर मार्गदर्शन दिया जाता रहे। सुधारों का सबसे बड़ा दायित्व शिक्षक पर ही आता है। उसे न केवल इस तरह के दायित्वों का निर्वहन करना पड़ता हैं बल्कि अनेक प्रशासनिक-परिभ्रमण, सामुदायिक-गणना आदि कार्यों को भी करना पड़ता हैं। कभी-कभी विद्यालय में पर्याप्त अध्यापक-अध्यापिकाओं के न होने अथवा एकाकी हो जाने से समस्या और जटिल हो जाती हैं। शिक्षक केवल कक्षाओं कों घेर ही पाता है। अकेले पांच-पांच कक्षाओं को देखना, उनके कार्य का निरीक्षण करना व गृह कार्य देना, पाठ्यक्रम का दबाव आदि ऐसे पहलू हैं, जिनके चलते अकेला अध्यापक विद्यालय को केवल खोल तो सकता हैं, अच्छी तरह चला नहीं सकता और न ही बालकों में किसी प्रकार का सुधार ला सकता हैं।

इसके अतिरिक्त विद्यालय का मुख्यमार्ग के समीप, ध्वनि विस्तारक यंत्रों के अधिकाधिक प्रभाव क्षेत्र में होने, भीड़-भीड़ वाले स्थानों आदि में स्थित होने से शिक्षक का ध्यान तो बंटता ही है, बालक भी रुचि नही ले पाते हैं। उनकी एकाग्रता, बाहरी गतिविधियों से सदैव भंग होती रहती हैं। शरीर भले ही विद्यालय परिसर में हो, मन-मस्तिष्क बाहर सड़क, बाजार, मेलें आदि में ही दौड़ लगाता रहता हैं। यहीं नहीं प्राथमिक विद्यालय में क्षेत्र के लोगों का हस्तक्षेप अधिक रहता हैं। विद्यालयों में चलती कक्षाओं में बालकों के सामने रोज ही उनकी शिक्षको से बातचीत, तो कभी नोंक-झोंक होती रहती है। अतः प्राथमिक शिक्षक अपना प्रभाव बालकों पर नहीं छोड़ पाते हैं और न ही बालक प्रभावित होते हैं। इसी तरह अतिरिक्त कार्य व बोंझ से दबे शिक्षक भी बालकों को अधिक समय न दे पाते हैं।

प्राथमिक शिक्षा जहाँ सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं, वहीं शिक्षक सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक हैं। शिक्षा के विविध वर्गों में यदि बालक पर किसी का सबसे अधिक प्रभाव होता हैं तो वह प्राथमिक शिक्षक ही होता है। बालक अपनी प्रथम शिक्षा माता के बाद सर्वाधिक रुप से प्राथमिक शिक्षा के अध्यापक-अध्यापिका से ही प्राप्त करता हैं। बालकों को जीवन के लिए पूर्ण रुप से सजानें-संवारनें , ठोंक- पीटकर तैयार करने का पूर्ण दायित्व इसी शिक्षक पर होता है। आज कुछ लोग भले ही प्राथमिक शिक्षक के दायित्व कार्यों को कम करके ऑक रहे हों, लेकिन उनका महत्व जैसा पहले था उससे कहीं अधिक आज हैं। क्योंकि प्राचीन काल के सीमित विदेशी आक्रमणों की अपेक्षा आज उस पर उसकी प्रगति को रोकने के लिए समाज के सभी क्ष्ेात्रो से आक्रमण हो रहे हैं। आज उसके सामने पास-पड़ोस, मित्र-मंडली, वातावरण, परिवार ही नहीं दृश्य-श्रव्य मीडिया के भी अनेक तरह के आक्रमण हो रहें हैं। जो कभी-कभी कम आयु में ही उसे बड़ा बनाने का प्रयास करते हैं, अथवा वे स्वयं ही इनसे प्रभावित होकर इनके जैसा बनने का प्रयास करते हैं। आवश्यक है कि कोमल बुद्धि के बालक अनजाने ही शक्तिमान, सुपरमैन या कामिक्स के काल्पनिक कृत्यों में न फॅसे, बल्कि आयु वर्ग समाज देश काल परिस्थितियों के आधार पर समुचित विकास करें।

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 डॉ. शशांक मिश्र ‘भारती’
दुबौला-रामेश्वर-262529,
पिथौरागढ़ (उत्तराखण्ड)
shashank.misra73@rediffmail.com
 
         
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