प्रवासी कविताएं

प्रकाशन :23-11-2010
अदिति मजूमदार
रुख को मोड़
जंजीरों में जकड़ी हुई वह
कब उड़ सकेगी
पलकों में सपने और पैरों में जंजीर लिए
क्यों उलझ रही है

वह कल्पनाओं का पिटारा लिये
वैज्ञानिकता से लदी हुई
क्षमताओं से विस्मय करने वाली
अंधविश्वासों से लड़ने वाली
अपने आधार के लिए मर मिटने वाली
वह कहीं न कहीं विवश है

विवशता के बन्धनों को तोड़
समाज के रुख को मोड़
अपने भविष्य को ख़ुद बना

बेख़ौफ़
भूख से लाचार
मैंने उस लड़की को देखा
भूख से तंग थी
पर हिम्मती भी

कड़ी धूप में घर से
निकल चौराहे पर देख रही थी
कहीं कोई राहगुज़र मिल जाए
आज रात के खाने का बंदोबस्त हो जाए

ग्राहक की तलाश थी जारी
माँ की दवाइयां ख़त्म हो चुकी थी
भूख और बेबसी से घिरा दिन

पिता बड़ा परिवार उसके कंधे पर लाद
चले गए उस लोक,
जहाँ के लिए माँ तरसती है हर रोज़
बेघर बना उसे सड़क पर ला खड़ा किया
पता भी कहाँ चला - क्यों ऐसा हुआ ?

क्या ग़लती, क्यों वह मजबूर
लोग हैं कि उसे बुरा कह रहे
पर वह है कि
बेदर्द ज़माने को ठोकर मार
सड़क पर बेख़ौफ़ खड़ी है

  अदिति मजूमदार
300 Indian Branch Dr Morris-ville NC ---27560, USA
maditi1999@yahoo.com
 
         
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