” मैं अनन्य कुमार बोल रहा हूँ ।”
” आप अनन्य कुमार ही बोल रहे हैं न ?
” जी , मैं अनन्य कुमार ही बोल रहा हूँ ।”
” मेरा नमस्कार । मैं कांति कुमारी बोल रही हूँ ।”
” नमस्कार कांति कुमारी जी । आपका लेख उर्वशी में पढ़ा था । अच्छा लिखती हैं आप “ कहिये, कैसे याद किया है आपने ? ”
” अनन्य कुमार जी, आपका इंटरव्यू लेना चाहती हूँ।”
” ज़रूर लीजिये।”
” आपके कृतित्व और व्यक्तित्व पर मैंने दस प्रश्न बनाए हैं। ”
” बस दस। प्रश्न बढ़ाईयेगा।”
” पाँच और जोड़ देती हूँ।”
” आप जोड़ने की चिंता मत कीजिये। मैं स्वयं ही जोड़ लूँगा।”
” आप प्रश्न जोड़ने का कष्ट नहीं करियेगा। मैं ही लिख कर आपको भेज दूँगी। ”
” जैसी आपकी इच्छा।”
कांति कुमारी ने पंद्रह प्रश्न भेजने में देरी नहीं की। पाँच दिनों के भीतर ही उसे सभी प्रश्नों के उत्तर मिल गये। झट मँगनी पट ब्याह वाली बात हुई। प्रश्नों के उत्तरों के साथ पूरे आठ सौ शब्दों में अनन्य कुमार का बायोडाटा ही था।
उन्होंने अपनी तारीफ़ में क्या–क्या नहीं लिखा था ! कांति कुमारी पढ़ती गयी और दाँतों तले उँगलियाँ दबाती गयी। पंद्रह के पंद्रह प्रश्नों की इबारत बदली हुई थी । एक शब्द भी उसका लिखा हुआ नहीं था।
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