एक
ये दुनियाँ हैं घबराई मँहगी दरों से
परेशां है उसपर वो बढ़ते करों से

मैं सुनसान बस्ती में जैसे ही आई
हुई बात मेरी कई पत्थरों से
घरों के किये सब दर-दरीचे
सभी सहमे-सहमे हैं फ़ितनागरों से
नज़र आए आसार हड़ताल के जब
तो मालिक ने की सुलह कारीगरों से
जो हिम्मत से जाते हैं जंगो-जदल में
वो अच्छे हैं बेशक सभी कायरों से
लगा कर वो माथे पे टीका लहू का
कफ़न वीर बांधे चले हैं सरों से
हवाओं में तकरार होती है ‘देवी’
ये जाना परिन्दों के गिरते परों से
परेशां है उसपर वो बढ़ते करों से

मैं सुनसान बस्ती में जैसे ही आई
हुई बात मेरी कई पत्थरों से
घरों के किये सब दर-दरीचे
सभी सहमे-सहमे हैं फ़ितनागरों से
नज़र आए आसार हड़ताल के जब
तो मालिक ने की सुलह कारीगरों से
जो हिम्मत से जाते हैं जंगो-जदल में
वो अच्छे हैं बेशक सभी कायरों से
लगा कर वो माथे पे टीका लहू का
कफ़न वीर बांधे चले हैं सरों से
हवाओं में तकरार होती है ‘देवी’
ये जाना परिन्दों के गिरते परों से
दो
इक सौदा बनके रह गये हो बार बार तुम
ईमान अपना बेचते हो बार बार तुम
नाकामियों की तुमने बना ली है आदतें
पापड़ अभी भी बेलते हो बार बार तुम
घर तक तुम्हारे आग ये पहुंचेगी देखना
घर मुफ़लिसों का फूंकते हो बार बार तुम
कूजागरी के फ़न से तुम्हें वास्ता नहीं
मिट्टी से फिर भी खेलते हो बार बार तुम
हैरान हूँ कि तुमको ज़रा भी नहीं मलाल
दिल से हमारे खेलते हो बार बार तुम
मैंने अना की आग में ख़ुद को जला लिया
घी मुस्कराके डालते हो बार बार तुम
देवी समेट लो कभी, ख़ुद को संभाल लो
बिखरा वजूद देखते हो बार बार तुम
ईमान अपना बेचते हो बार बार तुम
नाकामियों की तुमने बना ली है आदतें
पापड़ अभी भी बेलते हो बार बार तुम
घर तक तुम्हारे आग ये पहुंचेगी देखना
घर मुफ़लिसों का फूंकते हो बार बार तुम
कूजागरी के फ़न से तुम्हें वास्ता नहीं
मिट्टी से फिर भी खेलते हो बार बार तुम
हैरान हूँ कि तुमको ज़रा भी नहीं मलाल
दिल से हमारे खेलते हो बार बार तुम
मैंने अना की आग में ख़ुद को जला लिया
घी मुस्कराके डालते हो बार बार तुम
देवी समेट लो कभी, ख़ुद को संभाल लो
बिखरा वजूद देखते हो बार बार तुम
तीन
ज़रा पत्थरो! ध्यान देकर सुनो तुम
कभी दास्ताँ ख़ामुशी की ज़ुबानी
हुई शहर में सारी वीरान सड़कें
करम दहशतों का, बड़ी महरबानी
कभी चाँदनी रात ओढ़ी है हमने
तो चादर कभी धूप की हमने तानी
गया जो गया, उसपे इतना न सोचो
कि बीते न उसके बिना ज़िंदगानी
जमाती है क्या धौंस उनपर वो देवी
ग़रीबों पे दौलत की है हुक्मरानी
उन्हें देवी छेनी से मैंने तराशा
जो सपनों को साकार करने की ठानी
कभी दास्ताँ ख़ामुशी की ज़ुबानी
हुई शहर में सारी वीरान सड़कें
करम दहशतों का, बड़ी महरबानी
कभी चाँदनी रात ओढ़ी है हमने
तो चादर कभी धूप की हमने तानी
गया जो गया, उसपे इतना न सोचो
कि बीते न उसके बिना ज़िंदगानी
जमाती है क्या धौंस उनपर वो देवी
ग़रीबों पे दौलत की है हुक्मरानी
उन्हें देवी छेनी से मैंने तराशा
जो सपनों को साकार करने की ठानी
चार
सौत है या कोई सहेली है
दूर इक बाँसुरी जो बजती है
चुपके चुपके से देखती है वो
जैसे कोई गुनाह करती है
शर्म से लब अगर सिले तो क्या
राज़े-दिल आँख भी तो कहती है
टूट जाता है दिल का आईना
ठेस पत्थर-सी दिल को लगती है
रास-लीला की याद आती जब
मन ही मन राधिका थिरकती है
दोस्ती मत जहाँ से कर देवी
कब ये होकर किसी की रहती है.
दूर इक बाँसुरी जो बजती है
चुपके चुपके से देखती है वो
जैसे कोई गुनाह करती है
शर्म से लब अगर सिले तो क्या
राज़े-दिल आँख भी तो कहती है
टूट जाता है दिल का आईना
ठेस पत्थर-सी दिल को लगती है
रास-लीला की याद आती जब
मन ही मन राधिका थिरकती है
दोस्ती मत जहाँ से कर देवी
कब ये होकर किसी की रहती है.
पाँच
धर्म-ईमान सब जला क्या है
भूख भी आग के, सिवा क्या है ?
जो है चंगुल में अब फरेबों के
उन से जा पूछिए, दग़ा क्या है?
सारी खुशियाँ लगे अपाहिज सी
सीना पीटे है ग़म, हुआ क्या है?
जब बिछी है बिसात रिश्तों की
सब लगा दाव पर, बचा क्या है?
ठंडे चूल्हे रहे थे जिस घर के
उससे पूछा गया, "पका क्या है"?
बदली हर बार कुर्सियाँ देवी
ये न पूछो बदल रहा क्या है?
भूख भी आग के, सिवा क्या है ?
जो है चंगुल में अब फरेबों के
उन से जा पूछिए, दग़ा क्या है?
सारी खुशियाँ लगे अपाहिज सी
सीना पीटे है ग़म, हुआ क्या है?
जब बिछी है बिसात रिश्तों की
सब लगा दाव पर, बचा क्या है?
ठंडे चूल्हे रहे थे जिस घर के
उससे पूछा गया, "पका क्या है"?
बदली हर बार कुर्सियाँ देवी
ये न पूछो बदल रहा क्या है?
देवी नागरानी
9-डी, कार्नर व्यू सोसायटी
15/33 रोड, बान्द्रा, मुंबई-400050
मो.- 9867855751
ई-मेल- dnangrani@gmail.com
15/33 रोड, बान्द्रा, मुंबई-400050
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