प्रदूषण |
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मंदिर के प्रांगण में जागरण का कार्यक्रम था । औरत-मर्द, बच्चों को मिलाकर दो सौ की भीड़ । शहर के दूसरे छोर तक लाउडस्पीकर बिजूखे की तरह टँगे थे । गायक की तीखी आवाज़ से सिर भन्ना गया था । वह एकदम बाहरी सड़क पर निकल आया । सूखे ठूँठ के पास कोई बैठा था । ‘कौन’ उसने पूछा । ‘मै भगवान हूँ ।’ मरियल-सी आवाज़ आई । ‘भगवान का इस ठूँठ के पास क्या काम’ उसे तो किसी मंदिर में होना चाहिए । ‘मैं अब तक वहीं था,’ आकृति ने दुःखी स्वर में बताया- ‘शोर के कारण कुछ तबियत गड़बड़ हो गई थी । इसीलिए यहाँ भाग आया हूँ ।’ |
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