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एक परिपक्व कवि-मन की संवेदना

प्रकाशन :सोमवार, 6 दिसम्बर 2010
देवी नागरानी

विता एक तजुर्बा है, एक ख़्वाब है, एक भाव है। जब दिल के अंतर्मन में मनोभावों का तहलका मचता है, मन डांवाडोल होता है या ख़ुशी की लहरें अपने बांध को उलांघ जाती है तो कविता बन जाती है । कविता अन्दर से बाहर की ओर बहने वाला निर्झर झरना है ।

कविता शब्दों में अपना आकार पाती है, सोच के तिनके बुनकर, बुनावट और कसावट में अपने आप को प्रकट करती है । रचनात्मक सृष्टि के लिए शब्द बहुत ज़रूरी है, जिनको करीने से सजाकर, सवांरकर एक भव्य भवन का निर्माण किया जाता है । दूसरी विशेषता जो कविता को मुखरित करती है वह है शब्दों को जीवंत बनाने की कलात्मक अभिव्यक्ति जो एक रीति का प्रयोग करने पर रचनाकार को कसौटी पर खरा उतारती है । इन्हीं सभी गुणों की नींव पर निर्माण करती, अपनी देश-परदेश की भूली-बिसरी यादों को जीवंत करती, जानी मानी प्रवासी रचनाकार सुधा ओम ढींगरा की सुन्दर और भावनात्मक कविताएँ ‘धूप से रूठी चांदनी’ काव्य संग्रह में हमारे रूबरू हुई है ।

आज की व्यवसायिक परिस्थितियों में आदमी अपनी उलझनों के दायरे से निकलने के प्रयासों में और गहरे धँसता चला जा रहा है । ऐसे दौर में मनोबल में सकारात्मक संचार कराती उनकी कविता "मैं दीप बाँटती हूँ" अपने सर्वोत्तम दायित्व से हमें मालामाल करती है-

मैं दीप बाँटती हूँ / इनमें तेल है मुहब्बत का/
बाती है प्यार की/ और लौ है प्रेम की /
रौशनी करती है जो हर अँधियारे ह्रदय और मस्तिष्क को ।

निराला जी के शब्दों में "भावनाएं शब्द-रचना द्वारा अपना विशिष्ट अर्थ तथा चित्र द्वारा परिस्पुष्ट होती है । अर्थ शब्दों के द्वारा और शब्द वर्णों द्वारा।" देखिये इसी कविता की एक कड़ी कैसे भाषा के माध्यम से भावों के रत्नों का प्रकाश भरती जा रही है । उनकी दावेदारी के तेवर देखिये-

मैं दीप लेती भी हूँ/ पुराने टूटे-पुटे
नफ़रत, ईर्ष्या, द्वेष की दीप
जिनमें तेल है/ कलह-कलेश का/बाती है बैर-विरोध की
लौ करती है जिनकी जग-अँधियारा

सुधाजी एक बहु आयामी रचनाकार के रूप में हिंदी जगत को अपनी रचनात्मक ऊर्जा से परिचित कराती आ रही है । उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का विस्तार उनकी कहानियाँ, इंटरव्यू, अनुवादित उपन्यास हर क्षेत्र में अपनी पहचान पा चुका है और अब 80 कविताओं का यह संग्रह अपने बहुविध विशिष्टता से हमारा ध्यान बरबस आकृष्ट कर रहा है । इनकी रचनाएँ आपाधापी वाले संघर्षों से गुज़रते बीहड़ संसार के बीच एक आत्मीयता का बोध कराती हैं ।

आज खड़ी हूँ....
ईश्वर और स्वयं की पहचान की ऊहापोह में......

इनकी कवितात्मक ऊर्जा में आवेग है, एक परिपक्व कवि मन की गहन संवेदना, चिंतात्मक और सामाजिक बोध का जीवंत बोध शब्दों के बीच से झाँकता हुआ कह रहा है-

"अब दाग लगे दामन पर जितने, सह लूँगी
दुनिया जो कहे झेलूंगी/ तू जो कहे ....चुप रहूँगी
अपनी लाश को काँधे पर उठाये/ वीरानों में
दो काँधे और ढूँढूँगी / जो उसे मरघट तक पहुँचा दे.......

दर्द ही वो है जो मानव-मन की पीड़ा का मंथन करता है और फिर मंथन का फल तो सभी को समय के दायरे में रहकर चखना पड़ता है । कौन है जो बच पाया है? कौन है जो ज़ायके से वंचित रहा है? सुधाजी ने बड़ी संवेदना से समाज में पनपते अमानवीय कोण की प्रबलता को दर्शाया है । जहाँ नारी की पहचान घर की चौखट तक ही रह गई है, अपने जिम्मेदारियों की सांकल से बंधी हुई वह नारी जकड़ी हुई अपने तन की क़ैद में, घर की क़ैद में-

दुनिया ने जिसे सिर्फ़ औरत
और तूने महज़ बच्चों की माँ समझा

ज़िंदगी की सारी चुनौतीयों से रूबरू कराती कवयित्री की क़लम अपनी सशक्तता का परिचय दे रही है । जो कवि अपने शीश-महल में बैठकर काव्य सृजन करते है वे तानाशाहों के अत्याचारों से वाकिफ़ तो हैं, लेकिन मनुष्य की पीड़ा और वेदना उन्हें द्रवित नहीं करती । धरती पर न जाने कितने लोग कराहते हैं, कितना लहू बहता रहता है, कितनी साँसों में घुटन भर दी जाती है, ज़ुल्मतों का दहकता हुआ साया जब कवि मन पर अपनी छाप छोड़ जाता है, तो क़लम से निकले शब्द जीवंत हो जाते हैं, ख़ामोशियों से सम्वाद करते हैं, उन पीड़ाओं का, जिनको तनमन से भोगा सहा । जहाँ वेदना कराह उठती है वहीँ उनकी बानगी में हर एहसास धीमे से थपथपाता है, टटोलता है और उलझे हुए प्रश्नों का जवाब तलब करता-

आतंकवादी हमला हो
या जातिवाद की लड़ाई
रूह, वापिस देश अपने भाग जाती है

और फिर कटाक्ष करती शब्दावली का रूप देखिये-

तोड़ा था पुजारी ने
मंदिर के भरम को
जब सिक्के लिए हाथ में बेईमान मिल गए

जीवन सिर्फ़ जीने और भोगने का नाम नहीं, समझने और समझाने का विषय भी है । इसी काव्य सुधा में उनके उर्वर मस्तिष्क की अभिनव उपज है उनकी अनूठी रचना (जिसको सुनने का मौक़ा मुझे उनके रूबरू ले गया )जिससे उनकी सम्पूर्ण कविताओं की स्तरीयता एवं विलक्ष्णता का अनुभव सहज ही लगाया जा सकता है।"प्रतिविम्ब" में उठाये प्रसंग समाजिक, पारिवारिक चिंतन को पारदर्शी बिम्ब बनकर सामने आये-

मैं आप का ही प्रतिबिम्ब हूँ
बलात्कार से पीड़ित कोई बाला हो
या सवर्णों से पिटा कोई दलित ...
मेरा खून उसी तरह खौलता है
जैसे आप भड़कते थे ।"

लेखन कला अपनी पूर्णता तब ही प्रकट कर पाती है जब भाषा या शैली अपने तेवरों के प्रयोग से कल्पना और यथार्थ का अंतर मिटा दे... अपने परिवेश में जो देखा गया, महसूस किया गया और भोगा गया, उसे विषय-वस्तु बनाकर कवयित्री अपनी रचनाओं द्वारा पाठक को अनुभव सागर से जोड़ लेती हैं । उनकी अनेक रचनाएँ आप बीती से जग बीती तक का सफ़र करती हुई, हद की सरहदों तक को पार करने की कोशिश में कहती है अपनी कविता "शहीद" में-

"नेताओ और धर्म के लिए
इन्सान नहीं
सिर्फ़ सिपाही शहीद हुआ

हर रचना अपने धर्म क्षेत्र के दायरे में घूमती है, कहीं छटपटाती है, और कहीं-कहीं मंजिल के पास आते- आते दम तोड़ देती है । ऐसी सशक्त कविताएँ हैं बेरुखी, समाज, मुड़ कर देखा, परदेस की धूप, खुश हूँ मैं ,और देस-परदेस की व्यथा-गाथा को बहुत सुन्दरता से माँ के नाम चिट्ठी में लिख भेजा सन्देश उनकी जुबानी सुनें-

परदेस से चिट्ठी आई
माँ की आँख भर आई
लिखा था ख़ुश हूँ मैं चिंता न करना
घर के लिया है किश्तों पर
कार ले ली है किश्तों पर
फर्नीचर ले लिया किश्तों पर
यहाँ तो सब कुछ ख़रीदा जाता है किश्तों पर"
सोच की हर सलवट पीड़ा से भीगी हुई
आँख फिर भी नम नहीं ।

ऐसी अभिभूत करती हुई रचनाओं के लिए सुधाजी को बधाई एवं शुभ कामनाएँ ।

कृति- धूप से रूठी चांदनी
कवयित्री- डॉ सुधा ओम ढींगरा
प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, सिहोर, उ.प्र.
पृष्ठ- 112
मूल्य- 3०० रु.
  देवी नागरानी
देवी नागरानी
9-डी, कार्नर व्यू सोसायटी
15/33 रोड, बान्द्रा, मुंबई-400050
dnangrani@gmail.com
 
         
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