रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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महिष को निहारते हुए - जयप्रकाश मानस
चुनाव जीत गया - गाँव हार गया - कृष्ण बिहारी मिश्र
आषाढस्य प्रथम दिवसे - डॉ. शोभाकांत झा
धरती की बेटी ने कहा... - प्रभा सरस
मेरी पहली कविता - अज्ञेय
जीवन क्या जीया - मनु शर्मा
मुकदमेबाजी का मनोविज्ञान - विवेकी राय
आज मुझे तुलसी बहुत याद आते हैं - विजय कुमार दुबे
चन्द्रमा मनसो जातः - शिवप्रसाद सिंह
अमावस्या के हृदय में लक्ष्मी - कुबेरनाथ राय
दुनिया का स्वर्ग और हमारी गुलामी - गोबिंद कुमार 'गुंजन'
एक दुराशा - बाल मुकुन्द गुप्त
राम की जल-समाधि - महेश चन्द्र द्विवेदी
सूरज क्यों डूबता है ? - शिवबचन चौबे
अभागी स्त्री - महादेवी वर्मा
सावन की फुहार में बाबुल का अँगना - गोपीनाथ कालभोर
ऋद्धि और सिद्धि - गोपालराम गहमरी
अपने होने का असर दिखाता पानी - डा. महेश परिमल
गरेबां चाक करता है - शानी (गुलशेर खान)
लिखने का मतलब - डॉ. शोभाकांत झा
प्रार्थना में ख़ाली - अशोक वाजपेयी
पंकज - रंजना अरगड़े
चली फगुनहट बौरे आम - डॉ. विवेकी राय
बस में चांद - ब्रदीश सुखदेवे
दोपहर में गाँव - जयप्रकाश मानस
राष्ट्र भाषा और हमारा गणतंत्र - डॉ. शोभाकांत झा
अगर, मगर और शायद - पद्मश्री रमेशचन्द्र शाह
वसन्त के बिना - धर्मवीर भारती
नहीं चाहिए ऐसा धर्म - अशोक कुमार वशिष्ठ
समय के इस घमासान मेः डॉ.कृष्ण कमार रत्तू
सत्य का मतलब - जयप्रकाश मानस
पेड़ का आत्मकथ्य : मनोज सोनकर
कुम्भ : जन, जल और आस्था - प.विद्यानिवास मिश्र
माँ - उमाशंकर मालवीय
परमात्मा का जन्म और कविता - डॉ. श्रीराम परिहार
ये रहीम दर-दर फिरैं- डॉ. विश्वनाथ प्रसाद
मध्याह्न का काव्य- काकासाहब कालेलकर
सनातन नदी : अनाम धीवर- कुबेरनाथ राय
सर्दी की सुखद धूप- डॉ. सन्तराम देशवाल
नारियल- विद्यानिवास मिश्र
‘रामचरितमानस’ में शक्ति-भक्ति का संगम- विवेकी राय
अधेंरे में उम्मीद- डॉ. श्रीराम परिहार
वंदे मातरम्- अमृत राय
भारत होने का अर्थ- डॉ. युगेश्वर
सड़क पर दौड़ते ईहामृग- डा. श्यामसुंदर दुबे
रोजमर्रा- डॉ. शोभाकांत झा
आपकी प्रतिक्रिया
जितेन्द्रिय राजा ही प्रजा को वश में रख सकता है - मनुस्मृति
संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, संजीव ठाकुर, कामिनी, प्रगति
तकनीकः प्रशांत रथ
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