पोर-पोर, शाम-शाम, उतर गई आज शाम
वासंती एक शाम,वासंती एक शाम।
चढी धूप उतर गई, सीढी पर ताल के
दियने कुछ थिरक उठे, लहरों की चाल पे,
मंदिर के कलशों से उतर गई आज शाम।
बिन्दी एक लुढक गई, पश्चिम के भाल से
तारे कुछ उभर रहे, संध्या के गाल पे,
केश गुंथे जूडे पर, जुही जुडी आज शाम।
धूल उठी गैलों से, शाखों से उलझ गई,
दिन भर की अकुलाहट,पातों की सुलझ गई
अमुवा के बौरों से, लिपट गई आज शाम।
आंगन के तुलसी के बिरवे के नीचे,
जुडॆ हाथ,झुका माथ, दो अंखियां मीचे,
सधवा के वंदन में,सिमट गई आज शाम।

वासंती एक शाम,वासंती एक शाम।
चढी धूप उतर गई, सीढी पर ताल के
दियने कुछ थिरक उठे, लहरों की चाल पे,
मंदिर के कलशों से उतर गई आज शाम।
बिन्दी एक लुढक गई, पश्चिम के भाल से
तारे कुछ उभर रहे, संध्या के गाल पे,
केश गुंथे जूडे पर, जुही जुडी आज शाम।
धूल उठी गैलों से, शाखों से उलझ गई,
दिन भर की अकुलाहट,पातों की सुलझ गई
अमुवा के बौरों से, लिपट गई आज शाम।
आंगन के तुलसी के बिरवे के नीचे,
जुडॆ हाथ,झुका माथ, दो अंखियां मीचे,
सधवा के वंदन में,सिमट गई आज शाम।
श्री सूरजपुरी
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