काजीरंगा नॅशनल पार्क ।
असम वह शाम चार-सवा चार को ही अँधेरा उतर चुका था । नॅशनल पार्क में परमिट लेकर बंदूकधारी रक्षकों के साथ जीप में निकले थे । गहराई तक उतर जाते... एकाकी-रहस्यमय रास्ते । ऐसा ही रहस्यमय जंगल । उनकी पुंसकता जंगल का लिंग परिवर्तन करने को प्रेरणा दें.... जंगल कैसा के बदले कैसो लगे - ऐसी, घनी ! मन में बहुत बड़ा चित्र था । डिस्कवरी चैनल के परदे पर देखे गए दृश्यों की एक छाप थी । उन्मत गज यूथों को पानी में मस्ती करते हुए देखना था, बाघ की दहाड़ें सुननी थी । यहाँ-वहाँ घास के मैदानों में चरते गैंडों ने आकर्षण रचा । मगर फिर जंगल सुरीला लगाने लगा । आगे पढ़िये...
यह देश भी बड़ा विचित्र है।
इसको अपनी बपौती मानने वाले भी कोई कम नहीं हैं। वे मानते हैं कि जब तक वे हैं तभी तक देश टिकने वाला है। उनके परलोक सिधारते ही देश भी न जाने कहाँ चला जाएगा। ऐसी ग़लतफ़हमियाँ उन सभी ने पाल रखी हैं, जो ख़ुद को इस देश के कर्णधार, तारणहार, पालनहार, खेवनहार मान बैठे हैं। वे बोलते हैं तो लगता है देश उन्होंने ही संभाल रखा है। वे खेल-खेल में ही ज़िम्मेदारियों को निभाते चले जाते हैं। जब उनके पास कुछ भी खेलने के लिए नहीं होता तब वे माफ़ी-माफ़ी खेलते हैं। यह सिलसिला आज़ादी आंदोलन से शुरू हुआ और आज तक बदस्तूर जारी है। आगे पढ़िये...
मुम्बई । गत 25 अप्रैल को प्रसिद्ध कथा लेखिका संतोष श्रीवास्तव के सद्यःप्रकाशित उपन्यास 'टेम्स की सरगम' का लोकार्पण संपन्न हुआ । उपन्यास का लोकार्पण करते हुए डा. पुष्पा भारती ने कहा कि यह टेम्स की सरगम के सुरों का कृष्णार्पण है। उन्होंने धर्मवीर भारती जी के साथ बिताए अपने अमूल्य क्षणों को याद करते हुए कहा कि संतोष का यह उपन्यास पढ़ते हुए मुझे आज यह कहने में संकोच नहीं होता कि इस अद्भुत कोमल पारदर्शी प्रेम का अपनी लेखनी से संतोष ने जो वर्णन किया है, मैं वैसे ही उसी प्रेम से गुज़री हूँ। और यह प्रेम का एहसास ही इसमें वर्णित है। संतोष के इस उपन्यास में इतिहास धड़क रहा है। इसमें भक्ति मार्ग, ज्ञान मार्ग का संगम है। आगे पढ़िये...
कटक।
नाट्यकार गोपाल छोटराय की कृतियों को कालजयी रचना बताते हुए अध्यापक पठाणी पटनायक ने कहा कि ओड़िया रंगमंच और नाटक गोपाल छोटराय के प्रति सदैव ऋणी रहेगा। स्थानीय सारला भवन में विगत दिनों आयोजित गोपाल छोटराय स्मृति संध्या समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर पधारे पठाणी पटनायक ने कहा कि आधुनिक ओड़िया रंगमंच के लिए गोपाल छोटराय ने अनेक हृदय स्पर्शी नाटक की रचना की है। आगे पढ़िये...
जो देश पिछले बरस अमरीका से लंबा-चौड़ा समझौता करके परमाणु ऊर्जा के लिए एक छलाँग लगाने जा रहा है वहाँ देश की राजधानी में सरकार का देश का सबसे बड़ा अस्पताल यह कह रहा है कि परमाणु रेडिएशन जैसे ख़तरों में फँसे लोगों के लिए उसके पास कोई इलाज़ नहीं है और न ही देश में विकिरण के ऐसे ख़तरों से मरने या प्रभावित होने वालों के लिए किसी मुआवज़े का कोई क़ानून है। यह हालत भयानक है। आगे पढ़िये...
अफ़वाहों
के पर नहीं होते लेकिन जब वह फैलती है तो यह जा वोह जा। रोके नहीं रुकती। वह फैलती है और फैलती ही चली जाती है। इस फैलाव के दायरे में जो भी आता है वह अफ़वाहों की भेंट चढ़ जाता है। घर-समाज हो या देश अफ़वाहें बहुत कुछ लील जाती हैं। अफ़वाहों का अलग ही समाजशास्त्र है। वक़्त के परों पर हम ही इसे सवार करते हैं और जब यह फैल कर घर और देश को जला डालती है तो हम ख़ुद भी इस आग में अपने को जला पाते हैं। लेकिन यह सब कुछ देख-सुन कर भी हम अफ़वाहों को फैलने से नहीं रोकते। आगे पढ़िये...
तक़रीबन
1000 साल से भी पहले ग़ज़ल का जन्म ईरान में हुआ और वहाँ की फ़ारसी भाषा में ही इसे लिखा या कहा गया। माना जाता है कि ये "क़सीदे" से ही निकली। क़सीदे राजाओं की तारीफ़ में कहे जाते थे और शायर अपनी रोज़ी-रोटी चलाने के लिए शासकों की झूठी तारीफ़ करता था और विलासी राजाओं को वही सुनाता था जिससे वो ख़ुश होते थे। शराब, कबाब और शबाब के साथ राजा क़सीदे सुनते थे और विलासी राजा औरतों के ज़िक्र से ख़ुश होते थे तो शायर औरतों और शराब का ज़िक्र ही ग़ज़लों में करने लगे । वो चाहकर भी जनता का दुख-दर्द बयान नही कर सकते थे। आगे पढ़िये...
इन पँक्तियों
को लिखते हुए कमलेश्वर जी याद आ रहे हैं। एकबार बातचीत में उन्होंने बताया था कि दिल्ली से लेखकों का दल पूर्वी उत्तर प्रदेश के दौरे पर गया था। क़रीब पंद्रह दिनों तक हम लोग कई शहरों और क़स्बों में गए थे। हमारे साथ राजेंद्र यादव भी थे। स्थानीय साहित्यकार हमें सर-माथे पर बिठाते। जहाँ-जहाँ हम गए, वहाँ के साहत्यिकार अपनी किताबें भी देते। एक जगह हमें कुछ किताबें मिलीं। राजेंद्र यादव ने एक युवा साहित्यकार को एक पुस्तक देते हुए कहा कि इसे पढ़ें बहुत ही अच्छी किताब है। वह युवा साहित्यकार पहले तो सकुचाया फिर उसने हौले से कहा - यह किताब उसी की लिखी हुई है और उसने ही उन्हें भेंट की थी। इस एक घटना से दिल्ली के बड़े साहित्यकारों की मानसिकता को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। आगे पढ़िये...
बिहार, केन्द्र प्रदेश और मद्रास के भीतर खण्ड-विखण्डित होकर ओड़िशा विपर्यस्त अवस्था में थी । ओड़िआ-भाषी लोगों को एकत्र करके एक स्वतन्त्र प्रदेश निर्माण के लिये अनेक चिन्तक, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक एवं देशभक्त व्यक्तियों ने बहुत प्रयत्न किये । उन महान् व्यक्तियों में उत्कल-गौरव मधुसूदन दास अन्यतम हैं । वे ‘मधुबाबु’ नाम से सर्वत्र लोकादृत रहे हैं । आगे पढ़िये...टेलिफ़ोन टैपिंग के मामले को लेकर संसद में भारतीय जनता पार्टी ने यह मुद्दा बनाया है कि इस मामले में प्रधानमंत्री से कम किसी का जवाब वे नहीं सुनेंगे। संसद और विविध भारती जैसे फ़रमाईशी रेडियो स्टेशनों में फ़र्क किया जाना चाहिए। किसी छोटे से शहर में जब कोई आंदोलन होता है तो सडक़ पर खड़ी भीड़ इस बात को मुद्दा बनाती है कि कलेक्टर धरना स्थल पर आकर उनका मानपत्र लें या वे जब कलेक्टर के दफ्तर जाएँ तो वे बाहर आकर उनसे ज्ञापन लें। एक भीड़ की मानसिकता में अपने अहंकार को पूरा करने के लिए या भीड़ के सामने अपनी ताक़त और ज़िद को दिखाने के लिए तो ऐसा ठीक है लेकिन संसद के भीतर सरकार का कोई भी प्रतिनिधि सरकार की ओर से बोल सकता है और यह मामला मनमोहन सिंह के किसी निजी भ्रष्टाचार का मामला तो है नहीं जिस पर कि उनका ख़ुद का बोलना ज़रूरी हो। आगे पढ़िये...
ओयविनो रिमबरिनो
से मेरी मुलाक़ात बरगन(नोर्वे) में हुई थी। इस यूरोपीय यात्रा में कृत्या का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य था, नोर्वे में लेखक मंच काफ़ी सक्रिय हैं, उन्हें आपस में मिलने और कार्यशायालाएँ आयोजित करने के मौक़े भी मिलते हैं। ओडवे नोर्ला नामक संस्था की सदस्या है, और अधिकतर लेखकों से परिचित है। ओयविनो रिमबरिनो भी नोर्ला के सदस्य हैं। जब मैं बर्गन आई तो ओदवे ने ओयविनो रिमबरिनो से मिलने का कार्यक्रम भी बनवाया। आगे पढ़िये...
अरस्तू
ने अपने ग्रंथ में नाटकों पर विशेषकर त्रासदी पर बहुत विस्तार से विवेचन किया है। उन्होंने त्रासदी और कौमदी नामक दो भेद नाटक के माने। नाटक की उन्होंने कोई परिभाषा नहीं दी लेकिन उनके अनुसार नाटक काव्य का वह रूप है जिसमें पात्र जीवित, जाग्रत और चलते-फिरते प्रस्तुत किये जाते हैं। त्रासदी का लक्ष्य है यथार्थ जीवन से भव्यतम जीवन का चित्रण। यहाँ भव्यता का आधार नैतिक है। इसी आधार पर त्रासदी में औसत से उच्चतर मानव जीवन का चित्रण किया जाता है और त्रासदी को श्रेष्ठ काव्य रूप माना गया है। कौमदी का लक्ष्य है यथार्थ जीवन से हीनतर जीवन का चित्रण। आगे पढ़िये...
कोलकाता । रविवार को अकृत संस्था द्वारा स्थानीय कलामंदिर प्रेक्षागृह में कवि चम्पालाल मोहता 'अनोखा' का अभिनंदन किया गया जिसमें उनकी पुस्तक का लोकार्पण भी हुआ। समारोह की अध्यक्षता कवि ध्रुवदेव मिश्र 'पाषाण' ने की। आगे पढ़िये...
मध्यप्रदेश के एक पिछले मुख्यमंत्री और आज कांग्रेस के एक चर्चित बड़े नेता दिग्विजय सिंह के लेख के जवाब में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने शायद पहली बार ऐसे पैने राजनीतिक तेवर दिखाए हैं। एक बड़े अँगरेज़ी अख़बार में छपे दिग्विजय के लेख में ज़ाहिर तौर पर तो छत्तीसगढ़ के नक्सल मोर्चे पर लिखा गया था लेकिन उसका बड़ा हमला उन्हीं की पार्टी के केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम थे। आगे पढ़िये...
हैदराबाद । दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग में नवगठित साहित्य संस्कृति मंच और स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद के तत्वावधान में ‘उत्तरआधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य’ विषयक एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। आगे पढ़िये...
पहली कहानी
पर बात करने से पहले मैं अपनी पहली रचना पर बात करना चाहूँगा । पहली तुकबंदी मैंने 13 वर्ष की उम्र में की थी। उसके बाद छिटपुट कविताएँ लिखीं, जो देहरादून के स्थानीय अख़बारों में छपीं। दो-एक बार मंच से भी पढ़ीं, लेकिन लगातार मुझे लगता रहा कि जो बात मैं कहना चाह रहा हूँ, कह नहीं पा रहा हूँ। उम्र, अनुभव, संघर्ष और दायरा बढ़ने के साथ-साथ लिखने की, अपने आपको अभिव्यक्त करने की छटपटाहट लगातार बढ़ती रही, लेकिन कुछ सूझता ही नहीं था कि क्या लिखना है और कैसे लिखना है। आगे पढ़िये...
खगड़िया।(बिहार) गति रविवार को प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से एक संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी का विषय था- 'इतिहास, परंपरा, उपलब्धियाँ व चुनौतियाँ।' कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रलेस के जिलाध्यक्ष विश्वनाथ ने कहा कि संप्रदायिकता, बाजारवाद और नव साम्राज्यवाद लेखकों के समक्ष एक बड़ी चुनौती है।
उधर दलित वाच बिहार के तत्वाधान में रविवार को ही खगड़िया में 'दलितों की दशा-दिशा' विषयक एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता जेजेबी के सदस्य रामचंद्र दास ने की। मौक़े पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित बाढ़-सुखाड़ अभियान के राज्य प्रतिनिधि व जल विशेषज्ञ रणजीव ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर विस्तार से चर्चा की। आगे पढ़िये...
श्रद्धेय महाश्वेता जी,
आप मुझे पहचानती नहीं होंगी। मेरी उम्र 80 वर्षों की है। विगत 1949 से मैंने ख़ुद को वामपंथी राजनीति से जोड़ कर रखा है। आप हमेशा वामपंथी चिन्तन के साथ रहीं, और पारिवारिक तौर पर भी आप वामपंथी परम्परा के साथ रहीं, इन बातों से मैं वाक़िफ़ हूँ। आप कालजयी लेखिका हैं और आपकी रचनाओं को पढ़ने से साफ़ ज़ाहिर होता है कि मेहनतकश, निःसहाय और ग़रीब लोगों के साथ आपका मन किस हद तक मिला हुआ है। आगे पढ़िये...
भूमिहीन
खेतिहर मज़दूर पिसुआ पोखर में डूबकर मर गया । जानकर बहुत दुख हुआ । वही पिसुआ जो कहता था देखो केशव बाबू मैं भी एक आदमी हूँ पर जमींदार जिसके लिये जिसके खेत से हवेली तक दिन रात एक करता हूँ सेर भर मज़दूरी पर । वही जमींदार मेरे साथ जानवर से भी बुरा व्यवहार करते है । कुत्ते के मुँह मारे बर्तन में खा लेते हैं पर मेरा छुआ हुआ अपवित्र हो जाता है । मेरी परछाई तक से परहेज़ होता है । ज़िल्लतें झेलकर भी टिका हूँ । जाऊँ तो जाऊँ कहाँ केशव बाबू । आगे पढ़िये...
कोलकाता।
हितेन्द्र पटेल के पहले उपन्यास 'हारिल' पर एक विचार-गोष्ठी का आयोजन गरीफा मैत्रेय ग्रंथागार के स्थापना दिवस के मौक़े पर शनिवार 24 अप्रैल को किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आलोचक शंभुनाथ ने कहा कि यह उपन्यास यथार्थ को अनावृत्त करता है। इसमें परिवार की अवधारणा को बचाने की एक बेचैनी है। आलोचक प्रफुल्ल कोलख्यान ने कहा कि इतिहास बनाने का काम लेखक करता है। 'हारिल' में हितेन्द्र पटेल ने कुछ ऐसी ही भूमिका निभाई है। आगे पढ़िये...
बर्गन शहर
नोर्वे के दूसरे शहरों स्तांगवर आदि की अपेक्षा घना बसा है, लेकिन पर्वत और समुद्र का सम्मिश्रण इसे एक अजीब सी प्राकृतिक ख़ूबसूरती दे रहा है। छह महीने से भी ज़्यादा बरफ में डूबे रहने वाले इस बरसात के साथी शहर का अद्भुत शिल्प कौशल को देख कर आश्चर्य होता है कि इतनी विरोधी परिस्थिति में रहते हुए, बेहद माडर्न होते हुए भी यहाँ के वासी सदियों पुराने इमारतों की इतनी अच्छी तरह से साज-संभाल कर रहे हैं। आगे पढ़िये...
चंडीगढ़ । हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा इन दिनों पंजाबी समुदाय पर बड़े मेहरबान दिख रहे हैं। राज्य में पंजाबी को दूसरी भाषा का दर्जा देने की अधिसूचना जारी करने के बाद अब उन्होंने पंजाबी साहित्य को बढ़ाने पर बल दिया है। इसके लिए हुड्डा ने ‘बाबा शेख फ़रीद पुरस्कार’ की राशि 51,000 रुपये से बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दी है। इतना ही नहीं, उन्होंने पंजाबी के बढ़ावा के लिए हरसंभव मदद का ऐलान भी किया है। वे 24 अप्रैल को हरियाणा निवास में हरियाणा पंजाबी साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित पुरस्कार समारोह में बोल रहे थे। आगे पढ़िये...
मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इंडिया के बरसों से चले आ रहे बदनाम अध्यक्ष केतन देसाई के बारे में ख़बरें छपी हैं कि उनके घर-दफ़्तर से सीबीआई अफ़सरों को करोड़ों के सोने के गहने या नगदी मिले हैं। हम पिछले कई दिनों से अपने हाथों को एक सीमा के भीतर बंधा हुआ सा पा रहे थे कि आईपीएल के विशाल भ्रष्टाचार के अंधड़ के बीच उसे छोडक़र, उसके दर्जन भर पहलूओं को छोडक़र और किस बारे में लिखें? लेकिन आज यह एक दूसरा मुद्दा सामने आया भी है तो वह एक अलग भ्रष्टाचार के बारे में है और इसके दानवाकार से भी अगर यह लोकतंत्र अब दहशत नहीं खाता है तो यह लोकतंत्र पता नहीं कहाँ जाकर ख़त्म होगा। आगे पढ़िये...
मानवीय
गौरव की व्यापक प्रतिष्ठा करने की प्रक्रिया में हम यह पहचान सकेंगे कि यदि कहीं किसी भी मनुष्य के गौरव की क्षति होती है तो वह मनुष्य मात्र के गौरव की क्षति है। यहां पर यह बात समझ लेनी आवश्यक है कि लेखन के इस विशिष्ट दायित्व में राष्ट्र कोई निरपेक्ष इकाई नहीं है, राष्ट्र भी व्यापक मानव-नियति के प्रसंग में सार्थकता पाता है। साहित्य में राष्ट्र-निर्माण को व्यापक मानवीय नियति की पृष्ठभूमि में समझना श्रेयस्कर होता है। आगे पढ़िये...
उस शाम
अगर वह मेरे साथ सख़्ती से पेश आये होते तो मैं निश्चित रूप से घर छोड़कर अपने प्रेमी के साथ भाग जाने की नासमझी कर बैठती । उनके इस प्यार और विश्वास से भरे शब्दों ने मेरी ज़िन्दगी में होनेवाली कितनी बड़ी ट्रैजेडी से मुझे बचा लिया, यह मैं कभी नहीं भूल सकती । लेकिन मेरे साथ जो बेहद सही वक़्त पर सही राय देते हुए और सही कदम उठाते हुए पेश आये, वही पापा मुझसे छोटे भाई-बहनों के सन्दर्भ में कब-कैसे ग़लत हो गये, इस चक्रव्यूह को समझना मुझे अक्सर उदास कर जाता है, इसलिये इसमें उलझने से हमेशा बचती रहती हूँ । शायद यह उनके ज़रूरत से ज़्यादा प्यार-दुलार-सुरक्षा का नतीज़ा रहा जिसने बैक-फ़ायर किया । आगे पढ़िये...
लोग अपने बच्चों को समाज सेवा के कई तरह के काम में लगा सकते हैं। वे चाहें तो जाकर किसी लाईब्रेरी में कुछ समय मदद करें, चाहें तो घर से पानी की बोतलें ले जाकर अस्पताल में ज़रूरतमंदों को दे सकते हैं, वे चाहें तो मरीज़ों को रिक्शे से अस्पताल के भीतर तक या अस्पताल के भीतर से रिक्शे तक लाने में मदद कर सकते हैं। वे टोली बनाकर अपने मुहल्ले को साफ़ रखने का काम कर सकते हैं और घूरे से परे कचरा फेंकने वालों से अपील कर सकते हैं कि वे चारों तरफ गंदगी न फैलाएँ। पढ़े-लिखे बच्चे आसपास की ग़रीब बस्तियों के अनपढ़ बच्चों को बिठाकर उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित कर सकते हैं, अपनी पुरानी किताबें उन्हें दे सकते हैं। आगे पढ़िये...
बुजुर्ग कथाकार
डॉ. देवेंद्र नाथ शाह का पहला लघुकथा संग्रह ‘टूटे हुए चेहरे’ कथ्य, शिल्प और भाषा के स्तर पर बहुत ज़्यादा प्रभाव नहीं छोड़ता। हालांकि देवेंद्र नाथ शाह ने संग्रह को बेहतर बनाने के लिए दो ऐसे लोगों की बैसाखी का इस्तेमाल ज़रूर किया है लेकिन यह बैसाखी उनकी कमज़ोर लघुकथाओं को बहुत ज़्यादा सहारा दे पाएगी ऐसा लगता तो नहीं है। आगे पढ़िये...
पिछले
कुछ वर्षों के व्यंग्य साहित्य पर दृष्टिपात करें तो हम पाते है, कि एकनाम ने अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई है, और वह नाम है गिरीश पंकज। मैं इन्हें उसवक़्त से जानता-पहचानता हूँ, जब वे एक दैनिक समाचार पत्र के साहित्य संपादक थे। उन्होंने मेरी अनेक रचनाएँ प्रकाशित की थी। मुझ जैसे ग्रामीण परिवेश से आने वाले नये साहित्यकारों को समझा-परखा था । आगे पढ़िये...
यह सब इसलिए लिख
रहा हूँ कि कल यानी ‘हंस’, फरवरी, 2010 का संपादकीय पढ़ा और फिर रात एक महफ़िल में नामवरसिंह की मौजूदगी में अशोक वाजपेयी और राजेंद्र यादव की एक दिलचस्प झड़प का तिलस्मानी नज़ारा आँखों से होकर गुज़रा। आगे पढ़िये...
डॉ.
जीवन सिंह के अब तक के किये-धरे को लक्ष्य करके यह कहने में तनिक भी संशय न होगा कि उनकी आलोचना-दृष्टि सदैव लोक के पक्ष में, समय के सापेक्ष और जीवन-गतिकी के रचनात्मक क्रियाशीलनों से भासमान रही है जहाँ एकाँगी, अधूरे, निष्कर्षमूलक, खंडित और वक्र विचारों को कभी ‘स्पेस’ नहीं मिली। उनकी आलोचना में विषय-वस्तु और विचार सहजता किंतु समग्रता से प्रवेश पाते हैं और एक उदार विकसित जीवन के पक्ष में बड़ी दृढ़ता और निष्पक्षता से अपनी बात पाठकों के समक्ष रखते हैं। आगे पढ़िये...
बहुत ही ख़ूबसूरत शहर।
एक साथ गाँव और महानगर की इमेज़ रखने वाला, भारत का यह मानचेस्टर पहली ही नज़र में आपका मन मोह लेता है। इस शहर में इतनी विशेषताएँ हैं कि आप हमेशा के लिए इसके हो कर रह जायेंगे। हाँ, अगर आप इस शहर में ग़लती से बरसात के मौसम में जा पहुँचें और आपको अपने मन वांछित इलाक़े में, जिसे यहाँ विस्तार कहते हैं । एक तरह से सड़कों पर तैर कर पहुँचना पड़े तो ग़लती आपकी ही है। आपने ही ग़लत वक़्त चुना। शहर में बरसाती या छाता रखने का रिवाज नहीं है। आगे पढ़िये...
हैदराबाद । 25 अप्रैल, 2010 (रविवार) को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, के हैदराबाद केंद्र में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है। इस संगोष्ठी का केंद्रीय विषय है - "उत्तरआधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य"। आगे पढ़िये...
देश तो यह वही है जहाँ पर 1962 के चीनी हमले के वक़्त जब नेहरू ने घूम-घूमकर देश की जनता से मदद माँगी थी तो उनका भाषण सुनने पहुँची महिलाओं ने अपनी सोने की चूडियाँ तक उतारकर दे दी थीं और अपना मंगलसूत्र भी उतारकर दे दिया था। लेकिन उस वक़्त जनता को यह भरोसा था कि नेहरू का आईपीएल में शेयर नहीं था और नेहरू की बेटी-दामाद को आईपीएल के प्रसारण के अधिकार नहीं मिले थे और नेहरू ने अपनी किसी महिला मित्र को आईपीएल की किसी टीम से पसीना-मेहनताने के रूप में पौन अरब के शेयर नहीं दिलवाए थे। ऐसा भरोसा होने पर जनता अपने गहने भी उतारकर आज भी किसी नेता के कहे दे देगी लेकिन आज ऐसा भरोसा कोई कहाँ से लाए? आगे पढ़िये...
सलूम्बर । (राजस्थान) श्री शिवनारायण रावत स्मृति शब्द संस्थान, दौसा एवं कौशिक विद्या मंदिर समिति के संयुक्त तत्वावधान में ‘कवि शिरोमणि संत सुंदरदास समारोह 2010’ का आयोजन किया गया। इस समारोह में ‘काव्य माधुरी’ तथा ‘साहित्यकार सम्मान’ कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया। आगे पढ़िये...
‘फॉस की काई’
डॉ. अहिल्या मिश्र का महत्वपूर्ण कहानी संग्रह है। इस संग्रह की प्रायः प्रत्येक कहानी पूर्व प्रकाशित हैं। लेकिन आम पाठक के लिए इन कहानियों की एक साथ उपलब्धता सराहनीय प्रयास है। लेखिका की कहानियाँ आम आदमी का प्रतिनिधित्व करती हैं। वह आदमी जिसे समाज ने विस्मृत कर दिया है, उसका दर्द इन कथाओं में महसूस किया जा सकता है। आगे पढ़िये...
वैसे कम बोलना उनकी आदत है ।
यह आदत उन्होंने विकसित की है । कभी वह अधिक बोलते थे जिस पर उन्होंने सप्रयास नियंत्रण पा लिया । वह जानते थे कि कम बोलने के लाख लाभ होते हैं । साथी मुँह ताकते रहते हैं कि वह कुछ बोलें लेकिन वह चुप रहते हैं । दूसरों को सुनते हैं और उनके कहे को अपने अंदर गुनते हैं । अवसरानुकूल कुछ शब्द उच्चरित कर देते हैं... एक-एक शब्द पर बल देते हुए । आगे पढ़िये...
सिंगाराम
ने उसे ध्यान से देखा थोडी देर पहले जो उसे इतना दर्द हुआ था उसका नामोनिशान तक उसके चेहरे पर नहीं था। लेकिन सिंगाराम उस महिला के अनुभव को नहीं भूल सका । क्या एक जान के लिए हर माँ को इस तकलीफ़ से गुज़रना पड़ता है । ऐसा कर्म करना पड़ता है? क्या अपनी जान देकर ही दूसरी जान को बचाना पड़ता है? अनजाने ही उसने दोंनो हाथों को जोड कर प्रणाम किया । उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। यदि यह धरती अभी तक जीवित है तो उसका कारण सिर्फ़ माँ है माँ ही है। आगे पढ़िये...
पवार की क्रिकेट राजनीति में दिलचस्पी के बारे में दिल्ली के जानकार लोगों का यह कहना है कि वे क्रिकेट की बैठक के लिए जब चार घंटे निकालते हैं तब महंगाई और अनाज के लिए, विदर्भ में किसानों की आत्महत्या के लिए उनके पास आधा घंटा भी नहीं होता। पता नहीं यह बात सच है या नहीं लेकिन जब देश में गरीबी की रेखा के नीचे के बीपीएल लोगों के जिंदा रहने के लिए अनाज सबसे बड़ा मुद्दा है तब महाराष्ट्र का एक वक़्त का जमीन से जुड़ा हुआ यह मराठा नेता आज पता नहीं क्यों और कैसे सिर्फ़ माफियानुमा क्रिकेट सौदागरों से जुड़ा रह गया है। आगे पढ़िये...
आसमान
छूने की मेरी अभिलाषा ने मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन भी खींच ली, पर तब ... मैं ज़मीन को देखती ही कहाँ थी। मैं तो ऊपर टँगे आसमान को ताकते हुए अपना लक्ष्य पाना चाहती थी । तब अगर कुछ दिखाई देता था तो वह था केवल दूर-दूर तक फैला नीला आसमान, जहाँ उड़ा तो जा सकता है, पर उसका स्पर्श नहीं किया जा सकता है। ऊँचाइयों का कब स्पर्श हुआ है जब हाथ उठाओ वे और ऊँची उठ जाती हैं--मरीचिका की तरह। आगे पढ़िये...
अचानक बुरी तरह बदनाम हो गई आईपीएल क्रिकेट को लेकर कल संसद में और बाहर यह माँग उठने लगी कि इसे प्रतिबंधित किया जाए या भारत में क्रिकेट का पूरा नियंत्रण सरकार के हाथों में दे दिया जाए, बात यहाँ तक बढ़ी कि कुछ सांसदों ने कहा कि पुरानी परंपरागत क्रिकेट के मुताबिक केवल टेस्ट मैच होने दिए जाएँ। किसी दिक्कत के सामने आने पर उसके ऐसे ही आसान हल सोचे जाते हैं और बदहवासी की यह मानसिकता कई तरह की नासमझी के सुबूत पेश करती है। आगे पढ़िये...
सन्यासी
गांधीजी की बातों के पीछे छिपी सच्चाई को जानकर समझ ली और उसी क्षण गेरूए रंग के वस्त्रों का त्याग कर दिया । वैसे भी सन्यास तो मानसिकता का एक हिस्सा है । कपड़ों को तो शरीर धारण करता है, भला उन्हें अपनी मानसिकता से क्या लेनदेना ? जब तक मन से संन्यास नहीं लिया तो मतलब नहीं और अगर मन से ही संन्यास लिया तो वह किसी बंधन मैं कैसे बंधेगा? आगे पढ़िये...
चंडीगढ़ ।
प्रवासी लेखक प्रो. हरभजन सिंह की नयी कृति पंजाबी कहानी संग्रह ‘रेस क्लास अते जंग’ स्थानीय पंजाब कला भवन, चंडीगढ़ में 17 अप्रैल को लोकार्पित की गई । लोकार्पित कृति पर केंद्रित गोष्ठी आयोजन भी किया गया, जिसके आयोजक थे - पंजाब लेखक सभा चंडीगढ़, राइटर्स क्लब और साहित्य चिन्तन नामक साहित्यिक संस्थाएँ । इस पुस्तक में आर्थिक लूट-खसूट और मानव व्यवहार का वृत्तांत पेश किया गया है। कार्यक्रम की अध्यक्ष डॉ. जसविंदर सिंह ने कहा कि लेखक हरभजन सिंह समर्थ और चिंतक कवि है, जो मानव क़दर और क़ीमत का पक्ष बड़ी दलेरी से रखते हैं। आगे पढ़िये...
एक
अजीब मिठास लिये रसभरियों का, कसैला स्वाद मुझे कभी नहीं भाया था। हाँ उन्हे देखना अलबत्ता मुझे अच्छा लगता था; उन्हे देख मुझे यूँ लगता था जैसे कोई गदराया बदन, कल्फ़ लगी मलमल की साड़ी से बाहर निकला जा रहा हो। मुझे रसभरी के झीने मुलायम कवच को छूना भी भला लगता था। उसके चिकने बदन पर हाथ फिराना मुझे एक अजीब क़िस्म का सुख देता था, जिसे शायद फ्रायड महाशय ही शब्द दे पाएँगे। आगे पढ़िये...
जान ग्रे
द्वारा लिखित पुस्तक "व्हाय मार्स एँड वीनस कोलाइड" काफ़ी वैज्ञानिक तथ्यों और तर्कों, वितर्कों के विश्लेषण के उपरान्त लिखी एक अच्छी किताब है जिसे आदमी और औरत अपने आपसी रिश्तों में सुधार करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। आगे पढ़िये...
हिंदी को प्रचारित प्रसारित करने में हिंदी फ़िल्मों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। सरकारी संस्थानों की अपेक्षा हिंदी की लोकप्रियता को बढ़ाने में हिंदी सिनेमा के अद्वितीय योगदान का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि विदेशों में आम आदमी के लिए हिंदी, बालीवुड सिनेमा का पर्याय हो गई है। आगे पढ़िये...
शिब्बू
ने दौड़कर उनको दिलबाग़ के दो गुटखे पकड़ा दिए । लौटते समय जब उसकी नज़र वैन में बैठे हुए उन नन्हे-मुन्ने मासूम बच्चों पर पड़ी, जो ललचाई नज़रों से उसकी दुकान में लटके दिलबाग़, यामू, प्रिंस, हरसिंगार आदि के रंग-बिरंगे गुटखों को देख रहे थे, तो उसकी आँखों में अपने आप ही एक विशेष प्रकार की चमक आ गई । आगे पढ़िये...
धरती
पर उतर आने के बाद हो-ई ने दस सूर्यों को यह सलाह दी कि रोज़ उनमें से एक आसमान में घूमने आए, जिस से धरती को गर्मी व मनुष्य को रोशनी भी मिली, ज़मीन तेज़ किरणों के तपन से भी बच सके । लेकिन सूरजों ने हो-ई की सलाह नहीं मानी । सूरजों की हठधर्मी से क्रुद्ध हो कर हो-ई ने सूरजों को मार गिराने की ठान ली । आगे पढ़िये...
आसमान विशाल है
, हम पढ़ते-सुनते हैं। आसमान विशाल है, हम कभी-कभार ऊपर झाँक लेते हैं। धूएँ धक्कड़ और इमारतों के बीच से हमारा आसमान उतना ही विशाल होता है, जितना कि हम देख पाते हैं? टुकड़ों-टुकड़ों में बँटे आसमान की विशालता अधिकतर हमारी कल्पना की बैसाखी पर टिकी रहती है। आगे पढ़िये...
जम्मू । जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एंव भाषा अकादमी ने डोगरी भाषा के जाने-माने कवि शाम दत्त पराग को डोगरी, पंजाबी व हिंदी साहित्य में अपने विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया। जम्मू जिले के पौनी गाँव में वर्ष 1928 में जन्मे पराग को इस दौरान स्मृति चिह्न, प्रशस्तिपत्र व एक शाल भेंट किया गया। सोमवार को केएल सहगल हाल में हुए कार्यक्रम में पद्मश्री डोगरी कवियत्री पदमा सचदेव मुख्य अतिथि थीं। आगे पढ़िये...
ह्यूस्टन। तीन भारतीय फ़िल्मों बौधिसत्व, एक ठो चांस और सलुन ने 43वें वार्षिक वर्ल्डफेस्ट ह्यूस्टन इंटरनेशनल फ़िल्म एंड वीडियो फेस्टीवल में रेमी पुरस्कार जीता है। आगे पढ़िये...
मुम्बई।
देशभक्ति की भावना पर आधारित फ़िल्में बनाने के कारण भारत कुमार के नाम से मशहूर हुए वयोवृद्ध अभिनेता मनोज कुमार को राजकपूर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाज़ा जाएगा।लगान जैसी लोकप्रिय फ़िल्म बनाने वाले फिल्मकार आशुतोष गोवारीकर को राजकपूर स्पेशल कंट्रीब्यूशन अवार्ड विशेष योगदान सम्मान प्रदान किया जाएगा। आगे पढ़िये...
इस कहानी
के अंदर कई हृदय-विदारक मानवीय चीत्कारें छुपी हुई हैं। पाट अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर इस कहानी को पढ़ें। शनैः शनैः हम कहानी की तरफ़ अग्रसर होते हैं। काव्य-अलंकार से परे, वाक्य-विन्यास की चीर-फाड तथा खुले-मन से आप गद्य की काल्पनिकता तथा प्रतीकात्मकता को भूँक दीजिए। तभी आपको पता चलेगा, एक चीख निर्वस्त्र होकर हमारे सामने पड़ी होगी। उसी से परिचय कराना हमारा लक्ष्य है। आगे पढ़िये...
‘आख़िरी पावस’
डॉ. महेश संतोषी का ताज़ा काव्य संग्रह है। मुक्त छंद के अलावा छंद में भी महेश संतोषी ने कुछ बेहतर रचनाएँ की हैं। लंबे समय से कविता रच रहे महेश संतोषी के इस ताज़ा संग्रह में छंद और मुक्त छंद दोनों ही तरह की कविताओं का लुत्फ़ पाठकों को मिलेगा। संग्रह में गीत भी हैं और नवगीत भी । नई कविता के साथ-साथ अकविता से भी उन्होंने पाठकों से सरोकार बनाने की कोशिश की है। आगे पढ़िये...
पटना ।
वर्ष 2010 के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान कहानीकार और नाटककार-रंगचिन्तक हृषीकेश सुलभ को 2009 में प्रकाशित उनके कहानी ‘संग्रह वसंत के हत्यारे’ पर देने का निर्णय लिया गया है। कथा (यू के) के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा के अनुसार यह सम्मान लंदन के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में 08 जुलाई 2010 को प्रदान किया जायेगा। सम्मान समारोह में भारत और विदेशों में रचे जा रहे साहित्य पर गंभीर चिंतन भी किया जायेगा। आगे पढ़िये...
दिल्ली । देश भर के 13 स्कूली बच्चों को बाल भारती निबंध प्रतियोगिता-2009 के पुरस्कार दिए गए। प्रथम पुरस्कार के लिए दिल्ली की संस्कृति रावत, दूसरे पुरस्कार के लिए वर्धा, महाराष्ट्र के ओम कन्हैया बजाज और तीसरे पुरस्कार के लिए जोधपुर, राजस्थान की निधि शुक्ला के निबंध को चुना गया। इस मौक़े पर अन्य 10 को सांत्वना पुरस्कार भी दिए गए। तेरह विजेता बच्चों में से दस दिल्ली से बाहर के हैं। इनमें वर्धा, जोधपुर, नरसिंहपुर (म.प्र.), बड़वानी (म.प्र.), जयपुर, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड), सिरसा (हरियाणा), कानपुर (उ.प्र.), हैदराबाद (आ.प्र.), जमशेदपुर (झारखंड) जैसे दूर शहरों के प्रतियोगी शामिल हैं। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि तमन्ना फाउंडेशन की अध्यक्ष और शिक्षाविद श्रीमती श्यामा चोना ने विजेताओं को पुरस्कार बाँटे। आगे पढ़िये...
संघ का मुझ पर दबाव बढ़ने लगा।
सभी कहने लगे क्या हुआ विज्ञप्ति कब आयेगी? ज़ल्दी करो, नही तो समझौते के लिए दबाव बढ़ता जायेगा। क्या हम एक और आत्महत्या का इन्तज़ार करते रहेगे ? चार दिनों के बाद मै उस न्यूज़ पेपर के कार्यालय गया। वहाँ आलोक बैठा था। मैंने पूछा -‘‘क्या बात है यार आलोक वह न्यूज़ अब तक नही आई।’’ आलोक अन्जान बनने की कोशिश करने लगा। मैंने फिर अपना प्रश्न दोहराया। आलोक उलझन भरी मुद्रा मे मुझसे कहने लगा- ‘‘छोड़ न यार उस मुद्दे को।’’ मैंने कहा आख़िर न्यूज़ क्यो नहीं छपी मुझे बताओ? आलोक ने कहा ‘‘यार उस न्यूज़ में तहसीलदार का टाइटल देखकर संपादक ने उसे छापने से मनाकर दिया ।’’ आगे पढ़िये...
मुंबई। ``लोचन कला अकादमी'' की ओर से तैयार 9 कवियों - प्रमिला शर्मा, संजीव निगम, अरविंद शर्मा `राही', राजीव सारस्वत, राजेश्वर उनियाल, कलीम असर, नंदलाल यादव, प्रेम हसीजा और लोचन सक्सेना की शृंगारिक रचनाओं के एलबम ``श्रृंगारिका'' का विमोचन ऐश्वर्या हॉल, ओशिवारा पुलिस थाने के पास (आदर्शनगर), न्यू लिंक रोड, जोगेश्वरी (पश्र्चिम), मुंबई में सुप्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता राजकुमार बड़जात्या (राजश्री प्रोडक्शन प्राइवेट लिमिटेड) के हाथों संपन्न हुआ। आगे पढ़िये...
पाकिस्तान में एक ऐसे शरणार्थी शिविर पर कल बुर्कों में पहुँची दो आत्मघाती आतंकियों ने हमला किया और धमाकों में उनके साथ-साथ ऐसे 41 लोग मारे गए जो कि खाने के लिए क़तार में लगे हुए थे। अफ़गान सीमा पर तालिबानों पर हमला करते हुए जो लोग बेघर हो रहे हैं उन भूखे लोगों को इस तरह से मारकर तालिबानी या किसी और क़िस्म के आतंकी दुनिया में धर्म के नाम पर किए जा रहे आतंक की एक और मिसाल पेश कर रहे हैं। आगे पढ़िये...
बिलासपुर ।
विगत दिनों भोजपुरी साहित्यकारों के राष्ट्रीय सम्मेलन में न केवल भोजपुरी बल्कि छत्तीसगढ़ी साहित्य की विकास यात्रा के बारे में विस्तार से चर्चा की गई। दोनों ही भाषाओं को संविधान की 8 वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए ठोस तर्क दिए गये। इस सम्मेलन में कई ख़ास मुद्दे उठाए गये। प्रस्तुत रिपोर्ट छत्तीसगढ़ी व भोजपुरी ही नहीं बल्कि सभी स्थानीय बोलियों के जीवंत बने रहने की अपरिहार्यता क्यों है, इस पर भी प्रकाश डालती है। बोलियों का विकसित होना, फलना फूलना न सिर्फ़ भिन्न-भिन्न संस्कृतियों व रीति-रिवाजों के संरक्षण के लिए जरूरी है, बल्कि राष्ट्रभाषा हिन्दी का विकास भी इसमें अन्तर्निहित है। आगे पढ़िये...
रायपुर । प्रदेश के ख्याति प्राप्त रंगकर्मी एवं राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादमी के कौसिंल मेंबर व छत्तीसगढ़ राज्य के प्रतिनिधि अनूप रंजन पाण्डेय संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार की राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति में मनोनीत किये गये हैं । इस समिति में दिल्ली सहित 11 राज्यों के उत्कृष्ट कलाकारों को मनोनीत किया है। आगे पढ़िये...
नई दिल्ली।
हिंदी के सशक्त हस्ताक्षर और ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया ने कहा तीन प्रमुख महानगरों मुंबई, कोलकाता और नई दिल्ली तथा साहित्य के शहर इलाहाबाद में रह चुके कालिया ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी उन्हें आर्थिक राजधानी और सांस्कृतिक राजधानी के सामने बौनी लगती है और वह आज भी मानते हैं कि दिल्ली साहित्य की मंडी है और प्रयाग साहित्य का शहर है। आगे पढ़िये...
जंस्कर,
सुरू घाटी और पिंगपौंग झील के इलाके घूम कर हम केलंग लौटे और स्पिति की तरफ़ निकले। अनु के बहुआयाम देख कर मैं मुग्ध थी। वह अपने सारे काम ख़ुद ही करता था। सही व़क्त पर अपने काम निबटाता और समय पर सबके साथ नज़र आता। आगे पढ़िये...
आने वाली दुनिया को लेकर जिन लोगों के मन में यह आशंका है कि बढ़ती हुई आबादी के साथ किस तरह सडक़ें, रेलगाडियाँ या हवाई जहाज साथ दे पाएँगे, उनकी आशंका कुछ हद तक सही साबित हो सकती है अगर शहरीकरण और अंतरराष्ट्रीय आवाजाही के विशेषज्ञों ने मौज़ूदा टेक्नालॉजी और आने वाली टेक्नालॉजी के अधिकतम इस्तेमाल के साथ योजनाएँ नहीं बनाईं। भारत के भीतर भी हम देखते हैं कि जिन शहरों ने लोगों के एकमुश्त आने-जाने के साधन खड़े नहीं किए वे ही अधिक तकलीफ़ पा रहे हैं। आगे पढ़िये...
कटक।
सारला साहित्य संसद के 29वें वार्षिक उत्सव के मौक़े पर कवि रमाकान्त रथ को ‘कलिंग रत्न’ एवं साहित्यकार महापात्र नीलमणि साहू को ‘सारला सम्मान’ से नवाज़ा गया। इस उत्सव में राज्यपाल मुरलीधर चन्द्रकान्त भण्डारे मुख्य अतिथि के तौर पर शिरक़त करते हुए उन्हें इस सम्मान से सम्मानित किए। राज्यपाल श्री भण्डार ने कहा कि हर एक बदलाव के पीछे एक सोच होती है। देश एवं जाति के उत्थान में साहित्य की एक अहम भूमिका है। आगे पढ़िये...
देश के
अनेक लब्ध प्रतिष्ठित पुरस्कारों को तहख़ाने में छिपाने का अर्थ यह नहीं है वे सारे के सारे सोने और चांदी से निर्मित है और उनके चोरी चले जाने से दुनिया बरबाद हो जाएँगी। दरअसल पुरस्कार को हासिल करने वाले शख़्स का यह मानना है कि पुरस्कार से कभी कोई बड़ा नहीं होता। पुरस्कार न जवाबदेही करते हैं और न ही उसके मिल जाने से समाज के एक बड़े वर्ग को फ़ायदा पहुँचता है। आगे पढ़िये...
नई दिल्ली।
सुप्रसिद्ध गीतकार गुलजार ‘वंदे मातरम’ गीत को नये सिरे से लिखने को लेकर सुर्खियों में हैं। स्लमडॉग मिलिनेयर के गीत 'जय हो' लिखकर विश्व में प्रसिद्धि के शिखर पर आसिन गुलजार इस बार भी अंतरराष्ट्रीय संगीत में भारतीय परंपरा और उसमें छिपी भावनाओं को नये रूप में प्रस्तुत करने वाले है। मशहूर उपन्यासकार बंकिमचंद चटर्जी द्वारा लिखे ‘वंदे मातरम’ गीत में हर भारतीय की भावना और उसमें छिपी देशभक्ति को नया रुप देना गुलजार के लिए कोई आसान काम नहीं है। जहाँ एक ओर देश की गरिमा को बनाये रखना उनकी ज़िम्मेदारी होगी वहीं दूसरी तरफ़ आधुनिक परिवेश से तारतम्यता भी बैठाना होगा। आगे पढ़िये...
रॉबर्ट
का जन्म संपन्न परिवार में हुआ था ये बात भी मैं समझ पायी थी । हालाँकि उन्होंने अपने बीते जीवन के बारे में ज़्यादा खुलकर उस वक़्त बातें नहीं कीं थीं । उनके जीवन में ऐसी कौन सी घटना घटी होगी जिससे उनमे पश्चिम की जीवन शैली को छोड़ कर भारत के प्रति अदम्य आकर्षण और अपनत्व का भाव पैदा हुआ, ये मैं नहीं जानती थी । रॉबर्ट के जीवन से सम्बंधित कुछ तथ्य बाद में जान पायी हूँ । आगे पढ़िये...
मैं साहित्य
को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके और संवेदनशील न बना सके, उसे'साहित्य' कहने में मुझे संकोच होता है। मैं अनुभव करता हूँ कि हम लोग एक कठिन समय से गुज़र रहे हैं। आज नाना प्रकार के संकीर्ण स्वार्थों ने मनुष्य को कुछ अंधा बना दिया है कि जाति-धर्म-निर्विशेष मनुष्य के हित की बात सोचना असंभव हो गया है। आगे पढ़िये...
वढवाण के स्वर्गीय महाराजा दाजीराजजी का "हवा महल" बनाने का सपना अभी भी अधूरा है । "हवा महल" का आधा हिस्सा अभी भी पुरातत्त्व विभाग की अनदेखी से खंडहर बनाता जा रहा है । वढवाण गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले का पौराणिक शहर है । जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के मूल नाम वर्धमान से इस शहर का नाम वर्धमानपुरी रखा गया था । मगर समाया की बदलती करवट के साथ लोगों की जुबां पर अपभ्रंश होकर वढवाण हो गया । आगे पढ़िये...
नई दिल्ली। समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया की जन्मशती के मौक़े पर मंगलवार को त्रैमासिक पत्रिका 'थिंक इंडिया' का विशेष अंक जारी किया गया। हिन्दी के वरिष्ठ चिंतक अशोक वाजपेई ने इस विशेषांक का लोकार्पण किया। इस मौक़े पर पत्रिका के प्रधान संपादक डीपी त्रिपाठी, प्रो. पुष्पेश पंत, वेद प्रताप वैदिक और अन्य जाने माने चिंतक मौज़ूद थे। यह विशेष अंक लोहिया के विचारों और जीवन को समर्पित किया गया है। आगे पढ़िये...
मुझे ADRI से
जब आमंत्रण मिला तो सच बताऊँ - सबसे पहले मेरे मन में जो प्रश्न उठा, वह यह था कि एक ग़ैरशिक्षाविद् पुलिस अधिकारी का चयन आख़िरकार क्योंकर किया गया है ? मैं जानता हूँ कि शिक्षा और पुलिस की उपस्थिति आम भारतीय सोच तथा मीडिया में परस्पर विपरीत ध्रुवों पर देखी जाती है । और सच यह भी है कि पुलिस को समाज के सारे नकारात्मक कार्यों वाले परिवेश में अपना जीवन खपाना पड़ता है। पर शायद मैं सचमुच कुछ सोच पाता हूँ इस विषय पर और शायद इसलिये आपने मुझे बुलाया । आगे पढ़िये...
शशि थरूर देश के दूसरे बहुत से मंत्रियों या नेताओं के मुक़ाबले बेहतर हो सकते हैं, कम भ्रष्ट हो सकते हैं या हो सकता है कि ईमानदार भी हों, लेकिन सार्वजनिक जीवन में जब तक चोरी, बेईमानी, हेराफ़ेरी पकड़ में नहीं आती तब तक तो सब चल जाता है। जब यह पकड़ में आ जाए तो लोगों को सार्वजनिक लोकतांत्रिक मूल्यों का ध्यान रखते हुए अपने पद से कम से कम कुछ समय के लिए तो हटना ही पड़ता है। आगे पढ़िये...
इंदौर ।
ख्यातिनाम लेखक साहित्यकार और समाज सुधारक मोहनदास नेमिशराय को आज मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने डॉ.बाबा साहेब अम्बेडकर स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया । बाबा साहेब अम्बेडकर जयंती के अवसर पर उनकी जन्म स्थली महू में आयोजित इस सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री ने शॉल श्रीफल, प्रशस्ति पत्र एंव एक लाख रूपये देकर श्री नेमिशराय को सम्मानित किया इस अवसर पर सांसद वेंकैया नायडू प्रमुख रूप से मौज़ूद थे । आगे पढ़िये...
इंदौर !
इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ प्लानिंग एण्ड मेनेजमेंट (आई.आई.पी.एम.) द्वारा रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृति में दिए जाने वाले मानवता विकास अवार्ड के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर का चयन किया गया है। आगे पढ़िये...
चंडीगढ़ ।
नेशनल बुक ट्रस्ट की मासिक पत्रिका ‘पाठक मंच बुलेटिन’ के अप्रैल अंक में पंजाब के स्कूली बच्चों की कविताएँ और बनाए हुए चित्र देखने को मिलेंगे। विश्व पुस्तक दिवस के उपलक्ष्य में 23 अप्रैल को इसे जारी किया जाएगा। नेशनल बुक ट्रस्ट के राष्ट्रीय बाल साहित्य केंद्र की तरफ़ से ‘पढ़ो पंजाब’ नामक कार्यशाला में बच्चों ने कविताएँ लिखीं और चित्र बनाए। पंजाब सर्व शिक्षा अभियान के सेक्टर-34 स्थित कार्यालय में यह कार्यशाला आयोजित की गई। आगे पढ़िये...
बुढ़ापे का जो जहर पड़ोसन वृद्धा पी रही हैं, उसी की काट मैंने खोजी थी, उन्हें चाची कहना शुरू करके। फिर तो वे पूरी मल्टी में चाची के रूप में लोकप्रिय हो गईं। हम पाँच-सात घरों में बड़ा अपनापन है। दोपहर में कभी चाची के घर जा बैठते, कभी रामायण का पाठ रख लेते, कभी कुछ नया व्यंजन बनता, तो चाची का हिस्सा भी निकाल लेते। पर क्या हम पड़ोसी उस आत्मा के अकेलेपन को भर सकते हैं? हाँ, कुछ पूर्ति सम्भव है, पर रिक्तता का अहसास बड़ा घातक होता है। आगे पढ़िये...
देहरादून ।
पुरुषों के वर्चस्व वाले समाज में बारबरी और सम्मान के लिए हमारा संघर्ष जारी रहेगा। हालाँकि सफ़र अभी लंबा है लेकिन उम्मीद ख़त्म नहीं हुई है। हमें भरोसा है अपनी ताक़त और एकजुटता पर। एक दिन समाज में हम सम्मान के साथ सर उठा कर पुरुषों के साथ क़दम से क़दम मिला कर चलेंगे। ऐसा मानना है उत्तराखंड के विभिन्न इलाक़ों से आईं उन महिलाओं का जो लगातार अपने वजूद की ख़ातिर संघर्ष कर रही हैं। आगे पढ़िये...
दिल्ली में एक कबाड़ में मिले रेडियोधर्मी पदार्थ के असर से उसके आसपास काम करने वाले कबाड़ी और कुछ दूसरे लोग जिस तरह से जली हुई चमड़ी और झड़े हुए बाल की नौबत तक पहुँचे और अस्पताल ले जाए गए, उसे लापरवाही से नहीं लेना चाहिए। इसके बाद में हफ़्ते भर के भीतर ही कल फिर दिल्ली औद्योगिक क्षेत्र में ऐसे ही एक और रेडियोधर्मी पदार्थ से एक और व्यक्ति बीमार पड़ा। यह रेडियोएक्टिव पदार्थ कोबाल्ट 60 के रूप में पहचाना गया है जो शायद कैंसर सिकाई जैसी मशीनों में भी काम आता है। देश में दुनिया भर से रोज़ जहाजों में भर-भरकर कबाड़ पहुँचता है जिनमें तरह-तरह के रासायनिक पदार्थ होते हैं और हो सकता है कि ऐसे ही किसी रास्ते से यह सामान यहाँ पहुँचा हो। आगे पढ़िये...
नई दिल्ली। गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग ने कंप्यूटर पर हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए इससे जुड़ी सभी समस्याओं का हल एक जगह उपलब्ध करवा दिया है। यह सारी सामग्री इंटरनेट पर तो उपलब्ध होगी ही, किताब के रूप में भी उपलब्ध करवा दी गई है। गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने मंगलवार को केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान द्वारा तैयार किए गए 'हिंदी शब्द संसाधन' का लोकार्पण किया। आगे पढ़िये...
डैलस । यूएसए । अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमेरिका ) के कवि सम्मेलनों की श्रृंखला का आरम्भ 9 अप्रैल 2010 को डैलस से हुआ । उत्तरी अमेरिका में यह संस्था प्रत्येक वर्ष तक़रीबन पंद्रह से सत्रह कार्यक्रम करवाती है और इन कार्यक्रमों के संयोजक हैं - डॉ. सुधा ओम ढींगरा, डॉ. नंदलाल सिंह और आलोक मिश्रा। आगे पढ़िये...
आगरा । हिन्दी में शोध और अनुसंधान की दशा चिंतनीय है। क्यों ? इसमें सुधार कैसे हो ? मौलिक और श्रेष्ठ शोध कार्यों की ज़मीन कैसे बने? इन तमाम सवालों के जवाब ढूँढने में आगरा विश्वविद्यालय में देश के अनेक हिस्सों से आये विद्वान, प्रोफेसर, लेखक और शोधार्थी जुटे रहे। आगे पढ़िये...
इलाहाबाद । महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के इलाहाबाद स्थित क्षेत्रीय केन्द्र में आयोजित गोष्ठी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और आलोचना का वर्तमान की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह ने कहा, लोक प्रवत्ति की ध्वनि ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मूल्याँकन का मुख्य आधार है। हिन्दी साहित्य के इतिहास पर आचार्य शुक्ल ने अपनी पसंदगी और नापसंदगी स्पष्ट तौर पर ज़ाहिर की है। जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण शुद्धतावादी और नैतिकतावादी था। आगे पढ़िये...
कहा जाता है
कि जब कोई कवि वस्तु जगत में स्थित किसी भाव, घटना या तत्त्व से संवेदित होता है तो वह उसे अपनी समर्थ काव्य भाषा द्वारा सहृदय तक संप्रेषित करने का उपक्रम करता है । वह आपने अभिप्रेत भाव को तद्भव रूप में संप्रेषित करने के लिए अपने सृजन क्षण में, शब्दों की सामर्थ्य एवं सीमा का शूक्ष्म संधान कर उसे प्रयुक्त करता है । काव्य रचना अपने आरंभिक क्षण से ही एक सायास क्रिया के रूप में आरंभ हो जाती है, क्योंकि कवि के मानस कल्प में शब्दों की होड़ सी लग जाती है । यही शब्द श्रृंखलाबद्ध होकर काव्य का रूप ले लेता है । आगे पढ़िये...
गर्मियों में प्यासे पंछियों को मरने से बचाने के लिए इन दिनों बहुत से लोग ऐसे एसएमएस भेजते हैं कि घरों के बाहर कटोरों में पानी रखें ताकि पंछी प्यासे न मरें। और पंछियों की ही क्या बात करें छत्तीसगढ़ के कोरबा में कल कुछ बच्चे लू लगने से चल बसे। उड़ीसा, उत्तर भारत, राजस्थान जैसे कई राज्यों से लू लगने से लोगों के मरने की ख़बरें आने लगी हैं। लेकिन इस धरती का विकास के नाम पर क्या हाल किया जा रहा है उसे देखे बिना सिर्फ़ आँकड़ों से कुछ नहीं होना है। हम अगर अपने इर्दगिर्द के छत्तीसगढ़ को एक नमूना मानकर देखें कि पिछले बरसों में धरती को गर्म या ठंडा करने के लिए हमने क्या किया तो समझ आएगा कि हम पेड़ों को काट-काटकर एक क़िस्म से भट्ठी में झोंक रहे हैं और उसकी आँच को ख़ासकर ग़रीबों पर उँड़ेल रहे हैं। आगे पढ़िये...
अमेरिका
की अफ-पाक नीति इतनी दिग्भ्रमित है कि वॉशिंगटन सम्मेलन में उसे पाक को ससम्मान बुलाना पड़ा। जो आतंकवाद का गढ़ व परमाणु चोरी के लिए दुनिया में कुख्यात राष्ट्र है, उसके प्रधानमंत्री का ह्वाइट हाउस में स्वागत करना कितनी बड़ी मजबूरी है। ईरान और उत्तरी कोरिया को दुत्कारना और पाकिस्तान को पुचकारना ओबामा की नियति है, लेकिन क्या यह भारत की नीति हो सकती है? आगे पढ़िये...
डॉ. गवाण्डे संदेश यह देना चाहते हैं
कि इक्कीसवीं शताब्दी की तकनीक की जटिलताओं को सरलतम तरीकों से सुलझाया जा सकता है। गवाण्डे की बहुत महत्वपूर्ण सलाह यह है कि आधुनिक दुनिया में यह बहुत ज़रूरी हो गया है कि हम एक बार फिर से उस चीज़ को समझें जिसे दक्षता कहा जाता है, और यह समझें कि सहायता की ज़रूरत विशेषज्ञों को भी हुआ करती है और सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि विशेषज्ञों में भी इतनी विनम्रता हो कि वे यह स्वीकार करें कि सहायता की ज़रूरत उन्हें भी है। आगे पढ़िये...
रायपुर। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति राय के खिलाफ नक्सलियों का कथित महिमामंडन करने के लिए शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने सोमवार को बताया कि रायपुर के सामाजिक कार्यकर्ता विश्वजीत मित्रा ने तेलिबांधा पुलिस थाने में एक मामला दर्ज कराया है, जिसमें कहा गया है कि राय ने अपने लेख ‘वॉकिंग विद द कॉमरेड्स’ में नक्सलियों को महिमामंडित किया है। आगे पढ़िये...
दंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केंद्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है। आगे पढ़िये...
नयी दिल्ली। भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने विश्व हिंदी सचिवालय में मारीशस सरकार की सलाहकार तथा मारीशस भोजपुरी संस्थान की संस्थापक डॉ. सरिता बुधू को डॉ.अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार तथा दस दलित साहित्यकारों, पत्रकारों और समाज सेवियों को वर्ष 2010 के लिए डॉ. अम्बेडकर पुरस्कारों से सम्मानित करने की घोषणा की है। आगे पढ़िये...
सरताज ने
कहा कि भविष्य में उर्दू बनी रहेगी, लेकिन इसका हिंदी के साथ मिश्रण हो सकता है। हिंदी और उर्दू दोनों ही भाषाएँ आगे भी बनी रहेंगी, लेकिन उर्दू का बाज़ार बनाने के लिए इसमें अन्य भाषाओं के शब्द मिलाने पर संकोच नहीं किया जाना चाहिए। आगे पढ़िये...
भैंसा
को देखते ही चित्रगुप्त का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ गया-" साले नमक हराम तू यहाँ पर बैठा पगुरा रहा है और वहाँ महाराज कोर्ट जाने के तेरा इंतज़ार कर रहे हैं।" भैंसे गुस्से में में हँकड़ने लगा-"आले-साले मत बोल चित्रगुप्त नहीं तो ठीक नहीं होगा। जैसे तुम लोग सेवक हो यमराज के वैसे मै भी हूँ। मैं यहाँ पर तुम्हारा ही काम लगाने आया हूँ।” आगे पढ़िये...
करीब दो
साल पहले रायपुर में सृजन-सम्मान द्वारा लघुकथा पर आयोजित सेमिनार में लघुकथा के भविष्य पर बातचीत करते हुए मैंने कहा था कि लघुकथा के सामने जो सबसे बड़ा सवाल बार-बार आकर खड़ा होता है, वह शिनाख़्त को लेकर है। लघुकथा लेखक ख़ुद को कथाकार, कवि या आलोचक तो कहलाना पसंद करता है लेकिन बतौर लघुकथाकार वह अपनी शिनाख़्त को लेकर गंभीर नहीं है। आगे पढ़िये...
एक कुर्बानी की इज्ज़त की जानी चाहिए और कमियों या ख़ामियों के लिए बंद कमरों की बैठकें ठीक हैं जहाँ दो सुरक्षा बलों के बीच के तालमेल या उनमें सुधार की बात हो सकती है। आज जो लोग सीआरपीएफ की इस हादसे के लिए गलतियाँ गिना रहे हैं उन्हें यह बात मालूम होनी चाहिए कि कुल मिलाकर उन्हीं लोगों की जान गई है जिन्हें कुछ गलतियाँ करने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है। यह एक सामान्य समझ-बूझ की बात है कि कोई भी व्यक्ति अपनी ख़ुद की जान जानबूझकर तो ख़तरे में डाल नहीं सकता। इस मौके पर जिन लोगों को लापरवाही या नासमझी से अधिक बोलने की आदत है उन्हें चुप रहना चाहिए। आगे पढ़िये...
हिसार, हरियाणा ।
बाल-कल्याण एवं बाल साहित्य-सृजन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के दृष्टिगत, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामनिवास 'मानव' को, बाल कल्याण-केन्द्र, भोपाल द्वारा 'राष्ट्रीय बाल-साहित्य सम्मान-2009' प्रदान किया गया है। केन्द्र द्वारा आयोजित एक भव्य समारोह में, सांसद एवं मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी तथा शिक्षामंत्री अर्चना चिटनीश ने सम्मान के अंतर्गत शॉल, सम्मान-पत्र, स्मृति-चिह्न, श्रीफल तथा नकद राशि भेंट कर, डॉ. 'मानव' को सम्मानित किया। आगे पढ़िये...
मुंबई। विख्यात कवि कुंतल जैन का दुखद निधन रविवार को हो गया। उनके निधन से साहित्यिक जगत में शोक की लहर फैल गई है। 72 वर्षीय श्री जैन पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ थे और उनका इलाज भाटिया अस्पताल में चल रहा था और अचानक 10 अप्रैल को दोपहर 2.30 बजे उनका निधन हो गया। आगे पढ़िये...
‘हमारी बात छोड़ो।
पर लाला इतना मूरख नहीं है कि केवल मूर्ति को जल चढ़ाने के नाम पर वक़्त बरबाद करता फिरे। अगर ऐसा नहीं है तो अपने घर में मंदिर ही क्यों बनवाता।’ आगे पढ़िये...
गहराई
से देखें तो दोनो देशों की संस्कृति में काफ़ी फ़र्क मिलेगा जैसे कि अमेरिकावासी सामन्यतया ’पोलिटिकली करेक्ट’ होंगे। यहाँ लोग मिले वे “यौर ग्रेट कंट्री” कह कर प्रशंसा करना नहीं भूले। (यह उनकी आदत है आप कहीं ग़लती से इसे व्यंग्य मत समझ बैठिए।) मुझे तो आश्चर्य तब हुआ जब एक जगह अमरीकी अधिकारी ऑस्ट्रेलिया के इतिहास पर तथ्य लिखते समय अपराधियों का बसाया जाना गुल कर गये कि ऑस्ट्रेलियावासियों को कहीं बुरा न लगे जो कि स्वयं पोलिटिकली करेक्ट होने की परवाह बिल्कुल नहीं करते। आगे पढ़िये...
गहराई से देखें तो दोनो देशों की संस्कृति में काफ़ी फ़र्क मिलेगा जैसे कि अमेरिकावासी सामन्यतया ’पोलिटिकली करेक्ट’ होंगे। यहाँ लोग मिले वे “यौर ग्रेट कंट्री” कह कर प्रशंसा करना नहीं भूले। (यह उनकी आदत है आप कहीं ग़लती से इसे व्यंग्य मत समझ बैठिए।) मुझे तो आश्चर्य तब हुआ जब एक जगह अमरीकी अधिकारी ऑस्ट्रेलिया के इतिहास पर तथ्य लिखते समय अपराधियों का बसाया जाना गुल कर गये कि ऑस्ट्रेलियावासियों को कहीं बुरा न लगे जो कि स्वयं पोलिटिकली करेक्ट होने की परवाह बिल्कुल नहीं करते। आगे पढ़िये...
गाड़ी की रफ़्तार जितनी तेज़ हो रही थी, बहस उतनी ही गर्माती जा रही थी और मैं - मात्र एक श्रोता होते हुए भी, उस बहस में उतना ही अधिक रमता जा रहा था। मैं स्वयं बहस-मुबाहिसे में कम ही भाग लेता हूँ, पर ट्रेन में यात्री एवं कुलियों के बीच की तू तू-मैं मैं, यात्री एवं टीटीई के बीच आरोप-प्रत्यारोप, अथवा यात्री एवं यात्री के बीच बहस-मुबाहिसा सुने बिना मुझे कभी नहीं लगता कि मेरे टिकट के पैसे वसूल हुए हैं। आगे पढ़िये...
सुकमा के चिंतलनार जंगल में जो जवान परसों (6 अप्रैल, 2010) बर्बरतापूर्वक मारे गये - शोषक नहीं थे, बुर्जुआ नहीं थे, पूँजीवादी नहीं थे । जिन दरिंदे नक्सलियों ने उन्हें पीठ पीछे से वार किया, उनसे भी उनकी कोई जाति दुश्मनी नहीं थे । जानलेवा संकट की संपूर्ण संभावना के बाद भी जानबूझकर सीआरपीएफ की नौकरी में थे । ताकि देश में शांति और अमनचैन की निरंतरता बनी रहे । ताकि ख़ुशहाली का वातावरण बना रहे । ताकि आम आदमी अपनी गणतांत्रिक अधिकारों का उपयोग कर सके । आगे पढ़िये...
किसी भी देश में दुनिया के सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद अमरीका में राजनीतिक दलों और समाज के बाक़ी तबकों की एकजुटता देखने लायक थी। सरकार की सफलता या असफलता को लेकर किसी चर्चा के बजाय पूरे देश में एक साथ राष्ट्रपति बुश का साथ दिया था। और उसी का नतीज़ा था कि दुबारा बुश की पार्टी चुनाव जीतकर आई जबकि इसके पहले बुश ने इराक पर हमला करने जैसा अलोकप्रिय काम भी किया था जिसका कि अमरीका के भीतर भी ख़ासा विरोध हुआ था। लेकिन विदेशी मोर्चे से परे जब देश पर आतंकी हमला हुआ तो अमरीका के भीतर सरकार का साथ देने के मामले में कोई भी अलग नहीं रहा। आगे पढ़िये...
दंतेवाड़ा की
घटना कोई मामूली घटना नहीं,जो किसी रण/संघर्ष में आयी-गई घटित हुआ करती है। इस घटना ने बांगलादेश युद्ध के बाद पहली बार सम्पूर्ण राजनीतिक क्षितिज को एक रंग में रंग दिया है। क्या माकपा के बुद्वदेव भट्टाचार्य, क्या भाजपा के रविशंकर प्रसाद, सबों ने एक स्वर से माओवादियों के विरूद्ध मुहिम को आगे बढ़ाने के पक्ष में अपनी राय व्यक्त की है। आगे पढ़िये...
पूरे विश्व
परिदृश्य में जो परिवर्तन हुए हैं, उनकी छाया कथा साहित्य में भी देखने को मिलती है। इस व्यापक वैश्विक परिवर्तन को रेखाँकित करने तथा हिंदी कथा साहित्य में आए परिवर्तनों की पड़ताल करने के लिए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'कथा समय' का आयोजन विश्वविद्यालय के साहित्य विद्यापीठ की ओर से किया गया। आगे पढ़िये...
कोलकाता। श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय द्वारा इक्कीसवां डा. हेडगेवार प्रज्ञा सम्मान 18 अप्रैल को प्रात: 10 बजे महाजाति सदन प्रेक्षागृह में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंख की अध्यक्षता में आयोजित होगा। यह जानकारी देते हुए संयोजक अरुण प्रकाश मल्लावत ने बताया कि इस वर्ष का सम्मान रामकथा के लेखक व्याख्याकार तथा रामायण सेंटर के निदेशक राजेंद्र अरुण को पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी प्रदान करेंगे। आगे पढ़िये...
कटक। कटक दीवान बाजार स्तिथ इकरा रिसर्च एकेडमी द्वारा सोमवार की शाम को पुर्नजीवन काहिंकी (पुनर्जन्म क्यों) शीर्षक पुस्तक का विमोचन उत्सव आयोजित हो गया है। पांथ निवास सम्मेलन कक्ष में आयोजित विमोचन उत्सव में मुख्य अतिथि पूर्व पुलिस महानिदेशक बीबी पण्डा एवं सम्मानित अतिथि साहित्यकार अन्नदा प्रसाद राय उपस्थित थे। आगे पढ़िये...
मुंबई ।
कथा (यू के) के भारतीय प्रतिनिधि सूरज प्रकाश, मधु अरोड़ा और प्रीति गौड़ ने दिनांक 10 अप्रैल, 2010 को दादर (मुंबई) में स्थित ' गाडगे महाराज की धर्मशाला' में कैंसर पीडि़तों के साथ एक दिन बिताया। उन्होने वहाँ रह रहे लोगों से मुलाक़ात की। वहाँ एक संगीतकार से मुलाक़ात हुई जो कैंसर पीडि़त अपनी पत्नी के इलाज के लिये यहाँ रुके हुए हैं। वे प्रतिदिन सुबह भजन गाते हैं और सभी के जीवन के लिये ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। कथा यूके गत कई वर्षों से इस धर्मशाला से सक्रिय रूप से जुड़ी है। आगे पढ़िये...
कोलकाता। 'साहित्यिकी' की ओर से शनिवार की शाम बांग्ला अकादमी के जीवनानंद सभागार में 'मीडिया में यथार्थ और कल्पना:स्त्री के संदर्भ में' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसकी अध्यक्षता करते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक और प्रख्यात आलोचक डॉ.विजय बहादुर सिंह ने कहा कि स्त्रियों को अगर अपनी सत्ता स्थापित करनी है तो उन्हें अपने रंग-ढंग और मूल्यों को बारे में गंभीरता से सोचने की आïवश्यकता है। उन्हें अपनी बौद्धिक क्षमता भी विकसित करनी होगी। आगे पढ़िये...
कुल जमा
मकसद यह कि अख़बार से सम्पादक की बिदाई ऐसे ही नहीं हो रही है। यह शनैः शनैः एक चतुर प्रविधि के ज़रिये हुआ है। पहले सम्पादक को विदीर्ण करके दो टुकड़े किये। सम्पादक इकाई नहीं रह गया। वह समाचार-सम्पादक और विचार-सम्पादक में बँटा। वे दोनों टुकड़े एक-दूसरे के विरोधी हो गया। यह नयी डायकाटमी (द्वैत) बनी, जिससे एक क जरिये सत्ता या व्यवस्था पर चोट की जाती, दूसरे से प्राथमिक चिकित्सा। आगे पढ़िये...
कलाधर, अपने निजी वातानुकूलित वाहन में सवार था। उसे धूप नहीं लग रही थी। वह आराम से अपनी यात्रा कर रहा था। बाहर धूप में कुम्हला रहे वनवासियों को देख कर वह दुखी जैसा कुछ हो रहा था। लेकिन वह था पक्का कलाप्रेमी। उसे कला से सरोकार था। वह तलाश रहा था कि किसी के पास तो कोई कलात्मक वस्तु नज़र आ जाये। राजन, ईश्वर बड़ा दयालु होता है। उसने कलाधर की आवाज़ सुन ली। कलाधर के वातानुकूलित वाहन के पास से एक वनवासी गुजारा। आगे पढ़िये...
दिल्ली और मुंबई में बसे होने के कारण देश का जो मीडिया नेशनल मीडिया या राष्ट्रीय मीडिया कहलाता है उसे अगर देखें तो लगता है कि उनका राष्ट्र दिल्ली तक सीमित है। टेलीविज़न समाचार चैनलों पर यह बात ख़ासकर लागू होती है जिनके कैमरों को दिल्ली में अगर एक साधारण एक्सीडेंट भी नसीब हो जाता है तो फिर मानो उनकी उस दिन की रोज़ी निकल आती है। आज (8 अप्रैल) सुबह से एक कार से कुचलकर एक आदमी की मौत को जितने विकराल तरीक़े से दिल्ली में बसे समाचार चैनल दिखा रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि एक्सीडेंट में सडक़ पर मौत पूरे देश में कई हफ्तों के बाद सिर्फ़ दिल्ली में हुई है। आगे पढ़िये...
7
6 जवानों से जूड़े न जाने कितने ही परिवारों के दिए इन कायर नक्सलियों ने रात के अँधेरे में बूझा दिया। कितने ही बच्चे अनाथ हो गए और कितने ही औरतें विधवा। देश का हर वर्ग इस घटना से रोष में है पर अगर कोई शांत है तो वो है मानव अधिकारों पर बोलने वाले अमिर मानवाधिकारविद्, न जाने ऐसी कौन सी नींद में सोए हुए है ये तमाम लोग। अगर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में कोई जवान किसी नक्सली को एक थप्पड़ भी मारता है तो दिल्ली में बैठे मानवअधिकार के इन तथाकथित नुमाइंदों को उस थप्पड़ की गूँज सुनाई देने लगती है और फ़ौरन ही हज़ारों रूपए विमान यात्रा और शाही होटल किराये में फुँककर वे बस्तर पहुँच जाते है। प्रश्न यह है कि आज इन बुद्धिजीवियों को क्या हुआ है क्यों इनके कर्कश ज़ूबां नहीं खूल रहे है, क्या सारे नियम-क़ायदे देश की सुरक्षा में लगे इन जवानों पर ही लागू होते हैं? आगे पढ़िये...
केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश
ने एक उपाधि वितरण समारोह में परंपरागत रूप से मंच के अतिथियों और कुलपति वगैरह द्वारा पहना जाने वाला सजावटी लबादा मंच पर ही उतारकर फेंक दिया और कहा कि यह एक बहुत ही क्रूर साम्राज्यवादी बोझ है जिससे छुटकारा पाना चाहिए। हम उनकी सोच से पूरी तरह सहमत हैं और ऐसे आडंबरों के ख़िलाफ़ हमेशा से लिखते भी आए हैं। दरअसल भारतीय लोकतंत्र में अँगरेज़ों के छोड़े गए ऐसे कई क़िस्म के बोझ हिन्दुस्तानी सत्ता अपने सिर पर इस तरह ढोए चलती है मानो वह माँ-बाप का अस्थि कलश हो और उसे नीचे उतारने से बड़ा अपमान हो जाएगा। आगे पढ़िये...
अरे भाई
, मैं ज्योतिषी होता तो चुनावों के दिनों में अपनी जन्म कुंडली लेकर दूसरे ज्योतिषियों और तांत्रिकों के पीछे—पीछे नहीं घूमता, अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मुर्गों और बकरों की बलियाँ नहीं देता और न ही अपने विरोधियों को संकट में डालने के लिए अनुष्ठान करवाता। आगे पढ़िये...
भारतीय
संस्कृति का क्रेंद्र सूर्य है। प्रकाश-पुंज सूर्य की किरणों में सात रंग (बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी, लाल) हैं। इन विविधाताओं के बीच व्यवस्था की कम से कम चार वैकल्पिक (समानांतर) पध्दतियाँ फलती-फूलती रही हैं - संप्रदायों एवं पंथों की धार्मिक पध्दति, जातियों की सामाजिक पध्दति, कुटुम्बों की नातेदारी पध्दति एवं राज्यों की राजनैतिक पध्दति। ये चारों व्यवस्थायें एक-दूसरे की पूरक रही हैं। इनके अधिाकार एवं कर्त्तव्य की सीमाएँ संस्थाबद्ध रहीं हैं। आगे पढ़िये...
बात अश्लीलता की है
और वह भी मीडिया में। अश्लील चित्रण को लेकर मीडियाबाज़ भी सवालों के घेरे में आ गये हैं। प्रिंट वाले गाहे-बगाहे अर्द्धनग्न तस्वीरें तो छापते ही रहते हैं। कोई सेक्स सर्वेक्षण के नाम पर, तो कोई सेलिब्रेटिजस के नाम पर, तो कोई बाज़ार में बने रहने के लिए। इससे घर-घर में क़ब्जा जमाये छोटा पर्दा भी अछूता नहीं है। फ़र्क़ है बस इतना है कि मीडिया का एक भाई कागज पर अश्लीलता परोस रहा है तो दूसरा जीवंतता को बनाते हुए आँखों के समक्ष टीवी पर। आगे पढ़िये...
बस्तर
एक बार फिर उन लोगों के ख़ून से भीग गया जो देश भर के कोने-कोने से आकर इस प्रदेश के सबसे पिछड़े आदिवासी इलाके में लोकतंत्र को बचाने के लिए सिर पर कफन बांधकर यहाँ तैनात थे। इस बार का धमाका जितना वहाँ की ज़मीन पर हुआ उससे अधिक देश भर की सरकारों के बीच हुआ है क्योंकि एकमुश्त पौन सौ जवानों की शहादत से देश और प्रदेश एक क़िस्म से हिल से गए हैं। मौतों की बहुत बड़ी गिनती से ऐसा लग रहा है मानो नक्सल ख़तरा देश में एकाएक बढ़ गया है, लेकिन हम इस घटना का इस हद तक अतिसरलीकरण करना नहीं चाहते कि इसमें कोई अभूतपूर्व बात है। आगे पढ़िये...
गांधी
अपनी राष्ट्रीय भावना तथा हिन्दुस्तानियों के उद्धार के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिकारियों, पत्र-पत्रिकाओं के सम्माद कों, भारत के राष्ट्रीय नेताओं आदि के बराबर सम्पर्क में रहे। उन्होंने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लिया और दक्षिण अफ्रीका के हिन्दुस्तानी प्रवासियों की दुर्दशा एवं उन्हें क़ानूनी अधिकार दिलवाने का प्रस्ताव स्वीकार कराया। उन्होंने जब दक्षिण अफ्रीका में ‘इंडियन ओपिनियन’ समाचार पत्र निकाला तो उसमें हिन्दुस्तानी (इंडियन) दृष्टिकोण ही प्रमुख था। आगे पढ़िये...
कमलेश्वर
के इस नये संग्रह से समकालीन कविता के प्रचलित विषयों की पहचान भी संपुष्ट होती है और नये काव्य वस्तुओं की संभावना भी बलवती होती है । ठीक ऐसे दौर में, जब हमारे आलोचक निहायत शुष्क गद्यात्मकता में नया ताल-छंद-लय सिद्ध करके उसे महान कविता घोषित करने पर आमादा है जिससे मेरे जैसे लाखों, करोड़ों पाठकों को कोई दिलचस्पी नहीं – कमलेश्वर की कुछ पँक्तियाँ पूर्णतः गेय हैं । आगे पढ़िये...
व्यंग्यकार चाहे कितना आक्रोश प्रगट करे, कितनी ही आक्रामक मुद्रा ग्रहण करे और स्वयं को नायक समझने की भूल करे, उसका यथार्थ यह है कि वह अपने लक्ष्य के दुष्ट स्वभाव को बदल पाने में व्यक्तिगत धरातल पर नपुंसक विरोध के अतिरिक्त कोई ताक़त नहीं रखता है । उसके विरोध को तो हँसकर उड़ाया जा सकता है । उसकी असली ताक़त पाठकों की उसकी फौज है, जिस फौज सामने नंगा होने से विसंगतिपूर्ण चरित्र डरता है। आदमी यथार्थ के प्रकटीकरण सें उतना नहीं डरता है जितना विसंगति के नंगा होने से । आगे पढ़िये...
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों की हिंसा के कारण 76 से ज़्यादा लोगों की जानें चली गयी। बेशक नक्सली अपनी सफलता का जश्न मना रहे होंगे। लेकिन मानवता ख़ून के आँसू रो रही है। लोग सवाल कर रहे है कि यह कैसा नक्सलवाद है ? यह कैसी विचारधारा है? ये कैसा माओवाद है जो ख़ून से सींचा जा रहा है। परिवर्तन मै भी चाहता हूँ, भ्रष्टतंत्र बदलना चाहिए, सत्ता में काबिज़ लोगों को देखो तो ख़ुद पर शर्म आती है। ये मक्कार नेता, ये हरामखोर अफ़सर..? इन सबकी जगह जेल है, लेकिन ये आज़ाद घूम रहे है। लेकिन क्या करें। हमने ही इन्हें चुना है। हमने ही इनको नौकरियाँ दी है। आज़ादी के बाद हम एक महान समतावादी समाज का निर्माण नहीं कर सके। सो, भुगत रहे है। आगे पढ़िये...
लक्ष्मण
ने जिस आम आदमी को केंद्र में रख कर सृजन किया, उस आदमी की पीड़ा को उन्होंने न सिर्फ़ महसूस किया बल्कि उसे रेखाओं की मदद से व्यापक सरोकारों से जोड़ा। अपने समय और समाज से मुठभेड़ करते हुए लक्ष्मण ने हमेशा ही बहुत ही सलीक़े से अपनी बात हमारे सामने रखी। लक्ष्मण के कार्टूनों की एक बड़ी ख़ूबी यह भी है कि उन्होंने हर उस व्यक्ति को अपने सृजन का विषय बनाया, जो उन्हें मुनासिब लगा। व्यक्ति के पद और प्रभाव की वजह से उन्होंने कभी भी किसी तरह का समझौता नहीं किया। आगे पढ़िये...
राजश्री
की रात आँखों में ऐसे रिस-रिस के बीती कि सुबह उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था। इतनी बेचैन तो वह कभी नहीं हुई। ये क्या हो रहा है उसके साथ ? क्यों अजीब-अजीब घट रहा है। सब उसकी समझ से परे था। कहीं वह अपना मानसिक संतुलन न खो बैठे। वह बेहद चिन्तित और डरी हुई थी। आगे पढ़िये...
हिंदी साहित्य में प्रारंभ से ही विवाद के माध्यम से संवाद क़ायम करने की परंपरा रही है। पिछली शताब्दी के प्रारंभ में जब हिंदी साहित्य अपने विकास की शैशव अवस्था में था तब भी विवाद प्रायः देखने पढ़ने में आया करते थे। लेकिन उस समय विवाद का स्वरूप वर्तमान जैसा नहीं था। तब साहित्यकारों का मूल उद्देश्य हिंदी साहित्य को विश्व समकक्ष खड़ा करना था। आगे पढ़िये...
पूर्ण स्वतंत्रता
तो सृष्टि में भी नहीं है। नदियों को किनारों ने सीमित कर रखा है तो सागर के भी तट हैं। पहाड़ों की ऊँचाइयाँ भी नापी जा सकती है। पंछी स्वतंत्र तो लगते हैं लेकिन एक सीमा तक ही उड़ सकते हैं। कल्पना करें कि समुद्र को स्वतंत्र कर दिया जाए तो क्या होगा? जहाँ बरसों में आने वाले छोटे-मोटे तूफ़ान और चक्रवात तबाही मचा देते हैं, ऐसे में तो समुद्र ज़मीन को निगल जाएगा। यहाँ इसकी कल्पना मात्र काफ़ी होगी। नदी द्वारा थोड़ी-सी स्वतंत्रता लेने से बाढ़ आ जाती है। जो अपने अंदर आसपास की समूची बस्ती को बहाकर ले जाती है। फिर वो बूढ़ा-बच्चा-कमज़ोर या ताक़तवर नहीं देखती। आगे पढ़िये...
बस पकड़ने
के लिए बस-स्टाप पर लोग क़तार में खड़े रहते, शौचालय के बाहर लाइन, हर तरह के टिकटघर की अपनी लाइन, दुकान में सामान ख़रीदने वालों की भीड़ होने पर ख़रीदार तुरंत एक के पीछे एक हो जाते। यही नहीं धार्मिक स्थलों पर अनुयायियों की व्यवस्थित क़तार हर जगह देखी जा सकती थी। व्यावसायिक नज़रिये से देखें तो टैक्सी स्टैंड में टैक्सी भी क़तार में खड़ी होती। पहले पहल तो यह सब सुविधापूर्ण और अनुशासित लगता। भौतिक चकाचौंध मोहित करती। मगर स्टेशन पहुँचकर सारा अनुभव कटु सत्य में परिवर्तित हो जाता, जब लोकल ट्रेन में चढ़ने-उतरने के दौरान धक्का-मुक्की में लोग एक-दूसरे को रगड़ कर पीस देते। यह बेरहम भीड़ होती जिसको ज़िंदा इंसान से कोई सरोकार नहीं। सेकेंड में लोकल के छूटने का डर आदमी को मशीन बना देता और सारी इंसानियत भीड़ के पैरों से कुचल दी जाती। आगे पढ़िये...
वर्तमान
आधुनिक काल को कलियुग कहे जाने का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि चोर-सिपाही, ग़रीब-अमीर, पढ़ा-लिखा-अनपढ़, राजा-रंक, हर कोई कहता हुआ मिल जाएगा कि बहुत बुरा हाल है, व्यवस्था चरमरा गई है, समाज का पतन तीव्र गति से हो रहा है, हर जगह त्राहि-त्राहि और हा-हाकार मचा हुआ है। मज़े की बात है कि इतना सब कुछ कहने व स्वीकार करने के बावजूद कोई कुछ करता नहीं। यह एक विडंबना है और मानवीय सभ्यता के अजब विकास में विकृति की ग़ज़ब मिसाल। आगे पढ़िये...
कहा जाता है
कि पूरे देश में एक ही दिन 31 मई 1857 को क्रान्ति आरम्भ करने का निश्चय किया गया था,पर 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी के सिपाही मंगल पाण्डे (19 जुलाई 1827-8 अप्रैल 1857) की विद्रोह से उठी ज्वाला वक़्त का इंतज़ार नहीं कर सकी और प्रथम स्वाधीनता संग्राम का आगाज़ हो गया। मंगल पाण्डे को 1857 की क्रान्ति का पहला शहीद सिपाही माना जाता है।
आगे पढ़िये...
“आराधना में पहली बार राजेश खन्ना पर किशोर कुमार की आवाज़ का इस्तेमाल करके सचिन देव बर्मन ने हिन्दी सिनेमा के संगीत को एक नई राह दिखाई। इस फ़िल्म के बाद एक नहीं दो दो सुपर स्टारों ने जन्म लिया – राजेश खन्ना ने एक्टर के तौर पर और किशोर कुमार ने गायक के तौर पर।” यह कहना था कथा यू.के. के महासचिव एवं कथाकार तेजन्द्र शर्मा का। मौक़ा था एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स, लंदन एवं कथा यू.के. द्वारा नेहरू सेन्टर, लंदन में आयोजित कार्यक्रम सचिन देव बर्मन – यादों के साये में। आगे पढ़िये...
पटना । पटना में पिछले दिनों (8 अप्रैल) पंडित जसराज ने शास्त्रीय संगीत की स्वर लहरियाँ से श्रोता को मंत्रमुग्ध किया। अवसर था था आर्ट ऑफ़ लिविंग के तत्वावधान में आयोजित स्वर नाद कार्यक्रम का। पंडित जसराज की गणेश वंदना और माता कालिका के गीत पर श्रोताओं मंत्रमुग्ध हुए। पंडित जसराज ने ख़ुब तालियाँ बटोरी। आगे पढ़िये...
पटना।
रंगकर्मी प्रवीण स्मृति सम्मान समारोह के अंतर्गत गोस्वामी तुलसीदास के उत्तरार्द्ध के जीवन प्रसंगों को समेटते हुए नाटक ‘जानत तुलसीदास’ का मंचन पिछले दिनों (8 अप्रैल) को पटना के कालिदास रंगालय में तक्षशिला एजुकेशनल सोसायटी के सौजन्य से निर्माण कला मंच, पटना द्वारा किया गया। ‘जानत तुलसीदास’ नाटक का कथानक तो नया नहीं था। लेकिन प्रस्तुति में नयापन ज़रूर दिखा। आगे पढ़िये...
आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं।
अब इतना भागा-भागी करने की ज़रूरत नहीं। बड़े-बड़े होटलों से लेकर मैरिज पैलेस में हर तरह के पैकेज उपलब्ध हैं। इसमें खाने की वैरायटी के साथ बेयरा भी होता है, घरवालों को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं। हैसियत के अनुसार बैंडबाजे से लेकर पंडित जी भी उपलब्ध करा दिए जाते हैं। गहने कपड़े ही नहीं दहेज का हर सामान किसी भी मॉल में जाकर ख़रीदा जा सकता है। है न सहूलियत? तभी तो लड़का व लड़की वाले होटलों में एक मेहमान की तरह पहुँचते हैं। कोई चिंता नहीं। मस्ती का युग है। वर-वधू पक्ष द्वारा डांस सीखने का पैकेज भी लिया जाता है। और फ़िल्मी अंदाज़ में नाचना-गाना होता है। गोयाकि शादी न हो गई नौटंकी हो गई। दूल्हा-दुल्हन को भी सोचने की ज़रूरत नहीं। होटलों के पैकेज में सुहागरात के लिए बेहतरीन सूइट भी होता है। हनीमून की भी चिंता की ज़रूरत नहीं, कई तरह के पैकेज उपलब्ध हैं। आगे पढ़िये...
कोलकाता । अभिज्ञात के रूप में कहानी का फिर एक तारा चमका है। एक जीवंत कथाकार की पुस्तक 'तीसरी बीवी' के लोकार्पण में मैं ख़ुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। वे उम्र में छोटे हैं, लेकिन उनके अनुभव की एक बड़ी दुर्जेय दुनिया है जो उनके डेग और डग को विरल और विशिष्ट बनाता है। यह कहना है प्रख्यात कथाकार और हंस के कार्यकारी संपादक संजीव का। भारतीय भाषा परिषद सभागार में मंगलवार की शाम अभिज्ञात के कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' का लोकार्पण करते हुए उन्होंने यह बात कही। आगे पढ़िये...
मलय और शेखर
मेरे जीवन के दो किनारे बन कर रह गए और मैं दोनों के बीच नदी की तरह बहती रही जो किसी भी किनारे को छोड़े तो उसे स्वयं सिमटना होगा। अपने अस्तित्व को मिटाकर, क्या नदी कभी किसी एक किनारे में सिमट कर नदी रह पाई है? बचपन का एक साथी सपनों का हमसफ़र ही बन पाया था कि दूसरा जीवनभर के लिए हमसफ़र बन गया। आगे पढ़िये...
नई दिल्ली। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने सोमवार को पत्रकारिता और जनसंचार विषयों पर हिंदी में मौलिक लेखन को बढावा देने के लिए भारतेन्दु पुरस्कार वर्ष 2007 और वर्ष 2008 के पुरस्कार विजेताओं को सम्मानित किया। आगे पढ़िये...
श्यामसुंदर
ग्राम पंचायत के ससना गाँव में ज़्यादातर ब्राह्मण परिवार रहते हैं। गाँव में लगभग 32 परिवार हैं जिनमें 200 सदस्य हैं। इन सभी परिवारों की विशेषता यह है कि हर परिवार में एक न एक संस्कृत का विद्वान है। ये यहाँ चल रहे सरकारी संस्कृत माध्यम के शैक्षिक संस्थानों में शिक्षा देने का काम कर रहे हें। आगे पढ़िये...
फ़ैशन के या दूसरी किसी संस्कृति के सहज तौर-तरीक़ों का जब स्थानीय तौर-तरीक़ों के साथ टकराव होता है तो उससे कई बार ऐसे ख़तरे पैदा होते हैं जैसे कि दुबई में इस ब्रिटिश दंपत्ति को झेलने पड़े हैं या गोवा से लेकर केरल तक और पुष्कर से लेकर दिल्ली तक सैकड़ों-हजारों पर्यटक हर महीने झेलते हैं। हमारी सलाह यह है कि जब तक लोगों को अपने माहौल पर, अपने आसपास के लोगों के बारे में पूरा भरोसा न हो तब तक उन्हें कुछ सम्हलकर रहना चाहिए इसमें उनकी ख़ुद की हिफ़ाज़त भी है। आगे पढ़िये...
कम्प्यूटर
और साफ्टवेयर की क्षमताओं में अत्यधिक विकास के कारण आजकल अनेक भाषाओं का दूसरी भाषाओं में मशीनी अनुवाद सम्भव हो गया है। आगे पढ़िये...
जयपुर ।
पिछले दिनों से कोई व्यक्ति प्रगतिशील लेखक संघ, जयपुर इकाई के अध्यक्ष, गोविंद माथुर के नाम और पते का इस्तेमाल प्रेषक के रूप में करते हुए कल्कि अवतार सम्बन्धी आठ-दस पृष्ठ की प्रचारात्मक सामग्री देश में अनेक व्यक्तियों को डाक से प्रेषित कर रहा है। गोविंद माथुर का कहना है – “मैं एक प्रगतिशील विचार धारा का कवि हूँ, इस तरह की गतिविधियों से मेरा दूर तक कोई लेना देना नहीं है। अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में मेरी कवितायेँ प्रकाशित होती रहती है । मुझे लगता है कि किसी साहित्यिक पत्रिका से मेरा नाम और पता ले कर तथा इन्ही पत्रिकाओं से अन्य लोगों के नाम पते लेकर अनेक साहित्यकारों को भी ये सामग्री प्रेषित कि जा रही है। आगे पढ़िये...
कोटा ।
बाल साहित्यकार अजय जन्मेजय के सम्मान में कोटा में एक काव्य संध्या का आयोजन किया गया । गज़ल एवं गीतकार आर.सी.शर्मा ने निवास पर किये गये आयोजन में जन्मेजय के साथ ही कोटा के कवियों - डॉ. इन्द्र बिहारी सक्सेना, नरेन्द्र कुमार शर्मा, आर.सी.शर्मा ’आरसी’, शरद तैलंग, वीरेन्द्र विद्यार्थी, आर.सी.गुप्ता, तथा सुवीर श्रीवास्तव ने भी अपनी रचनाएँ सुनाई । आगे पढ़िये...
नई दिल्ली।
पिछले दिनों गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में ‘काजल’ एवं ‘हम सब साथ साथ’ पत्रिका द्वारा संयुक्त रूप से अ.भा. बाल युवा, वरिष्ठ प्रतिभा प्रदर्शन व सम्मान समारोह का वार्षिक आयोजन किया गया । मुख्य आतिथ्य की आसंदी से पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह ‘शशि’ डॉ. शशि ने साहित्य एवं कला क्षेत्र की विसंगतियों पर कटाक्ष करते हुए विभिन्न प्रतिभाओं को मंच व सम्मान देने के लिए काजल व हम सब साथ साथ पत्रिकाओं की ईमानदार प्रयासों की सराहना की। आगे पढ़िये...
सानिया मिर्जा
और उसका परिवार आज यह दावा कर सकता है कि शादी का फ़ैसला उनका निजी फ़ैसला है और उसे लेकर सानिया के ख़िलाफ़ इतनी बातें नहीं की जानी चाहिए। लेकिन सार्वजनिक जीवन में जब कोई व्यक्ति शोहरत का इस्तेमाल करने लगता है, अपने निजी जीवन से जुड़ी बातों को मीडिया के कैमरों के सामने सार्वजनिक रूप से और औपचारिक रूप से कहने लगता है तो फिर वह अपने निजी जीवन की निजता के (प्राइवेसी के) कुछ हक़ खो भी बैठता है। आगे पढ़िये...
बुदापैश्त ।
27 मार्च 2010 को बुदापैश्त, हंगरी के ओत्वोश लोरांद विश्विद्यालय के भारतीय विद्या अध्ययन विभाग एवं भारतीय दूतावास के सहयोग से विश्व हिंदी दिवस का आयोजन किया गया। भारत व हिंदी-प्रेमी हंगेरियन व हंगरी में रहनेवाले भारतीय जन इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए बुदा की पहाड़ियों में स्थित मोरित्स जिगमौंड जिम्नेजियम के हॉल में एकत्रित हुए। इस उत्सवी माहौल को हंगारी लड़कियों की भारतीय वेशभूषा और अधिक रंगीन बना रही थी। कहीँ उनकी चूड़ियाँ खनक रही थीं तो कहीं उनके दुपट्टे लहरा रहे थे। एक दो महिलाएँ तो साड़ी भी पहने थीं जो पिनें लगी होने के बाद भी उनसे मुश्किल से सँभल रही थीं। यह इस अवसर का ही महत्व था कि इसके लिए कुछ छात्रों ने विशेष रूप से भारतीय पोशाकें खरीदीं थीं। आगे पढ़िये...
अधिकतर
लोग मेरे आधुनिक विचारों की वजह से मुझमें अवगुण तलाश कर मुझे नीचा दिखाने की कोशिश करते रहते हैं। जींस-टॉप और खुले बालों की वजह से कभी-कभी परिचित भी मुझ पर ग़लत-सलत आरोप लगाने से नहीं चूकते हैं। कइयों ने तो मुझे खुले बालों वाली लड़की, कह कर बुलाना ही शुरू कर दिया है। आगे पढ़िये...
मुंबई ।
मॉरीशस के प्रख्यात कथाकार, उपन्यासकार श्री अभिमन्यु अनत के मुंबई आगमन पर कथा यू.के. ने एक अनौपचारिक गोष्ठी का आयोजन किया। इस बैठक में मुंबई के नामचीन कथाकार, पत्रकार, फ़िल्मों से जुड़े व्यक्तित्वों ने शिरकत की। गोष्ठी की शुरूआत में पुष्पा भारती जी ने भारतीयों लोगों के मारिशस में जाने, वहाँ सषंर्घ करने और पीढि़यों तक हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद वहाँ के समाज, संस्कृति और राजनीति में अपनी जगह बनाने की रोचक लेकिन लोमहर्षक कथा सुनायी। आगे पढ़िये...
अगर शिक्षा
के अधिकार का फायदा अपने प्रदेश के बच्चों को देना है तो सरकार में बैठे लोगों को केंद्र सरकार से आ रहे विशाल बजट पर अपनी लार टपकाना बंद करना होगा। हमारा यह भी मानना है कि जो योजनाएँ सौ फ़ीसदी केंद्र सरकार के पैसों से चलती हैं उनमें अगर बड़ा संगठित भ्रष्टाचार होता है तो राज्य सरकार की सिफ़ारिश या मर्ज़ी के बिना भी केंद्र सरकार को उनकी सीबीआई जाँच करवानी चाहिए। आगे पढ़िये...
पटना ।
स्व.शशिभूषण की स्मृति में पटना के कालीदास रंगालय में तीन दिवसीय नाट्य महोत्सव का आयोजन राष्ट्रीय नाट्य विधालय से जुडे़ रंगकर्मी विजय कुमार ने मंच, के तत्ववाधान में किया। उमरावजान, जनपथ किस, तेरा नहीं मेरा नहीं तेरा, सब कुछ हमारा और हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं नाटकों का मंचन हुआ। आगे पढ़िये...
मुंबई ।
27 मार्च को में प्रवासी कवयित्री द्वय अंजना संधीर और रेखा मैत्र के सन्मान में काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया । स्थल था - ग़ज़ल लेखिका देवी नागरानी का निवास स्थान । अध्यक्षता आर. पी. शर्मा की और संचालन अरविंद राही का । आगे पढ़िये...
पटना ।
एक ओर सामाजिक-आर्थिक प्रगति के झूठ के प्रचार और अपने लूट को ढँकने वाली सत्ता संस्कृति के विज्ञापन और दूसरी ओर अराजक तरीक़े से किए जा रहे उपभोक्ता उत्पाद कंपनियों के विज्ञापन, बिहार में आजकल पहली नज़र में इसी की भरमार दिखती है। जनता के बुनियादी सवालों को घनघोर विज्ञापनबाज़ी के ज़रिए ढँक देने की जैसे एक ज़बर्दस्त कोशिश चल रही है। ऐसे ही समय में जन संस्कृति मंच ने बिहार की राजधानी पटना में 12 से 14 मार्च तक जनकवि नागार्जुन की स्मृति को समर्पित सृजनोत्सव का आयोजन किया। जिसका उद्घाटन करते हुए जनसंस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि सृजनोत्सव पूरे मुल्क़ में विभिन्न भाषाओं, बोलियों और कलारूपों में जनता के रोज़मर्रे के संघर्षों और आंदोलनों को एक मंच देने की शुरुआत है। आगे पढ़िये...
इलाहाबाद ।
20वीं सदी के अंतिम वर्षो में बांदा क्षेत्र से स्फुटित होने वाले साहित्यिक शब्द अगले दो वर्षो में देश के हिंदी भाषी प्रदेशों में लोगों को साहित्यिक बोध कराएँगे। केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती समारोह समिति की ओर से प्रख्यात हिंदी कवि केदारनाथ का जन्मशती समारोह 1 अप्रैल 2010-12 तक मनाया जा रहा है। आयोजन की पहली कड़ी में दूरदर्शन पर 'केन और केदारनाथ अग्रवाल' विषयक परिचर्चा प्रसारित होगी। आगे पढ़िये...
प्राचीनकाल
से एक शब्द बहुमत चलन में है। वेद, उपनिषदकाल, पुराणकाल अथवा राजाओं के समय इसका अर्थ भी वही हुआ करता था जो आज है। इस शब्द का उपयोग राजाकाज चलाने और राजनीतिक दाँवपेंचों के लिए हुआ करता था। कृषि सभ्यता से निकलकर जब मनुष्य समाज ने औद्योगिक सभ्यता में पदार्पण किया तब नयी समाज रचना के लिए नयी व्यवस्था की आवश्यकता भी महसूस हुई। इसमें से एक शब्द निकला जिसे लोकतंत्र नाम दिया गया। आगे पढ़िये...
गांधीजी
चाहते तो इन कामगारों का समर्थन कर हड़ताल ज़ल्द समाप्त करवाकर इस अमानवीय कार्य में भंगियों को कुछ सुविधा दिलवा सकते थे किन्तु उन्होंने उल्टे अँगरेज़ सरकार का समर्थन करते हुए हड़ताल की निन्दा की । इस संबंध में एक लेख में वे लिखते है- सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के ख़िलाफ़ मेरी राय वही है जो 1897 में थी जब मै डरबन (द-अफ्रीका) में था। वहाँ एक आम हड़ताल की घोषणा की गयी थी। और सवाल उठा कि क्या सफाई कर्मचारियों को इसमें शामिल होना चाहिए, मैंने अपना वोट इस प्रस्ताव के विरोध में दिया। आगे पढ़िये...
स्वयं दलित जातियाँ,
दलित साहित्यकार जो साहित्य सृजन को लेकर सहानुभूति, समानुभूति, स्वानुभूति का राग अलापते हैं, वे खुद भी इस जातिगत भेदभाव से मुक्त नहीं हो पाये हैं। महात्मा फुले, बाबा साहेब अम्बेडकर, रामास्वामी पेरियार के अथक प्रयासों और विभिन्न संघ और संगठनों द्वारा चलाये आन्दोलनों के बावजूद आज भी मोची मेहतर को रोटी ऊपर से पकड़ता है और ओक से पानी पिलाता है। बुनकरों और चर्मकारों के बीच जाजम का रिश्ता नहीं है। दलित जातियों का यह हिन्दुत्व अपने आप में दलित्व है। आगे पढ़िये...
नागार्जुन
जन कवि इन अर्थों में हैं कि उनके यहाँ जन की अभिव्यक्ति देखने के ही स्तर पर नहीं होती, वह दृष्टि के स्तर पर भी होती है। नागार्जुन जन की पीड़ा से सीधे संवेदित होकर निराला की तरह अपना कलेजा दो टूक नहीं करते, बल्कि वे उसे चिंतन के स्तर पर ले जाते हैं। वे चिंतित नहीं होते, बल्कि उसे धैर्य के साथ वहन करते हैं और जन के दुखों की व्यापकता को देखते हैं। आगे पढ़िये...
नगरोटा बगवां (धर्मशाला)। हिमाचल प्रदेश के नगरोटा बगवां में कांगड़ा लोक साहित्य परिषद द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन में जिला भर से साहित्यकारों ने रचनाओं से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। इस मौके पर अरूण नागपाल ने कुरूक्षेत्र शीर्षक कविता के तहत 'जीवन से लड़ते-लड़ते बीत चुके हैं, कई रोज़ महीने-साल' सुनाकर खूब तालियाँ बटौरी। आगे पढ़िये...
अमेरिकी
हवाई अड्डा में माई नेम इज शाहरूख खान, शाहरूख खान के ये स्टाईलिश बोल सुरक्षा हेतु लगे कम्प्युटर को नागवार गुज़रे और कम्प्युटर ने सुरक्षा अधिकरियों को गहन जाँच के आदेश दे दिये लगभग दो घंटे तक शाहरूख खान को जाँच हेतु रोके रखा बाद में पूरी संतुष्टि पश्चात छोड़ दिया। इस पर भारतीय मीडिया ने ख़ूब हाय तौबा मचाई शाहरूख खान न हुए भारत के बादशाह हो गये। न्यूज चैनलों ने टी आर पी बढ़ाने को कोई भी मौक़ा हाथ से जाने न दिया। शाहरूख की सुरक्षा जाँच को भारत की बेइज्जत्ती के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया। आगे पढ़िये...
सृजनशीलता मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है,
उसका नैसर्गिक धर्म है। लेखन सृजन ही है और सर्जक होने के कारण मैक्सिम गोर्की साहित्यकार को भी वैज्ञानिक मानते हैं। उनके अनुसार विज्ञान और साहित्य दोनों में प्रेक्षण, तुलना व अध्ययन प्रमुख भूमिका अदा करते हैं इसलिए वैज्ञानिक और लेखक दोनों में सृजनशील बने रहने के लिए कल्पना शक्ति और अन्तदृष्टि का होना आवश्यक है। आगे पढ़िये...
मैं और मीनू स्कूल के हॉस्टल में रहा करते थे। कमरे में बत्ती जला कर सोने की सख़्त मनाही थी। अँधेरे में डर के मारे मेरी देह के पोर-पोर से पसीना छूटने लगता था और मैं सबकी आँख बचाकर चोरी- चुपके बत्ती जला लेती थी। डिनर के दो घंटे बाद जब कभी मैट्रन कमरों का राउँड लगाने आती तो मेरा दिल रह-रह कर दहल जाता। मैं आँखें मूंद कर प्रार्थना करती रहती। आगे पढ़िये...
मैं सोचता हूँ ? लोग पूछते हैं, परिचर्चाएँ होती हैं, ज़श्न मनाए जाते हैं-लेकिन फिर भी लगता है, जैसे हाथ से कुछ छूट गया है, कोई भरा-पूरा प्रतीक, जिसको हम उस ज़मीन, ज़मीन के टुकड़े के साथ सम्पृक्त कर सकें, जिसे देश की संज्ञा दी जाती है; क्या मैं उसे प्यार करता हूँ ? आगे पढ़िये...हिंदी की
वरिष्ठ कहानीकार कृष्णा सोबती ने कहा है कि निर्मल वर्मा जैसे कई साहित्यकार जीवन के अंतिम समय में जिस परेशानी से गुज़रे उसे देखते हुए साहित्य समाज को एक कोष का निर्माण करना चाहिए, ताकि साहित्य सेवा करने वाला कोई व्यक्ति फिर इस दौर से न गुज़रे। आगे पढ़िये...
‘उत्सव अभी शेष है’
वरिष्ठ कथाकार अशोक गुप्ता का पहला उपन्यास है। अपनी कहानियों से अशोक गुप्ता ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। ख़ास कर भाषा और विषय को लेकर उन्होंने कई बेहतर प्रयोग किए हैं। इसलिए उनकी कहानियाँ एक बड़े वर्ग से अपना सरोकार तो बनाती ही हैं समय और समाज के साथ मुठभेड़ भी करती हैं। ‘इसलिए’ और ‘तुम घना साया’ संग्रहों की कहानियों में अशोक गुप्ता के विस्तार को देखा जा सकता है। उनकी कहानियों की एक बड़ी ख़ूबी उसका कहन होता है और बिना किसी शोर-शराबे के अशोक गुप्ता अपनी बात सलीक़े से रखने के आदी है। आगे पढ़िये...
पारामारिबो । सूरीनाम ।
29 मार्च 2010 को भारतीय सांस्कृतिक केंद्र, पारामारिबो के सभागार में सूरीनाम साहित्य मित्र संस्था द्वारा प्रकाशित प्रथम कविता संग्रह एक बाग के फूल का विमोचन सूरीनाम के ही 95 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक और हिंदी के प्रचार प्रसार में सक्रिय रहे श्री भागू अवतार के हाथों कराया गया। आगे पढ़िये...
भारत के
ऐतिहासिक मानचित्र पर इलाहाबाद एक ऐसा प्रकाश स्तम्भ है, जिसकी रोशनी कभी भी धूमिल नहीं हो सकती। इस नगर ने युगों की करवट देखी है, बदलते हुए इतिहास के उत्थान-पतन को देखा है, राष्ट्र की सामाजिक व सांस्कृतिक गरिमा का यह गवाह रहा है तो राजनैतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र भी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस नगर का नाम प्रयाग है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। आगे पढ़िये...
एक
दिन एक युवक आया और उसने मज़ाक़ के तौर पर झोली में मुट्ठी भरकर मिट्टी डाली। पृथ्वीराज ने उस युवक का हाथ पकड़कर कहा; "दोस्त ! हमारे वतन की मिट्टी का मूल्य तुम्हें शायद मालूम नहीं। हम सब इसी मिट्टी से पैदा हुए है। कृपा करके इस मिटते को झोली में नहीं, मेरे सर पर दाल दो। आगे पढ़िये...
सतना ।
मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद्, साहित्य अकादमी द्वारा संचालित पाठक मंच, सतना की मासिक गोष्ठी पिछले दिनों वरिष्ठ कवि चंद्रसेन विराट के कविता संग्रह 'चुटकी चुटकी चांदनी' को केंद्र में रखकर आयोजित की गयी जिसमें मुंबई के युवा कवि विजयशंकर चतुर्वेदी का विशेष काव्य पाठ भी हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता शिक्षाविद डॉ. ए.आर. तिवारी ने की और विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रसिद्ध आलोचक डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी उपस्थित थे। आगे पढ़िये...
पश्चिम जर्मनी । भारत की कई प्रादेशिक भाषाओं में रचित अनमोल साहित्य को यूरोप के जर्मन भाषी समुदाय तक पहुँचाने के लिए जर्मनी के 'द्रौपदी प्रकाशन' ने भारत के कई लेखकों और कवियों की कृतियों का जर्मन भाषा में अनुवाद करके 'Nachtregen' शीर्षक के साथ एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है। आगे पढ़िये...
मुझे तुम पर शर्म आ रही है अल्बर्ट।
तुम इस लायक भी नहीं रह गये हो माय सन कि तुम्हें बेटा कहूँ। पता नहीं यह पत्र पढ़ने के लिए तुम घर पर लौट कर आओगे भी या नहीं। मुझे पता होता कि यहाँ आने पर मुझे इस तरह से परेशान होना पड़ेगा तो मैं आता ही नहीं। चार दिन से बंबई आया हुआ हूँ और तुम्हारा बंद दरवाज़ा ही देख रहा हूँ। आगे पढ़िये...
पटना ।
प्रगतिशील धारा के महत्वपूर्ण लेखक श्री खगेन्द्र ठाकुर ने कथाकार और बया पत्रिका के प्रमुख गौरीनाथ की
एक प्रतिक्रिया के लिए उन्हें कानूनी नोटिस भेजा गया है। यह प्रतिक्रिया गौरीनाथ ने खगेंद्र ठाकुर के उस आलेख पर दी थी, जिसमें उन्होंने गौरीनाथ को इशारों इशारों में अवसरवादी कहा था और इस अवसरवादिता के एक उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया था कि पटना पुस्तक मेले में मंच पर आकर गौरीनाथ ने आलोचक नामवर सिंह के पाँव छूए। आगे पढ़िये...
जयपुर ।
के.के. बिड़ला फाउंडेशन की ओर से 2009 का 19 वाँ बिहारी पुरस्कार प्रसिद्ध कवि हेमंत शेष को उनके कविता संग्रह ‘जगह जैसी जगह’ के लिए दिया जाएगा। पुरस्कार स्वरूप एक लाख रुपए एवं प्रशस्ति—पत्र दिया जाएगा। हेमंत शेष राजस्थान लोक सेवा आयोग में सचिव हैं। उनकी अब तक 13 मौलिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि 8 पुस्तकों का उन्होंने संपादन किया है। आगे पढ़िये...
जालंधर।
पंजाबी भाषा के सुज्ञात कवि डॉ. जगतार अब नहीं रहे । कल 31 मार्च शाम 5 बजे टैगोर अस्पताल में उनका निधन हो गया। डॉ. जगतार की अब तक तेरह काव्य पुस्तकें व कई अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। वे उर्दू व फारसी के स्कालर थे। उन्हें दिल्ली साहित्य अकादमी की ओर से जुगनू, दीवा व दरिया पर अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है । इसके अलावा कई सम्मान से नवाज़ा जा चुका है । आगे पढ़िये...
मुंबई। महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी महाराष्ट्र में 15 वर्षों से अधिक निरंतर निवास करनेवाले हिन्दी साहित्यकारों की पुरस्कार वर्ष से तीन वर्ष पूर्व तक प्रकाशित मौलिक / अनुवादित रचनाओं पर प्रतिवर्ष नामित विधा पुरस्कार प्रदान करती है। लेखक एकाधिक विधाओं में प्रविष्टि भेज सकते हैं परंतु किसी एक वर्ष में केवल एक ही विधा में पुरस्कार देय होगा। किसी भी विधा में केवल एक ग्रंथ की चार प्रतियाँ आमंत्रित की जाती हैं । आगे पढ़िये...
अमिताभ बच्चन
को लेकर कल क़ाग्रेस पार्टी ने अपने तेवर साफ़ कर दिए कि उनकी राजनीति में और उनकी सरकारों के राज में अमिताभ की कोई जगह नहीं है। इसके साथ-साथ क़ाग्रेस ने शायद पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला करते हुए जिस ज़ुबान का इस्तेमाल किया वह इसके पहले क़ाग्रेस के प्रवक्ता के मुँहह से कभी सुनने नहीं मिली थी। मनीष तिवारी हिन्दी भाषी हैं और एक वकील भी हैं इसलिए अब तक की सुनी हुई उनकी भाषा के साथ जोडक़र देखें तो यह साफ़ समझ आता है कि मोदी के लिए बार-बार ‘उस’ शब्द का इस्तेमाल अनायास नहीं था और क़ाग्रेस पार्टी अब सोच-समझकर मोदी के बहाने अमिताभ पर या अमिताभ के बहाने मोदी पर हमला कर रही है। आगे पढ़िये...
मैंने
उसे दीवानावार चाहा था। कोई किसी को क्यों चाहता है? क्यों चाहता है कोई किसी को ? कितना अजीब होता है, सिर्फ़ एक ही को देखना, पल-पल उसी के बारे में सोचना, दिल में बस एक ही ख़्वाहिश, होंठों पे बस एक ही नाम - एक ही नाम, जो बढ़ा आता है, सोते के पानी-सा, आत्मा की गहराइयों से होंठों तक, एक ही नाम जो आप दोहराते हैं बार-बार,एक नाम जो आप लगातार बड़बड़ाते हैं कहीं भी प्रार्थना की तरह। आगे पढ़िये...
'दिलाया याद
तो मैं खोजता हूँ/ कहीं पर था कहीं तो दिल रहा है।' भला हो वैलेंटाइन डे का जिसके कारण साल में एकाध बार ही सही दिल का ख़याल आ जाता है। वरना आज के दौर में चालीस पार के एक सामान्य आदमी को ग़मे-जहां के हिसाब से फ़ुरसत कब मिलती है। साहित्य की दुनिया में विधिवत आये दो दशक हो गये हैं। अब जबकी मेरी नौवीं किताब कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' आयी है तो गौर करता हूँ तो पाता हूँ कि मेरे इस संग्रह में इश्क़ पर इक्की-दुक्की रचना ही है। जबकि यह स्वीकार करने में मुझे कोई हिचक नहीं कि मेरा लेखन इश्क़ की देन है। आगे पढ़िये...
पिछले
एक दशक में अपनी तीन सुपर बेस्टसेलर किताबों द टिपिंग पॉइंट, ब्लिंक और आउटलायर्स से बहु चर्चित और अपने परिवेश को देखने का हमरा नज़रिया बदल डालने वाले लेखक माल्कम ग्लैडवेल की नई किताब व्हाट द डॉग सॉ: एँड अदर एडवेंचर्स असल में लगभग इसी कालावधि में न्यूयॉर्कर पत्रिका में छपे उनके 19 बेहतरीन लेखों का संचयन है। आगे पढ़िये...
इंटरनेट
के युग में अन्य भाषा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती प्रतीत होती है चूँकि कम्प्यूटर का यह मायाजाल अँगरेज़ी पर निर्भर है और इसी भाषा को प्रचारित और प्रसारित कर रहा है। ऐसे में कोई दूसरी भाषा का लेखक, जब इंटरनेट पर उभरता है तो सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। इंटरनेट पर उपलब्ध साहित्य की दुनिया में एक रूसी नाम भी है, विक्टर पेलेविन, जिसने तेज़ी से अपने अस्तित्व का अहसास आधुनिक संसार को करवाया। आगे पढ़िये...
न्यूज़ चैनल
के दिल्ली स्टूडियो में चहल-पहल थी। पार्टी जो चल रही थी ‘‘फिदायीन‘‘ यानी शुभेन्दु के लिये। ख़तरनाक रिपोर्टिंग के लिये सिर पर कफ़न बांध कर बैठने वाले शुभेन्दु के दोस्तों ने उसका उपनाम फिदायीन‘‘ ही रख दिया था। ‘‘फिदायीन जिसकी एक परिभाषा उन लोगों ने स्थापित कर दी, जो कभी मौत से ख़ुद नज़रें नहीं मिलाते। जन्नत तक पहुँचने की गारन्टी देकर मासूम बच्चों और किशोरों के कोरे काग़ज़ के समान मस्तिष्क में ये उकेर देते हैं-घृणा, विद्वेष और आतंक। आगे पढ़िये...
गरिमा
का विवाह हुए दस वर्ष बीत चुके थे । इस बार उसके मन की इच्छा थी कि सभी घरवाले आनेवाली दीवाली उसके नए घर में एक साथ मनाएँ । नए घर में उनकी यह पहली दीवाली थी । वह उसे यादगार बनाना चाहती थी । उसके मन में दीवाली की तैयारियों को लेकर इस बार कुछ ख़ास नई उमंग, नया जोश और नया उत्साह भरा था । उसने बड़े प्रेम से सभी रिश्तेदारों को दीवाली मनाने के लिए शाम के समय आने के लिए आमंत्रित किया था। अपने मायक़ेवालो को उसने ख़ुद बड़े चाव से आमंत्रित कर लिया था और ससुराल में जिस किसें भी बुलाना हों उसका जिम्मा उसने मनीष को दिया था । शाम में सबके साथ- साथ भोजन के लिए उसने मन ही मन काफ़ी योजना बना ली थी। आगे पढ़िये...