प्रदूषण

प्रकाशन :01-04-2007
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

प्रदूषण

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रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
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मंदिर के प्रांगण में जागरण का कार्यक्रम था । औरत-मर्द, बच्चों को मिलाकर दो सौ की भीड़ । शहर के दूसरे छोर तक लाउडस्पीकर बिजूखे की तरह टँगे थे । गायक की तीखी आवाज़ से सिर भन्ना गया था ।

वह एकदम बाहरी सड़क पर निकल आया । सूखे ठूँठ के पास कोई बैठा था ।

‘कौन’ उसने पूछा ।

‘मै भगवान हूँ ।’ मरियल-सी आवाज़ आई ।

‘भगवान का इस ठूँठ के पास क्या काम’ उसे तो किसी मंदिर में होना चाहिए ।

‘मैं अब तक वहीं था,’ आकृति ने दुःखी स्वर में बताया- ‘शोर के कारण कुछ तबियत गड़बड़ हो गई थी । इसीलिए यहाँ भाग आया हूँ ।’

 
 

 

  

 
         
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