कोई और सवाल?

प्रकाशन :11-04-2012
जय वर्मा

ज डोरीन ने आज़ादी की साँस ली !

बाईस वर्षों में पहली बार डोरीन अकेली घर से बाहर निकली थी। लहराती हुई पतली सड़क पर लाल रंग की बस तेज़ी से वादियों के बीच चली जा रही थी। चार्नवुड एक लेस्टरशायर की छोटी-छोटी पहाड़ीयों के बीच में बसा एक रमणीक और आकर्षक गॉंव है। इंग्लैंड के मुख्य मोटरवे ‘एम.वन.’ के पास होते हुए भी चार्नवुड में यातायात के बहुत ही कम साधन उपलब्ध हैं। रेल तो यहाँ है ही नहीं। नेशनल एक्सप्रेस की बस भी दिन में केवल दो बार आती है। मार्ग में बिना कुछ कहे अपने गंभीर विचारों में लीन केवल डोरीन ही जानती है कि उसने शादी से लेकर अब तक बाईस वर्ष कैसे बिताये।

डोरीन देखने में बहुत सुंदर थी। मां-बाप ने उसे बहुत प्यार और दुलार से पाला था। अपनी नीली आँखें, सुनहरे घुंघराले बालों के सौंदर्य के कारण प्रत्येक वर्ष स्पोलडिंग मेले में आयोजित सुंदरी प्रतियोगिता में ‘ब्यूटी क्वीन’ का ख़िताब जीतती थी। उसके पापा की बड़ी सी लॉरी को ट्यूलिप्स के फूलों से सजा कर फ्लोट में परिवर्तित कर देते थे। वे सजी हुई झांकियाँ लिंकनशायर के रंग-बिरंगें ट्यूलिप्स के खेतों के बीच से गुजरती हुई अति आकर्षित लगती हैं। इस वार्षिक फूलों के कार्निवाल को दूर-दूर से लोग देखने आते हैं। डोरीन मुकुट पहनकर फ्लोट में बैठती तो समस्त परिवार उस पर गर्व करता। बड़ी बहन सिलविया कभी-कभी थोड़ा चिढ़ जाती और बड़बड़ाती, “हर साल डोरीन को ही क्यों ‘ट्यूलिप फ़ेस्टिवल’ में फूलों की फ़्लोट में ‘ब्यूटी क्वीन’ बना कर बिठाया जाता है?”

उन्माद भरे वातावरण में भी डोरीन को अभिमान और अकड़ का आभास न था। चमक-दमक की चकाचौंध जिंदगी में भी वह संजीदगी और शीलता का संतुलन बनाये रखती थी। उसे दुनिया की दौड़ में कदम से कदम मिलाकर उल्लासपूर्ण आधुनिक जीवन जीने की अभिलाषा थी। समय के साथ आगे बढ़ने की तन्मयता के बावजूद डोरीन का ध्यान पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता था। फ़ैशन के प्रति उसका रुझान था और सज़ने-सवंरने का उसे शौक भी। डोरीन ने सोलह वर्ष की आयु में ही अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा समाप्त कर सहेलियों के साथ ‘लिंकन’ नामक शहर में एक कपड़ों की फैक्टरी में मशीनिस्ट का काम आरंभ कर दिया। माँ ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “उच्च शिक्षा के बिना भविष्य का क्या होगा, अपने जीवन के बारे में सोचो।”

नो! मॉम मैं अब और नहीं पढ़ूंगी, मेरी यही मर्ज़ी है।”

माँ के बार-बार समझाने के बावजूद डोरीन ‘ए’ लेवल के लिए कॉलिज नहीं गयी, माँ उसके भविष्य के लिए चिंतित रहती।

चार्नवुड गांव के रहने वाले पीटर जॉन्सन के साथ डोरीन ने ‘सिविल मेरिज’ करने का इरादा माँ को बताया। अठारह साल की डोरीन ने माँ को यह कहकर चुप कर दिया,“माँ यह जीवन मेरा है जिसे मैं अपने अनुसार जीना चाहती हूँ। जीवन बस एक ही बार मिलता है। तुम शादी का यह फ़ैसला मुझ पर छोड़ दो।”

ऐसे में माँ करती भी क्या? वह भौचक सी देखती रह गयी और कहा, “अपने निर्णय पर पुनः विचार करना, बिना पढ़ाई पूरी किये शादी का फ़ैसला उचित नही है।”

बेटी के विद्रोह पर वह दुःखी थी लेकिन चुप रही। वह अपने जीवन के अनुभवों के बावजूद बेटी को यह न समझा सकी कि जीवन साथी की तलाश करना तो बेटी का जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन एक सही पति का चुनाव होना कितना कठिन।

शादी के बाद पीटर और डोरीन का दाम्पत्य जीवन प्रसन्नता और प्रेम के साथ तेज़ी से बीतने लगा। एक बेटा डेविड तथा दो बेटियों को डोरीन ने जन्म दिया। बेटियों के नाम लूसी तथा एना रखे। मातृत्व का आनन्द लेती हुई वह घर के कामकाज सुघड़ता से करती। गृह कार्यो से निवृत्त होकर अपने पति की सहायता के लिये छोटे से फ़ॉर्म पर मुर्गियों के अंडे इकट्ठे करके अपने पति की सफेद रंग की चारों तरफ से ज़ंग लगी मिनी वैन में बाजार बेचने के लिये रख देती। थोड़े दिनों के बाद मुर्गियों तथा सफेद टर्कियों के पंख भी साफ करके वह बेचने के लिए मार्किट में हर शनिवार को पति के साथ भेजने लगी। दिसंबर के महीने में विशेषतः क्रिसमस के आस-पास मुर्गियों और टर्कियों की माँग बढ़ जाने के कारण काम और अधिक हो जाता लेकिन डोरीन उसे भी चुनौती मानकर अपना उत्तरदायित्व भली प्रकार निभाती। क्रिसमस गिफ्ट्स के लिए नये उत्साह के साथ वे ओवर टाईम करते।

पीटर डोरीन से कहता “तुम्हारी सहायता से अपने इस लघु व्यवसाय में अच्छी आमदनी होने लगी है।” वह लौटते समय रास्ते से ही खाने-पीने की चीजें ख़रीद कर घर ले आता। डोरीन अपनी रसोई में केक, बिस्कुट, डबल रोटी तथा पेस्ट्री स्वयं ही बनाती। उसे खाना बनाने का बहुत शौक़ था। पीटर से अक्सर कहती “अगर अवसर मिले तो बजाय फ़ॉर्म पर काम करने के मैं अपना एक कॉफ़ी हाउस या छोटा सा रेस्टोरेन्ट खोलना पसंद करूंगी।” डोरीन बच्चों के स्वेटर बुनती तथा कपड़ों की सिलाई भी स्वयं करती। तीनों बच्चे निर्भीकता से टॉमी कुत्ते के साथ आपस में खेलते, किलकारियाँ भरते तथा भेड़ों को पकड़ने की कोशिश करते हुए नये-नये खेल प्रतिदिन बनाया करते।

एक दिन डेविड न जाने कहॉ खो गया ? उसे पुकारते हुए सब जगह ढूँढ़ा, फ़ॉर्म का कोना-कोना छान डाला, लेकिन पांच वर्ष का डेविड कहीं नहीं मिला। इंग्लैंड के बरसाती मौसम की कौंधती बिजली तथा सर्दी के वातावरण में भय और आशँकाओं से उसका मन भर आया। तरह-तरह के बुरे विचार मन में आने लगे ‘मेरा नन्हा सा बच्चा न जाने किस हाल में होगा ?’ ‘बारिश भी रुकने में नही आ रही है... वह भूखा-प्यासा न जाने कैसा होगा?’ मॉं की ममता के साथ बच्चे की सुरक्षा तथा पति के घर वापस लौटने पर घर में झगड़ों की कल्पना से घबरा गई। वह पसीने-पसीने हो गयी! उसकी समझ में नही आ रहा था कि अब क्या करे? कई घण्टे ढूढॅने के बाद डेविड भेड़ों के पास भूसे के बार्न में आराम से सोता हुआ मिला। फूल से मासूम चेहरे को देख कर उसने चैन की साँस ली। डोरीन ने खुशी के आवेग के साथ बच्चे को गोद में समेट लिया। “ओह! थेंक गुडनैस... मदर मेरी तेरा बहुत धन्यवाद।”

डोरीन के पास दिन में एक पल भी खाली न होता था। वह गृहस्थ जीवन में ऐसे व्यस्त हो गयी कि बाहर की दुनिया उसके लिये एक अज़नबी चीज़ बन गयी थी। उसने एक दिन पीटर से कहा “चलो बच्चों को उनकी नानी से मिलवाने के लिए शहर ले चलते है। शादी के बाद अब तक मैं भी मां से मिलने न जा सकी। वे भी हमें उतना ही याद करती होंगीं।” पीटर ने कुछ नहीं कहा और न कोई उत्साह ही दिखाया। “अगले रविवार छुट्टी के दिन हम मां से मिलने लिंकन जायेंगे।” डोरीन को ख़ुशी और उमंग के कारण नींद नही आयी। रात में सोने से पहले उसने बच्चों को गर्म पानी से नहलाकर सुला दिया। उनके पहनने के कपड़े, बिस्तर के पास मेज़ पर रखकर वह अपने लिये एक ड्रेस ढूँढ़ने लगी।

फिर बैठकर धीमी रोशनी में अपनी एक नीली तथा सफ़ेद फूलों की ड्रेस की तुर्पई करने लगी। पीटर ने ऊंची आवाज़ में कहा “बिजली बन्द कर दो, वरना इसका बिल कौन देगा?” डोरीन ने दबी आवाज़ में कहा “सात वर्ष हमारी शादी को हो गये हैं, तुमने आज तक मेरे लिए कोई भी नये कपड़े या जूते नहीं ख़रीदे हैं। मैं अपनी मां से मिलने कल फटे कपड़ों में कैसे जाउँगी? हमारे तो कोई पड़ोसी या मेरी सहेली भी नहीं है जिससे मैं कपड़े मांग सकूँ! मैं पन्द्रह या बीस मिनट में अपनी पुरानी ड्रेस ठीक कर लूँगी, तुम सो जाओ वरना बच्चे जाग जायेंगे और अगर वे जाग गये तो उनको पिलाने के लिए घर में दूध भी नहीं है।”

सुबह उठकर डोरीन ने जल्दी-जल्दी घर का सब काम किया तथा बच्चों को तैयार करने लगी। तभी पीटर ने रसोई में आकर पूछा “मेरा नाश्ता कहां है, मुझे बहुत भूख लगी है।” डोरीन ने थोड़े कड़वे व मीठे अन्दाज़ में कहा, “आज ख़ुद तुम अण्डे उबलने के लिए रख दो। मैं बच्चों को तैयार कर रही हूँ। हमें आज शहर मां से मिलने जाना है।” पीटर ने पैर पटके “मैं नाश्ता बाहर ही कर लूँगा ” और घर का दरवाज़ा बाहर से बन्द करके अपनी वैन में बैठकर कहीं चला गया। डोरीन ने वैन के स्ट्रार्ट होने की आवाज सुनी और मन ही मन कहा, ‘शायद पेट्रोल भरवाने के लिया गया है, अभी आ जायेगा।’

बच्चे साफ़-सुथरे कपड़ों में बड़े सुन्दर लग रहे थे। वे आपस में गेंद फेंकते हुए टॉमी कुत्ते के साथ खेलने लगे, टॉमी बार-बार फेंकी हुई गेंद को बाहर से उठाकर लाता तथा मुँह में दबाकर भाग जाता। डोरीन ने कहा, “बाहर कोर्टयार्ड में मत जाना, वरना कपड़े गन्दे हो जायेंगे, आज हम नानी से मिलने लिंकन जायेंगे।” खेलते-खेलते बच्चे थक कर सो गये। पीटर का कहीं नामो-निशान नहीं था। डोरीन दुखी होकर घर का दरवाज़ा खोलने लगी। लेकिन आश्चर्य कि दरवाजा बाहर से बन्द था। आज पीटर के संकीर्ण व्यवहार से व्याकुल होकर बिलख-बिलख कर रोने लगी। आज वह माँ से मिलने की उमंग तथा अपने बच्चों को नानी से मिलवाने की कल्पना में ही उल्लासित हो रही थी। माँ का स्नेह तथा उससे मिलने की ख़ुशी में वह पिछले चार दिनों से सूर्य उदय होने से पहले ही घर के दैनिक कार्य निबटा रही थी।

पीटर के इस व्यवहार से वह बहुत दुखी हुई। क्रोध और आशंकाओं से रह-रह कर अनजाने भय और विचित्र विचार मन में घर करने लगे। ‘पीटर कहाँ चला गया ? कहीं एक्सिडेंट तो नहीं हो गया? कहीं पीटर हमेशा के लिए तो नही चला गया?’ बैचेन होकर उसने फिर से एक बार दरवाज़े को खोलने की कोशिश की। दरवाज़े पर बाहर से ताला लगा हुआ था। उसकी चिन्ता बढ़ने लगी। उसे पहले तो विश्वास ही नही हुआ कि पीटर इतना स्वार्थी कैसे बन गया? वह पीटर को धन लोलुप तो मानती थी, लेकिन वह अपने स्वार्थ को ही श्रेय और श्रेष्ठ मानने की भूल भी करेगा, उसे यकीन न था। ‘अगर किसी बात से नाराज़ था तो बता क्यों नहीं दिया ? बच्चों का तो ध्यान रखा होता ? इतना बड़ा धोखा!’ इस विषम स्थिति में वह अपमान से कांप रही थी।

शाम को पीटर दरवाज़ा खोलकर धड़ाधड़ सीढ़ियाँ उतर कर घर में दाखिल हुआ तथा किचन टेबल पर बैठकर सॉरी कहने के बजाय खाने की मांग करने लगा। डोरीन ने उस की ओर विस्मय से देखा और कोई भी जवाब नही दिया। वह अभी तक उसके धोखे एवं दुस्साहस से नाराज़ थी। “देर से घर क्यों आये? दरवाज़े पर ताला क्यों लगाया?” भीगे गालों को पोंछते हुए बार-बार डोरीन ने प्रश्न पूछे। पीटर ने डोरीन को एक लापरवाह निगाह से देखा। डोरीन को समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा बर्ताव उसके साथ क्यों हुआ? कर्तव्य एवं प्रेम में उसने कभी कोई कमी नहीं रखी। वह तो हमेशा मन और तन से अपने परिवार का काम स्वार्थ-रहित करती रहती। उसे नहीं मालूम कि पीटर के मन में क्या था? क्षमा याचना की उसे पीटर से अब उम्मीद नहीं थी। गुस्से और अपेक्षा से व्याकुल मध्य रात्रि के उपरांत न जाने कब डोरीन को नींद आ गयी। उदास मन से सुबह बच्चों को स्कूल भेजकर वह घर के कामकाज में लग गयी। बाहर के लोगों से डोरीन का सम्पर्क न के बराबर था। कभी-कभी उसकी मां या बड़ी बहन का पत्र आ जाता था। वह पत्र लिखकर पीटर को पोस्ट में डालने के लिये दे देती थी। टेलीफ़ोन की लाईन फ़ॉर्म तक नही पहुँची थी। वार्तालाप के लिये पड़ोस में कोई भी नही था।

धीरे-धीरे समय के साथ बच्चे बड़े हो गये। सोलह वर्ष की आयु में डेविड ने चार्नवुड पार्क में ग्रीनकीपर के साथ काम करना आरम्भ कर दिया। वह काम मेहनत से मन लगा करता। अपना दायित्व समझता। पहले मां को घर के ख़र्चे के लिए थोड़े पाउण्ड्स हर सप्ताह देता था। फिर उसने अपना एक कमरा किराये पर ले लिया। पश्चिमी वातावरण में अक्सर नवयुवक आत्मनिर्भर होकर रहना पसंद करते हैं। दोनों बेटियां लूसी एवं एना दिन में पढ़ाई करती थी और शाम के समय दोनों ‘बुल-हैड’ नाम के एक ‘पब’ में काम करती। डोरीन की दिनचर्या में व्यस्तता और बढ़ गयी। उसका फ़ॉर्म पर काम करने में ही दिन बीत जाता। पसीना बहाकर भी उसे कोई आमदनी नहीं थी। पीटर से वह भयभीत रहती। वह सब पैसा अपने पास ही रखता था। पीटर कई बार देर से घर आने लगा और बात-बात में कहता, “मुझे आराम करने दो मैं थक गया हूँ।” बच्चे कहते, “मॉम, हमें डैडी से डर लगता है, अब वह पहले सा प्यार नहीं करते।”

डोरीन अधिक धार्मिक न होते हुए भी कभी-कभी रविवार को चर्च जाने के लिये इच्छुक होती, लेकिन पीटर ने कभी उत्साह नहीं दिखाया। वैवाहिक जीवन में दोनों की केमिस्ट्री कैसे बदल गयी, इसका पता ही नहीं चला। पीटर को डोरीन या बच्चों से कोई लगाव नहीं था। अब डोरीन को जीवन अभिशाप प्रतीत होता था। वह कर्तव्य समझकर काम और व्यवस्था करती, लेकिन अपने विचार व्यक्त करने में लाचार एवं असमर्थ होती थी। पीटर कभी-कभी बाहर से घर का दरवाज़ा बन्द कर जाता था ताकि वह कहीं आज़ादी से स्वयं बाहर न जा सके। डोरीन का मनोबल और साहस अब कमज़ोर होने लगा था। उसकी मानसिकता एवं आत्मशक्ति कमज़ोर पड़ गयी थीं। पीटर की आदतें अब बदलनी मुश्किल थीं। बच्चों की सोलह वर्ष की आयु के उपरान्त हर हफ़्ते का चाईल्ड अलाउंस बन्द हो जाने की वज़ह से डोरीन और भी पैसों के लिए चिंतित रहने लगी थी। पीटर भी हफ़्ते की हाउस-कीपिंग मनी नहीं देता था। ऐसी आर्थिक स्थिति में डोरीन बड़ी मुश्किल से घर चला रही थी। उसका किसी भी काम में मन नहीं लगता था।

पीटर एक दिन ‘पब’ होता हुआ शाम को जल्दी घर आया। उसे आज घर का वातावरण कुछ अलग सा प्रतीत हुआ। मन ही मन उसे संशय हुआ “कोई है घर में, भोजन की ख़ुशबू भी नहीं आ रही, ऐसा लगता है कि ओवन भी ठंडा पड़ा है?” रसोई में सब जगह ढूँढने पर भी उसे खाना नहीं मिला। क्रोधित हो पुकारा, “मेरा डिनर कहां है?” डोरीन ने जबाब दिया, “क्या पत्नी का काम केवल खाना ही बनाना ही है? क्या मेरी यही ड्यूटी है?” पीटर ने ग़ुस्से में डोरीन पर हाथ उठाया।

इस घटना से डोरीन का मन व्याकुल होकर विक्षोभ और निराशा में डूब गया। अपने अस्तित्व को उसने कुचला हुआ महसूस किया। अपने अंदर की विभिन्न प्रतिरोध शक्तियों के जाग्रण से डोरीन ने दृढ़ता के साथ परिस्थिति का सामना करने का फ़ैसला किया। आत्मसम्मान के लिए घर छोड़ने का निश्चय आज कर लिया। ‘जब पीटर काम पर जायेगा, मैं इस घर में एक मिनट भी नहीं रुकूँगी।‘

वह हिम्मत जुटाकर गंभीर विचार में मग्न बस-स्टॉप पर चुप-चाप आकर खड़ी हो गयी। लंबा बरसाती कोट और हाई बूट पहने हुए दबे पाँव चलती रास्ते भर भय से त्रस्त वह पीछे मुड़कर बार-बार देखती कि ‘कहीं किसी ने देख तो नहीं लिया?’ सिर पर बंधे स्कार्फ़ को संभालती, सड़क पर पड़ी हुई पतझड़ की पत्तियों की आवाज़ से वह घबरा जाती। हाथ में हैंड बैग को कस कर पकड़े हुए मन ही मन प्रार्थना करती कि आने वाली बस निकल न जाये क्योंकि शहर जाने के लिए दिन में केवल दो बार ही बस आती थी।

इस समय वह अपने बच्चे, समाज या किसी अंजाम के बारे में नही सोच रही थी, बस नये जीवन की तलाश में तेज़ गति से आगे बढ़ती जा रही थी।

 


  जय वर्मा
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