रुख को मोड़
जंजीरों में जकड़ी हुई वहकब उड़ सकेगी
पलकों में सपने और पैरों में जंजीर लिए
क्यों उलझ रही है
वह कल्पनाओं का पिटारा लिये
वैज्ञानिकता से लदी हुई
क्षमताओं से विस्मय करने वाली
अंधविश्वासों से लड़ने वाली
अपने आधार के लिए मर मिटने वाली
वह कहीं न कहीं विवश है
विवशता के बन्धनों को तोड़
समाज के रुख को मोड़
अपने भविष्य को ख़ुद बना
बेख़ौफ़
भूख से लाचारमैंने उस लड़की को देखा
भूख से तंग थी
पर हिम्मती भी
कड़ी धूप में घर से
निकल चौराहे पर देख रही थी
कहीं कोई राहगुज़र मिल जाए
आज रात के खाने का बंदोबस्त हो जाए
ग्राहक की तलाश थी जारी
माँ की दवाइयां ख़त्म हो चुकी थी
भूख और बेबसी से घिरा दिन
पिता बड़ा परिवार उसके कंधे पर लाद
चले गए उस लोक,
जहाँ के लिए माँ तरसती है हर रोज़
बेघर बना उसे सड़क पर ला खड़ा किया
पता भी कहाँ चला - क्यों ऐसा हुआ ?
क्या ग़लती, क्यों वह मजबूर
लोग हैं कि उसे बुरा कह रहे
पर वह है कि
बेदर्द ज़माने को ठोकर मार
सड़क पर बेख़ौफ़ खड़ी है
अदिति मजूमदार
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