स्याह सफ़ेद

ये भी एक दृष्टिकोण

आधुनिक वेताल कथा

समय-समय पर

ओडिया-माटी

बाअदब-बामुलाहिजा

झरोखा

धारिणी

ब्लॉग गाथा

ब्लॉग गाथा

जून 2010

शिकारी

घिनुआ को इस शब्द का अर्थ मालूम नहीं था। उसे फिर से हाजत में ले जाया गया और समझाया गया, उसका उसके बख़्शीश पाने के दिन नज़दीक आ रहे हैं। घिनुआ उस समय तक नहीं समझ पाया था, वह एक अपराधी है और उसे प्राणदंड की सज़ा सुनाई गई है। उसे कहाँ पता था कि गोविंद सरदार को मारना और झपट सिंह को मारना एक बात नहीं थी। वह समझ नहीं पा रहा था, क़ानून की दृष्टि में एक गुनाह है तो दूसरा गौरव की बात है। आगे पढ़िये...

ओडिया-माटी, (180) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 2 जुलाई 2010
भगवती चरण पाणीग्रही

बिछलन भरी जमीन पर आलोचना का संतुलन

आलोक फतवेबाजी के अतिरेकों से बचते हैं और निष्कर्षात्मक जल्दबाजी से बचते हुए अपनी विश्लेषण क्षमता का प्रयोग करते हैं। जहाँ वे हिन्दी के पूर्ववर्ती आलोचकों से स्वयं को सहमत पाते हैं, उसे बताने में वे कतई संकोच नहीं करते। वे दूसरे की बातों पर अपनी मोहर लगाकर बेचने में विश्वास नहीं करते। इसी कारण उनकी बातें अक्सर पूरी आलोचना परम्परा से छन कर आती हैं और उसे समृध्द बनाने में अपने आलोचकीय श्रम को सार्थक समझती हैं। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (47) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 30 जून 2010
रघुवंशमणि

दूसरों के हक़ का सम्मान शायद उस गुफा-काल जितना ही है

भारत का यह असभ्य और हिंसक समाज दुनिया के उदार समाजों से सैकड़ों बरस पीछे चल रहा है और चुनावी-मतदान का मतलब लोकतंत्र नहीं होता है। कहने को तो आर्थिक विकास के सुबूत की शक्ल में इस देश में आसमान छूती इमारतों की फ़सल सी लहलहा रही है लेकिन इस समाज की हत्यारी सोच को अगर देखें तो लगता है कि पत्थर युग के लोगों ने अपनी गुफाओं को आसमान की तरफ मोडक़र खड़ा कर दिया है आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (61) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 30 जून 2010
सुनील कुमार

चल गई.......!
लघुकथा, (102) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 30 जून 2010,
कुमार प्रमोद

शब्दों के ताप से पिघलेगी पत्थर होती दुनिया

समीक्ष्य कृति 'एक बार फिर ' में संकलित पैंतालिस कविताएँ बिना किसी भूमिका या दावे के सीधे पाठकों को संवाद के लिए आमंत्रित करती हैं। विपिन चौधरी की कविता का फलक बहुत व्यापक है। एक तरफ़ जहाँ कुछ कविताएँ निजी संवेदनाओं को आधार बनाकर लिखी गई हैं, वहीं ज़्यादातर कविताएँ मानवीय अस्मिता को बचाए रखने और एक बेहतर संसार बनाने के संघर्ष की कविताएँ हैं।
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पुस्तकायन, (82) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 30 जून 2010
हरभगवान चावला

अमरीक सिंह पूनी की पुस्तक मरणोपरांत विमोचन

पंजाबी के सुप्रसिद्ध कवि अमरीक सिंह पूनी का काव्य संग्रह " आपे नाल तुरदेयाँ" गत रविवार को पंजाब कला भवन में विमोचित हुआ । इस अवसर पर विशेष तौर पर उपस्थित पंजाब के पूर्व कांग्रस सांसद राणा गुरजीत सिंह ने कहा कि पंजाब के छोटे से गाँव में जन्मे पूनी एक सफल आईएएस आफ़िसर तो बने ही पर उनका पहला प्यार साहित्य ही रहा । मन के अहसासों से लेकर समाज की घटनाओं को वह अपनी लेखनी से इस प्रकार व्यक्त करते थे कि हरेक के मन को छू जाएँ । यह उनकी दसवीं पुस्तक है पर जिसे रिलीज़ करने के लिए वह हमारे बीच नहीं है । आगे पढ़िये...

हलचल, (95) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 29 जून 2010

भिखारी ठाकुर को उनका हक दो

भिखारी को लोर्का, मायकोवस्की, लेर्मंतोब, नाजिम हिकमत, ब्रेख्त जैसे कुछ कवियों से गिड़गिड़ाकर अपने बैठने की जगह माँगते पाया। इस बार भी सपने में दिल्ली ही थी। लोग भिखारी की भाषा नहीं समझ रहे थे। वहाँ मैजूद विद्वान लोग भिखारी को सुन रहे थे पर बाद में मिलना...बाद में....ओ दादा.....ओ......बाद में चलो.....हटो....बाद में ...कल दोपहर में लंच के बाद....वो.....टल हट....कह कर लगभग दुरदुरा रहे थे। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (75) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 29 जून 2010
बोधिसत्व

डॉ. वेद व्यथित का गीत
छंद, (67) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 29 जून 2010,
डॉ. वेद व्यथित

कबहुँ न नाथ नींद भरि सोयो

बहुत सोच विचार करने के बाद नियति से समझौता करते हुए पति ने दस साल बाद पत्नी को साथ रखने का फ़ैसला किया। पत्नी गाँव से बनारस लायी गयीं। उन्हें अनुकूल बनाने का प्रयास शुरू हुआ। ‘‘एक दिन भैया ने भौजी से कहा, ‘देखो, रसोई और झाड़ू बुहारू तो कोई भी कर सकता है लेकिन वह काफ़ी नहीं है। बी.ए. ,एम.ए. होना ज़रूरी नहीं लेकिन जितनी पढ़ाई-लिखाई की है, वह बहुत कम है। मैं कल से किताबें ला रहा हूँ, उन्हें पढ़ा करो। आगे पढ़िये...

आलेख, (69) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 29 जून 2010
मटुक नाथ चौधरी

इसके पहले कि हिंसा कई और मोर्चे खोले..

फ़िलहाल देश के भीतर भ्रष्टाचार को लेकर, लूटपाट को लेकर एक ऐसा घना अंधेरा छाया हुआ है जिसमें रोशनी किसी कोने से आते नहीं दिखती और कभी-कभार इस भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक लपट सी दिखाई पड़ती है तो वह हत्यारे नक्सलियों के बारूदी धमाकों से निकली रौशनी रहती है जिससे लोकतंत्र और समाज को, लुटे हुए लोगों को सिवाय और जख़्मों के कुछ मिलने से रहा। कर्नाटक में लोकायुक्त ने जो मुद्दे उठाए हैं उन पर कर्नाटक से परे भी सोचने की ज़रूरत है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (48) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 29 जून 2010
सुनील कुमार

ग़ज़ल
छंद, (82) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 28 जून 2010,
आर सी शर्मा ‘आरसी’

संताल परगना के विस्मृत मनीषी आचार्य ज्योतींद्र प्रसाद झा "पंकज" के अवदानों का मूल्यांकन ---

हिन्दी विद्यापीठ के युवा सेनापतियों में पंकज का नाम विशिष्ट है. कवि, एकांकीकार व गद्य लेखक के रूप में इन्होंने जितनी ख्याति प्राप्त की उतनी ही ख्याति एक आचार्य समीक्षक के रूप में भी प्राप्त की. मध्यकालीन संत साहित्य व बंगला साहित्य, विशेषकर रवींद्र साहित्य के तो ये अध्येता थे. काव्य-शास्त्र व भक्ति साहित्य इनके सर्वाधिक प्रिय विषय थे. पंकज के अवदानों की चर्चा के क्रम में ’पंकज-गोष्ठी’ का उल्लेख किये बिना कोई भी प्रयास अधूरा ही कहा जायेगा. आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (92) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 28 जून 2010
अमरनाथ झा

आदर्श
लघुकथा, (107) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 28 जून 2010,
रावेंद्रकुमार रवि

दस हज़ार पत्रिकाओं के अनूठे संग्राहक डॉ. ‘मानव’

एक मुलाक़ात में डॉ. ‘मानव’ ने बताया कि उनके पास प्रतिमास देश-विदेश की लगभग सौ पत्र-पत्रिकाएँ आती हैं। पिछले पैंतीस-चालीस वर्षों में उनके पास जितनी भी पत्र-पत्रिकाएँ आई हैं, उनमें से लगभग सभी की एक-एक, दो-दो प्रतियाँ उनके पास सुरक्षित हैं। इन पत्र-पत्रिकाओं में अमरीका की ‘हिन्दी-जगत्’, नेपाल की ‘हिमालिनी’ और मॉरीशस की ‘इन्द्रधनुष’ तो हैं ही, ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘नई धारा’ ‘सारिका’, ‘कादम्बिनी’, ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘वीणा’ जैसी ऐतिहासिक महत्त्व की साहित्यिक पत्रिकाएँ भी हैं। इनके अतिरिक्त हस्तलिखित, फ़ोटोस्टेट की हुई, पोस्टकार्ड़ पर निकलने वाली, गुटका साइज़ और डिमाई साइज़ से लेकर समाचार-पत्र साइज़ में निकलने वाली पत्रिकाओं के साथ-साथ अनेक पत्रिकाओं के भारी-भरकम विशेषांक भी उनके पास उपलब्ध हैं।
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हलचल, (115) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 28 जून 2010

असीम सामर्थ्य तो अंदर है... !
प्रेरक प्रसंग, (123) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 27 जून 2010,
पंकज त्रिवेदी

हिन्दी से दूर होते हिन्दी के अखबार

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हिन्दी का एक बड़ा पाठक वर्ग आज भी अंग्रेजीमिश्रित हिन्दी के खिलाफ हैं। कार्पोरेटस्वरूप लेकर तेजी से फैलते भास्कर पत्र समूह एवं कुछ हिन्दी के कुछ अन्य समाचार पत्र सम्मानजनक मानदेय देने लगे हैं। पेजथ्री पढ़ाने वाले हिन्दी के अखबारों में स्थानीय लेखकों को स्थान नहीं मिल पाता है और न ही उन्हें सम्मानपूर्वक मानदेय दिया जाता है। पाठक वर्ग भी इन दिनों अखबारों को गंभीरता से नहीं ले रहा है। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (92) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 27 जून 2010
मनोज कुमार

वह तो कविता का ही घर...

''समूचा साहित्य एक प्रयत्न है : जीवन को वास्तविक बनाने का। जैसा कि हर कोई जानता है, जीवन अपने प्रत्यक्ष रूपों में पूरी तरह अवास्तविक है: जो कुछ हम देखते-महसूसते हैं, उसका यथावत् संप्रेषण नामुमकिन है जब तक हम उस सबको साहित्य में परिणत नहीं कर देते। इस तरह देखा जाय तो बच्चे महान् लेखक होते हैं क्योंकि वे वैसा ही बोलते हैं जैसा महसूस करते हैं' न कि वैसा, जैसा अपने बड़ों के मुताबिक उन्हें बोलना चाहिए। बोलना? क्या हम जानते हैं बोलना? कैसे लिखित आवाज़ और बौध्दिक बिम्बों का इस्तेमाल करते हुए होना-सचमुच होना! यह हम कर सकें तो सचमुच धन्य हो जाएं क्योंकि जीवन का मूल्य इससे ज्यादा कुछ नहीं है। बाकी तो नर-नारी, ... उनके मनगढ़न्त प्रेम, और झूठी आत्म-छलनाएं हैं।
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डायरी, (134) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 27 जून 2010
रमेशचन्द्र शाह

दो लघुकथाएँ
लघुकथा, (133) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 27 जून 2010,
आलोक कुमार सातपुते

बाज़ार के हवाले ‘हम भारत के लोग’

आम आदमी का नाम लेते हुए ख़ास आदमी के लिए यह सारा तंत्र समर्पित है। भ्रष्टाचारियों के सामने नतमस्तक यह पूरा का पूरा तंत्र आम आदमी की ज़िंदगी में कड़वाहटें घोल रहा है। तेल की अंर्तराष्ट्रीय बाज़ार में जो क़ीमत है उससे अधिक उसपर ड्यूटी लगती है। इसलिए अगर सरकार को तेल पर सब्सिडी देनी पड़े तो देने में हर्ज़ क्या है। सरकार अगर हर जगह से अपने हाथ खींच लेगी और सारा कुछ बाज़ार की ताक़तों को सौंप देगी तो ऐसी सरकार का हम क्या करेंगें। सरकार भले अपने इस क़दम को तर्कों से सही साबित करे किंतु एक जनकल्याणकारी राज्य, हमेशा अपनी जनता के प्रति जवाबदेह होता है, बाज़ार की शक्तियों का नहीं। किंतु ऐसा लगता है कि आज की सरकारें कारपोरेट, अमरीका और बाज़ार की ताक़तों की चाकरी में ही अपनी मुक्ति समझती हैं। आगे पढ़िये...

प्रसंगवश, (54) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 27 जून 2010
संजय द्विवेदी

बड़ा होने लगा है सूरज
कविता, (156) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 27 जून 2010,
अपर्णा भटनागर

परदेस में देस का रंग

ग्यारह कवियों के इस संग्रह की बड़ी ख़ूबी यह है कि इसमें देस की मिट्टी की ख़ुशबू बिखरी पड़ी है। कविता पुस्तक का नाम ‘बूमरैंग’ रखने की वजह भी यही है। कविता पुस्तक पढ़ते हुए जो बात शिद्दत के साथ कहीं भीतर उतरती है वह परदेस में रहते हुए भाषा का टटकापन। हो सकता है कि ढेरों लोग मेरी इस बात से असहमत हों लेकिन मैं यह बात एक आलोचक की हैसियत से नहीं बल्कि एक ख़ालिस पाठक के तौर पर कह रहा हूँ और पूरे विश्वास के साथ कह रहा हूँ। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (95) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 27 जून 2010
फ़ज़ल इमाम मल्लिक

दोहे कबीर के

कबीर जंयती पर विशेष आगे पढ़िये...

छंद, (218) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 26 जून 2010
कबीर

स्मरण नमन
ब्लॉग गाथा, (61) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 26 जून 2010,
केपी उर्फ़ कुंवरपाल सिंह

नैतिकता की शक्ति
प्रेरक प्रसंग, (136) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 26 जून 2010,
पंकज त्रिवेदी

गिद्ध

गिद्ध की मनहूसियत ने मेरी ज़िंदगी पर धीरे-धीरे असर दिखाना शुरू कर दिया था। उसने सबसे पहला हमला मेरे नाम पर किया। जिससे मेरा अच्छा-ख़ासा मुकंदबिहारी नाम दम तोड़ गया। पूरी दीवानमंजिल, शहर की हरेक गली, हर कूंचे, और कोठे में केवल गिद्ध सुनाई पड़ने लगा। यहाँ तक कि लोगों के जहनों, घरों और दीवारों तक पर मेरा गिद्ध नाम सरमाया हो गया। यही गिद्ध आगे भी बार-बार झपट्टा मारता रहा। बिना रुके, बिना थके...बिना कोई हमदर्दी दिखाए, यह मेरी ज़िंदगी को चालीस सालों तक बड़ी बेदर्दी से नोंच-नोंचकर खाता रहा। अब तो ज़िंदगी का केवल कंकाल बाक़ी है। आगे पढ़िये...

कहानी, (336) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 25 जून 2010
ओमप्रकाश कश्यप

सभ्यता, संस्कृति एवं विरासत का प्रतिबिम्ब है फ़िलेटली

सामान्यतः लोग डाक विभाग द्वारा जारी फ़िलेटलीनियत डाक टिकटों के बारे में ही जानते हैं। ये डाक टिकट विशेष रूप से दिन-प्रतिदिन की डाक-आवश्यकताओं के लिए जारी किए जाते हैं और असीमित अवधि के लिए विक्रय हेतु रखे जाते है। पर इसके अलावा डाक विभाग किसी घटना, संस्थान, विषय-वस्तु, वनस्पति व जीव-जन्तु तथा विभूतियों के स्मरण में भी डाक टिकट भी जारी करता है, जिन्हें स्मारक/विशेष डाक टिकट कहा जाता है। सामान्यतया ये सीमित संख्या मे मुद्रित किये जाते हैं और फ़िलेटलिक ब्यूरो/काउन्टर/प्राधिकृत डाकघरों से सीमित अवधि के लिये ही बेचे जाते हैं। आगे पढ़िये...

बचपन, (79) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 25 जून 2010
कृष्ण कुमार यादव

आधी धूप, आधी छाँव
प्रेरक प्रसंग, (91) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 25 जून 2010,
जया केतकी

बदलाव मुश्क़िल है फिर भी मुमकिन है!

किताब का हर अध्याय एक रोचक कथा से प्रारंभ होता है और फिर हर अध्याय में और अनेक कहानियाँ हैं। ऊपर से देखने पर लगता है कि किताब कोई बड़ी और नई बात नहीं कह रही है, लेकिन अगर हम अपनी ज़िंदगी के इर्द-गिर्द नज़र डालें तो पाएँगे कि लोगों को परिवर्तन के लिए तैयार करने से ज़्यादा बड़ी बात और क्या हो सकती है? किताब हमें बहुत उम्दा तरह से समझाती है कि जड़ता यानि बदलाव के अभाव के मूल में हमारे मस्तिष्क का द्वैत होता है। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (50) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 25 जून 2010
डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल

प्राण शर्मा की दो ग़ज़लें
छंद, (172) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 25 जून 2010,
प्राण शर्मा

यह जादू नहीं टूटना चाहिए

तीस-पैतीस सालों के बाद अचानक मेरी रुलाई फूट पड़ी। छी: एक आवाज़ से इतना मोह! मैंने ख़ुद को समझाना चाहा, क्यों बना हुआ हूँ कठपुतली उस आवाज़ का? क्यों नहीं उठा देता परदा अपने झूठ प     र से और मुक्त हो जाता! उस पर भी गुस्सा आता रहा। आख़िर चाहती क्या है मुझसे! क्या मैं छोटा बच्चा हूँ, जो हर बार मैं ही मनाया जाऊँ! सोच-सोच कर सिर फटा जा रहा है। कभी वह मेरे जीवन को फिर से जीवंतता से सराबोर कर देने वाली चाँदनी लगती है तो कभी एक छलावा और मायावी लगने लगती है। हर पल छल रही है जो मुझे। आगे पढ़िये...

कहानी, (317) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 25 जून 2010
सूरज प्रकाश

विवेक मिश्र की कुछ कविताएँ
कविता, (253) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 24 जून 2010,
विवेक मिश्र

पुरस्कार तो पप्पू को ही मिलेगा

पिछले दिनों एक गरिमापूर्ण संस्थान ने एक पचास हजार रुपये वाली नवलेखन प्रतियोगिता आयोजित की। उसमें कितने नवलेखकों ने भाग लिया यह तो नहीं मालूम लेकिन पुरस्कार उसे मिला जो उसी संस्थान में काम करता है और पत्रिका के संपादक का पालक-बालक है। चूंकि वह एक पत्रिका में काम करता है और संपादक का पप्पू है तो बहुतेरे लेखकों और समालोचकों के लिए वह वैसे ही श्रेष्ठ लेखक हो गया। वह जो भी लिखता है वह रचना कालजयी हो जाती है। पुरस्कार की बात तो बेइमानी है। यह भी हमारे हिंदी समाज की एक संस्कृति है। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (73) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 24 जून 2010
ओमप्रकाश तिवारी

दोहरी मार
लघुकथा, (133) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 24 जून 2010,
प्राण शर्मा

डॉ. वेद व्यथित का गीत
छंद, (95) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 24 जून 2010,
डॉ. वेद व्यथित

जाति आधारित जनगणना अनिवार्य

क्या जब आज़ादी के बाद से जातियों की गणना नहीं हो रही थी तो जातिवाद ख़त्म हो गया था या जनगणना में जाति मात्र का कालम हटा देने से जातिवाद का ज़हर ख़त्म हो जाएगा ? जब तक जातिवाद का ज़हर नहीं ख़त्म होगा तब तक जाति-गणना से अगड़ापन या पिछड़ापन नहीं आता है। भारत अभी भी पिछड़ा है तो सदियों से चली आ रही इस सामाजिक विषमता के कारण जो प्रतिभाओं को कुंठित कर रही है। समाज में अभी भी व्यक्ति के चेहरे पर लगा कथित निचली या पिछड़ी जाति का ठप्पा व्यक्ति के पूरे व्यक्तिव को ध्वस्त कर देता है।
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इनदिनों, (103) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 24 जून 2010
राम शिव मूर्ति यादव

सप्रे संग्रहालय द्वारा रामबहादुर राय को माधवराव सप्रे पुरस्कार

भोपाल। रामबहादुर राय को माधवराव सप्रे पुरस्कारहिन्दुस्थान समाचार, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता और अब प्रथम प्रवक्ता के माध्यम से पत्रकारिता करने वाले रामबहादुर राय को भोपाल स्थित सप्रे संग्रहालय ने माधवराव सप्रे पुरस्कार से सम्मानित किया है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भोपाल के वर्तमान सांसद कैलाश जोशी, मध्यप्रदेश शासन के वित्तमंत्री राघवजी भाई, गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता, सांसद मीनाक्षी नटराजन और पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा की उपस्थिति में श्री राय सहित अनके पत्रकारों को पुरस्कार और सम्मान दिया गया। आगे पढ़िये...

हलचल, (97) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 24 जून 2010

तथास्तु
लघुकथा, (90) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 26 जून 2010,
मूल नेपाली: अशेष मल्ल
अनुवाद : कुमुद अधिकारी

रास्ता ही रास्ता
लघुकथा, (101) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 24 जून 2010,
मूल नेपाली: ध्रुव मधिकर्मी
अनुवाद : कुमुद अधिकारी

वैशाली की नगर वधू से लेकर फैशन फिल्म तक

जैसे-जैसे प्रियंका चौपड़ा, कंगना रणावत का किरदार आकार लेता जा रहा था वैसे-वैसे मुझे उस किरदार में अम्बपाली नजर आने लगी। लगा हर एक के दिमाग में नारी की देह ही कसमसा रही है। हर जगह जहाँ दिमाग और विद्वत्ता की बात आती है और महिला भारी नजर आती है तो उसके इस दिमाग को उसी की देह के नीचे कुचलने की कोशिशे की जाती हैं। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (78) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 23 जून 2010
श्रुति अग्रवाल

नुक्कड़ पे पान की दुकान !

पान खाने में कोई ऊँच-नीच का भेद नही होता। पान तो हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। पान की लालिमा सिर्फ़ बनारस तक ही सीमित नही है, बल्कि वह तो हमारी राष्ट्रीयता के रागों में भी घुलमिल गई है। बदलाते समय के चलते हमारी युवा पीढी पान की सात्विकता से विमुख होकर गुटखा खाने की आदी हो गई है, जिसमें सड़ी हुई सुपारी के साथ सुगंधी द्रव्यों का मिश्रण भले ही ललचाए, मगर उनके विकृत परिणाम हम सब भुगत रहें है। आगे पढ़िये...

झरोखा, (112) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 23 जून 2010
पंकज त्रिवेदी

आदिवासी संस्कृति और साहित्य में स्त्री का दर्ज़ा

कुछ बातें जो भारत की सभी जनजातियों में समान हैं, वे हैं-दहेज प्रथा का न होना, अपने लिए वर कास्वयं चयन करना, युवा युवती दोनों को प्रेम करने की स्वतन्त्रता, स्‍त्री पुरुषों का एक साथ मिलकर खाना-पीना व उत्सवों में खुलेआम भाग लेना और नाचना-गाना। ये सुविधाएँ और अधिकार भारतीय परम्पराओं में किसी धर्म में स्‍त्रियों को प्राप्त नहीं हैं। आगे पढ़िये...

समांतर, (97) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 23 जून 2010
रमणिका गुप्ता

बहुत बड़े अफ़सर की तुलना में छोटा लेखक होना बेहतर है

जब लेखक के हक के लिए, लेखक की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के लिए और लेखक के सम्‍मान के लिए आपको पक्ष लेना हो तो आपको ऐसी अफ़सरी पर लात मार देनी चाहिये जो आपको ऐसा करने से रोके। आख़िरकार लेखक ही तो है जो अपने वक़्त को सबसे ज़्यादा ईमानदारी के साथ महसूस करके कलमबद्ध करता है और कम से कम अपनी अपनी अभिव्‍यक्ति के मामले में झूठ नहीं बोलता। आगे पढ़िये...

संस्मरण, (69) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 23 जून 2010
सूरज प्रकाश

रिश्तों का बंधन

रामजी की आँखों के सामने अनेक दृश्य घूमने लगे और रामजी की आँखों से आँसू बह रहे थे। रामजी सोचने लगे कि आख़िर कालू मुझसे क्यों नाराज़ है? ऐसी कोई इतनी बड़ी बात तो नहीं हुई थी कि वह मुझे अपनी लड़की की शादी में भी न बुलायें। क्या हो गया जो मैंने उसके बच्चे को एक चांटा मार दिया। इसमें इतनी बड़ी कौनसी बात हो गई। क्या मुझे इतना भी हक नहीं कि मैं उसके बच्चे की गलत हरकत पर उसे समझा सकूँ। आगे पढ़िये...

कहानी, (148) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 22 जून 2010
संजय जनागल

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की तीन कविताएँ
कविता, (266) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 22 जून 2010,
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

कविता के शब्द

जैसा कि आम तौर पर होता है कि दंगे में हत्या और लूट का तांडव करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती , यहाँ भी लोगों को यही शक़ है. लेकिन पिछले दिनों कुछ ऐसे मामले आये हैं जहां दंगाइयों को कानून की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा और उन्हें सज़ा हुई, आज़ादी के बाद से अब तक हुए दंगों में लाखों लोगों की जान गयी है . मरने वालों में हिन्दू, मुसलमान,सिख और ईसाई सभी रहते हैं लेकिन कुछ मामलों को छोड़ कर कभी कार्रवाई नहीं होती. आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (55) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 22 जून 2010
सुनील दीपक

अछूता व्यंजन
लघुकथा, (88) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 22 जून 2010,
मूल नेपाली: गोरखबहादुर सिंह
अनुवाद : कुमुद अधिकारी

उबाऊ अभिव्यक्तियाँ भी हिन्दी-काव्य में लिपिबद्ध हो रही

(वरिष्ठ साहित्यकार महेंद्र भटनागर से प्रो. आदित्य प्रचण्डिया की भेंटवार्ता )
आज की हिन्दी-काविता का स्वरूप बदल गया है।महेंद्र भटनागर माना, अपने परम्परागत स्वरूप में भी वह आज लिखी जा रही है। इन दोनों प्रकार की कविताओं से जिन पाठकों का आवर्जन होता है; उनकी मानसिक बनावट समान नहीं है। मात्र भावुकता, तुकबंदी, बासी उपमानादि, घिसे-पिटे शब्द आदि वर्तमान वैज्ञानिक युग के बुद्धिजीवियों को क़तई पसंद नहीं। अभिव्यक्ति-सौन्दर्य में नयापन वर्तमान युग के रचनाकारों और प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष बुनियादी तत्त्व हैं। हिन्दी भाषा की कथन-भंगिमाएँ भी आश्चर्यजनक रूप से अभिनव रूप में लक्षित हो रही हैं। आगे पढ़िये...

कथोपकथन, (236) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 22 जून 2010
आदित्य प्रचण्डिया

पिछड़ा वर्ग की स्थिति की जाँच पड़ताल

असल में यह पुस्तक पिछड़े वर्ग की उत्पत्ति एवं जातिगत जाँच पड़ताल पर आधारित है बाक़ी विषय सतही है। इस पुस्तक में लेखक ने बहुत परिश्रम लगन से शोध कार्य किया। खोजपूर्ण पुस्तक में सभी तथ्यों या विमर्श पर चर्चा किया जाना संभव नही हो सकता है लेकिन लेखकीय तटस्थता के फलस्वरूप यह पुस्तक संजीव खुदशाह की अंर्तराष्ट्रीय स्पर पर चर्चित कृति ‘‘सफाई कामगार समुदाय’’ की अगली कड़ी के रूप में हम सभी के सामने आई है। पुस्तक पठनीय है। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (79) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 22 जून 2010
डॉ. सुधीर सागर

नदी किनारे प्रेम

जैसा कि आम तौर पर होता है कि दंगे में हत्या और लूट का तांडव करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती , यहाँ भी लोगों को यही शक़ है. लेकिन पिछले दिनों कुछ ऐसे मामले आये हैं जहां दंगाइयों को कानून की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा और उन्हें सज़ा हुई, आज़ादी के बाद से अब तक हुए दंगों में लाखों लोगों की जान गयी है . मरने वालों में हिन्दू, मुसलमान,सिख और ईसाई सभी रहते हैं लेकिन कुछ मामलों को छोड़ कर कभी कार्रवाई नहीं होती. आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (82) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 21 जून 2010
प्रतिभा कटियार

लंदन में मुलाकात नवाज़ शरीफ़ से

तभी नवाज़ साहब ने जानना चाहा कि हम लंदन किस सिलसिले में आये हैं। उन्‍हें बताया गया कि लंदन की एक संस्‍था कथा यूके का साहित्‍य सम्‍मान लेने के लिए महुआ भारत से आयी हैं और कि अगले ही दिन हाउस आफ लार्ड्स में ये सम्‍मान दिया जाना है। वे ये जानकर बहुत ख़ुश हुए और कहने लगे कि ये तो वाक़ई बहुत शानदार बात है कि लिटलेचर इस तरह से मुल्‍क़ों की सरहदें पार कर अपनी जगह बना रहा है। आगे पढ़िये...

संस्मरण, (159) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 21 जून 2010
सूरज प्रकाश

परिवेश
लघुकथा, (100) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 21 जून 2010,
मूल नेपाली: नारायण तिवारी
अनुवाद : कुमुद अधिकारी

एक था चंचल

जैसा कि आम तौर पर होता है कि दंगे में हत्या और लूट का तांडव करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती , यहाँ भी लोगों को यही शक़ है. लेकिन पिछले दिनों कुछ ऐसे मामले आये हैं जहां दंगाइयों को कानून की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा और उन्हें सज़ा हुई, आज़ादी के बाद से अब तक हुए दंगों में लाखों लोगों की जान गयी है . मरने वालों में हिन्दू, मुसलमान,सिख और ईसाई सभी रहते हैं लेकिन कुछ मामलों को छोड़ कर कभी कार्रवाई नहीं होती. आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (70) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 20 जून 2010
डॉ वर्तिका नन्दा

फ़र्ज़ में ईमानदारी
प्रेरक प्रसंग, (135) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 20 जून 2010,
पंकज त्रिवेदी

दया
लघुकथा, (84) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 20 जून 2010,
मूल नेपाली: नवराज रिजाल,
अनुवाद : कुमुद अधिकारी

हिंदी के संदर्भ में आकृति-विज्ञान विश्लेषक

आकृति-विज्ञान विश्लेषण हिंदी के लिए आवश्यक है, यह अन्य भारतीय आर्य परिवार भाषाओं की तरह परिवर्तक आकृति-विज्ञान की सुस्पष्ट प्रणाली है। यहाँ मुख्य तथ्य शब्दों की व्याकरणिक सूचना जैसे लिंग, संख्या, पुरुष आदि के चिन्हित उपसर्गों के आधार पर है । आगे पढ़िये...

व्याकरण, (104) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 20 जून 2010
डॉ. काजल बाजपेयी

मोहन राणा की दो कविताएँ
कविता, (336) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 20 जून 2010,
मोहन राणा

असली पूंजी

तुम बहुत ख़ुशनसीब हो जो इतना प्यार करने वाला पति और घर संसार मिला है । मुझे देखो भीतर से मैं पूरी तरह से खोखली हो चुकी हूँ, जानती हो जिज्ञासा, हमारी असली संपत्ति तो हमारा घर परिवार, हमारे बच्चे ही होते है। वह ही हमारी वास्तविक पूंजी है, मुझ अभागी को देखो , इतने उच्च पद पर आसीन होने बावजूद भी आज ख़ाली हाथ दामन बिछाए खडी हूँ....
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कहानी, (426) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 19 जून 2010
अलका सैनी

रोज़मर्रा की जीवन-‘इच्छाएँ’

समाज में घटित हो रही समस्त घटनाएँ अप्रत्याशित हैं। अमीरी-ग़रीबी, बेरोज़गारी, पुलिसिया क़ानून, हत्या, लूट, डकैती, बलात्कार, रिश्वतबाजी, धोख़ाधड़ी एवं चोरबाज़ारी सब कुछ अप्रत्याशित है। कुमार अंबुज की कहानियाँ व्यक्ति के मन में दृढ़ इच्छाशक्ति पैदा करती हैं, अपने समय एवं समाज की सही पड़ताल करती हैं, लोगों की समय से पहचान कराती हैं। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (80) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 19 जून 2010
डॉ. प्रकाश त्रिपाठी

भागता लम्हा सम्भाल रखा है
कविता, (169) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 19 जून 2010,
सत्य व्यास

बाबा कार्ल मार्क्स की मज़ार बरसात और कम्यूनिस्ट कोना

अभी हम मार्क्स बाबा की तस्वीरें ले ही रहे थे कि हमारी निगाह सामने वाले कोने की तरफ़ गयी जहाँ कुछ कब्रों पर ताज़े फूल चढ़ाये गये थे। हम देख कर हैरान रहे गये कि ये पूरा का पूरा कोना दुनिया भर के ऐसे कम्यूनिस्ट नेताओं की कब्रों के लिए सुरक्षित था जिन्होंने पिछले दशकों में इंगलैंड में रह कर देश निकाला झेलते हुए यहाँ से अपने अपने देश की राजनीति का सूत्र संचालन किया था। यहाँ पर हमने ईराकी, अफ्रीकी, लातिनी देशों के कई प्रसिद्ध नेताओं की कब्रें देखीं।
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संस्मरण, (76) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 19 जून 2010
सूरज प्रकाश

स्वतंत्रता
लघुकथा, (91) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 19 जून 2010,
मूल नेपाली: आर.आर.चौलागाईं,
अनुवाद : कुमुद अधिकारी

किताबें जिन्होंने मुझे बिगाड़ा

एक और किताब जिसने उस लडक़े की ज़िंदगी को बिगाडऩे में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की वह है केदारनाथ अग्रवाल जी का संग्रह ‘फूल नहीं रंग बोलते हैं’ …इस संग्रह की भूमिका को उसने कई-कई बार पढ़ा है जब भी वह निराश होता, जब भी उससे कविता नहीं बन रही होती है, जब भी उसे लगता है कि कविता लिखना तो जन्म जात प्रतिभाशाली आदमियों का ही काम है तब-तब ही उस किताब की भूमिका ने रोशनी की एक कंदील की तरह उसे सहारा देकर निराशा के भंवर से बाहर निकाला है। आगे पढ़िये...

समांतर, (78) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 19 जून 2010
सुरेश सेन निशांत

लाहौर से लेकर हैदराबाद तक

जैसा कि आम तौर पर होता है कि दंगे में हत्या और लूट का तांडव करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती , यहाँ भी लोगों को यही शक़ है. लेकिन पिछले दिनों कुछ ऐसे मामले आये हैं जहां दंगाइयों को कानून की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा और उन्हें सज़ा हुई, आज़ादी के बाद से अब तक हुए दंगों में लाखों लोगों की जान गयी है . मरने वालों में हिन्दू, मुसलमान,सिख और ईसाई सभी रहते हैं लेकिन कुछ मामलों को छोड़ कर कभी कार्रवाई नहीं होती. आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (65) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 19 जून 2010
शेष नारायण सिंह

हमारे सैकड़ों भोपाल

पता नहीं, हम क्या करेंगे, इस विदेशी पूंजी का ? जो विदेशी पूंजी हमारे नागरिकों को कीड़ा-मकोड़ा बनाती हो, उसे हम दूर से ही नमस्कार क्यों नहीं करते ? यह ठीक है कि जो मर गए, वे लौटनेवाले नहीं और यह भी साफ़ है कि जो भुगत रहे हैं, उन्हें कोई राहत मिलनेवाली नहीं है लेकिन चिंता यही है कि हमारी सरकारें और अदालतें अब भी भावी भोपालों और भावी चेर्नोबिलों से सचेत हुई हैं या नहीं ?इतनी भयावह तकनीकों को भारत लाने के पहले क्या हमारी तैयारी ठीक-ठाक होती है ? बिल्कुल नहीं| परमाणु-बिजली और ज़हरीले कीटनाशकों की बात जाने दें, हमारे देश में जितनी मौतें रेल और कारों से होती हैं, दुनिया में कहीं नहीं होतीं| अकेले मुंबई शहर में पिछले पाँच साल में रेल-दुर्घटनाओं में 20706 लोग मारे गए| भोपाल में तो उस रात सिर्फ़ 3800 लोग मारे गए थे और 20 हज़ार का आँकड़ा तो कई वर्षों का है| यदि पूरे देश पर नज़र दौड़ाएँ तो लगेगा कि भारत में हर साल एक न एक भोपाल होता ही रहता है| आगे पढ़िये...

प्रसंगवश, (72) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 18 जून 2010
डॉ. वेदप्रताप वैदिक

पिशीमोनि.... मैं आपकी कुहू - - - !

ईश्वर ने उसकी सुनी और भाई के आँगन में कली ने जन्म लिया। फोन पर पत्रकार भाई ने भी कहा था, दीदी मैं जीत गया, मुझे बेटी चाहिए थी। नीलोफ़र ने भी कहा, मैं भी जीत गई और झट से मोबाईल उठा उसने कई एस.एस.एस और फ़ोन कर डाले थे – ईश्वर ने हमें एक और नीलोफ़र से नवाज़ा है। और नीलोफ़र के कान बेसब्री से उस कुहू की कुहू कुहू सुनने को बेक़रार हैं कि कब कुहू कहेगी - पिशीमोनि (बुआ) मैं आपकी कुहू। आगे पढ़िये...

आलेख, (124) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 18 जून 2010
नीलम शर्मा ‘अंशु’

जयंत महापात्र और चंद्रभागा

बातों में बात ये भी निकली कि अंग्रेज़ी गद्य के ताबड़तोड़ बाज़ार का खमियाज़ा कविता को चुकाना पड़ा है। सच ये है कि अंग्रेज़ी में कविता लिखने की वजहें कम से कमतर होती जा रही हैं। चंद्रभागा जैसे प्रकाशनों के लिए आर्थिक मदद के कोई ज़रिए नहीं है। लगभग सभी बड़ी प्रकाशन ’कंपनियां’ कविता को सिरे से ख़ारिज कर देती हैं। ऐसा भारत ही में हो या केवल अंग्रेज़ी में, ऐसी बात नहीं है। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (77) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 18 जून 2010
समर्थ वशिष्ठ

गीत मेरा बदनाम न होवे
छंद, (107) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 18 जून 2010,
जया केतकी

मेरे पास आकाश है....!

कभी-कभी बाल सँवारते समय एकाध  ज़ुल्फ़ सरक जाए तब बेटी मीठा उपालंभ करें; "क्या, आप भी पापा...! लाईये मैं ख़ुद ही संवार लूँ... !"  तब आँखों की नमीं से उसे  देखूँ तो लगता है, मानो मेरी बेटी बड़ी हो गई  है...! वह मुझे छोडकर चली जाएगी यही डर से आँसू के धून्धलेपन के बीच देखाकर उसे कहूँ; "अब तेरी जुल्फ़ नही निकलेगी बेटा,  मैं  ध्यान रखूँगा..."   इतना कहकर उसे मेरे साथ खाना खिलाकर स्कूल तक छोडने के लिए मैने अभी भी अपना समय बचा रखा है ।   मेरी बेटी मेरा आ...का...श..... है । आगे पढ़िये...

झरोखा, (138) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 18 जून 2010
पंकज त्रिवेदी

अज्ञेय और शमशेर पर आलेख आमंत्रित

रायपुर । छत्तीसगढ़ की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा प्रेमचंद जयंती 31 जुलाई, 2010 के अवसर पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है । यह आयोजन अभिकेंद्रित है साहित्य दो मूर्धन्यों – शमशेर बहादुर सिंह और अज्ञेय के अवदानों और उनके विभिन्न पक्षों के पुनराकलन पर, 2010 जिनका जन्मशताब्दि वर्ष है । उक्त अवसर पर दो सत्रोंशमशेर का कविता संसार’व  ‘अज्ञेय की शास्त्रीयता’  पर देश भर के वरिष्ठ और युवा आलोचक एवं कवि अपनी बात रखेंगे। आगे पढ़िये...

हलचल, (116) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 18 जून 2010

आदमी
लघुकथा, (84) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 18 जून 2010,
मूल नेपाली: श्री ओम श्रेष्ठ 'रोदन' अनुवाद : कुमुद अधिकारी

शशि पाधा की दो कविताएँ
कविता, (354) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 17 जून 2010,
शशि पाधा

मशहूर साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद का......

‘‘...जिन दिनों इस्लाम का झंडा कटक से लेकर डेन्युष तक और तुर्किस्तान से लेकर स्पेन तक फ़हराता था मुसलमान बादशाहों की धार्मिक उदारता इतिहास में अपना सानी (समकक्ष) नहीं रखती थी। बड़े से बड़े राज्यपदों पर ग़ैर-मुस्लिमों को नियुक्त करना तो साधारण बात थी, महाविद्यालयों के कुलपति तक ईसाई और यहूदी होते थे...।’’ आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (89) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 17 जून 2010
इस्लामिक वेबदुनिया

पागल-सवाल
लघुकथा, (107) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 17 जून 2010,
मूल नेपाली : सुमन पोखरेल
अनुवाद: कुमुद अधिकारी

मौत के सौदागर और उनके मार्केटिंग एजेंट

टाटा से लेकर कमलनाथ और चिदंबरम तक इस काम में भिड़े हुए थे कि नए मालिक डोव केमिकल्स को किस तरह सारी की सारी जवाबदेही से मुक्त रखा जाए क्योंकि वह भारत में लंबा-चौड़ा पूंजीनिवेश करना चाहती थी। सूचना के अधिकार के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से 55 पेज का यह दस्तावेज निकाला गया है जिसमें यह साफ़ है कि हत्यारी कम्पनी और उसके नए मालिक की किस तरह मार्केटिंग की जा रही थी, और प्रधानमंत्री के बनाए हुए मंत्रियों के समूह के दस में से कम से कम दो लोग तो इस मार्केटिंग में लगे हुए थे ही। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (78) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 17 जून 2010
सुनील कुमार

पवित्र ह्रदय से आचरण
प्रेरक प्रसंग, (161) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 17 जून 2010,
पंकज त्रिवेदी

अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, मॉरीशस में भाग लेंगे साहित्यकार

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और हिंदी-संस्कृति को प्रतिष्ठित करने के लिए सृजन-सम्मान संस्था द्वारा, किये जा रहे प्रयासों और पहलों के अनुक्रम में आगामी 11 सितम्बर, 20  सितम्बर, 2010  के दरमियान मारीशस में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन मॉरीशस की साहित्यिक संस्थाओं के सहयोग से किया जा रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश सहित छत्तीसगढ़ के लगभग 40 साहित्यकार, हिन्दी सेवी सम्मिलित हो रहे हैं । सम्मेलन का मूल उद्देश्य हिंदी-संस्कृति का प्रचार-प्रसार, भाषायी सौहार्द्रता एवं सांस्कृतिक अध्ययन-पर्यटन है। आगे पढ़िये...

हलचल, (142) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 17 जून 2010

सुरंग

एक बार फिर किसी गाड़ी की आवाज़ ने उसकी तंद्रा भंग कर दी । वह झुंझलाकर सामने देखा । वह अबकी बार भी महिन्द्रा ट्रेव्हल्स या काँकेर बस सर्विस की गाड़ी समझ रहा था, परन्तु नहीं, यह तो नीले रंग वाली गाड़ी थी । पुलिस की ही होगी । उसने वायनाकुलर उठा लिया । यह पुलिस की ही गाड़ी थी । गाड़ी अब आँवला पेड़ के सामने निशाने पर पहुँचना ही चाहती थी । उसने टी पर उँगली रख ली । जैसे ही गाड़ी आँवले के पेड़ की सीध में आयी उसने टी दबा दिया । आगे पढ़िये...

कहानी, (176) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 जून 2010
सुरेश कुमार पंडा

मौत के सौदागरों के सवाल-जवाब से जनता के हाथ आया शून्य

कमोबेश ऐसी ही ताक़त ऐसी कंपनियों की संसद के बारे में, सरकारों के बारे में, और अदालतों के बारे में बार-बार साबित होती रही है। कुल मिलाकर यह है कि लोकतंत्र में समानता एक कागजी बात है जिसका हक़ीक़त से कुछ लेना-देना नहीं है। और यह कागज़ भी अब इंटरनेट के डिजिटल सिग्नलों या आसमानी लहरों पर आते इलेक्ट्रॉनिक सिग्नलों के हाथों हटा दिया जा रहा है। ऐसे में लोकतंत्र में समानता का हक़ और इंसाफ जैसे शब्द अब लक़ीरें भी खो बैठे हैं। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (79) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 जून 2010
सुनील कुमार

व्यासकवि फकीरमोहन सेनापति

फकीर मोहन प्रथम ओड़िआ साहित्यकार हैं, जिनकी कहानियों और उपन्यासों में तत्कालीन समाज के अति नगण्य, दीन हीन चरित्र सारिआ, भगिआ आदि दृष्टिगोचर होते हैं । उनकी लिखी कहानियों में ‘रेवती’, 'पैटेण्ट्‍‍ मेडिसिन्‌‍’, ‘डाक-मुन्सी’, ‘सभ्य जमीदार’ प्रमुख उल्लेखनीय हैं ।  ‘रेवती’ उनकी पहली कहानी है, जहाँ तत्कालीन समाज में नारी-शिक्षा एवं नारी-जागरण के लिये प्रथम उन्मेष का सूत्रपात हुआ । आगे पढ़िये...

हस्ताक्षर, (112) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 जून 2010
डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

थेरावदा बौद्ध धर्म का शंकेन फेस्टिवल

ये त्यौहार थेरावदा बौद्ध धर्मं के अनुयायी नए साल के रूप मे मनाते है ।इसे एकता,समृद्धि के साथ-साथ नौज-मस्ती का त्यौहार भी माना जाता है। शंकेन शब्द संस्कृत के संक्रांति से लिया गया है । थेरावदा बौद्ध धर्मी मानते है की सूरज अपनी घूमने की प्रक्रिया मेष राशि से शुरू करके आखिरी राशि मीन मे आने के बाद जब पुन मेष मे प्रवेश करता है तो इसे बौद्ध धर्मी नए सूरज का आगमन मानते है और इसे नया साल कहते है।ये फेस्टिवल एशिया के म्यनमार ,थाईलैंड,कम्बोडिया,श्री लंका,बंगलादेश के साथ-साथ उत्तर-पूर्वी भारत मे भी मनाया जाता है। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (92) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 जून 2010
ममता

पूर्वोत्तर में हिंदी प्रेम

वास्तविकता इन झूठे और अनुभवहीन दलीलों से भिन्न है.मै पूर्वोत्तर के हिंदी प्रेम की कहानी कहूँ,उससे पूर्व आपको बताना उचित समझता हूँ कि जो लोग इस प्रकार का अफवाह उड़ाते है कि पूर्वोत्तर में हिंदी भाषियों का अपमान होता है या हिंदी नहीं पढ़ी-लिखी जाती है.उसमे अधिकांश बंगलादेशी घुसपैठ समर्थित लोग या धर्मान्तरण को और सरल करने हेतु मिशनरी स्कुल खोलने के समर्थक लोग है.जो सरकार का ध्यान अपने ऊपर से हटाकर निर्दोष हिंदी भाषियों की हत्या करके उसे ज्यादा गंभीर मुद्दा बना देते है. आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (89) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 15 जून 2010
राजीव पाठक

प्रदीप जिलवाने की चार कविताएँ
कविता, (151) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 15 जून 2010,
प्रदीप जिलवाने

आबादी में करोड़पति देश बत्तीसवें नंबर पर भी नहीं?

देश के बड़े-बड़े ताक़तवर नेता देश और प्रदेश में क्रिकेट पर कब्जा जमाए रखने के लिए दलगत राजनीति से ऊपर उठकर गिरोहबंदी करते देखे जा सकते हैं। ऐसे में फुटबॉल के एक समय के कोलकाता के विख्यात क्लबों को आज भला कौन पूछेगा? लेकिन इस बात को सोचने की ज़रूरत है कि क्रिकेट की तरह की महँगी पिच और महँगे सामान वाले खेल के बजाय फुटबॉल की तरह का सस्ता खेल इस देश की स्कूलों और कॉलेज़ों में, शहर और गाँव की गलियों में क्यों लोकप्रिय नहीं करवाया जाता? यह बात सिर्फ़ एक खेल में कोई कप या मैडल पाने की नहीं है, यह पूरे देश के आत्मगौरव की बात भी रहती है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (104) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 15 जून 2010
सुनील कुमार

उपन्यास ‘बंधन’ का विमोचन

चंडीगढ़ । शनिवार 12 जून को को चंडीगढ़ प्रेसक्लब में हिंदी लेखक मनोज सिंह के उपन्यास बंधन का विमोचन किया गया । पुस्तक का विमोचन पंजाब यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ जसपाल सिंग ने किया । उक्त अवसर पर सतिंदर सिंह नूर और रगुवीर सिंह सिर्जना भी उपस्थित थे। बंधन एक मानसिक रोगी और उसके परिवार की भी दर्दभरी दास्ताँ है। आगे पढ़िये...

हलचल, (118) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 14 जून 2010

कितने माणसे

चुनाव इसी वक़्त होना था, माणसे को ओर क्या चाहिये था। गरम लोहे पर मगली का मारा हथौड़ा। मगली के नाम पर माणसे की पार्टी ने चुनाव लड़ा, अब जनता की भावनाओं के साथ खेलकर चुनाव जीतना तो उस देश का पुराना रिवाज था। होना क्या था, माणसे की पार्टी चुनाव जीत गई। कहतें है उस देश में जुल्म करने वालों का राज आज भी लठ के बल पर चलता है। आगे पढ़िये...

कहानी, (107) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 14 जून 2010
संदीप कुमार मील

नीतीश कुमार का हाल गुड़ खाएँ, गुलगुले से...

बिहार में राज्य के मतदाताओं के बीच जनता दल-यू को वैसे भी यह जवाब देना मुश्किल पड़ा रहा था कि गुजरात दंगों के लिए ज़िम्मेदार वहाँ के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ वे कैसे एक मंच पर आ सकते हैं और बिहार के मुसलमानों के वोटों की उम्मीद भी कर सकते हैं। गुजरात में मुसलमानों के क़त्लेआम के वक़्त नरेन्द्र मोदी की सरकार थी और दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में एनडीए की सरकार में नीतीश कुमार भागीदार थे और मंत्री थे। उन्होंने न तो अपना पद छोड़ा था और न ही एनडीए से नाता। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (101) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 14 जून 2010
सुनील कुमार

असमिया के श, ष और स वर्ण

17 अगस्त 1993 को गौहाटी से आये हुए एक सज्जन श्री एन० जे० गोस्वामी से असमिया भाषा के बारे में विस्तृत चर्चा हुई । इसी चर्चा के दौरान हमने उनसे पूछा कि जब असमिया में 'स' का अकसर 'ह' उच्चारण होता है तो क्या 'Saikia' (an Assamese Surname) का उच्चारण 'Haikia' होता है ? उत्तर हाँ में मिला अर्थात् 'शइकीया' का उच्चारण 'हइकीया' ही होता है । असमिया में 'श', 'ष' और 'स' के उच्चारण में कोई विशेष अन्तर नहीं होने के कारण ही Bronson ने "Dictionary in Assamese and English" (प्रकाशन वर्ष 1867 ई०) में 'श' और 'ष' का बिलकुल त्याग करके सिर्फ 'स' का ही प्रयोग किया है (सन्दर्भ 2, पृष्ठ 401) । आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (101) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 14 जून 2010
नारायण प्रसाद

किताबों की भीड़ में कुछ और किताबें

देवेंद्र कुमार मिश्र के कविताओं में अपने समय और समाज को देखा जा सकता है। पहला संग्रह व्यंग्य कविताओं का है तो दूसरे संग्रह में सामजिक सरोकार के रंग बिखरे पड़े हैं। ‘प्रजातंत्र का फ़्लाप शो’ के नाम से ही पता चलता है कि संग्रह की कविताओं के केंद्र में राजनीति और व्यवस्था है। संग्रह में मिश्रा की 106 कविताएँ हैं। संग्रह की कवितओं में राजनीतिक रंग भी है और इस राजनीति से उपजी सड़ी-गली व्यवस्था का ज़िक्र भी। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (111) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 14 जून 2010
फ़ज़ल इमाम मल्लिक

राजा शयन-कक्ष में आराम हेतु चले गए हैं !

एक दिन रविवार को जब प्रिंसिपल साहेब ने उसे घर पर शाम की चाय के लिये बुलाया तब नेहा ने मना कर दिया, लेकिन प्रिंसिपल साहेब ने कहा आपको मेरी माता जी ने चाय के लिये बुलाया है, फिर उसने धीमे से हां कर दी। उस दिन बहुत चिंतित और घबडाई हुई नेहा जब प्रिंसिपल साहेब के घर गई, दरवाजा खुला एक बूढी औरत और साथ में एक बदसूरत महिला ने उसका स्वागत किया, तब उसने अचंभित होकर पूछा- आंटी जी, आपने मुझे क्यों बुलाया है- चाय तो सर के साथ मैं कॉलेज में पी ही लेती हूं। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (125) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 13 जून 2010
रंजन ऋतुराज सिंह

ओमप्रकाश यती की तीन ग़ज़लें
छंद, (205) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 13 जून 2010,
ओमप्रकाश यती

आप वहाँ क्या कर रही हैं अरूंधती ?

यह सही मायने में मीडिया का ऐसा इस्तेमाल है जिसे राजनेता और प्रोपेगेंडा की राजनीति करने वाले अक्सर इस्तेमाल करते हैं। आप जो कहें उसे उसी रूप में छापना और दिखाना मीडिया की ज़िम्मेदारी है किंतु कुछ दिन बाद जब आप अपने कहे की अनोखी व्याख्याएँ करते हैं तो मीडिया क्या कर सकता है। अरूंधती राय एक महान लेखिका हैं उनके पास शब्दजाल हैं। हर कहे गए वाक्य की नितांत उलझी हुयी व्याख्याएँ हैं। जैसे 76 सीआरपीएफ जवानों की मौत पर वे “दंतेवाड़ा के लोगों को सलाम” भेजती हैं। आख़िर यह सलाम किसके लिए है मारने वालों के लिए या मरनेवालों के लिए।
आगे पढ़िये...

प्रसंगवश, (119) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 13 जून 2010
संजय द्विवेदी

ज़मीन से जुड़ा

यह बात तो सभी जानते हैं कि आज की राजनीति में टिकने के लिए ज़मीन से जुड़ा होना निहायत ज़रूरी हो गया है। अब यदि सकारात्मक सोच से देखेंगे तो इस देश की ज़मीन ही सोना उगलने वाली है। वह बाक्साइट उगलती है, अभ्रक उगलती है, कोयला उगलती है, हीरा उगलती है, हरे-हरे नोट उगलती है। ज़मीन से जुड़ने पर यह कभी किसी को निराष नहीं करती। आगे पढ़िये...

आलेख, (83) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 13 जून 2010
डॉ. पुष्पेंद्र दुबे

साहित्यिक कृतियां

एक दिन रविवार को जब प्रिंसिपल साहेब ने उसे घर पर शाम की चाय के लिये बुलाया तब नेहा ने मना कर दिया, लेकिन प्रिंसिपल साहेब ने कहा आपको मेरी माता जी ने चाय के लिये बुलाया है, फिर उसने धीमे से हां कर दी। उस दिन बहुत चिंतित और घबडाई हुई नेहा जब प्रिंसिपल साहेब के घर गई, दरवाजा खुला एक बूढी औरत और साथ में एक बदसूरत महिला ने उसका स्वागत किया, तब उसने अचंभित होकर पूछा- आंटी जी, आपने मुझे क्यों बुलाया है- चाय तो सर के साथ मैं कॉलेज में पी ही लेती हूं। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (109) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 12 जून 2010
शेष नारायण बंछोर

सपने मरते नहीं....
कविता, (247) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 12 जून 2010,
ज़कीया ज़ुबैरी

कला और क्रांति

यह सच है, प्रद्युम्न वैचारिक क्रांति लाना बच्चों का खेल नहीं है। माओवादियों की तरह बंदूक से क्रांति तो की जा सकती है। पर तुम जानते ही हो, उन्हें भी बंदूक से कुछ नहीं मिला, वे लोगों के विचार में तब्दीली नहीं ला सके और हिंसा का रास्ता त्याग दिया। तुमने जो रास्ता चुना है, वह बहुत कठिन है, तुम ने ठान ली है, लक्ष में पहुँचो। मेरी शुभकामनाएँ।' 'कोशिश तो करनी है न भैया। कोई चलता ही नहीं तो कहीं कैसे पहुँचेगा ? कहीं पहुँचने के लिए तो चलना चलना ज़रूरी है। आगे पढ़िये...

कहानी, (182) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 12 जून 2010
कुमुद अधिकारी

एक चित्र : कल, आज, कल !
लघुकथा, (147) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 11 जून 2010,
कुमार प्रमोद

अर्जुन सिंह धुंध साफ़ करें

आज यही बात अच्छी है कि वे ज़िंदा हैं और कामकाज करने की हालत में हैं। पूरी ज़िंदगी उन्होंने अपने पूरे कुनबे के साथ लोकतंत्र, सरकारों और सार्वजनिक संपत्तियों को जिस तरह भोगा है, तो उनसे सफाई पाने का, जवाब पाने का हक़ भी इस देश का बनता है। हो सकता है कि उनसे परे असली गुनहगार उन्हीं की पार्टी के दिल्ली की सरकार में बैठे हुए लोग हों लेकिन इस बारे में अर्जुन सिंह को धुंध साफ़ करनी चाहिए। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (113) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 11 जून 2010
सुनील कुमार

झमाझम मानसून की बारिश, मुंबई में फ़्रेंच विन्डो के आनंद और छाता

बिस्तर पर लेटे लेटे ही रात में तारे गिन लो, खुली हवा का आनंद लो, यह सब आनंद अपने छत पर सोने में आते थे, अब यही सब आनंद मुंबई के छोटे से फ़्लेट में भी आते हैं, बस अंतर यह है कि ऊपर छत रहती है, यही तो फ़्रेंच विन्डो के आनंद हैं। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (117) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 11 जून 2010
विवेक रस्तोगी

अपने साहित्यकार को देर से पहचाना डॉ. रत्नलाल शर्मा ने

लेखक को स्वयं अपने को पहचानना होता है .... वह क्या लिख सकता है। जीवन भर इधर-उधर भागने के बाद अवकाश ग्रहण करने के पश्चात शायद उन्हें वास्तविकता का ज्ञान हुआ और उन्होंने अपने को 'बाल साहित्य' में केन्द्रित करना प्रारंभ किया। यदि वह कुछ वर्ष और जीवित रह जाते तो तन-मन-धन से बाल साहितय के लिए समर्पित हो जाने वाले व्यक्ति के रूप में अपनी अलग पहचान बना लेते।
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संस्मरण, (90) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 11 जून 2010
रूपसिंह चन्देल

राजनीतिक बिसात की चालें

प्रकाश झा की राजनीति मुख्य रूप से महाभारत के किरदारों के स्वभाव को लेकर आज के माहौल में बुनी गई कहानी है। यहां कृष्ण हैं। पांडवों में से भीम और अर्जुन हैं। कौरवों में से दुर्योधन हैं। और कर्ण हैं। साथ में कुंती हैं और थोड़ी उदारता से काम लें तो द्रौपदी हैं। महाभारत के ठोस किरदारों के साथ मशहूर फिल्म गाडफादर से भी साम्राज्य बचाने की कोशिशें ली गई हैं। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (106) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 10 जून 2010
अजय ब्रह्मात्मज

हम तो डाभ हैं वीरानों के
कविता, (207) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 10 जून 2010,
अपर्णा भटनागर

हर पल मुझको याद रहा
छंद, (139) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 10 जून 2010,
डॉ. वेद व्यथित

शायर हसन कमाल को जीवंती गौरव सम्मान

मुंबई । जीवंती फाउंडेशन, मुम्बई ने भवंस कल्चरल सेंटर, अंधेरी के सहयोग से शनिवार 5 जून को एस.पी.जैन सभागार में शायर हसन कमाल को ‘जीवंती गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया। सम्मानस्वरूप वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल ने उन्हें प्रशस्तिपत्र और स्मृतिचिन्ह भेंट किया। समारोह संचालक आलोक भट्टाचार्य ने शायर हसन कमाल का ऐसा आला तवारूफ़ कराया कि उसे सुनकर सामईन परेशान और शायर पशेमान हो गया। आगे पढ़िये...

हलचल, (132) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 10 जून 2010

भोपाल से लेकर दिल्ली तक लोकतंत्र के ठेकेदार

सवाल यह है कि यह क्यों इतनी आसानी से हुआ। प्रेस क्यों इतना चौकस नहीं था। इस मामले में न्याय नहीं हुआ है। तो पिछले पचीस बरसों में बाज़ार और कारख़ाने हज़ार गुना अधिक ताक़तवर हुए होंगे और लोकतंत्र के तमाम स्तंभ कई गुना अधिक बेईमान और बिकाऊ हो गए हैं। ऐसे में ग़रीब को किसी भी हादसे से बचाने के लायक यह लोकतंत्र बिल्कुल नहीं है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (105) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 10 जून 2010
सुनील कुमार

अथ हिन्दी पूजन कथा

हिन्दी हम सबों का 'ऑफिसियल` 'लेंग्वेज़` है। और इसका सम्मान करना हम सबों की 'ड्यूटी` है। हिन्दी के बारे में हमारे 'ऑफिस से हर साल 'डेवलपमेन्ट` 'रिपोर्ट` हेड ऑफ़िस` को जाता है। इस बार हमारे ऑफिस में हिन्दी में 'एक्सलेंट` काम हुआ। हम समझते हैं 'एप्रोक्स` 'सेवेंटी टू सेवेंटी फ़ाइब परसेन्ट` 'लेटर` हम लोगों ने हिन्दी में लिखा है। यह इसबार 'हेड आफिस` के द्वारा 'फिक्स` 'टार्गेट` से भी 'एक्सीड` कर गया। हिन्दी के इसी 'एचीवमेंट` के कारण हमलोग इसबार बड़े 'स्केल` पर हिन्दी का 'फ़ेस्टीवल` 'ऑर्गनाइज़` किया है। हम लोग हिंदी का और हिंन्दी लोगों का 'रिस्पेक्ट` करते हैं। हमारा देश तभी आगे बढेग़ा जब हम 'नेशनल लेग्वेज़` में अधिक से अधिक 'वर्क` कर सकेंगे। 'सी.सी.आई. इण्डिया` के कुछ ऐसे ऑफिस में से है जहाँ हिन्दी के लिए 'सेप्रेट बजट` 'सैंक्सन` किया जाता है। यहाँ हम 'टाइम टू टाइम` हिन्दी में 'ऐसे कम्पिटीसन` एवं 'ट्रांस्लेसन` 'आर्गनाइज़` करते हैं एवं `वीनर` को 'प्राइज़` दिया जाता है। सबने तालियाँ बजाई। आगे पढ़िये...

व्यंग्य, (140) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 10 जून 2010
कलानाथ मिश्र

ज्ञान प्राप्ति में उम्र कहाँ?
प्रेरक प्रसंग, (220) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 9 जून 2010,
पंकज त्रिवेदी

तारों से बंधे कुछ रिश्ते

सोचिये इस रूटीनड लाइफ में, ऑफिस के "हेक्टिक" स्केड्यूल के बीच आपके कंप्यूटर के मॉनिटर पर किसी ई-दोस्त का प्यारा सा हँसता हुआ स्माइली अचानक से चमकता है तो बिलकुल "स्ट्रेस बस्टर" की तरह काम करता है और एक मुस्कुराहट तो आपके चेहरे पर भी आ ही जाती है... चंद लम्हों के लिये ही सही आप उस बिज़ी लाइफ को भूल जाते हैं... कुछ देर उस दोस्त से बात करते हैं और मन हल्का हो जाता है... आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (119) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 9 जून 2010
ऋचा

आशा पाण्ड़े ओझा शिलांग में सम्मानित

शिलांग । 22 से 24 मई, 2010 को पूर्वोतर, हिन्दी अकादमी शिलांग में तीन दिवसीय हिन्दी विकास सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसके अन्तर्गत विचार, काव्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया व अखिल भारतीय हिन्दी लेखक सम्मान समारोह एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का गरिमामय आयोजन किया गया। सम्मेलन में पूरे देश भर से 100 से अधिक साहित्यकारों एवं विद्वान लेखकों ने शिरक़त की। आशा पाण्ड़े ओझा को पूर्वोतर क्षेत्रीय हिन्दी विकास सम्मेलन एवं अखिल भारतीय लेखक सम्मान समारोह के अवसर पर उनके समग्र लेखन (पुस्तक- दो बूंद संमुद्र के नाम) तथा साहित्य धर्मिता के लिये डॉ. महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान, 2009 से विभूषित किया गया । आगे पढ़िये...

हलचल, (107) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 8 जून 2010

मीडिया को कच्छे की तरह पहन लिया है बाज़ार ने

हमारे प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बाज़ार ने अपने कच्छे की तरह पहन लिया है। बाज़ार की नंगई ढाँपने की भूमिका में उतर कर मीडिया मुग्ध है। उधर इंटरनेट पर ब्रिटनी स्पीयर्स अपने जननांग के चित्र जारी करती है, इधर हमारे मीडिया के कच्छे गीले होने लगते हैं। यही हमारा मीडिया विज़्डम बन गया है। प्रिंस वाली घटना के बाद से करुणा का कारोबार बंद कर दिया गया। अब उत्तेजना का कारोबार चल रहा है। इसलिए, रिक्शा चालक के बेटे का आईएएस में चयन हो जाना समाचार में उतनी जगह नहीं घेरता, जितनी राखी सावंत की बाइट। आगे पढ़िये...

मीडिया, (148) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 8 जून 2010
प्रभु जोशी

एक नन्हें दोस्त का आपरेशन

ओपरेशन टेबल पर उसे बेहोशी का इंजेक्शन देते समय , जिस तरह से मिनी मुझे देख रही थी वह मैं कभी नहीं भूल सकता ! आपरेशन के दौरान मैंने अपने बॉस और सहकर्मियों को "मेरी एक दोस्त का आपरेशन है अतः नहीं आ सकता ...हाँ ...कुतिया सुनकर.. मुझे साथ देने कोई नहीं आया ! आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (105) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 8 जून 2010
सतीश सक्सेना

भोपाल का यह फ़ैसला लगभग महत्वहीन है अगर...

भारत का बदनाम लेट-लतीफ़ अदालती इंसाफ़ तो अपनी रफ़्तार से ही पहुँचता है लेकिन दिसंबर 1984 से ही इस देश की जनता अगर चाहती तो यूनियन कार्बाइड के तमाम सामानों का ऐसा बहिष्कार करती कि अगले ही दिन से इस कम्पनी को एक सामाजिक न्याय मिल गया होता। लेकिन समाज में चेतना की इतनी कमी है कि लोग इस कम्पनी की बैटरियाँ ख़रीदते रहते हैं और किसी बात का बहिष्कार न हुआ, न इस देश में होने का आसार दिखता है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (99) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 8 जून 2010
सुनील कुमार

नीड और ग्रीड को समझने का दिन

जब तक समाज के भीतर के कुछ लोग बाहर निकलकर आकर सत्ता से सवाल नहीं करेंगे तब तक यह तय है कि यह समाज अपने आने वाली पीढ़ी को सिर्फ़ चिलचिलाती धूप की विरासत देकर जाएगा। दूसरी तरफ़ जनता के पैसों पर जो नेता-अफ़सर सभी तरह के साधनों का लम्बा-चौड़ा बेज़ा इस्तेमाल करते हैं, एक-एक व्यक्ति नियमों को तोड़ते हुए कई-कई गाडिय़ों का इस्तेमाल करता है, ढेर से एयरकंडीशनर लगवा लेता है उसके ख़िलाफ़ भी एक जनमत तैयार करने की ज़रूरत है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (121) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 9 जून 2010
सुनील कुमार

सुल्ताना डाकू और उसका दोस्त

हिंदुस्तान दैनिक 30 मई 10 में एन सी शाह के शोध के माध्यम से छपे एक समाचार ने मेरा बचपन मुझे याद दिला दिया। सुल्ताना डाकू पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसी आख्यान के नायक की तरह था। स्कूलों में नाटक खेले जाते थे, नौटंकियां और सांग होते थे। वह डाकू कम नायक ज़्यादा था। वह वेष बदलने में माहिर था। अकसर अग्रेज़ अफसरों को मूर्ख बनाकर निकल जाता था। कभी कलक्टर बन जाता था कभी कमिश्नर और कभी एस पी। उसके बारे में अनेक ऐसी किंवदन्तियां प्रचलित थीं कि अमीरों को लूटता था और गरीबों का साथी था। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (150) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 7 जून 2010
गिरिराज किशोर

कविताओं में स्त्री

यह एक कवि की सहज आत्मस्वीकृति है बिना किसी तरह के दंभ या अभिमान के। इस आत्मस्वीकृति में एक कवि की ईमनादारी भी झलकती है और उसे भीतर की निश्च्छलता भी। ऐसा बहुत कम होता है जब कोई कवि इस तरह के शब्दों में अपनी रचनात्मकता का बखान करता है। शैल चंद्रा ने यह हिम्मत दिखाई है और यक़ीनन इसके लिए उन्हें बधाई देनी चाहिए। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (144) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 7 जून 2010
फ़ज़ल इमाम मल्लिक

मागुनी की बैलगाड़ी

स्टेशन से गढ़ के लिए सिंह की बस प्रारंभ हो गई थी । मागुनी की बैलगाड़ी भी चलना प्रारंभ हो गई। देखते-देखते ही बस लोगों से भर गई, मगर बैलगाड़ी ख़ाली। मागुनी आधी रात को ही बैलगाड़ी लेकर स्टेशन पर हाजिर हो जाता था फिर भी लोग बस में बैठना पसंद करते थे। उसने अपनी बैलगाड़ी में बोरे की गद्दी बनाकर बिछाई फिर भी लोग बस की तरफ़ भागते थे। किसी को हाथ पकड़कर लाने से भी लोग बस की तरफ़ देखने लगते थे। आगे पढ़िये...

ओडिया-माटी, (439) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 7 जून 2010
मूल ओडिया : गोदावरीश महापात्र
अनुवाद : दिनेश माली

बड़बोले और बड़लिखे लोगों से

इनमें से हर तबक़ा बहुत संगठित है और मीडिया में तो रोज़ाना के कामकाज में एक नारा सावधानी के लिए याद भी रखा जाता है- वेन इन डाऊट, कट इट आऊट। जब किसी बात पर शक़ हो तो उसे छोड़ ही दो। सभी क़िस्म के बड़बोले और बड़लिखे भी, लोगों से हमारा यही कहना है कि दुनिया की आज की व्यस्त ज़िंदगी में लोगों के पास पूरे सच को ही जानने का वक़्त नहीं रहता। ऐसे में कोई संदिग्ध बात या कोई झूठ लोगों पर कई दिनों तक लाद दिए जाने का नतीज़ा बड़ा खराब होता है। समाज का इतना समय सच तक पहुँचने के पहले झूठ के रास्ते पर ख़र्च होता है कि उसकी कोई भरपाई नहीं हो सकती। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (103) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 7 जून 2010
सुनील कुमार

गांव के घर की याद

इस घर से मेरी स्‍मृतियॉं बहुत गहरी जुड़ी हुई हैं । अब भी जब मुझे सपने आते हैं सपनों  में या तो मैं खेडीपुरा हरदा के घर में होता हँू या दूलिया गॉंव के इस पैतृक घर में । ऐसा क्‍या है कि मैं चलता फिरता बोलता हँसता दूसरे भूगोल में हँू और मेरे विचारों मेरी स्‍मृतियों मेरी कसकती रुह में ये घर इनका वातावरण यहॉं बिताये हर्ष विषाद के क्षण पिघलते रहते हैं । आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (134) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 6 जून 2010
धर्मेन्‍द्र पारे

`समावर्तन' के नंदकिशोर नौटियाल विशेषांक का लोकार्पण

मुंबई। 29 मई, 2010 को मुंबई के हिंदुस्तानी प्रचार सभा के सभागृह में साहित्यिक पत्रिका `क़ुतुबनुमा' के तत्वावधान में वरिष्ठ पत्रकार श्री नंदकिशोर नौटियाल के पत्रकारिता में योगदान पर प्रकाशित `समावर्तन' के विशेषांक का लोकार्पण और `समावर्तन' के संपादक प्रो. प्रभात कुमार भट्टाचार्य का सम्मान साथ-साथ हुआ । विश्वनाथ सचदेव ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि `समावर्तन' और भट्टाचार्यजी ने बड़े साहस का काम किया है। हिंदी की लघु पत्रिकाएँ निकालने के लिए काफ़ी बड़ा ज़िगर चाहिये। `समावर्तन' का प्रकाशन अपने समय की पहचान कराने का उपक्रम है। समाज को चेहरा दिखाने का काम लघु पत्रिकाएँ ही कर सकती हैं और यह पत्रिका इस क्षेत्र में बढ़िया काम कर रही है।
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हलचल, (148) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 6 जून 2010

बुद्धिजीवी जब हिंसा की ज़ुबान बोलने लगे तो क्या होगा?

दरअसल हिंसा इस दौर में एक एडवेंचर है। हिंसा करके बुद्धिजीवी समझते हैं, हम क्रांति कर रहे हैं। उनका समर्थन करके भी कुछ लोग यही समझते हैं,कि हम सामाजिक परिवर्तन में अपनी विशिष्ट भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। खादी का कुरता-पायजमा या जींस की फ़ुलपैंट पहन कर आज के छद्म बुद्धिजीवी हवाई-यात्राएँ करते हैं। पंचतारा होटलों मे रुकते हैं। वैभवशाली जीवन जीते हैं। तमाम तरह की चरित्रहीनताओं में लिप्त रहते हैं। महँगी शराब पीते हैं। अय्याशियाँ करते हैं। और वक़्त मिला तो सामाजिक परिवर्तन का भाषण पेलते हैं। दुखद यह है कि पापुलर मीडिया (जनसंचार माध्यम) ऐसे ही लोगों के पास है।
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प्रसंगवश, (156) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 6 जून 2010
गिरीश पंकज

समानांतर मीडिया की दृष्टि से सार्थक है हिंदी ब्लॉगिंग

ब्लॉग लेखन और वाचन के लिए सबसे सुखद पहलू तो यह है कि हिन्दी में बेहतर ब्लॉग लेखन की शुरुआत हो चुकी है जो हिंदी समाज के लिए शुभ संकेत का द्योतक है । वैसे वर्ष-2009 हिंदी ब्लॉगिंग के लिए व्यापक विस्तार और बृहद प्रभामंडल विकसित करने का महत्वपूर्ण वर्ष रहा है , जबकि वर्ष-2010 अपने समापन तक हिंदी ब्लॉगिंग को एक नया आयाम देने में सफल होगा ऐसी उम्मीद की जा रही है ।
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मूल्याँकन, (631) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 6 जून 2010
रवीन्द्र प्रभात

मुक्त स्त्री की छद्म छवि

असल साहित्य स्त्री के शोषण का विरोधी है और पुरुष लेखकों ने भी अपनी रचनाओं में स्त्री के शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है। कुछ लेखिकाएँ और कवयित्रियाँ स्त्री-अधिकारों को लेकर बहुत उग्र दिखाई देती हैं। उनकी उग्रता से प्रतीत होता है कि वे सभी पुरुषों के ख़िलाफ़ हैं। इसका कोई अर्थ नहीं है। मैं मानता हूँ कि औरत ही पुरुष को मुक्त कर सकती है पर ऐसा वह उसमें भय पैदा करके नहीं कर सकती। स्त्री आज आक्रामक मुद्रा में है। उसके लिए नए रास्ते खुल रहे हैं। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में उसकी भागीदारी बढ़ रही है। शायद इसीलिए उसे अधिक संयमित होने की ज़रूरत है। आगे पढ़िये...

पुस्तकांश, (162) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 6 जून 2010
नामवर सिंह

न दैन्यम् न पलायनम्

जो अभी मैदान में है, जिसने लड़ना बन्द नहीं किया, उसकी हार-जीत के बीच निश्चय-अनिश्चय की सम्भावना फिर भी बनी रहती है, परन्तु जिसने हथियार डाल दिये, मैदान छोड़ दिया उसकी हार तो एकदम निश्चित है। भागने का विचार सबसे पहले मन में उत्पन्न होता है उसके क्रियान्वित होने की स्थिति बाद में बनती है। मन को नियंत्रित करता है व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण। जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। आवश्यक है कि सोच सकारात्मक हो। आगे पढ़िये...

आलेख, (134) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 6 जून 2010
मदन मोहन ‘अरविंद'

असीम

उसका चेहरा लाल आभा से खिल उठा। उसकी बात सच नही थी। मैं डिगने वाला भले ही न होऊँ मगर आजकल मुझे उसका ख़्याल अक्सर आता था। शाखा से चले जाने के बाद भी मानो वह अपना कोई अंश मेरे पास छोड़ जाती थी। मैं सोचने लगा कि शायद मेनका और उर्वशी भी ममता के जैसे ही दिखते होंगे। इसीलिए उनकी सुन्दरता की उपमा आज तक दी जाती है। आगे पढ़िये...

कहानी, (487) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 6 जून 2010
अनुराग शर्मा

ग़ज़ल
छंद, (421) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 5 जून 2010,
प्राण शर्मा

पालनेघर से वृद्धाश्रम तक

धीर-गंभीर होकर जस्सीभाई ने जो जवाब दिया था, उसका जवाब हमसब के पास होने के बाद भी लाचारी है। यही अहसास ने मेरी रूह को बूरी तरह छटपटाई थी। वह बोले थे, "मेरी दृष्टि से पालनेघर से ही वृद्धाश्रम की शुरुआत होती है।" फिर तो कई बातें हमारे बीच में हुई मगर मुझे उनके शब्दों के तीर ने घायल कर दिया था। उनकी बात बिलकुल सही लग रही थी। दौड़धूप की ज़िंदगी में हमारे ही बच्चों के लिए समय नहीं होता और उन्हें हमारे लिए ! हमारी नौकरी और अन्य प्रवृत्तियों के बीच बच्चों को आया की गोद में या पालानेघर के सहारे छोड देतें है।
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झरोखा, (227) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 5 जून 2010
पंकज त्रिवेदी

जीवन संघर्ष और जिजीविषा की बेहतरीन कहानियाँ

यह डॉ. अभिज्ञात की खासियत है कि वे पाठकों को विशेष तौर पर चौंकाते नहीं हैं बल्कि इनकी कहानियों में कथानक धीरे-धीरे स्वत: आगे बढ़ता है। हालाँकि 'क्रेजी फ़ैंटेसी की दुनिया’ में डॉ. अभिज्ञात पाठकों के सामने एक ऐसा रचना संसार प्रस्तुत करते हैं, जिसमें प्रकृति के सानिध्य से रक्षा, विनाश की परिकल्पना के साथ-साथ मानवीय मूल्यों के क्षरण का लेखा-जोखा सा पाठकों के सामने मानो उपस्थित हो जाता है। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (178) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 5 जून 2010
कमलेश पाण्डेय

कॉर्पस भाषाविज्ञान

विभिन्‍न भारतीय भाषाओं के प्रौद्योगिकीय विकास के लिए हमें एक विशाल और व्यापक आधार वाले कॉर्पस की आवश्यकता है। कॉर्पस-आधारित सतत भाषिक विश्‍लेषण आने वाले समय में भाषा संसाधन के विभिन्‍न सैद्धांतिक एवं अनुप्रयुक्‍त विषय क्षेत्रों को पोषित संवर्धित करेगा। हम कॉर्पस की सहायता से समय की बचत तथा उपकरणों के निर्माण प्रक्रिया में तेजी ला सकते हैं। आगे पढ़िये...

आलेख, (169) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 5 जून 2010
डॉ. काजल बाजपेयी

पर्यावरण से खिलवाड़ घातक

(5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष)

आखिर हम बच्चों में प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा के संस्कार क्यों नहीं पैदा करते। मात्र स्लोगन लिखी तख़्तियाँ पकड़ाने से पर्यावरण का उद्धार संभव नहीं है। इस ओर सभी को तन-मन-धन से जुड़ना होगा। अन्यथा हम रोज उन अफ़वाहों से डरते रहेंगे कि पृथ्वी पर अब प्रलय आने वाली है। पता नहीं इस प्रलय के क्या मायने हैं, पर कभी ग्लोबल वार्मिंग, कभी सुनामी, कभी कैटरीना व आईला चक्रवात तो कभी बाढ़, सूखा, भूकंप, आगजनी और अकाल मौत की घटनाएँ । क्या ये प्रलय नहीं है? आगे पढ़िये...

प्रसंगवश, (144) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 5 जून 2010
कृष्ण कुमार यादव

कथासंग्रह ‘पावसी’ का विमोचन

जोधपुर । ’जुड़ाव” राजस्थानी साहित्यिक संस्थान और राजस्थान शिक्षक संघ जोधपुर के संयुक्त तत्वाधान में बोरूंदा के श्री सबल महिला शिक्षण संस्थान के सभागार में 25 मार्च, 2010 को अशोक जोशी ‘क्रांत’ के कथा-संग्रह “पावसी” का लोकार्पण समारोह आयोजित हुआ । आगे पढ़िये...

हलचल, (126) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 5 जून 2010

आज के बस्तर का सच

आज के बस्तर का यही सच है | सुरम्य वादियों में अब धमाके गूँज रहे हैं और लाल सलाम बोल -बोल कर काबिज हुए लड़ाकों ने बस्तर की धरती को रक्त से लाल कर दिया है| इलाके में आप जाएं तो हरित दृश्य और झूमते हुए साल वनों से ढकी पहाड़ियां आपका मन मोह सकती हैं बशर्ते बताया न जाए कि दंतेवाडा भी यही इसी इलाके में है | आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (170) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 4 जून 2010
रमेश शर्मा

श्री बालकृष्ण शर्मा ‘‘नवीन’’ की संपादकीय टिप्पणियाँ ...

श्री बालकृष्ण शर्मा नवीन की टिप्पणियों में अंबेडकर, राजगोपालाचारी, महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस, पुरूषोत्तमदास टंडन, सरदार पटेल, संपूर्णानंद, रफ़ी मोहम्मद, कमला नेहरू आदि पर संस्मरणात्मक टिप्पणियाँ और लेख हैं। राष्ट्रीय आंदोलन, मज़दूर संगठन, साम्यवादी दल और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गंभीरतापूर्वक मूल्याँकन है। दुनिया में होने वाले बदलावों और भारत पर उसके प्रभावों, युद्ध और क्रांतियों आदि के बारे में उनकी संपादकीय टिप्पणियों ने न सिर्फ़ पाठकों को, बल्कि आमजन को उद्वेलित किया। आगे पढ़िये...

आलेख, (207) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 4 जून 2010
अनिल सौमित्र

ऐसी नौबत आए उसके पहले समाज पुलिस के बारे में सोचे

आर्थिक संपन्नता से लदे हुए छत्तीसगढ़ के उच्च आयवर्ग में से किसने कितनी मदद इस राज्य को नक्सल हमलों से बचाने के लिए शहीद होने वालों के लिए भेजी है? जब समाज इतना नाशुकरा रहेगा तो उसके लिए बेबस-बेरोज़गार तो जान के ख़तरे वाली वर्दी पहन लेंगे लेकिन देश-प्रदेश को बचाने के लिए शहादत का ज़ूनून उन वर्दियों के ऊपर किसी सिर में नहीं रहेगा। अपनी अगली मुसीबत के वक्त पुलिस के बारे में सोचना श्मशान वैराग्य जैसा होगा, ऐसी नौबत आए उसके पहले समाज पुलिस के बारे में सोचे। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (113) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 4 जून 2010
सुनील कुमार

नेड केली – डाउन अंडर का रोबिनहुड

कहीं ऐसा तो नहीं कि नेड केली को प्रतीक बना कर वे अपने ही मन में उभरे पुलिस के नृशंस व्यवहार के प्रति आक्रोश को अभिव्यक्ति देना चाहते थे ? पर अदालत ने एक न सुनी और उसे फाँसी दे दी गई। मरने से पहले उसकी माँ ने कहा था – “ध्यान रहे, एक केली की तरह वीरतापूर्वक मरना”। क्रूर प्रशासन की बलिवेदी पर एक और आहुति चढ़ी किन्तु यह मानव अपने साहस के बल पर न्याय-व्यवस्था को इतिहास के कटघरे में खड़ा कर पाया। आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (278) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 4 जून 2010
हरिहर झा

खुले पिंजरे की चिड़ियां

मम्मी लगभग रोज़ ही मुझे ऐसी हिदायतें दिया करतीं थीं, परंतु मैं तो टेलिफ़ोन ऑपरेटर हूँ, बोलना और सुनना मेरा पेशा है। मैं रोज़ अनेक अजनबियों की आवाज़ों का जवाब देती हूँ। हैलो कहती हूँ। दो व्यक्तियों को आपस में मिलवाती हूँ। मैं एक सेतू हूँ। दूर स्थित दो किनारों के एक पुल पर आपसी प्यार मुहब्बत करने वालों को मेरे अस्तित्व का अहसास ही नहीं होता। काश ! मेरा भी कोई अपना किनारा हो।
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भाषांतर, (140) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 4 जून 2010
मूल : हमदर्दवीर नौशहरवी
अनुवाद : नीलम शर्मा ‘अंशु’

गाल भर धुआँ

बुधिया- नहीं जी माँगे तो नहीं । पी लो बहुत गरमी है । पना भी देती हूँ, एक गिलास वह भी पी लो, बच्चों को पना ही पिला रही थी । आगे पढ़िये...

कहानी, (192) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 4 जून 2010
नन्दलाल भारती

मलयाली लेखक कोविलन का निधन

त्रिचूर। मलयालम भाषा के वरिष्ठ लेखक कोविलन का बुधवार सुबह यहां एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनके परिजनों ने बताया कि वह सांस संबंधी दिक्कतों से पीडित थे। कोविलन (87)की दो पुत्रियाँ और एक पुत्र है। स्वतंत्रता सेनानी रहे कोविलन का असली नाम वी वी अयाप्पन था। आगे पढ़िये...

हलचल, (154) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 4 जून 2010

पानी मंहगा सस्ता खून

इंसानी जीवन मैं पानी मिलने के तो इन्सान को कई साधन मिल जायेंगे ! लेकिन इन्सान को खून मिलने का कोई साधन नहीं है ! और ना कभी होगा ! इसलिए हम पानी को सस्ता और सुलभ मानते हैं ! और कभी भी हमने उसका मूल्य समझा ही नहीं ! और खून की कीमत इन्सान को मालूम है ! क्योंकि इन्सान जानता है कि खून की एक बूँद किसी भी मरते इन्सान को जीवन दान दे सकती है ! लेकिन आज इस देश मैं उलटी गंगा वह रही है ! आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (130) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 3 जून 2010
संजय कुमार चौरसिया

सुभाष काक की दो कविताएँ
कविता, (222) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 3 जून 2010,
सुभाष काक

बाज़ार में खेल

ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट क्या सिर्फ़ खेल भर है या इससे अलग कुछ और। यह सवाल मेरे जैसा सैकड़ों लोगों के मन में बारहा उठता होगा। दरअसल पिछले एक दशक में भारतीय क्रिकेट का जिस तरह से चेहरा बदला है उससे क्रिकेट महज खेल भर न रह कर प्रोडक्ट में बदल गया है। क्रिकेट ने भारतीय बाज़ार के इस तरह प्रभावित किया कि हर कोई क्रिकेट की भाषा में बात करने लगा। आगे पढ़िये...

बाअदब-बामुलाहिजा, (189) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 3 जून 2010
फ़ज़ल इमाम मल्लिक

राजा और प्रजा के इस्तेमाल के साधनों में फ़र्क

अब तो देश भर में अस्पतालों का निजी ढाँचा इतना बढ़ चुका है और सत्ता पर बैठे तमाम लोग अपनी हर छोटी-बड़ी तकलीफ़ के लिए महंगे निजी अस्पतालों पर पूरी तरह टिके रहते हैं इसलिए सरकारी अस्पतालों की बदहाली उन सार्वजनिक शौचालयों की तरह हो जाती है जिनका इस्तेमाल कोई नेता-अफ़सर नहीं करता। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (109) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 3 जून 2010
सुनील कुमार

शब्द-मित्र
कविता, (179) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 2 जून 2010,
किशोर कुमार खोरेन्द्र

कहाँ है चित्रकला की भाषा

सचिन और अणखी में समानता है। वह स्पोर्ट्स का बादशाह है और अणखी साहित्य का। सचिव ने बल्ले के ज़ोर पर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है तो अणखी ने कलम के ज़ोर पर। सचिन की प्रगति में शारीरिक चोटें रोड़े पैदा करती रही हैं और अणखी को घरेलू समस्याओं ने सूली पर टांगे रखा। आलोचकों ने दोनों को खूब खींचा, पर दोनों अपनी कारगुजारियों से उनके मुँह बन्द करते आए हैं। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (123) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 2 जून 2010
राजू रंजन

आबिद सुरती का सम्मान समारोह

मुंबई । साहित्यिक पत्रिका ‘शब्दयोग’ के आबिद सुरती केंद्रित अंक (जून 2010 ) के लोकार्पण एवं आबिद सुरती के 75 वें जन्म दिन पर एक संगोष्ठी का आयोजन हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के सभागार में 28 मई 2010 को आयोजित हुआ। इस अवसर पर आबिद सुरती का सम्मान करते हुए समाज सेवी संस्था ‘योगदान’ के सचिव आर.के.अग्रवाल ने आबिद सुरती की पानी बचाओ मुहिम के लिये दस हज़ार रुपये का चेक भेंट किया। आगे पढ़िये...

हलचल, (137) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 2 जून 2010

क्लब

क्लब का हर मौसम जश्न का मौसम होता। औरतें, मर्द, बच्चे और ख़ूबसूरत जवान लड़कियाँ। जवान लड़कियों को कनखियों से देखना भी उत्सव जैसा होता। मैं आउटसाइडर था। मेरे मित्र फ़ैक्ट्री में काम करते थे। वो शाम को क्लब में होते और मैं भी घर से डेढ़ किलोमीटर पैदल चल कर क्लब पहुँचता। आगे पढ़िये...

कहानी, (159) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 2 जून 2010
ज्ञानप्रकाश विवेक

वंचितो पर व्यंग्य कतई नहीं करना चाहिए- प्रेम जनमेजय

प्रेम जनमेजय को मैं अपनी पीढ़ी का श्रेष्ठ व्यंग्यकार मानता हूँ। उसने आरंभ से व्यंग्य को एक गंभीर-कर्म के रूप में लिया है। उसने व्यंग्य को न केवल सीमित होने से बचाया है अपितु उसके सैद्धांतिक पक्ष पर अनेक चर्चाओं को आरंभ किया है तथा उन चर्चाओं में, व्यंग्य के प्रति उदासीन साहित्यकारों को भी सम्मिलित करने का सार्थक प्रयत्न किया है। आगे पढ़िये...

कथोपकथन, (188) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
दिविक रमेश

अण्डमान-निकोबार में समृद्ध होती हिन्दी

आज़ादी के बाद भी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में हिन्दी का बोलबाला बना रहा। द्वीप समूह ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके बिना आज़ादी का इतिहास अधूरा है। इतिहास का यह ‘काला पानी’ आज ‘मुक्ति तीर्थ’ के रूप में जाना जाता है। देश के तमाम साहित्यकारों ने काला पानी की यातनाओं को केंद्रबिंदु में रखकर कविताएँ लिखीं। ये काव्य रचनाएँ द्वीप समूह के हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। आगे पढ़िये...

हिंदी-विश्व, (201) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
कृष्ण कुमार यादव

घृणा पर आधारित अरविंद अडिगा का उपन्‍यास द वाइट टाइगर

लेखक ने भारत को अंधकार और रोशनी के भारत में बाँटकर देखा है। अंधकार का भारत वह जहाँ रोशनी की किरणें पहुँच कर दम तोड देती हैं और रोशनी का भारत वह जहाँ अँधेरा रोशनी के नियॉन बल्बों से फूटता है और अपने छोटे से घेरे के बाहर के अँधेरे को और गहराता जाता है। किताब जहाँ तहाँ अपने मज़ेदार सनसनीखेज विश्लेषणों से भरी है। कुछ इस तरह से कि आपको उसमें जीवन के दर्शन का भी पुट मिलता चलेगा और आपकी कुछ गंभीर पढने की ग्रंथी तुष्ट होती रहेगी। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (149) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
कुमार मुकुल

इक़बाल का पुनर्पाठ

इक़बाल के यहाँ जीवन का जो राग है, उसे अगर अक़्ल व शऊर के साज़ पर सुनें तो जो आवाज़ सुनाई देगी, उसमें अमन है, मोहब्बत है और आपसी रिश्तों को मज़बूत करने की वकालत है। भारतीय भाषाओं के ढेरों कवियों ने मोहब्बत के तराने तो गाए हैं पर उनमें एक व्यापक संसार की कमी दिखाई पड़ती है। जबकि इक़बाल के यहाँ वह सरोकार बहुत शिद्दत के साथ दिखाई पड़ते हैं। वह इक़बाल ही हैं जिनकी कविाताओं में गौतम बुद्ध, विश्वामित्र, राम, भर्तृहरि का ज़िक्र मिलता है। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (126) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
फ़ज़ल इमाम मल्लिक

पंजाबी साहित्य का सचिन तेंदूलकर - राम सरूप अणखी

सचिन और अणखी में समानता है। वह स्पोर्ट्स का बादशाह है और अणखी साहित्य का। सचिव ने बल्ले के ज़ोर पर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है तो अणखी ने कलम के ज़ोर पर। सचिन की प्रगति में शारीरिक चोटें रोड़े पैदा करती रही हैं और अणखी को घरेलू समस्याओं ने सूली पर टांगे रखा। आलोचकों ने दोनों को खूब खींचा, पर दोनों अपनी कारगुजारियों से उनके मुँह बन्द करते आए हैं। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (133) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
सुभाष नीरव

बी. एल. पाल की दो कविताएँ
कविता, (519) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010,
बी. एल. पाल

समय का शेष नाम
कविता, (164) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010,
डॉ. सीताकांत महापात्र

मुझे मेरे धोबी से बचाओ

अब मिर्ज़ा को कैसे यकीन दिलाऊँ कि कल न मैं सदर गया था न ही अपना भूरा सूट पहना था क्योंकि वह सूट तो धोबी को धोने के लिया दिया है । मिर्ज़ा नाराज़ होकर चले गये और मैं सोचने लगा कि ये कैसे हो सकता है कि मैं कल सदर बाज़ार गया था और मेरे को ही मालूम नहीं और वह सूट पहन कर गया था जो इस वक़्त मेरे पास है ही नहीं । मैं तो घर पर अपनी बीवी के साथ था । अगर मैं बीवी के साथ था तो सदर में कौन था ? अगर मैं सदर में था तो धर में मेरी बीवी के साथ कौन था ? अगर मैं अपना भूरा सूट पहन कर सदर गया था तो धोबी को किसका भूरा सूट धोने को दे आया हूँ? आगे पढ़िये...

व्यंग्य, (218) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
मूल लेखक : मुज्तबा हुसैन
अनुवाद : अख़्तर अली

मूक फ़िल्मों के सौ साल और एस्सेने संग्रहालय थियटर

इन मूक छवियों का वास्तविक इतिहास भले ही लुइस ले प्रिंस की 1888 की दो सेकेण्ड की फ़िल्म (?) ‘च्राउन्ड हे गार्डेन सीन’ को गिनती के लिए कह लें, लेकिन इसका वास्तविक इतिहास शुरू होता है 1909 में ब्रिटेन की क्लारेंडन कम्पनी (Clarendon Company) की एक रील की फ़िल्म से। आगे पढ़िये...

समांतर, (113) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
अनिल सिन्हा

इंग्लैंड की राज परम्परा और साम्राज्ञी एलिजाबेथ

उनका पूरानाम था ऐलिज़ाबेथ ऐलेक्ज़ान्ड्रा मेरी। जन्म 21 अप्रेल,1926। जन्मस्थली- 17ब्रुटोन स्ट्रीट, मे फेर, लंदन यु.क़े.( युनाइटेडकिंगडम)। पिता- प्रिंस आल्बर्ट जो बाद मेंजोर्ज 4बनकर महाराज पद पर आसीन हुए। माता- एलिजाबेथबोज़लियोन(डचेस ओफ योर्क - बाद में राजामाता बनीं)।
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शेष-विशेष, (178) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
लावण्या दीपक शाह

एक गायिका की ज़िंदगी के बहाने भारतीय शास्त्रीय संगीत का वृत्तांत

नमिता भारतीय संगीत परंपरा के भविष्य के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त हैं। वे कहती हैं कि “भारतीय परंपरा कभी ख़त्म नहीं होगी। हो सकता है कि यह बदलते श्रोताओं और उनकी रुचियों के अनुरूप ख़ुद को किंचित बदल ले, और यह अच्छा भी है क्योंकि परंपरा और संस्कृति कभी जड़ हो भी नहीं सकते। असल में तो ऐसा तभी होता है जब वे मरते हैं।” आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (120) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल

सामाजिक सरोकार और युवाओं की भूमिका

अप्रवासी भारतीय आलिम का जन्म एवं शिक्षा अमेरिका में हुई है, लेकिन उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र राजस्थान के झुंझनु जिले के छोटे से गाँव बगड़ को चुना है। आलिम के साथ क़रीब आधा दर्जन युवाओं की टीम ने बगड़ में देश के पहले महिला बीपीओ का आगाज़ किया है। ऑप्टीकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके आलिम, कैलीफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी से अर्थषास्त्र की डिग्री प्राप्त गगन राणा, अमेरिका की केस वेस्टर्न रिज़र्व यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में स्नातक कार्तिक रमण, बेल्जियम में पली-बढ़ी और शिक्षित आशिनी कोठारी एवं बायोटेक्नॉलजी में स्नातक मुंबई के श्रोत कटेवा चाहते तो किसी भी कार्पोरेट कंपनी में नौकरी करके आराम की ज़िंदगी बसर कर सकते थे। आगे पढ़िये...

आलेख, (174) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
उमाशंकर मिश्र

फ़ेसबुक में आपके कितने मित्र हैं?

बड़ी कंपनी होने, बड़ा प्रयोक्ता बेस होने से फ़ेसबुक बहुत पैसे भी बना रही है। इसके हर पृष्ठ पर विज्ञापन नज़र आते हैं। इस तरह से फ़ेसबुक आपके इमोशन की क़ीमत पर पैसे बना रही है। आप अपने भतीजे के बर्थ डे केक को काटने का स्टेटस फ़ोटो सहित फ़ेसबुक में चिपकाते हैं और ऑनलाइन पार्टी करते हैं। या फिर अपनी दादी की मृत्यु का ऑनलाइन मातम फ़ेसबुक पर मनाते हैं। फ़ेसबुक को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वो हर पेज़ पर विज्ञापन दिखाती है, और इस तरह से चहुँओर से पैसे बनाती है। आगे पढ़िये...

तकनीक, (156) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
रविशंकर श्रीवास्तव

ज्ञानश्री और नक्काली जाति के लोग

ज्ञानश्री के अपने तर्क थे,जो दयाराम के समझ में नहीं आए। वो निराश हो कर लौट गया। उसने अपने साथियों से कहा, कि ''ज्ञानश्री और उसके लोग हमारा साथ नहीं देंगे। हमें अपनी लड़ाई ख़ुद लडऩी होगी। चाहे हमारी जान ही क्यों न चली जाए। दायाराम और उसके साथियों ने आपस में मिल कर एक संगठन बनाया-'' एकजुट''। 'एकजुट' नक्कालियों के ख़िलाफ़ नारे लगा कर और साहित्य का प्रकाशन कर के उनसे मुख्यधारा में आने की अपील करने लगे।'' आगे पढ़िये...

आधुनिक वेताल कथा, (124) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
गिरीश पंकज

संगणकीय भाषाविज्ञान

परंपरागत व्याकरण में भाषा के नियमों को एकसूत्रता में बांधा जाता था तथा भाषा को उन्ही नियमों द्वारा सीखने–सिखाने का कार्य भी चलता था लेकिन यह व्याकरण किसी एक भाषा के लिए ही उपयोगी था । इसलिए प्रसिद्ध भाषाविज्ञानी नोअम चोम्स्की द्वारा सार्वभौमिक व्याकरण बनाया गया लेकिन संगणक के इस जगत में यह व्याकरण भी संगणकीय व्याकरण में परिवर्तित हो गया जो मशीनी अनुवाद अनुप्रयोग विकास में उपयुक्त है । आगे पढ़िये...

व्याकरण, (203) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
डॉ. काजल बाजपेयी

चिंता और चिंतन

 मैं से निकलकर सर्वज्ञ सर्वत्र विद्यमान होने की, चारों ओर फैल जाने की क्रिया, अंदर से बाहर निकल जाने की प्रक्रिया, चिंता से चिंतन का सफ़र है। साहित्य संपूर्ण समाज को सकारात्मक दृष्टि से देखते हुए, उसके बेहतरी की चिंता करता है, तभी उसमें चिंतन होता है। एक दार्शनिक, व्यक्तिगत जीवन में भी, समस्त मानव जाति को व्यापक दृष्टि में समेटकर, उसके मूल तथ्य की जब चिंता करने लग पड़ता है तो वो चिंतन हो जाता है। समाज की असमानता से चिंतित समाजशास्त्री कुछ ऐसा करना चाहते हैं जिससे ग़रीब और दुखियारों का दुःख समाप्त हो। उनके वक्तव्य, कार्य, उनकी सोच, उनकी बातें जिसके केंद्र में दबे-कुचलों की चिंताएँ होती हैं, सामाजिक चिंतन में डूबी विचारधाराएँ बन जाती हैं। आगे पढ़िये...

ये भी एक दृष्टिकोण, (92) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 30 जून 2010
मनोज सिंह

कुत्ते पालने के फ़ायदे

एक मनोवैज्ञानिक चिकित्सक ने एक रूखे व तलाक के क़गार पर पहुँच चुके दंपति को कुत्ते पालने की सलाह दी थी। दोनों इंसान के बच्चे को गोद लेने को तैयार नहीं होते। डाक्टर की ऐसी सोच थी कि कुत्ते के पिल्ले से उनके बीच में प्रेम जागेगा, दोनों आधुनिक नारी-पुरुष में सेवा-भाव भी उत्पन्न हो सकता है। डाक्टर के मतानुसार ये नन्हा-सा जीव दोनों को नज़दीक लाएगा और अंत में वे अपना बच्चा पैदा करने में उत्सुक हो सकते हैं। और यह सच साबित हुआ। आगे पढ़िये...

ये भी एक दृष्टिकोण, (218) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 24 जून 2010
मनोज सिंह

सीमाओं में बंधी ज़िंदगी

इस सीमा रेखा की कहानी बड़ी अजीबो-ग़रीब है। यह यहीं पर आकर नहीं रुकती। हमने दिशाओं को भी मुख्य रूप से चार और फिर आठ भागों में बांट रखा है। इनके बीच में अटे पड़े क्षेत्र को परिभाषित कर नाम भी दे दिया है। वो तो भला हो सृष्टिकर्ता का कि अंतरिक्ष में जाते ही पूरब-पश्चिम तथा ऊपर-नीचे की कहानी समाप्त और सब कुछ दिशाहीन हो जाता है। यहाँ आकर सभी सीमा रेखाएँ लुप्त होती प्रतीत होती हैं। आगे पढ़िये...

ये भी एक दृष्टिकोण, (217) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 8 जून 2010
मनोज सिंह

हिंदी पुस्तक प्रकाशन का मकड़जाल

दरअसल सच कहा जाए तो हिंदी क्षेत्र में प्रकाशन का माफ़िया काम कर रहा है। प्रत्येक नामी गिरामी से लेकर आम प्रकाशक इनके चंगुल में कैद है। चूँकि प्रकाशकों के पास साहित्य की समझ का अभाव है। इसलिए उनके पास स्थित सलाहकार मंड़ल जिस लेखक को चाहे उसे उपकृत करता रहता है। इस स्थिति में दोयम दर्जे की इन पुस्तकों की सरकारी ख़रीद ही हो सकती है। आम पाठक में कम से कम इतनी समझ तो है कि उसे क्या ख़रीदना है व पढ़ना है। आगे पढ़िये...

समय-समय पर, (292) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 5 जून 2010
अखिलेश शुक्ल

मैं क्या हूँ?

ऐसा कोई ज़रूरी नहीं कि इस तरह के सवाल वैचारिक विमर्श करने वाले या दर्शनशास्त्र से संबंधित लोग ही अपने आप से पूछ सकते हैं। सामान्य अवस्था में भी कई बार आमजन यह सवाल करने लगता है। मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? इस तरह के प्रश्न करके, मैं शाश्वत रहस्य के घोर अंधकारमय ब्लैक-होल में अपने आप को अस्तित्वहीन नहीं करना चाहता। मैं तो लेखन की दृष्टि से, स्वयं को पहचानकर परिभाषित करने की यहाँ कोशिश कर रहा हूँ। आगे पढ़िये...

ये भी एक दृष्टिकोण, (277) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 1 जून 2010
मनोज सिंह

   

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