स्याह सफ़ेद

ये भी एक दृष्टिकोण

आधुनिक वेताल कथा

समय-समय पर

ओडिया-माटी

बाअदब-बामुलाहिजा

झरोखा

धारिणी

ब्लॉग गाथा

ब्लॉग गाथा

मार्च 2010

आज एक घिसे-पिटे मुद्दे पर

आज देश के दो अलग-अलग हिस्सों से आ रही ख़बरों को लेकर एक बार फिर भारतीय राजनीति की आधी सदी पुरानी एक परेशानी पर ध्यान जा रहा है। रांची में दर्जन भर क़िस्मों के अपराधों को अदालतों में झेल चुके या झेल रहे वहाँ के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन अब यह देख रहे हैं कि अपने घर के किस बेटे-बहू की विधानसभा सीट ख़ाली करवाकर वहाँ से वे चुनाव लड़ें। और बाद में अपनी ख़ाली लोकसभा सीट से उस बेटे या बहू को सांसद बनवा दें। एक वक़्त था जब इस देश में नेहरू के बाद इंदिरा को मौक़ा मिलने पर वंशवाद की बात चली थी। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (306) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 31 मार्च 2010
सुनील कुमार

भगीरथ की चार लघुकथायें


लघुकथा, (261 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 31 मार्च 2010,
भगीरथ परिहार

प्रतिभा सिंह को दिया गया भिखारी ठाकुर सम्मान

फेनिक्स, मॉरीशस । मॉरीशस में हर माह साहित्य-प्रेमियों के ’साहित्य-संवाद’ वाले साहित्यिक जुटाव में इस बार शनिवार 27 मार्च 2010 को इन्दिरा गाँधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र, फेनिक्स में भारत के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एसोशियेट प्रोफ़ेसर, डॉ. देवेन्द्र कुमार चौबे जी द्वारा कहानी-पाठ किया गया । आगे पढ़िये...

हलचल, (216) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 31 मार्च 2010
सृजनगाथा

मॉरीशस में डॉ. देवेन्द्र चौबे का कहानी पाठ

फेनिक्स, मॉरीशस । मॉरीशस में हर माह साहित्य-प्रेमियों के ’साहित्य-संवाद’ वाले साहित्यिक जुटाव में इस बार शनिवार 27 मार्च 2010 को इन्दिरा गाँधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र, फेनिक्स में भारत के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एसोशियेट प्रोफ़ेसर, डॉ. देवेन्द्र कुमार चौबे जी द्वारा कहानी-पाठ किया गया । आगे पढ़िये...

हलचल, (189) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 31 मार्च 2010
सृजनगाथा

ललित निबंध का स्थापत्य

ललित निबंध यह अभिधा या विधा समीक्षकों के बीच विवाद का विषय रहा हा – व्यंग्य विधा की तरह। बहरबाल इस विवादक से बचते हुए ललित निबंधों के बीच से उभरे मूल्यों और उनकी बनावट-बुनावट के संबंध में एक संवाद स्थापित करने का यह एक विनम्र प्रयास है। आगे पढ़िये...

ललित निबंध, (325) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 30 मार्च 2010
डॉ. शोभाकांत झा

देश-विदेश में रंगमंच दिवस

आबुधाबी । २७ मार्च, विश्व रंगमंच दिवस को विशेष ढंग से मनाने के लिए गोष्ठी का आयोजन किया गया । भारत से दो विशेष अतिथि कवियों श्रीमती निर्मला जोशी और श्री यतीन्द्र राही को लेकर पधारे आबू धाबी से कृष्ण बिहारी। आगे पढ़िये...

हलचल, (200) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 29 मार्च 2010
सृजनगाथा

दिव्या माथुर को हरिवंश राय बच्चन सम्मान

लंदन। नेहरू केंद्र की वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी दिव्या माथुर को वर्ष 2009 के हरिवंश राय बच्चन लेखन सम्मान से सम्मानित किया गया है। ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त नलिन सूरी ने माथुर को यह सम्मान प्रदान किया, जिन्होंने कई कविता संग्रहों के साथ ही कहानियाँ भी लिखी हैं। 1985 में लंदन में भारतीय उच्चायोग से जुड़ी दिव्या माथुर रॉयल सोसाइटी ऑफ आर्ट्स की फ़ेलो हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (197) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 29 मार्च 2010
सृजनगाथा

हिंदी पत्रिका ‘कोंगु निधि’ का विमोचन

कोयंबत्तूर । कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, क्षेत्रीय कार्यालय, कोयंबत्तूर की हिंदी गृह पत्रिका कोंगु निधि के मार्च, 2010 अंक का विमोचन कोयंबत्तूर में 26 मार्च को श्री एन.ए. नायर, अपर केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त (तमिलनाडु एवं केरल राज्य) के करकमलों से किया गया । आगे पढ़िये...

हलचल, (196) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 29 मार्च 2010
सृजनगाथा

संस्कृत से खड़ीबोली तक का सफ़र

हिन्दी साहित्य की दृष्टि से सम्वत् 769 से 1318 काल को आदिकाल की संज्ञा दी गयी है। इस काल में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, अवधी, ब्रजभाषा एवं खड़ीबोली, साहित्य की भाषाएँ थीं। डॉ. धीरेन्द्र वर्मा का मत है कि पतञ्जलि (पाणिनि की व्याकरण अष्टाध्यायी के महाभाष्यकार) के समय में व्याकरण शास्त्र जानने वाले विद्वान् ही केवल शुद्ध संस्कृत बोलते थे, अन्य लोग अशुद्ध संस्कृत बोलते थे तथा साधारण लोग स्वाभाविक बोली बोलते थे, जो कालान्तर में प्राकृत कहलायी। आगे पढ़िये...

हिंदी-विश्व, (617) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 29 मार्च 2010
डॉ. काजल बाजपेयी

पहला पत्थर मारने का हक़ किसे?

लोकतंत्र बिना दांतों वाले मसूड़ों सा होता है, वह लोगों को पकड़ते तो दिखता है लेकिन उन्हें सज़ा आसानी से नहीं दे पाता। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए उनकी माँ और देश की प्रधानमंत्री के हत्यारों को सज़ा मिलने में बरसों लग गए थे। ऐसा ही हाल दूसरे बहुत से चर्चित मामलों में होता है और देश की आज की राजनीतिक व्यवस्था इस क़दर अनैतिक और सिद्धांतविहीन हो गई है कि लोग अपनी कुर्सियों पर रहते हुए अपराध करते हुए दुबारा वहीं पर आ जाते हैं और लोकतंत्र के मौजूदा भारतीय ढाँचे में कुर्सियों के अंतरसंबंध ख़ारिज़ नहीं किए जा सकते। आगे पढ़िये...

इनदिनों, (318) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 29 मार्च 2010
सुनील कुमार

हिंदी आखिर राष्ट्र भाषा क्यों नहीं हैं ?

पता तो पहले से था मगर गुजरात उच्च न्यायालय के बंगाली मुख्य न्यायाधीश ने याद दिलाया कि भारत की राष्ट्र भाषा हिंदी नहीं है। एक जनहित याचिका पर फ़ैसला देते हुए उन्होंने यह तो माना कि भारत में सबसे ज़्यादा लोग हिंदी बोलते हैं लेकिन भारत के संविधान में इसे राष्ट्र भाषा नहीं माना गया है। यह सिर्फ राज भाषा है। आगे पढ़िये...

हिंदी-विश्व, (286) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 27 मार्च 2010
आलोक तोमर

रूस ने बिसराया टालस्टाय को ?

मास्को।विश्व के महान साहित्यकारों में शुमार लियो टालस्टाय को उनके अपने देश, रूस ने भुला दिया है। यह साल टालस्टाय की मृत्यु का शताब्दी वर्ष है। राजधानी क्रेमलिन में उनकी स्मृति में इस साल कोई आयोजन नहीं किया जा रहा। जबकि क्यूबा और मेक्सिको जैसे देश टालस्टाय को इस मौके पर शिद्दत से याद कर रहे हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (245) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 28 मार्च 2010
सृजनगाथा

लास्ट बुकर पुरस्कार के नामों की घोषणा

लंदन। करीब 40 साल पहले ब्रिटेन के शीर्ष साहित्यिक सम्मान बुकर पुरस्कार पाने में विफल रहे छह लेखकों को इस सम्मान को पाने का दोबारा मौका है। लास्ट बुकर पुरस्कार के अंतिम दौर के नामों की घोषणा गुरुवार को कर दी गई। बुकर पुरस्कार 1970 से शुरू हुआ था। 1970 में इस पुरस्कार से वंचित रह गई किताबों के लिए लास्ट बुकर पुरस्कार दिया जा रहा है। आगे पढ़िये...

हलचल, (200) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 28 मार्च 2010
सृजनगाथा

प्रतिमाओं से कुचलते नवजात शिशुओं को बचाने आए डॉलर

यह विरोधाभास मन में तकलीफ़ पैदा करता है कि जहाँ 50 करोड़ रूपए से एक जिले में ऐसी स्थायी जागरूकता पैदा की गई है कि नवजात शिशुओं की मौत घटकर आधी रह गई हों वहाँ पर 50-50 करोड़ रूपए से जाने कितनी प्रतिमायावती, हाथी और दूसरी प्रतिमाएँ चबूतरों पर लगाई जा रही हैं और मौतें जारी हैं। इस गरीब प्रदेश में कल की ही ख़बर थी कि देश के भीतर के ग़रीबी के रेखा के नीचे वाले लोगों की सबसे अधिक संख्या बसी हुई है। आगे पढ़िये...

इनदिनों, (341) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 27 मार्च 2010
सुनील कुमार

कम्युनिस्ट आन्दोलन का एक अध्याय

कानू सान्याल स्वयं में भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास के एक अध्याय थे। उन्हे उसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए। संभव है कि कहीं कहीं उनसे हमारा मतभेद हो, यह संभव है कि उनके निष्कर्ष हमें नागवार गुज़रे फिर भी वामपंथी दुःसाहसिकतावाद के विरोध के एक उज्ज्वल सितारे के रूप में उनका नाम हमेशा चमकता रहेगा। आज के दिन जब माओवादी कारगुज़ारियों से मार्क्स का नाम तक कलंकित हो रहा है, तब हमे उस सितारे के मार्गदर्शन की ज़रूरत है। आगे पढ़िये...

प्रसंगवश, (277) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 27 मार्च 2010
विश्वजीत सेन

संजय पुरोहित की कहानी संग्रह पर विमर्श

बीकानेर । शिक्षाविद्, समालोचक कवि डॉ. मदन केवलिया ने कहा कि किसी भी रचना में लेखकीय मन्तव्य की अहम् भूमिका होती है और यदि इस दृश्टि संजय पुरोहित मन्तव्य की प्रस्तुति में सफल माने जा सकते हैं । डॉ. केवलिया ने कहानियों में सृजित जीवन-चरित्र को व्याख्यायित करते हुए कहा कि सामाजिक विचलन और खोखले सम्बन्धों को बड़ी शिद्दत से रचा और उकेरा गया है । कथ्य विश्लेशण करते हुए उन्होंने कहा कि समय की माँग के दृष्टिगत नव-बोध और मूल्य-परिवर्तन को बारीक़ी से उँकेरती ये कहानियाँ वक़्त की नब्ज़ पहचानने वाली बेहतरीन कहानियाँ हैं । आगे पढ़िये...

हलचल, (237) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 27 मार्च 2010
सृजनगाथा

रंगमंच, परम्परा और प्रयोग

हिन्दी रंगमंच-नाटक का जो रूप स्वरूप, विधान आज हमारे सामने है, वह समय समय पर हुये परिवर्तन और प्रयोगधर्मिता का ही परिणाम है। रंगमंच के नाटक ने नये आयाम स्थापित कर नये धरातलों को छुआ है, इसमें दो राय नहीं है। किन्तु साथ ही साथ आधुनिक रंगमंच ने कई प्रश्नों को भी जन्म दिया है। विचार नाटक की रीढ की हड्डी की तरह होता है। किन्तु प्रयोग के नाम पर हो रहे अधिकतर नाटकों में पिछले वर्षों से विचार ही लुप्त होता जा रहा है। विचार के स्थान पर आज शरीर और उसके संचालन को अधिक महत्त्व दिया जा रहा है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि नाटक एकायामी न होकर जटिल और बहुआयामी होता जा रहा है। आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (245) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 27 मार्च 2010
मदन शर्मा

31 मार्च तक जगन्नाथ संस्कृति महाधिवेशन

कटक। जगन्नाथ संस्कृति को छोड़ कर उड़ीसा की कल्पना सम्भव नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे यह संस्कृति नष्ट होने लगी है। जगन्नाथ संस्कृति की सुरक्षा व प्रचार प्रसार के लिए हर एक ओड़िआ को आन्तरिकता के साथ प्रयास करने के लिए पुरी के गजपति महाराज ने आह्वान किया है। आगे पढ़िये...

हलचल, (192) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 26 मार्च 2010
सृजनगाथा

मुंबई में हिन्द स्वराज पर संगोष्ठी

मुंबई । न्यायमूर्ति चन्द्रशेखर धर्माधिकारी ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि दुनिया के कई देशों में हिंद स्वराज की सौवीं जयंती मनाई जा रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर कर्इ देशों के राष्ट्राध्यक्ष हिंद स्वराज में अपनी आस्था व्यक्त कर चुके हैं । मेरे विचार से हर हिंदुस्तानी को महात्मा गांधी की इस किताब को अवश्य पढ़ना चाहिए और इस पर चिंतन करना चाहिए । गांधी जी ने अगर मशीनों, वकीलों और डॉक्टरों के खिलाफ़ लिखा तो उनके पास इसके लिए तर्कसंगत आधार भी था । आगे पढ़िये...

हलचल, (212) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 26 मार्च 2010
सृजनगाथा

सार्क देशों के साहित्यकारों का त्रिदिवसीय सम्मेलन

दिल्ली । आज से तीन दिनों तक इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में चलने वाले इस उत्सव में महाश्वेता देवी उद्घाटन भाषण देंगी और डॉ. कर्ण सिंह अपने विचारों से तमाम देशों के प्रतिनिधियों को अवगत कराएँगे। कार्यक्रम का मूल उद्देश्य विभिन्न देशों की संस्कृतियों व साहित्य को एक-दूसरे तक पहुँचाना है। अजीत कौर ने बताया कि उद्घाटन समारोह में उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी, पाकिस्तानी पत्रकार और जिओ टीवी के प्रोड्यूसर हामिद मीर को उनके उल्लेखनीय कार्यो के लिए सार्क लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। आगे पढ़िये...

हलचल, (248) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 26 मार्च 2010
सृजनगाथा

रंगों का बादशाह

राजस्थान के ग्रामीण अंचल में होली एक त्यौहार न होकर पूरे एक महीने का जीवन माना जाता है जो लोक रंग में रंगा हुआ होता है। अकसर गाँव में होली धार्मिक त्यौहार की जगह लोक संस्कृति का रूप ले लेती है जिसमें हिंदू मुस्लिम एक साथ रंग खेलने का लुफ्त उठाते हैं। आगे पढ़िये...

ये भी एक दृष्टिकोण, (249) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 26 मार्च 2010
संदीप कुमार मील

कानू सान्यालः विकल्प के अभाव की पीड़ा

कुछ ही साल तो बीते हैं - कानू सान्याल रायपुर आए थे। उनकी पार्टी भाकपा (माले) का अधिवेशन था। भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार मनोहर चौरे ने मुझे कहा - तुम रायपुर में हो, कानू सान्याल से बातचीत करके एक रिपोर्ट लिखो। ख़ैर मैंने कानू से बात की वह ख़बर भी लिखी। किंतु उस व क़भी ऐसा कहाँ लगा था कि यह आदमी जो नक्सलवादी आंदोलन के प्रेरकों में रहा है कभी इस तरह हारकर आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाएगा। आगे पढ़िये...

प्रसंगवश, (271) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 26 मार्च 2010
संजय द्विवेदी

विजय कुमार सप्पति की तीन कविताएँ


कविता, (248 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 26 मार्च 2010,
विजय कुमार सप्पति

सऊदी कवियित्री की नज़्मों से कोहराम

आबुधाबी । अपने लेखन से चरमपंथियों पर निशाना साधने वाली एक सऊदी कवियित्री हिसा हिलाल अबू धाबी में चल रही एक प्रतियोगिता में सबसे मज़बूत दावेदार बनकर उभरी हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (236) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 25 मार्च 2010
सृजनगाथा

हिंसा के बरक्स शब्द की सत्ता

चार दशकों से अधिक समय तक जो लेखक और कलाकार सरकारों के विरोध तथा नक्सलियों के पक्ष में खड़े रहते आए थे, वे अब नक्सली हिंसा की ही आलोचना करने लगे हैं। नक्सलियों के नए स्वरूप माओवादियों की विध्वंसक गतिविधियों ने उनके समर्थकों को भी आहत किया है। आगे पढ़िये...

आलेख, (268) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 25 मार्च 2010
रमेश नैयर

डबल फॉस्लहुड के लेखक शेक्सपीयर ही हैं

लंदन। नाटक डबल फॉल्सहुड के लेखक के नाम पर 280 साल से ज़्यादा समय तक बना भ्रम अब दूर हो गया है। अब यह साफ़ हो गया है कि इसे किसी और ने नहीं बल्कि मशहूर ब्रिटिश नाटककार विलियम शेक्सपीयर ने लिखा था। आगे पढ़िये...

हलचल, (313) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 25 मार्च 2010
सृजनगाथा

‘‘आत्मकथा लेखन स्त्री सशक्तीकरण की ओर बढ़ता पहला चरण है’’ - सुधा अरोड़ा

साहित्य के इतिहास में स्थायी रूप से तो आपका नाम तभी दर्ज होगा, जब आपका ज़मीर साफ़ हो । ग़लत को देखते-पहचानते हुए भी अपने छोटे छोटे फ़ायदों के तहत उस ग़लत पर परदा डालते रहना, उसके विरोध में न ख़ड़े होना, कोई दूसरा खड़ा हो तो भी उसका साथ न देकर मूक दर्षक बनकर एक सुविधाजनक दूरी बनाकर दूर खड़े होकर तालियाँ बजाना और अपनी ही महिला बिरादरी का अपमान करना मेरे गले नहीं उतरता । आगे पढ़िये...

कथोपकथन, (836) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 25 मार्च 2010
उर्मिला शिरीष की बातचीत

आतंक के 20 साल बाद कश्मीर

क्या कश्मीर समस्या का समाधान संभव नहीं है जवाब मिलना संभव तो है लेकिन यहाँ के राजनीतिक दल ही नहीं चाहते कि ये मामला सुलझे, क्योंकि यदि यह समस्या सुलझ गई तो राजनीतिक दलों एवं छद्म मानवाधिकारवादियों के पास कश्मीरी आवाम को बरगलाकर शासन करने का मुद्दा ही ख़त्म हो जायेगा। इस उठापटक में पिस कौन रहा है मर कौन लोग रहे हैं, तनाव के दंश से कौन लोग गुज़र रहे हैं और बंदूक के साये में जीने के लिए मजबूर कौन हैं, वह न तो कोई राजनेता हैं और न ही अलगाववादी, बल्कि आम कश्मीरी आवाम को इन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। आगे पढ़िये...

इनदिनों, (261) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 24 मार्च 2010
सृजनगाथा

टीएन शुक्ला साहित्य अकादमी के नए निदेशक

भोपाल। राज्य शासन ने डा. त्रिभुवन नाथ शुक्ला को मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का निदेशक नियुक्त किया है। यह नियुक्ति तीन वर्ष के लिए की गई है। संस्कृति विभाग द्वारा इस संबंध में आदेश जारी कर दिए गए हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (188) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 24 मार्च 2010
सृजनगाथा

मारीशस में कवि इन्द्र बहादुर खरे के साहित्य पर परिचर्चा

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली कवि के साहित्य पर विचार रखते हुए कहा कि कवि इन्द्र बहादुर खरे के साहित्य ने समकालीन कवि मैथिलीशरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा की साहित्यिक चुनौतियों को स्वीकारा और अपनी अल्प आयु में पहचान बनाई एवं 70 वर्ष पहले लिखी कविताओं का विदेशी धरती पर साहित्यकारों द्वारा स्वीकारना कविताओं की मौलिक सौंदर्य का प्रमाण है । आगे पढ़िये...

हलचल, (200) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 23 मार्च 2010
सृजनगाथा

कागज़ी बुर्ज

कागज़ी बुर्ज की कहानियाँ स्थापित मूल्यों के गिरते बुर्जों पर चिपके कागज़ी पैबंदों के सुराग खोजती हैं। वो बुर्ज चाहे स्त्री को महिमामंडित करने वाली खोखली परम्पराओं की आड़ हों या जीवन-संबंधों की जीर्ण-शीर्ण दंतकथाएं। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (180) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 24 मार्च 2010
सृजनगाथा

रामेश्वर वैष्णव और डॉ. सुखदेव साहू सम्मानित

दुर्ग । वर्ष 2010 का पतिराम साव सम्मान दीर्घकालीन साहित्य साधना के लिए हास्य व्यंग्य के आंचलिक कवि रामेश्वर वैष्णव को तथा शिक्षा एवं समाजसेवा के लिए डॉ. सुखदेव साहू ’सरस’ को प्रदान किया गया । उन्हें शॉल, श्रीफल और अभिनंदन पत्र से अलंकृत किया गया। यह सम्मान दुर्ग के समाजसेवी, शिक्षक और अध्यापक पतिराम साव के नाम से छत्तीसगढ़ में समाजसेवा, शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य करने वालों को विगत दस वर्षों से अलंकृत किया जा रहा है। आगे पढ़िये...

हलचल, (230) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 23 मार्च 2010
सृजनगाथा

ख़ुद को छुड़ाये जाने पर सहमत नहीं थे भगत सिंह

भगत सिंह इस बात पर सहमत नही थे उन्हें जेल से छुड़ा लिया जाए। वर्ना सारी तैयारियाँ पूरी कर ली गई थी। एक मोटरकार पर उनके सशस्त्र सहयोगी, जिनका नेतृत्व चन्द्रशेखर आजाद कर रहे थे, असावधन पुलिस बल और जेल के फाटक पर कुछेक तनहा लमहें, जब भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त फाटक से बाहर निकलकर बस पर चढ़ने जा रहे थे। यह बस उन्हें अदालत में पेशी के लिए ले जाने वाली थी। आगे पढ़िये...

इतिहास, (359) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 23 मार्च 2010
विश्वजीत सेन

जीवन पर्यन्त


छंद, (378 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 23 मार्च 2010,
शशि पाधा

शहीद भगत सिंह के सामने राष्ट्र नतमस्तक क्यों’ का लोकार्पण

हिसार । शहीद भगत सिंह क्रांतिकारी होने के बावजूद भावुक व संवेदनशील युवक थे। भगत सिंह ने क्रांतिकारी होने के बावजूद अपने क्रियाकलापों से यह सिद्घ कर दिया कि क्रांति के लिये हिंसा अनिवार्य नहीं। प्रसिद्घ कवि उदयभानु हंस ने यह बात प्रो. एम. एम. जुनेजा द्वारा लिखित पुस्तक शहीद भगत सिंह के आगे राष्ट्र नतमस्तक क्यों के लोकार्पण समारोह में कही। यह समारोह पाठक मंच द्वारा जिला पुस्तकालय में आयोजित किया गया। आगे पढ़िये...

हलचल, (227) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 23 मार्च 2010
सृजनगाथा

मृत्युंजय को प्रतिष्ठित गोल्डस्मिथ्स फेलोशिप

पटना । नालंदा जिला निवासी मृत्युंजय कुमार प्रभाकर बिहार के पहले छात्र हैं जिन्हें लंदन की गोल्डस्मिथ्स यूनिवर्सिटी से फेलोशिप दिया जा रहा है । वे कला एवं सौंदर्य पर रिसर्च के लिए दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय गोल्डस्मिथ्स यूनिवर्सिटी में 'कोलोनियल व पोस्ट कोलोनियल भारत में शेक्सपियर' पर शोध करेंगे। आगे पढ़िये...

हलचल, (229) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 23 मार्च 2010
सृजनगाथा

हिंदी साहित्य के सौ वर्ष

हम सब यह जानते हैं कि कोई भी भाषा एक आदमी द्वारा बनाई नहीं जा सकती। भाषा का निर्माण या विकास धीरे-धीरे समाज में आपस में बोलचाल से होता है। समय के साथ-साथ भाषा बदलती रहती है, इसलिए एक भाषा से दूसरी भाषा बन जाती है। भाषा और साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भाषा है तो साहित्य है और जब साहित्य होता है तब भाषा स्वतः ही विकासमान होती है। वर्तमान में हिंदी भाषा दुनिया भर में अपनी पहचान बना चुकी है। इस विकास का एकमात्र आधार है समन्वय। हिंदी भाषा ने न केवल भारत की अपितु विश्व की अनेक भाषाओं के शब्दों से अपने आपको परिपूर्ण किया और आज भी अनेक शब्दों को अपने अंदर समाहित कर रही है। आगे पढ़िये...

मूल्याँकन, (438) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 23 मार्च 2010
डॉ. काजल बाजपेयी

जान ग्रिशम की किताबें होंगी डिजिटल

नई दिल्ली। बच्चों के लिए दुनिया की पहली पुस्तक श्रृंखला रचने वाले जान ग्रिशम की कृतियों को अब ई-बुक की शक्ल दी जा रही है । एक समाचार के अनुसार रैंडम हाउस इनकारपोरेशन ने ग्रिशम की ए टाइम टू किल से लेकर फोर्ड काउंटी तक की श्रृंखला की 23 किताबों का ई-बुक संस्करण प्रकाशित करने की घोषणा की है । आगे पढ़िये...

हलचल, (197) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 23 मार्च 2010
सृजनगाथा

सागर


कविता, (269 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 23 मार्च 2010,
डॉ. वेद व्यथित

थ्हांनै काजलियौ बणा ल्यूं

बात केवल हँसी मजाक़ तक हो तो ठीक है, परन्तु अगर सचमुच में ही औरतें पति को काजल बना कर आँखों में रखने लग गईं तो विष्व का आठवाँ अजूबा यही होगा, फिर तो पति को सबसें पहले काजल बना कर आँखों में रखने वाली महिला का नाम गिनिज बुक में आने सें कोई नहीं रोक सकता। आजकल लोगों का कुछ भरोसा भी तो नहीं हैं । गिनिज बुक में नाम छपवाने के लिए लोग जाने क्या-क्या उल्टा-सीधा कर बैठते हैं । आगे पढ़िये...

व्यंग्य, (1211) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 22 मार्च 2010
आशा पाण्डे

मैं सिंध की पैदाइश हूँ का लोकार्पण

मुंबई । 13 मार्च को आर.डी. नेशनल कॉलेज के ऑडिटोरियम में लायन क्लब ऑफ़ यूनिवर्सिटी कैम्पस में हिंदी और सिंधी भाषा की ग़ज़लगो देवी नागरानी की काव्य-संग्रह ‘सिंध की मैं पैदाइश हूँ’ का लोकार्पण मुख्य मेहमानों के हाथों संपन हुआ । ज्ञातव्य हो कि यह संग्रह हाल ही में कराची से प्रकाशित हुआ है । आगे पढ़िये...

हलचल, (273) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 22 मार्च 2010
देवी नागरानी की रपट

देवी नागरानी की पाँच ग़ज़लें


छंद, (338 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 22 मार्च 2010,
देवी नागरानी

लंदन में रमा पांडेय की नाटकों पर चर्चा गोष्ठी संपन्न

लंदन । “रमा पाण्डेय की नायिकाएँ दबी कुचली नारियाँ नहीं हैं। वे सब अपने अपने परिवेश में विद्रोह का बिगुल बजाने की क्षमता रखती हैं।” यह कहना था काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी का। अवसर था लंदन के नेहरू सेंटर में निर्माता, निर्देशिका व लेखिका रमा पाण्डेय की भारतीय मुस्लिम महिलाओं की ज़िंदगी पर लिखे नाटक संकलन फ़ैसले एवं उन नाटकों पर बने डीवीडी के कथा यूके द्वारा आयोजित विमोचन का। आगे पढ़िये...

हलचल, (271) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 22 मार्च 2010
दीप्ति शर्मा की रपट

बक्सर की कृति का ब्रिटेन में परचम

बक्सर । दुनिया यूँ ही बिहारी प्रतिभा का लोहा नहीं मानती। बक्सर की बारह वर्षीया कृति ने इंग्लैंड में आयोजित युवा लेखकों की 20 वीं वार्षिक सृजनात्मक प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल कर सूबे को नया ताज दिलाया है। प्रतियोगिता में इंग्लैंड के पाँच हज़ार स्कूलों के बीस हज़ार छात्रों ने भाग लिया था। आगे पढ़िये...

हलचल, (246) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 21 मार्च 2010
सृजनगाथा

कैलाश वनवासी की किताब पर गोष्ठी

दुर्ग । जनसंस्कृति मंच दुर्ग-भिलाई, रायपुर-कुम्हारी इकाई ने कल्याण महाविद्यालय के सहयोग से 22 फरवरी को महाविद्यालय के सभागार में देश के चर्चित युवा कथाकार कैलाश बनवासी के तीसरे कथा संग्रह 'पीले कागज़ की उजली इबारत' पर समीक्षा गोष्ठी का आयोजन किया। गोष्ठी में प्रो. विनोद शर्मा ने आलेख पाठ द्वारा संग्रह की सभी कहानियों पर प्रकाश डालते हुआ कहा कि मनुष्य आज उपभोक्ता से उपयोग की वस्तु में तब्दील हो रहा है, ऐसे समय में संग्रह की कहानियाँ सार्थक हस्तक्षेप दर्ज़ कराती हैं। चर्चा को आगे बढ़ाते हुए समालोचक श्री सियाराम शर्मा ने बताया कि कथाकार कैलाश बनवासी अपने समय को द्वंदात्मक तरीक़े से देखते हैं, इस परास्त होते समय में मुठभेड़ करती कहानियाँ हैं इसलिए वह अलग क़िस्म के जुझारू कथाकार हैं। आसपास के जीवन से उठाई गई कहानियों में आब्जर्वेशण सूक्ष्म और गहरा है, स्थानीय बोध क्षेत्रीयतावादी या अंचलवादी नहीं है। आगे पढ़िये...

हलचल, (215) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 21 मार्च 2010
सृजनगाथा

हेमंत स्मृति कविता सम्मान

मुंबई। किसी पुरस्कार का महत्व उसकी राशि से नहीं बल्कि उसका महत्व पुरस्कार देने वाले और पुरस्कार प्राप्त करने वाले की प्रामाणिकता से तय होता है। चयन और रचनाकर्म की यही प्रामाणिकता किसी पुरस्कार के प्रति समाज में आकर्षण व विश्वास पैदा करती है। हेमंत स्मृति कविता सम्मान व विजय वर्मा कथा सम्मान ऐसे ही महत्वपूर्ण पुरस्कारों की श्रेणी में आते हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (232) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 21 मार्च 2010
सृजनगाथा

डॉ.अभिज्ञात की कहानी-संजय झा की फ़िल्म

कोलकाता । डॉ.अभिज्ञात की कहानी पर फ़िल्म बनाना चाहते हैं युवा फ़िल्मकार संजय झा। डॉ.अभिज्ञात का कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' हाल ही में शिल्पायन प्रकाशन, नयी दिल्ली से आया है। इसके पहले उनके छह कविता संग्रह और दो उपन्यास प्रकाशित हैं। पेशे से पत्रकार डॉ.अभिज्ञात ने बताया कि 'हंस' में प्रकाशित कहानी 'मनुष्य और मत्स्यकन्या' लगभग दस माह पहले मैंने लिखी थी। कुछेक माह तो मैं इस उलझन में रहा कि उसे प्रकाशनार्थ कहाँ भेजूँ। हंस कहानी के प्रकाशन के संदर्भ में और कथाकारों की तरह मेरी भी पहली पसंद रही है, किन्तु मुश्किल यह थी कि कुछ माह पहले ही हंस में मेरी एक कहानी 'कामरेड और चूहे' प्रकाशित हुई थी। मैं जानता हूँ हंस में प्रकाशनार्थ स्वीकृत और विचारार्थ कहानियों की फ़ेहरिश्त बहुत लम्बी होती है। ऐसे में एक और कहानी ज़ल्द प्रकाशित होने का साहस न था। फिर भी उसी में भेजी। और वह ज़ल्द ही प्रकाशित भी हो गयी। विज्ञान की नयी चुनौतियों उसे लेकर उठे नये प्रश्नों के कारण भी शायद इस कहानी जगह दी गयी होगी। आगे पढ़िये...

हलचल, (226) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 20 मार्च 2010
सृजनगाथा

रिश्तों का अँगरेज़ीकरण

जबलपुर के आसपास का सैकड़ों मील का क्षेत्र आधुनिकता की अंधी-दौड़ में तीव्रता से दौड़ तो रहा है मगर अभी भी कुछ देसी रंग-ढंग दिख जाता है, बोली में, रहन-सहन में, खान-पान और विचारों में। ये मुझे आज भी अपनी ओर आकर्षित करते हैं और अपनेपन का अहसास कराते हैं। मगर यहाँ मैं बहुत देर तक उपरोक्त सज्जन के 'मैडम' शब्द से भ्रमित था। इसकी 'मैडम' कौन हो सकती है? समझना मुश्किल था। वो तो उसने घर फ़ोन करके मेरे लिए यह मुश्किल आसान कर दी। जब उसने अपने बेटे से कहा कि माँ से कहना हम गाड़ी भिजवा दिए हैं, अस्पताल से दवा ले आए। सुनकर मेरी नींद पूरी तरह से गायब हो चुकी थी, तो यह है इसकी 'मैडम'! आगे पढ़िये...

ये भी एक दृष्टिकोण, (417) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 20 मार्च 2010
मनोज सिंह

ठहाका मार गुटका

हमारे मित्र डा.मेवाराम गुप्ता ने तो रोते-बिसूरते मानव-समाज का कल्याण करना चाहा था। लेकिन समाज उनके काम को कल्याण नहीं समझा। उनके ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया और उनकी चामत्कारिक दवाई 'ठहाका मार गुटका' को क़ानूनन बंद करा दिया। हमारी सरकार भी बड़ी 'असरकार' है। वह बंद करने और खोलने में बड़ी माहिर है। जब वह बंद करने पर आती है तो बड़े-बड़े धर्मात्माओं को और बड़ी-से-बड़ी कल्याणकारी योजनाओं को चुटकी बजाते बंद कर देती है और जब खोलने पर आती है तो नेताओं-महात्माओं के लिए बैंकों के द्वार ही नहीं, विदेशियों तक के लिए अपने द्वार खोल देती है। अपनी आदत के अनुसार जब सरकार बंद करने पर आई तो उसने जनता के दबाव में उतना नहीं जितना अपने चरित्र पर मँडरा रहे ख़तरे को देखते हुए मेवाराम गुप्ता द्वारा बनाए गए 'ठहाका मार गुटके' पर पूर्ण पाबंदी लगा दी। आगे पढ़िये...

व्यंग्य, (286) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 20 मार्च 2010
डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल

सरोजिनी नायडू पुरस्कार हेतु प्रविष्टियाँ भेजें

महिलाएँ एवं पंचायती राज से संबंधित वो सभी सकारात्मक लेख, जो 31 जुलाई 2009 से 15 जुलाई 2010 के बीच प्रकाशित हो एवं महिला नेतृत्व को बढ़ावा देता हो, आमंत्रित किये जाते हैं अंतिम तिथि - 15 जुलाई 2010, लेखों के लिए कोई शब्द सीमा निर्धारित नहीं। आगे पढ़िये...

हलचल, (456) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 19 मार्च 2010
सृजनगाथा

हिंदी अकादेमी ने पुरस्कारों का दायरा बढ़ाया

नई दिल्ली- हिंदी अकादेमी ने शलाका साहित आठ पुरस्कारों का दायरा बढ़ा दिया हैं। अब इन पुरस्कारों के लिए चयन में पुरस्कार पाने वाले का दिल्ली का होना जरूरी नहीं रह गया है। अकादमी के इस निर्णय से पुरस्कारों के लिए नाम का चयन राष्टीय स्तर पर किया जा सकेगा। आगे पढ़िये...

हलचल, (247) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 19 मार्च 2010
सृजनगाथा

अज्ञेय जन्मशती पर व्याख्यान

जम्मू । हिंदी के महत्वपूर्ण कवि हीरानंद सच्चिदानंद वात्सयायन अज्ञेय की 100वीं जयंती के अवसर पर 6 मार्च को शाश्वती की ओर से अज्ञेय स्मारक व्याख्यान-2010 का आयोजन किया गया। विषय था- बदलते सामाजिक परिवेश में व्यंग्य की भूमिका। आगे पढ़िये...

हलचल, (264) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 19 मार्च 2010
सृजनगाथा

कथाकार मार्कण्डेय नहीं रहे

इलाहाबाद। मुंशी प्रेमचन्द की विरासत को सहेजने व संवारने वाले नई कहानी के पुरोधा प्रख्यात कथाकार मार्कण्डेय का निधन गुरुवार को दिल्ली में हो गया। वे 80 वर्ष के थे। आगे पढ़िये...

हलचल, (283) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 19 मार्च 2010
सृजनगाथा

रविशंकर का ऑस्ट्रेलिया में सम्मान

मेलबोर्न । मेलबोर्न विश्वविद्यालय संगीत और मानवीयता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सितार वादक पंडित रविशंकर को अपना शीर्ष सम्मान डॉक्टरेट डिग्री ऑफ लॉ प्रदान करेगा। आगे पढ़िये...

हलचल, (257) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 19 मार्च 2010
सृजनगाथा

मोइली को मूर्तिदेवी पुरस्कार

नई दिल्ली। विघि एवं न्याय मंत्री एम वीरप्पा मोइली को भारतीय ज्ञानपीठ के प्रतिष्ठित मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके द्वारा कन्नड में लिखे गए महाकाव्य 'श्री रामाणयम महान्वेषणम' के लिए यह पुरस्कार दिया गया। आगे पढ़िये...

हलचल, (303) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 19 मार्च 2010
शिवानन्द द्विवेदी ‘सहर’ की रपट

टेढ़ी नज़र वाला अर्थशास्त्र

सन 2005 में प्रकाशित एक छोटी-सी किताब फ्रीकोनोमिक्स ने अर्थशास्त्र और दुनिया के प्रति लोगों का नज़रिया बदलने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की। न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्ट सेलर सूची में रही स्टीवेन डी. लेविट्ट और स्टीफ़ेन जे. ड्युब नेर कृत इस किताब की दुनिया की 35 भाषाओं में 40 लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं। और अब हाल ही में इस जोड़ी की नई किताब आई है सुपर फ्रीकोनोमिक्स। किताब का शीर्षक ही संकेत कर देता है कि यह पिछली किताब के विचार को ही आगे बढ़ाने का उपक्रम है। चार साल की मेहनत से तैयार यह किताब पहले वाली किताब से अधिक साहसिक, अधिक मज़ेदार और अधिक चौंकाने वाली है। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (254) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 19 मार्च 2010
समीक्षक : डॉ.दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

नकारात्मक राजनीति का प्रतीक बनती मायावती

देश की संसद व विधानसभाओं में महिलाओं की 33 प्रतिशत् भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु भारतीय राजनीति में इन दिनों ज़बरदस्त खींचतान चल रही है। नि:संदेह भरतीय महिलाओं में इस ख़बर को लेकर का$फी उत्साह देखा जा रहा है कि संभवत: भविष्य में देश की संसद व विधानसभाएँ 33 प्रतिशत महिलाओं से सुशोभित होंगी। परंतु जब बिना महिला आरक्षण के ही राजनीति में अपना अहम स्थान बना चुकी बहन मायावती के राजनैतिक तौर-तरीक़ों पर नज़र डालते हैं तब हमें यह सोचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि यदि ख़ुदा न ख़्वासता देश की सभी 33 प्रतिशत् महिला नेत्रियाँ मायाबती को ही अपना आदर्श मानने लगीं तो ऐसे में देश की जनता की उस सोच तथा भावनाओं का क्या होगा जिसके तहत तथा जिसे मद्देनजऱ रखकर महिलाओं को संसद तथा विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की बात की जा रही है। आगे पढ़िये...

राजकाज, (290) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 19 मार्च 2010
निर्मल रानी

राजतंत्र या गणतन्त्र?

नवम्बर 1999 में तत्कालिन प्रधानमन्त्री को जो दिल-दिमाग से राजतन्त्र के पक्ष में रहे हैं, दबाव में आकर जनमत संग्रह करवाना पड़ा । उन्होने इस जनमत संग्रह में ’राजतंत्र या गणतन्त्र?’ सीधा सवाल करने के बदले गणतन्त्र का ऐसा मॉडल रखा जो यहाँ लोकप्रिय नहीं है – परिणाम यह हुआ कि गणतन्त्र का प्रयास असफल होगया । आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (781) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 18 मार्च 2010
हरिहर झा

यहाँ फूल तोड़ना मना है

हँसते-बतियाते दोनों पार्क से बाहर चल दिए थे। शहर से दूर होने के कारण पार्क में संध्या के समय काफ़ी लोग शुद्ध हवा का आनंद लेने आ जाते थे। अल्पना कॉलेज का रास्ता पार्क के ठीक बीच से गुज़रता था। पहली बार र्कॉलेज जाते समय पार्क के बीच वाली सड़क से जब रिक्शा गुज़रा था तो सड़क के दोनों ओर लगे बैगनी फूलों से लदे छतनारी वृक्षों ने अल्पना को मोह लिया । गर्मियों में अमलतास के पीले और गुलमोहर के लाल फूलों से सज्जित सड़क से वह परिचित थी, पर बैजनी फूलों के उस आकर्षक रूप से वह सर्वथा अपरिचित थी। आगे पढ़िये...

कहानी, (396) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 18 मार्च 2010
पुष्पा सक्सेना

शंभूदत्त सती, उषा अग्रवाल, एवं शैलेय पुरस्कृत

भोपाल। ऐतिहासिक उपन्सासकार, कवि एवं चित्रकार स्वर्गीय अम्बिका प्रसाद दिव्य की स्मृति पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है । आगे पढ़िये...

हलचल, (278) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 18 मार्च 2010
जदगीश किंजल्क की रपट

‘लाहौर’ पर प्रतिबंध

इस्लामाबाद। पाकिस्तान में बॉलीवुड फ़िल्म लाहौर के प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी गई है। फ़िल्म के निर्माता विवेक खटकर के मुताबिक, प्रतिबंध लगाने वालों का कहना है कि फ़िल्म में पाकिस्तान का नकारात्मक चित्रण है। हालाँकि खटकर ने कहा कि उनकी फ़िल्म में पाक के बारे में कुछ भी नकारात्मक नहीं है। 19 मार्च को प्रदर्शित होने वाली इस फ़िल्म का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में फिल्माया गया है। आगे पढ़िये...

हलचल, (203) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 18 मार्च 2010
सृजनगाथा

साहित्यकार अमरकांत को व्यास सम्मान

नई दिल्ली। मशहूर हिंदी साहित्यकार अमरकांत को प्रतिष्ठित व्यास सम्मान के लिए चुना गया है। उन्हें उनकी चर्चित कृति ‘इन्हीं हथियारों से’ के लिए यह सम्मान दिया जाएगा। आगे पढ़िये...

हलचल, (268) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 18 मार्च 2010
सृजनगाथा

वैद को पुरस्कार न मिलने पर विवाद

नई दिल्ली। अमेरिका में रहने वाले हिंदी लेखक कृष्ण बलदेव वैद को प्रतिष्ठित शलाका सम्मान नहीं मिलने पर साहित्य जगत में घमासान मचा हुआ है । कहते हैं - इस पुरस्कार के लिए वैद का नामांकन हुआ था, लेकिन उन्हें इस आधार पर यह पुरस्कार देने से वंचित रखा गया, क्योंकि उनकी पुस्तकों में कथित तौर पर अश्लीलता होती हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की अध्यक्षता वाली दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी ने 83 वर्षीय वैद को वर्ष 2008-09 के श्लाका सम्मान के लिए नामांकित किया था। यह दिल्ली सरकार की ओर से दिया जाने वाला सर्वोच्च साहित्य सम्मान है। कांग्रेस के पदाधिकारी पुरूषोत्तम गोयल ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर आपत्ति जताई थी कि वैद की पुस्तकों में अश्लीलता होती है। इसे लेकर साहित्य समुदाय में रोष व्याप्त हो गया है। आगे पढ़िये...

हलचल, (253) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 18 मार्च 2010
सृजनगाथा

कन्फ़ेशन इन्सपेक्टर मातादीन का !

बढ़ती उम्र में मातादीन जी के शरीर के सत्तर प्रतिशत कलपुर्जों ने काम करना बंद कर दिया था। श्वास अन्दर जाती तो बाहर आने में उतना ही वक़्त ले लेती, जितना कोई खटारा कार स्टार्ट होने में। परिवार वाले कई बर उन्हें गंगाजल पिला चुके थे। परंतु, उनकी गुमशुदा श्वास फिर वैसे ही वापस लौट आती थी, जैसे बजट में एक हाथ से छूट देने के बाद, रुपया दूसरे हाथ से सरकार के पास वापस लौट आता है। मातादीन के प्राण, कटी पतंग की तरह न जाने शरीर के किस कोने में अटक गए थे। कष्ट लगातार बढ़ता जाता था पर वे देह से निकलने का नाम ही नहीं लेते थे। मातादीन ने आत्मा पर पापों के भारी बोझ का अनुभव किया। सोचा, कन्फ़ेशन से शायद बिगड़ी बात बन जाए। इसलिए हाथ जोड़कर, उन्होंने बजरंगबली से कहा-हे संकटमोचन, कबूल करता हूँ कि मैं प्रथम श्रेणी का भ्रष्टाचारी हूँ। मेरे पाप कर्मों की सूची उतनी ही लम्बी है, जितनी संसद में दिन-प्रतिदिन बढ़ती हंगामों की संख्या। कमजोरी और कष्ट के कारण मैं प्रमुख पापों को ही कबूल कर पाऊँगा। सो, हे मारूतिनंदन, आप सुनें और मुझे मुक्त करने की कृपा करें। आगे पढ़िये...

व्यंग्य, (278) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 18 मार्च 2010
विनोद शंकर शुक्ल

चाय पीने का मेरा भी मन है

माना कि चाय हमारा राष्ट्रीय पेय है। लोग कश्मीर से कन्याकुमारी तक चाय के अलग-अलग स्वरूप के लुत्फ़ उठाते है। जैसे चाय हमारे लहू में घुलमिल गयी हो, ऐसा नहीं लगता? चाय के बारे में कोई जाति-पाँति का भेद नहीं है और ना अमीरी-ग़रीबी का। मानो चाय तो सर्वस्वीकृत है । चाय के बारे में कई विशेषताए या तुकबंदी भी प्रसिद्द है । कश्मीर में चाय की असली पत्ती के बदले विशेष प्रकार की जड़ीबुटियों के कंदमूल को ही उबाला जाता है । उसमे नमक डालकर नींबू का रस निचोड़ा जाता है । ऐसी चाय को सोल्टी-टी कहते है । सोल्टी-टी के साथ पतली-मीठी पापड जैसी रोटी सुबह के नाश्ते में ली जाती है । जिसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी बताया जाता है कि पहाड़ियों की ऊँचाई के कारण डी-हाईड्रेशन होने का ख़तरा रहता है । उसी कारण नमक और नींबू का मिश्रण किया जाता है । कश्मीर में जो नमक सल्पाई किया जाता है वह गुजरात के सुरेंद्रनगर के पाटडी और खाराघोदा क्षेत्र से है और वह प्रथम श्रेणी का है । जो आमतौर से यहाँ के लोगों के नसीब में कहाँ? आगे पढ़िये...

आलेख, (477) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 18 मार्च 2010
पंकज त्रिवेदी

साहित्य में पुरस्कारों की राजनीति

पुरस्कारों की समाज में प्राचीनकाल से ही एक लम्बी परम्परा रही है। उत्कृष्ट व सृजनात्मक कार्य को सम्मानित-पुरस्कृत करके जहाँ सम्बन्धित व्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाता है, वहीं अन्य लोगों हेतु यह एक नजीर भी पेश करता है। पुरस्कार भावनात्मक, आर्थिक या अन्य किसी भी रूप में हो सकते हैं। सभ्यता के विकास के साथ ही पुरस्कारों के रूप, उद्देश्य व प्रयोजन में भी मात्रात्मक परिवर्तन होते गये। साहित्य में रचनाधर्मिता भी पुरस्कारों से अछूती नहीं है। कभी-कभी तो रचना स्वयं किसी के सम्मान में कही जाती है, यहाँ पर रचना स्वयं में पुरस्कार बन जाती है। आगे पढ़िये...

विचार-वीथी, (274) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 17 मार्च 2010
राम शिव मूर्ति यादव

भाषाओं को बचाने रांची में महासम्मेलन

रांची । भाषाओं को विलुप्त होने से बचाने के लिए ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा ‘ लगातार सक्रिय है । इसी तारतम्य में 16-17 अप्रैल 2010 को रांची में अखड़ा का द्वितीय महासम्मेलन किया जा रहा है । आगे पढ़िये...

हलचल, (254) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 17 मार्च 2010
सृजनगाथा

छोटे कस्बों तक हो लोक संस्कृति का प्रचार

जयपुर । राज्यपाल प्रभा राव ने कहा है कि विभिन्न राज्यों की कला एवं संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के लिए पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ छोटे जिलों एवं कस्बों में भी कार्यक्रमों का आयोजन करें। राज्यपाल शनिवार को उदयपुर स्थित आनंद भवन में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के शासकीय बोर्ड की बैठक की अध्यक्षता कर रहीं थीं। उन्होंने बैठक में केंद्र की वर्ष 2008-2009 के कार्यो की समीक्षा तथा वर्ष 2009-2010 में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अवलोकन दृश्य-श्रव्य माध्यम से किया। आगे पढ़िये...

हलचल, (282) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 17 मार्च 2010
सृजनगाथा

राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार हेतु कृतियाँ आमंत्रित

जयपुर । राजस्थान साहित्य अकादमी की पुरस्कार योजना के अंतर्गत वर्ष 2010-2011 के लिए कृतियाँ आमंत्रित की गई हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (356) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 17 मार्च 2010
सृजनगाथा

ओडिसा की साहित्यिक गतिविधियाँ

भुवनेश्वर ने 'सरग शशि' के 9 वें राज्यस्तरीय वार्षिक सारस्वत समारोह में मुख्य अतिथि व राज्य की प्रख्यात लेखिका पद्मश्री डा. प्रतिभा राय ने बाल साहित्यकार देवराज सामन्तराय द्वारा रचित पुस्तक 'ता धेईकी' का विमोचन किया गया। उधर राऊरकेला के भाषासेवी श्री नारायण पति सम्मानित हुए हैं । किशोर कुमार महान्ति रचित कविता पुस्तक 'धुम्राभ स्वर-' का विमोचन भी पिछले दिनों कटक में किया गया । आगे पढ़िये...

हलचल, (321) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 17 मार्च 2010
डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

केदारनाथ सिंह भी नहीं लेंगे अकादमी सम्म्मान

दिल्ली । हिंदी के स्वनामधन्य कवि श्री केदारनाथ सिंह ने हिंदी अकादमी की ओर से घोषित शलाका सम्‍मान लेने से इनकार कर दिया है। उन्होंने यह निर्णय उन्‍होंने कथाकार कृष्‍ण बलदेव वैद के साथ अकादमी के अपमानजनक बर्ताव की जानकारी मिलने पर किया है। आगे पढ़िये...

हलचल, (248) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 17 मार्च 2010
सृजनगाथा

ग्लोबल गाँव के देवता

नियुक्ति-पत्र देखकर ख़ुश होऊँ कि उदास होऊँ, समझ में नहीं आ रहा। लम्बी बेरोज़गारी, बदहाली, उपेक्षा, अपमान की गाढ़ी काली रात के बाद रौशनी आयी थी। मैं अब नौकरीशुदा था। यह ख़ुशी की बात थी। एक तरफ़ बहुत ही ख़ुशी की बात, मन बल्लियों उछलने को कर रहा था। दूसरी तरफ़ जिस स्कूल में पोस्टिंग हुई थी उसे देखकर दिल डूबा जा रहा था। बरवे ज़िला ही हमारे घर से ढाई-तीन सौ किलोमीटर दूर था। उस पर प्रखंड कोयलबीघा का भौंरापाट। पहाड़ के ऊपर, जंगलों के बीच वह आवासीय विद्यालय। पीटीजी गर्ल्ज रेज़िडेंशियल स्कूल। प्रिमिटिव ट्राइव्स, आदिम जनजाति परिवार की बच्चियों के लिए आवासीय विद्यालय में विज्ञान-शिक्षक। क्या पोस्टिंग थी ! ख़ुश होने के बदले माथा पीटने का मन होने लगा। मेरे ही साथ ऐसा क्यों होता है ? माँ पिछली रोटी खिलाती रही है शायद। आगे पढ़िये...

पुस्तकांश, (311) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 17 मार्च 2010
उपन्यासकार : रणेन्द्र

रज़ा अब लौटेंगे स्वदेश

नई दिल्ली। मशहूर पेंटर एम.एफ.हुसैन भले ही वृद्धावस्था में कतर की नागरिकता ले ली हो, लेकिन एक अन्य विख्यात पेंटर सैयद हैदर रज़ा अपना शेष जीवन भारत में बिताने की ख़्वाहिश लेकर साल के आख़िर में स्वदेश लौटने की तैयारी में हैं। बीते छह दशक से वह फ्रांस में रह रहे हैं। वह दुनिया के सबसे महँगे पेंटरों में से एक हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (245) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 17 मार्च 2010
सृजनगाथा

भावों का पानी
कविता, (1872) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 16 मार्च 2010,
आशा पाण्डे

तितलियों के देश में....!

इन्सान को जब जीवन जीने की समझ मिलती है तब कच्चे हीरे जैसी होती है । हीरे को तराशने के बाद ही उसके मूल्य की परख हो सकती है । उसे बाज़ार में रखा जाए तब ही जौहरी की नज़र उन पर होती है. समझ पाने के बावजूद इन्सान आख़िर बच्चा ही तो होता है न? उसके बचपन से ही उसे तराशने का कार्य शुरू करना चाहिए । फिर देखो, समाज के बाज़ार में उस हीरे का मूल्य अपने आप बढ़ने लगेगा । बच्चे में जो शक्ति पहली नज़र में ही दिखती है वह आखरी नहीं होती । जो नहीं दिखती उसका शून्यावकाश भी तो नहीं होता! इस बात को स्पष्ट रूप से समजने में हमारी ग़लती हो सकती है, उस बात को कैसे नकार सकेंगे? कभी-कभी बच्चे की बाह्य-भीतरी शक्ति के आसपास ही हम होतें है । जो हमारे छीछौलेपन को प्रकट करके दंभ को ललकारता है । किसी व्यक्ति के सन्दर्भ में हम विविध प्रकार के अभिप्राय देने का हक़ प्राप्त कर लेतें है । ऐसा क्यों? आगे पढ़िये...

आलेख, (364) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 16 मार्च 2010
पंकज त्रिवेदी

कृष्ण कुमार यादव को अक्षर शिल्पी सम्मान- 2010

गुना। म.प्र. के प्रतिष्ठित राजेश्वरी प्रकाशन, गुना ने युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को उनके विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु अक्षर शिल्पी सम्मान-2010 से विभूषित किया है। आगे पढ़िये...

हलचल, (295) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 16 मार्च 2010
गोवर्धन यादव की रपट

नहीं रहे मराठी कवि विंदा कारंदीकर

मुंबई। जाने-माने मराठी कवि गोविंद विनायक करंदीकर का रविवार को संक्षिप्त बीमारी के बाद निधन हो गया। 23 अगस्त 1918 को जन्मे विंदा ने मुंबई के भाभा अस्पताल में आख़िरी साँसे लीं। 92 वर्षीय श्री करंदीकर के परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री है। वह विंदा करंदीकर के नाम से विख्यात थे। आगे पढ़िये...

हलचल, (282) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 15 मार्च 2010
सृजनगाथा

माँ का पैर
कविता, (349) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 15 मार्च 2010,
शिवानन्द द्विवेदी, ‘सहर’

अशोक कुमार पांडेय की तीन कविताएँ
कविता, (2909) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 15 मार्च 2010,
अशोक कुमार पांडेय

अखंडता के लिए विभाजन ज़रूरी !

हमारे देश के नेताओं की देशभक्ति देखने लायक है। उन्होंने पहले आज़ादी की लड़ाई लड़ी। ख़ूब लड़ी। जब देखा सत्ता मिलने ही वाली है और उसके दो दावेदार हो गए हैं तो अपनी-अपनी सत्ता बचाने का एकमात्र रास्ता उन्हें यही दिखाई दिया कि विभाजन कर लो। एक म्यान में दो तलवारें तो रह नहीं सकतीं। उन नेताओं के हाथ में धर्म का अस्त्र भी था। काम और आसान हो गया। विभाजन हुआ और आज़ादी के सिपाहियों की राजनीति चल निकली। अब उसका ठीकरा फोड़ना था। सारे नेताओं को एक फ़कीर दिखाई दिया। उस पर ठीकरा क्या फोड़ा, उसे गोली से छलनी कर दिया। आगे पढ़िये...

व्यंग्य, (481) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 15 मार्च 2010
डॉ. पुष्पेंद्र दुबे

सुरक्षा का पाठ

राघव अपनी अमरीकी बीवी स्टेला और दो बच्चों - पॉल और जिनि के साथ भारत लौट रहा है, सुनकर मेरा कलेजा चौड़ा हो गया । आख़िर अपना देश खींचता तो है ही । मेरा बेटा राघव तो अमरीका जाने के बाद और भी भारतीय हो गया था । भारत में रहते चाहे उसने कभी 15 अगस्त और 26 जनवरी के कार्यक्रमों में भाग न लिया हो पर विदेश जाते ही उसने अपनी कम्पनी के भारतीय अधिकारियों को इकट्ठा कर वह इन दिनों के उपलक्ष्य में देशप्रेम के कुछ कार्यक्रम करने लगा था जिसके लिए वह मुझसे फ़ोन पर देशप्रेम की कविताएँ और राष्ट्रªप्रेम के गीत पूछता और नोट करता । कार्यक्रम की शुरुआत का भाषण भी रोमन अक्षरों में देवनागरी लिखकर मैं ई मेल से उसे भेजती । आगे पढ़िये...

लघुकथा, (402) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 15 मार्च 2010
सुधा अरोड़ा

जेहादी लड़ाकों के ग़ैर इस्लामी कारनामे

जेहादी आतंकवाद की जड़ें वहीं हैं जिनका ज़िक्र बार-बार होता आ रहा है और इतिहास में यह घटना एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो चुकी है। अर्थात् सोवियत संघ की घुसपैठ के विरुद्ध जब अफ़ग़ानी लड़ाकुओं ने स्वयं को तैयार किया उस समय इन लड़ाकुओं ने जिन्हें तालिबानी लड़ाकों के नाम से जाना गया, सोवियत संघ के विरुद्ध ख़ुदा की राह मे जेहाद घोषित किया। इस कथित जेहादी युद्ध में जहाँ अशिक्षित अफ़ग़ानी मुसलमान सोवियत संघ के विरुद्ध एकजुट हुए वहीं इसी दौरान अमेरिका ने भी सोवियत संघ के विरुद्ध तालिबानों को न केवल सशस्त्र सहायता दी तथा अफ़गानिस्तान में इन लड़ाकुओं के प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने में भी उनकी पूरी मदद की बल्कि उन्हें नैतिक समर्थन देकर उनकी हौसला अफ़ज़ाई भी की।
आगे पढ़िये...

राजकाज, (326) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 14 मार्च 2010
तनवीर जाफ़री

पुरुषोत्तम अग्रवाल और पंकज सिंह ने ठुकराया अकादमी सम्मान

दिल्ली । हिन्दी अकादमी के पुरस्कारों को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर गहरा गया है। ख़बर है कि हिन्दी के जाने माने कवि पंकज सिंह ने अकादमी द्वारा उन्हें दिया गया 2008-09 का साहित्यकार सम्मान लेने से मना कर दिया है। इसके साथ ही आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने भी अकादमी सम्मान को ठुकरा दिया है । पंकज सिंह का मानना है कि 'वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद को वर्ष 2008-09 का शलाका सम्मान जो देने का निर्णय लिया गया था, वह राजनीतिक दवाबों के चलते निरस्त कर दिया गया। इतना ही नहीं इस वर्ष में भी किसी लेखक को शलाका सम्मान नहीं दिया गया। उनका मानना है कि निर्णायक समिति में शामिल लेखकों और बुद्धिजीवी की अपनी गरिमा और मर्यादा होती है जिसे ठेस पहुँचाने का अधिकार किसी को नहीं है। आगे पढ़िये...

हलचल, (353) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 14 मार्च 2010
सृजनगाथा

प्रदीप कांत की तीन प्रेम कविताएँ
कविता, (501) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 14 फरवरी 2010,
प्रदीप कांत

शरणार्थी

दूरस्थ गाँव से आए ये अजनबी नई राजधानी से होते हुए चले जा रहे थे, भले ही उनकी अपनी ज़मीनें यहाँ से, इसी गली से जिस पर वे चले जा रहे थे, कुछ ही सैंकड़ों मील दूर थीं । फिर भी इनके लिए बहुत दूर थीं। उनकी आँखें उन लोगों की आँखें थीं जिन्हें किसी अनुत्तरदाई शक्ति ने उनकी हमेशा से जानी पहचानी उस दुनिया से अचानक अलग कर दिया हो जिसमें वे स्वयं को अब तक सुरक्षित अनुभव करते आए हों । वे जिनके पाँवों अब तक केवल गाँव के रास्तों और खेतों पर चलने के ही अभ्यस्त थे, अब नई राजधानी की भव्य सड़क के एक तरफ़ बनी कंकरीट की नई पटरी पर चले जा रहे थे। भले ही बाज़ार की इस सड़क पर ऐसी चीज़ों की भरमार थी जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखी नहीं थीं, और यहाँ तो वाहन भी थे जिनके बारे में उन्होंने कभी सुना भी नहीं था, फिर भी वे कुछ भी देखे बिना चले जा रहे थे, मानो स्वप्न में चले जा रहे हों। आगे पढ़िये...

भाषांतर, (311) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 13 मार्च 2010
मूल : पर्ल. एस. बक
अनुवाद : द्विजेन्द्र ‘द्विज’

महिलाओं की उपस्थिति : एक विहंगावलोकन

स्त्रियों की समस्या और स्थान को लेकर बातें तो बहुत सी है जो की जा सके क्योंकि दोनों को लेकर माहौल तो भड़का हुआ है।स्त्री-पुरुष जैसे सनातन संबंध के बीच जीवन एवं साहित्य में भी कँटीली रेखाएँ खींची जा रही है। जैसे कि सारे झगड़े की जड़ इन दोनों के बीच का शोषक-शोषित का रिश्ता हो। इस बात को हम भूल रहे हैं कि पुरुष,एक पुरुष ही नहीं परंपरा में व्यस्त बहुत से आयामोंवाला एक प्रतीक है। संबंधो में परंपरा का मुखडा़ उसी से दिखाई देता है। आगे पढ़िये...

आलेख, (328) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 13 मार्च 2010
डॉ. नैना डेलीवाला

आधुनिक युग में क्वालिटी मनुष्य

क्वालिटी अर्थात गुणवत्ता। यह शब्द आते ही उत्कृष्टता का स्वर उभरता है। उच्चस्तरीय कार्य या वस्तु। यहाँ प्रयोग में आने वाले माल की शुद्धता भी जेहन में उभरती है। वस्तु के सही नाप-तोल का होना प्रमुख पैमाना बन जाता है। ठीक इसी तरह विश्वसनीयता भी यहाँ जुड़ जाती है। तकनीकी व सेवा के क्षेत्र में विशेष तौर पर सुरक्षा और वातावरण में सकारात्मकता भी अपेक्षित नज़र आती है। मगर क्या उपरोक्त भावना तक ही क्वालिटी के क्षेत्र को सीमित किया जाना चाहिए? शायद नहीं। क्या क्वालिटी शब्द का संदर्भ सिर्फ़ मशीन, उत्पादन और बाज़ार के माल तक ही सीमित है? नहीं। क्या क्वालिटी की विचारधारा को विदेशी मान लिया जाना चाहिए? नहीं। यह तो जीवन के हर क्षेत्र में है। आदिकाल से। कह सकते हैं कि क्वालिटी जीवन जीना हर एक जीवित मानव का सपना और उद्देश्य होता है। और इसी की कोशिश में वो तमाम उम्र निरंतर प्रयासरत रहता है। आगे पढ़िये...

आलेख, (826) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 12 मार्च 2010
मनोज सिंह

विमोचन

देवीदयाल जीकी रोज़मर्रा की दिनचर्या मुझसे जान-पहचान के बाद और नियमित हो गयी थी अब तो वे मुझसे पहले मेरे दफ़्तर आ जाते और बाहर प्रतीक्षा करते मिलते। दफ़्तर आते ही खींसे निपोर कर मुझशे पूछते, अर........आप आ गये ? मैं ख़ुद को गिल्टी कॉसस फ़ील करता, कहीं मैं लेट तो नहीं हो गया ? कोई बात नहीं 5-10 मिनट देरी चलती है। देवीदयाल जी से सुनकर मुझ लगता मानो मेरा बास नसीहत दे रहा हो। आगे पढ़िये...

कहानी, (336) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 12 मार्च 2010
उमेश द्विवेदी

लिट्ररी क्लब में श्री अशोक वाजपेयी का काव्यपाठ

भिलाई । लिट्ररी क्लब भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा सुविख्यात कवि व समालोचक तथा राष्ट्रीय ललित कला अकादमी के अध्यक्ष श्री अशोक वाजपेयी का काव्यपाठ समारोह 16 फरवरी को क्लब के अध्यक्ष व राजभाषा प्रमुख, भिलाई इस्पात संयंत्र श्री अशोक सिंघई के निवास सिंघई विला में सम्पन्न हुआ। इस गरिमामय आयोजन की अध्यक्षता गाँधीवादी लेखक श्री कनक तिवारी ने की। श्री अशोक सिंघई ने महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदान के लिये श्री अशोक वाजपेयी को भिलाई इस्पात संयंत्र की ओर से सम्मानस्वरूप स्वर्ण जयंती पोस्टल आल्बम भेंट किया। आगे पढ़िये...

हलचल, (291) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 12 मार्च 2010
अशोक सिंघई

कृत्या का पाँचवा समारोह

मैसूर । उन्नीसवीं सदी के एक दार्शनिक ने कहा था कि समय के साथ कविता सर्वाधिक प्रासंगिक और कवि सर्वथा अप्रासंगिक होता जाएगा। इस कथन पर अलग अलग राय हो सकती है, पर कविता और कवियों का जुटना अपने आप में एक जीवंत कविता का रचाव है, यह सिद्ध हुआ कृत्या 2010 यानी कृत्या के पाँचवें अंतरराष्ट्रीय काव्योत्सव में। जो इस बार तीन से पाँच फरवरी का मैसूर में केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान के परिसर में आयोजित हुआ। आयोजन में कृत्या के सहयोगी थे- केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, साहित्य अकादमी, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् आदि। आगे पढ़िये...

हलचल, (327) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 12 मार्च 2010
डॉ. दुष्यंत

डॉ.अभिज्ञात की तीन कविताएँ
कविता, (412) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 12 मार्च 2010,
डॉ.अभिज्ञात

कविता की जातीयता

'जातीय' यहाँ 'राष्ट्रीय' का पर्याय है, परंतु यह राष्ट्र ‘नेशन’ नहीं है। जातीय या राष्ट्रीय का गहरा सांस्कृतिक अर्थ है, जो भौगोलिक या राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक है। इस ग्रन्थ की लेखिका डॉ. कविता वाचक्नवी ने राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लिखा है- "जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं, उसके तत्त्वों का अन्वेषण भारतीय जातीयता की व्याख्या करने में समर्थ होगा।" आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (344) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 12 मार्च 2010
समीक्षक : डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय

दलित लेखन का सौंदर्यशास्त्र

दलित एक समाज वर्ग विशेष को अभिहित करने के हेतु प्रयुक्त शब्द है। वह एक व्यंजनात्मक शब्द है। गाँधी द्वारा शब्द हरिजन में उस वर्ग को कृत्रिम ढंग से ऊपर उठाने का प्रयास ही अधिक दिखता है। हरिजन एक महिमामंडित शब्द है। दलित शब्द जिस विशेष के लिय प्रयुक्त हैं उसकी वास्तविकता को प्रकटित करने में यह सक्षम है। मराठी भाषा में दलित आन्दोलन का ज दौर चला तब से यह शब्द स्वीकृत और प्रयुक्त है। आगे पढ़िये...

मूल्याँकन, (342) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 12 मार्च 2010
प्रो. ए. अरविदांक्षन

दिल्‍ली पूछे चार सवाल

अब दिल्‍ली जाने से बहुत डरता हूँ। दिल्‍ली से नहीं, दिल्‍ली के इन सवालों से। लेखक बनने और सचमुच कुछ कर दिखाने के बाद भी मैं दिल्‍ली में जा कर तय नहीं कर पाता कि मैं किस मठ का हूँ या किस दरबार में जा कर मुझे सलाम करना चाहिये। कइर् बार सोचता हूँ कि लेखक भी हूँ या नहीं। वजह वही है कि दिल्‍ली हर जगह और हर शिवाले में मुझसे यही चार सवाल पूछती है और मेरे ही जवाबों से ये कह कर मेरी छुट्टी कर देती है। आगे पढ़िये...

आलेख, (347) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 12 मार्च 2010
सूरज प्रकाश

महिला सशक्तिकरण: कितनी हक़ीक़त कितना फ़साना

महिला आरक्षण विधेयक से जुड़ी तमाम और ऐसी सच्चाईयाँ हैं जिन्हें हम नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते। हालांकि महिलाओं द्वारा आमतौर पर इस विषय पर ख़ुशी का इज़हार किया जा रहा है। आरक्षण की ख़बर ने देश की अधिकांश महिलाओं में जोश भर दिया है। परंतु इन्हीं में कुछ शिक्षित व सुधी महिलाएँ ऐसी भी हैं जो महिला आरक्षण को ग़ैर ज़रूरी और शोशेबाज़ी मात्र बता रही हैं। ऐसी महिलाओं का तर्क है कि महिला सशक्तिकरण का उपाय मात्र आरक्षण ही नहीं है। इसके अतिरिक्त और भी तमाम उपाय ऐसे हो सकते हैं जिनसे कि महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष लाया जा सकता है। आगे पढ़िये...

राजकाज, (453) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 11 मार्च 2010
निर्मल रानी

संजय जनागल की लघुकथाएँ
लघुकथा, (384) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 11 मार्च 2010,
संजय जनागल

लोहिया के बिना साहित्य का इतिहास अधूरा - नामवर

नई दिल्ली। डॉ. राम मनोहर लोहिया को गांधी के बाद पाखंड रहित दूसरा राजनेता बताते हुए आलोचक डा. नामवर सिंह ने बृहस्पतिवार को कहा कि लोहिया के जिक्र के बिना आधुनिक भारतीय साहित्य का इतिहास अधूरा ही रह जाएगा। साहित्य अकादमी द्वारा डा. राम मनोहर लोहिया की जन्मशती पर आयोजित त्रिदिवसीय संगोष्ठी में डा. नामवर सिंह ने कहा, मैं लोहियावादी नहीं हूँ, लेकिन वह मुझे आकर्षित करते थे। मुझे कई बार लोहिया को सुनने का मौका मिला है। गांधी के बाद लोहिया दूसरे राजनेता थे, जो पाखंड रहित थे। यहाँ तक कि नेहरू में भी पाखंड था। उन्होंने कहा, राजनीति में व्यक्ति के कई चेहरे होते हैं और ऐसा लगता है कि वह मुखौटे लगाए हुए हैं, जबकि लोहिया पारदर्शी व्यक्तित्व के धनी थे। लोहिया का गांधी पर लिखा गया लंबा लेख उनके व्यक्तित्व को उजागर करता है। आगे पढ़िये...

हलचल, (346) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 11 मार्च 2010
सृजनगाथा

अंतिम पड़ाव तक

पिछले दो हफ़्तों से कोहरे की चादर ने डेनमार्क के शहर नोरेब्रो को अपनी जकड़ में ले रखा था, लेकिन यहाँ के लिए यह कोई अनोखी या नई बात नहीं थी।बर्फीली सर्द हवायें तो यहाँ के लम्बे ठंडे मौसम की मानो शान होती हैं, लेकिन जैसे ही किसी दिन कोहरे की चादर को चीरकर सूरज अपनी चमक को धरती पर बिखेर देता है तो इन्सान ही नहीं, वनस्पतियाँ भी मानों उसकी रोशनी के स्वागत में पलक-पाँवड़े बिछाये तैयार रहती हैं। उजाले की किरणें चारों ओर अपनी छठा बिखेरती हैं। पार्क और दूसरे सार्वजनिक स्थल युवाओं की मदहोश साँसों और बच्चों की किलकारियों से गुँजायमान हो जाते हैं। वृद्ध भी वहाँ के उन्मुक्त वातावरण में जोश से भर जाते हैं। यहाँ तक कि, चिकनी साफ़ सड़कें भी बेकार और बेमक़सद की आवा-जाही की चहल-पहल से भर जाती हैं। आगे पढ़िये...

कहानी, (305) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 11 मार्च 2010
चाँद शुक्ला "हदियाबादी"

साझी संस्कृति की संवाहक मुस्लिम महिलाएँ

शबनम के काज़ी बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं। अपने काज़ी पिता की सातवीं बेटी शबनम ने पिता के लकवाग्रस्त हो जाने पर निकाह कराने में उनकी मदद करना आरम्भ किया। शरीयत का अच्छी तरह इल्म हो जाने पर पिता जी ने उसे नायब काज़ी बना दिया। वर्ष 2003 में पिता जी की मौत के बाद शबनम ने अपने पैरों पर खड़े होने हेतु काज़ी बनने का रास्ता चुना और संयोग से काज़ी के रूप में उनका पंजीयन भी हो गया। पर काज़ी बनने के बाद शबनम की असली दिक्कतें आरम्भ हुईं। अंततः धमकियों और मुक़दमों के बीच शबनम अपने को काज़ी पद के योग्य साबित करने में सफल हुयीं। आगे पढ़िये...

आलेख, (366) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 11 मार्च 2010
आकांक्षा यादव

दो कविताएँ
कविता, (387) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 10 मार्च 2010,
सुदर्शन प्रियदर्शिनी

कमलेश्वर ने फ़िल्मों को दोयम दर्जे की कला नहीं माना - अरविंद

साहित्य से जुड़ा ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिसमें अलग हट कर कुछ नया करने का कमलेश्वर जी ने प्रयास न किया हो। उन्हें हमेशा नयी ज़मीन की तलाश रहती थी। नयी कहानी का आंदोलन इसी सब की भूमिका थी। आज़ादी के बाद औद्योगिकीकरण के चलते बड़े शहरों की तरफ़ लोगों का पलायन शुरू हुआ। इससे आपसी रिश्तों को लेकर ज़बरदस्त मोहभंग हुआ। हिंदी कहानी को भी समय के साथ चलना था। कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव ने समय को पहचाना और नयी कहानी आंदोलन का सूत्रपात किया। आगे पढ़िये...

कथोपकथन, (322) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 10 मार्च 2010
मधु अरोड़ा

आप सिर्फ़ अपनी भाषा में जीवित नहीं रह सकते

भाषा की जरूरत के हेतु आर्थिक हैं, इसीलिए दुर्निवार हैं। रेणु विकास के लाभ चाहती है और कार्यकारी अधिकारी कमाई चाहता है। दोनों एक-दूसरे से अनजाने भाषा के उपयोग और उपभोग बदलने के कारण दूसरी भाषाएँ सीख रहे हैं। यही वैश्वीकरण की दुर्निवार प्रक्रिया है। यह कहती है कि आप सिर्फ़ अपनी भाषा में जीवित नहीं रह सकते । अपनी आर्थिक स्थिति को बचाने के लिए अपनी भाषा के साथ आपको दूसरी भाषा में जाना हो सकता है । यह द्वय भाषिकता बहु भाषिकता की प्रक्रिया है । ये दोनों उदाहरण भाषा को बनाने वाले हैं । आगे पढ़िये...

आलेख, (368) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 10 मार्च 2010
सुधीश पचौरी

मोहन राणा की चार कविताएँ
कविता, (632) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 10 मार्च 2010,
मोहन राणा

डॉ.महेंद्रभटनागर 'साहित्यवाचस्पति' से अलंकृत

हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के प्रधानमंत्री विभूति मिश्र की सूचना के अनुसार, अपने जगन्नाथपुरी-अधिवेशन (२३ फ़रवरी २०१०) में डा. महेंद्रभटनागर को अपने सर्वोच्च अलंकरण 'साहित्यवाचस्पति' से अलंकृत किया है। उल्लेखनीय है कि हिन्दी के प्रगतिवादी आन्दोलन के शीर्ष कवियों में शुमार डा. महेंद्रभटनागर की रचनाओं के अनुवाद केवल भारतीय भाषाओं में ही नहीं; विश्व-भाषाओं में भी हुए हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (423) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 10 मार्च 2010
सृजनगाथा

देवमणि पांडेय के दो गीत
छंद, (428) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 10 मार्च 2010,
देवमणि पांडेय

बीकानेर में व्याख्यानमाला आयोजित

राजस्थान साहित्य अकादमी,उदयपुर के सौजन्य से होटल मरूधर हैरीटेज़ के विनायक सभागार में आयोजित राजस्थान का समकालीन हिन्दी साहित्य और सामाजिक सरोकार विषयक व्याख्यान देते हुए डॉ. व्यास ने कहा कि साहित्य को स्वायत्तता तो होनी चाहिए परन्तु यह समाज सापेक्ष होनी आवश्यक है । समकालीन हिन्दी कविता की बात करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें लोकतांत्रिक चेतना,शिल्प के प्रति अनाग्रह,केन्द्रीय संवेदना,शिल्प और सौंदर्य के कई रूपाकारों के हमें दर्शन होते हैं । समकालीन कविता कहती अधिक है पर बोलती कम है । आगे पढ़िये...

हलचल, (332) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 10 मार्च 2010
सृजनगाथा

अज्ञेय की जन्म शताब्दी वर्ष का शुभांरभ

दिल्ली । आधुनिक हिन्दी साहित्य एवं पत्रकारिता को नई दिशा देने वाले यशस्वी लेखक सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की जन्मशती रविवार, 7 मार्च से शुरू हो चुकी है। हिन्दी के कई लेखकों ने उनकी स्मृति में डाक टिकट निकालने तथा दूरदर्शन एवं फ़िल्म डिविजन से उन पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने की माँग की है। अज्ञेय जन्मशती के आयोजन के सूत्रधार एवं हिन्दी के प्रसिद्ध कवि तथा संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने बताया कि कल से अज्ञेय की जन्म शताब्दी शुरू हो रही है। इस मौक़े पर हमने उनकी आवाज़ में उनकी कविताओं की रिकार्डिंग सुनवाने का एक कार्यक्रम का आयोजन किया है। आगे पढ़िये...

हलचल, (348) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 9 मार्च 2010
सृजनगाथा

हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कारों की घोषणा

नई दिल्ली। हिंदी अकादमी दिल्ली ने इस वर्ष (2009-10) और पिछले वर्ष (2008-09) के पुरस्कारों की घोषणा सोमवार को कर दी। यह पुरस्कार 23 मार्च को श्रीराम सेंटर में पुरस्कार वितरण समारोह में दी जाएगी। अकादमी के सचिव प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव परिचयदास ने बताया कि इस वर्ष प्रो. केदारनाथ सिंह को शलाका पुरस्कार (दो लाख) की घोषणा की जा चुकी है। नए नियमों के अनुसार अन्य सात पुरस्कारों की घोषणा की जा रही है। आगे पढ़िये...

हलचल, (393) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 9 मार्च 2010
सृजनगाथा

कथाकार मार्कण्डेय को दोबारा कैंसर

नई दिल्ली । वरिष्ठ साहित्यकार, जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में एक और कथा के संपादक मार्कण्डेय दोबारा कैंसर से ग्रस्त हो गए हैं। उनका इलाज राजीव गांधी कैंसर अस्पताल में इलाज चल रहा है। प्रेमचंद के बाद हिंदी कहानियों में ग्रामीण जीवन को पुनर्स्थापित करने वालों में मार्कण्डेय अग्रगण्य हैं। आम आदमी के जीवन में साहित्य में उन्होंने महत्वपूर्ण जगह दी है। आगे पढ़िये...

हलचल, (377) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 9 मार्च 2010
सृजनगाथा

केदारनाथ सिंह को शलाका सम्मान

दिल्ली । तीसरे सप्तक के कवि, आलोचक और चिंतक प्रोफ़ेसर केदारनाथ सिंह को प्रतिष्ठित शलाका सम्मान देने की घोषणा की गई है। हिंदी अकादमी कविता में नए बिम्ब रचने वाले केदारनाथ सिंह को इस सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ने जा रही है। आगे पढ़िये...

हलचल, (260) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 9 मार्च 2010
सृजनगाथा

कितनी सार्थक पाकिस्तान से बातचीत की प्रक्रिया ?

नवम्बर 2008  के मुम्बई हमले के बाद भारत-पाक के रिश्तों में जो खटास उत्पन्न हुआ था, उस कारण दोनों देशों के बीच वार्ताओं का सिलसिला पूरी तरह से बंद था और भारत द्वारा बार-बार स्पष्ट रूप से यही कहा गया था कि जब तक पाकिस्तान मुम्बई हमलों के ज़िम्मेदार पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी गिरोहों के नेताओं को सज़ा नहीं देता तथा अपने वहाँ फैले भारत विरोधी आतंकी नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने के लिए ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक दोनों देशों के बीच कोई बातचीत शुरू नहीं हो सकती लेकिन अति उत्साह से सराबोर भारत सरकार द्वारा अपने ही बयानों से पलटी मारते हुए पाकिस्तान की निरन्तर वादाख़िलाफ़ी के बावजूद पिछले दिनों जिस प्रकार पाकिस्तान के साथ बातचीत की पेशकश की गई, उससे हर किसी का हतप्रभ होना स्वाभाविक ही है। आगे पढ़िये...

राजकाज, (297) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 10 मार्च 2010
योगेश कुमार गोयल

मरीचिका

वह मन ही मन घबरा रही थी कि वह गोपाल जी से मिल भी पाएगी या नहीं या वह उसे बाहर से ही लौट जाने को कह देंगे। कुछ देर बाद दरबान  जब वापिस आया तो उसने न सिर्फ़ अन्दर आने को कहा बल्कि इज्ज़त के साथ बैठक-कक्ष में ले गया । जबकि आफ़िस के बरामदे में मिलने वाले लोगों का तांता लगा हुआ था । वह उस बैठक-कक्ष में बैठकर तरह -तरह के विचारों के उधेड़-बुन में खो गई । वह मन ही मन अत्यंत ख़ुश हो रही थी कि गोपाल जी ने उसे विशिष्ट स्थान प्रदान कर अनुग्रहित किया है। जहाँ उनको मिलने के लिए आम- लोगों को  लम्बी-कतार में खड़े होकर दीर्घ प्रतीक्षा करनी पड़ती है, वहाँ उसे न तो किसी भी प्रकार का इंतज़ार करना पड़ा बल्कि उसे बैठक-कक्ष में जाने का इशारा कर आम-लोगों की नज़रों में ऊँचा उठा दिया। वह मन ही मन अपने आप को गौरवान्वित अनुभव कर रही थी कि अवश्य विधायक-साहब कहीं न कहीं उसके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के किसी न किसी पहलु से प्रभावित हुए है । आगे पढ़िये...

कहानी, (785) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 9 मार्च 2010
अलका सैनी

पुष्प जीवंत है

प्रकृति का कोमलतम उपादान पुष्प है । पुष्प रंग हैं । पुष्प सुगन्ध हैं । पुष्प सुन्दर हैं। पुष्प भावनाओं का वाहक है । पुष्प प्रतीक हैं । पुष्प प्रेम हैं। प्रकृति का अन्यतम अवदान पुष्प हैं । पुष्प जीवन्त हैं । पुष्प कारक हैं । पुष्प संदेश हैं, संदेश वाहक भी है । भावनाओं के खिलने, सतह पर आने, अभिव्यक्त होने का आधार पुष्प ही है । भक्त और भगवान के बीच का सेतु है पुष्प । वन्दना का कारक है । प्रार्थना का माध्यम है । प्रेम का उद्रेक है । भगवत आराधन में समर्पण का मुख्य उपादान पुष्प ही है । पुष्प अपने पाँच गुणों, सौंदर्य, रंग, कोमलता, गंध, और पराग, के साथ क्रियारुप है । आनन्द का पोषक है । यह आकर्षण का जनक है । अनुराग का प्रवर्तक है, और प्रकृति की सुन्दर अभिव्यन्जना है । यह व्याकरण में विशेषण है । काव्य में प्रवाह है । गीत में लय है, राग है । आगे पढ़िये...

ललित निबंध, (416) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 9 मार्च 2010
सुरेश कुमार पंडा

कहीं हम चौथे इडियट तो नहीं?

फ़िल्म 'थ्री इडियट्स' की अच्छी चर्चा हो रही है। इंजीनियरिंग कालेज का छात्र जीवन, युवा वर्ग का संदर्भ व शिक्षानीति का विरोध, इस तरह के कई सारे मुद्दे सुनाई पड़ रहे थे। प्रचार का यही तो कमाल है कि उत्सुकतावश मैंने भी यह फ़िल्म देखी। सपरिवार। और फिर प्रारंभ से ही अपने ज़माने के इंजीनियरिंग कालेज को प्रतीकात्मक रूप से ही सही, ढूँढ़ता रहा। कोई ऐसा क़िस्सा, जिसे मैं अपने हॉस्टल जीवन से जोड़ सकूँ, जब अंत तक मुझे नहीं मिला तो हताशा हुई थी। आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (860) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 9 मार्च 2010
मनोज सिंह

इंसानी रिश्तों को शर्मसार करते पंचायती फ़ैसले

हरियाणा में जातिगत पंचायतें समाज की भलाई या सामाजिक समस्याओं के निवारण के कार्यों के लिए नहीं बल्कि समाज को बाँटने, बसे-बसाये घरों को तोड़ने और गोत्र के नाम पर मौत के फ़रमान सुनाने जैसे बर्बर एवं घृणित कार्यों के लिए अधिक चर्चा में रही हैं। अब एक बार फिर ये पंचायतें अपने तानाशाही एवं अमानवीय रवैये और तालिबानी फ़तवों को लेकर चर्चा में हैं। बीते दिनों सिर्फ़ एक सप्ताह के अंदर ही एक-एक कर ऐसे ही कई मामले सामने आए, जिन्होंने तालिबानी हुक़ूमत की यादें ताज़ा कराने में कोई क़सर नहीं छोड़ी। आगे पढ़िये...

राजकाज, (394) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 9 मार्च 2010
योगेश कुमार गोयल

चीड़े की पाठशाला

अपने गाँव के प्राइमीरी इस्कूल के चीड़े ड्राइंग मास्टर जी सर का दसवीं के जाली सर्टिफ़िकेट पर नाम केएस है। जब उनको इस्कूल के इकलौते पक्के मास्टर जी ने अपनी जगह ठेके पर पढ़ाने के लिए तैनात कर ख़ुद होलसेल का काम शुरू किया तो वे इस्कूल में केएस से खेस हो गए। कुछ दिन तक बच्चे उन्हें केएस ड्राइंग मास्टर जी सर भी कहते रहे पर जैसे जैसे वे घिसते रहे उनका नाम घिस कर केएस से खेस और अब चीड़े ड्राइंग मास्टर जी सर हो गया। आगे पढ़िये...

व्यंग्य, (476) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 8 मार्च 2010
डॉ. अशोक गौतम

विषमता एक पुनर्विवेचन

यहाँ मेरा तर्क है कि समानता के विश्लेषण और आकलन का केंद्रीय प्रश्न है ‘समानता किस चीज़ की ?’ मेरा कहना यह भी है कि सामाजिक व्यवस्था की नैतिकता के प्रति जो भी दृष्टिकोण समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं, लगभग उन सबकी एक साझी विशेषता यह है कि वे किसी-न-किसी वस्तु की समानता की माँग करते रहे हैं- ऐसी किसी वस्तु की जो उस विशेष सिद्धांत में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। केवल समान-आयवादी ही (अगर इस शब्द के प्रयोग की इजाजत हो तो) समान आयों की और समान-कल्याणवादी के सामने स्तरों की माँग नहीं करते, बल्कि शास्त्रीय क़िस्म के उपयोगितावादी भी सभी को उपयोगिताओं को समान भारमान देने का आग्रह करते हैं और शुद्ध स्वाधीनतावादी भी अधिकारों और स्वाधीनताओं की एक पूरी श्रेणी को लेकर समानता का तकाज़ा करते हैं। किसी-न-किसी बुनियादी अर्थ में वे सभी ‘समानतावादी’ हैं जो किसी ऐसी वस्तु की समानता के ज़ोरदार पक्षधर हैं जो हरेक को प्राप्त होनी चाहिए और जो ख़ुद उनके अपने विशेष दृष्टिकोण के लिए नाजुक अहमियत रखती है। संघर्ष को समानता के ‘पक्ष’ और ‘विपक्ष’ का संघर्ष समझना (जैसाकि ग्रंथों में अकसर पेश किया जाता है) किसी के किसी केन्द्रीय तत्त्वों को अनदेखा करने के बराबर होगा। आगे पढ़िये...

पुस्तकांश, (340) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 8 मार्च 2010
अमर्त्य सेन

आकाशवाणी समाचार की दुनिया

पुस्तक आकाशवाणी समाचार की दुनिया, आवाज के आरोह-अवरोह से हमारा बखूबी परिचय कराती है। यों तो आकाशवाणी के प्रादेशिक समाचार एकांश, पटना की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आई है यह पुस्तक। लेकिन इसका दायरा विस्तृत है। यह न सिर्फ़ आकाशवाणी पटना के समाचार एकांश के विगत पचास वर्षों का इतिहास एक नज़र में बता जाती है, बल्कि समाचारों के संकलन, तैयारी, संपादन से लेकर वाचन तक की तकनीकी जानकारी भी दे जाती है। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (539) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 4 मार्च 2010
समीक्षक-कीर्ति सिंह

'समुद्र, चाँद और मैं' केदारनाथ सिंह द्वारा लोकार्पित

भिलाई । शीर्ष कवि व समर्थ समालोचक डॉ. केदार नाथ सिंह ने 4 मार्च, 2010 को लिटरेरी क्लब, भिलाई इस्पात संयंत्र के अध्यक्ष व राजभाषा प्रमुख श्री अशोक सिंघई के पाँचवें काव्य संग्रह समुद्र, चाँद और मैं का लोकार्पण किया। इस सादे किन्तु गरिमामय आयोजन की अध्यक्षता गाँधीवादी चिन्तक व कानूनविद् श्री कनक तिवारी ने की। प्रसंगवश अशोक सिंघई के पहले प्रकाशन प्रदीर्घ कविता अलविदा बीसवीं सदी का लोकार्पण फरवरी 2000 में विश्व पुस्तक मेला में एवं तीसरे काव्य संग्रह सम्भाल कर रखना अपनी आकाशगंगा का भी लोकार्पण छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में नवम्बर, 2004 में प्रख्यात साहित्यकार स्वर्गीय श्रीकान्त वर्मा एवं कीर्तिशेष सम्पादक, कवि व उपन्यासकार गुलशेर अहमद शानी की स्मृति में आयोजित कविता की पंचाट में श्री केदार नाथ सिंह ने ही किया था। आगे पढ़िये...

हलचल, (320) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 8 मार्च 2010
सृजनगाथा

बिटिया
कविता, (408) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 7 मार्च 2010,
किरण राजपुरोहित नितिला

नवगीत
छंद, (389) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 7 मार्च 2010,
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

2010 का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार पंकज सुबीर को

दिल्ली । सीहोर के युवा कहानीकार पंकज सुबीर को उनके उपन्यास के लिये इस वर्ष का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार दिया जा रहा है । भारतीय ज्ञानपीठ ने 2009 को उपन्यास वर्ष मनाते हुए नवलेखन पुरस्कार को उपन्यास के लिये दिये जाने की घोषणा की थी । इसके लिये एक चयन समिति शीर्ष आलोचक डॉ. नामवर सिंह की अध्यक्षता में बनाई गई थी । जिसमें शीर्ष कथाकार तथा नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया, आलोचक डॉ. विजय मोहन सिंह, कथाकार चित्रा मुद्गल, कथाकार अखिलेश सम्मिलित थे । देश भर से प्राप्त पांडुलिपियों में से चयन करके ये पुरस्कार प्रदान किया जाना था । आगे पढ़िये...

हलचल, (302) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 7 मार्च 2010
सृजनगाथा

आमची मुंबई

मुंबई एक ऐसी अनोखी नगरी है , जो भारत को दुनिया से जोड़ती है । किसी के लिए वो सपनों को पूरा करने की संसार में सबसे आख़िरी जगह है, तो किसी के लिए सपनों के टूटने के बाद हक़ीक़त से मुलाक़ात करने की यहाँ कला है। कल्पना है, ख़ूबसूरती है, पैसा है, विकास है, जुआ है, जनसँख्या है, अभिनेता हैं, नेता हैं, क्रिकेटर हैं, शिक्षा है, मीडिया है , विज्ञान है, विश्व की बेहतरीन चिकित्सा है, व्यस्तता है, फ़ैशन है, आधुनिकता है। मुंबई प्रतिनिधित्व करता है भारत का विश्व पटल पर। दुनिया में तीन वजहों से लोग भारत को पहचानतें हैं - मुंबई ,गाँधी और आईटी क्षेत्र। गाँधी के मूल्यों और सिंद्धांतों की क़द्र आज भारत से ज़्यादा भारत के बाहर की जाती है। हम उन मूल्यों को भूलते जा रहें हैं, इसमें कोई दो मत नहीं हैं। आगे पढ़िये...

आलेख, (393) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 7 मार्च 2010
रेखा भाटिया

बादल को घिरते देखा है

हेलो, दीदी...आप सुन रही हैं न? हमारे बिहार से लेकर यहाँ आपके हिमाचल तक भारी बारिशें हो रही हैं...फ़ोन और डाक सेवा गड़बड़ चल रही है...बिहार में बहुत बाढ़ आई है...कोसी बांध टूट गया है...पिताजी दरभंगा के हस्पताल में छाती के दर्द की जाँच कराने आए थे...उन्होंने वहाँ से हमें फ़ोन किया...माताजी ने भी बात की...उनको आपकी और हमारी बड़ी चिंता है...हमारे मनीआर्डर का भी इंतज़ार है...’’ आगे पढ़िये...

कहानी, (477) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 7 मार्च 2010
स्नोवा बॉर्नो

अहमदाबाद डायरी के कुछ पन्‍ने

एक बार फिर अकेले ही रहना है होली पर, लेकिन अब पहले की तरह खालीपन नहीं कचोटता। अकेलेपन के बीसियों इलाज हैं – डायरी, संगीत, पढ़ना, लिखना यूँ ही लेटे रहना। लेकिन खालीपन मारता है। खा जाता है। आप सिर धुनने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। आगे पढ़िये...

डायरी, (429) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 6 मार्च 2010
सूरज प्रकाश

कोपनहेगन में ‘वेयर डू आई बिलान्ग’ का विमोचन

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित यह उपन्यास योरोपीय वातावरण में रह रहें एक ऐसे भारतीय परिवार की कहानी है। जिसके माध्यम से लेखिका ने भारतीय अप्रवासियों की जीवन शैली, संघर्ष, द्विविधायें, कठिनाईयाँ,उनके सोर्चविचार, दो संस्कृतियों के बीच उनकी जूझ व इमीग्रेशन इशू आदि को दर्शाया है। उपन्यास की प्रमुख पात्र नवयुवती रीना है। रीना की ज़िंदगी के पाँच अहम् 20 से 25 वर्ष उपन्यास में वर्णित है। इन पाँच वर्षो के अन्तराल में आज के युग की किसी महत्वाकांक्षी नवयुवती को अपना कैरियर बनाने के अतिरिक्त जीवन-साथी की भी खोज होती है। आगे पढ़िये...

हलचल, (461) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 6 मार्च 2010
सृजनगाथा

साहित्य में मूल्यबोध

आज के विशृंखलित और ध्वंसाभिमुखी समाज को सन्मार्ग पर प्रवृत्त और परिचालित करने हेतु लेखनी-शक्ति की विशिष्ट पहचान होनी चाहिये । अपसंस्कृति के दूरीकरण एवं आध्यात्मिक चिन्तन-धारा में कर्मों के आचरण से ही सांस्कृतिक महत्त्व को सुरक्षित रखने में सहायता प्राप्त होगी । दृढ़ मनोबल, आत्म-विश्वास एवं सदाचार द्वारा समाज में स्वच्छ परिवेश की सर्जना की जा सकती है । देश को समृद्ध और सुसंस्कृति-सम्पन्न करने में नारी-पुरुष सभीको राष्ट्रीय कर्त्तव्य निभाना है । भारतवर्ष को एक महनीय महान् देश के रूप में सुप्रतिष्ठित करने के लिये मन, वचन और कर्म का त्रिवेणी-संगम आवश्यक है । केवल वाक्य-वीर न होकर धर्म-वीर एवं कर्म-वीर के रूप में अपने को प्रतिपादन करने से मनुष्य-जन्म की सार्थकता बनी रहेगी । आगे पढ़िये...

आलेख, (704) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 5 मार्च 2010
डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

समाज


कविता, (576 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 4 मार्च 2010,
सुधा ओम ढींगरा

नियति


कविता, (635 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 4 मार्च 2010,
सुधा ओम ढींगरा

अपेक्षा


कविता, (603 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 4 मार्च 2010,
सुधा ओम ढींगरा

‘तीखे तेवर’ विमोचित-योगेश गोयल सम्मानित

इस अवसर पर हिन्दी यूएएसए के संस्थापक श्री देवेन्द्र सिंह एवं रचिता सिंह भी उपस्थित थे। श्रीमती रचयिता सिंह ने कि "जब तक हम मिलकर हिन्दी भाषा के लिए काम नहीं करेंगे, तब तक आने वाली पीढ़ियों को उनकी विरासत देने का प्रयास सफल नहीं होगा" श्री देवेन्द्र सिंह ने हिन्दी के कार्यों का विवरण देते हुए उनमें और सक्रियता का संकल्प लिया। आगे पढ़िये...

हलचल, (316) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 4 मार्च 2010
सृजनगाथा

‘अनोखी’ है ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’

वाकई इस पुस्तक में अनेक अद्भुत, असाधारण, दुर्लभ जीव-जंतुओं के बारे में बहुत दिलचस्प जानकारियाँ हैं। जैसे पुस्तक में ‘प्लैनेरियन’ नामक अद्भुत कीड़े की जानकारी है, जो न पूँछ काटने से मरता है और न ही मुँह काटने से। दुनिया के सबसे जहरीले बिच्छू ‘एड्रोक्टोमस आस्ट्रेलिस’ सहित अन्य जहरीले जीवों की जानकारी भी हैरान करने वाली है। दुनिया में अद्भुत पक्षियों में कौन पक्षी सबसे बड़ा है और किसका कितना वज़न तथा कैसा आकार है, इनके अलावा पक्षी होते हुए भी कौन उड़ नहीं सकता, जैसी जानकारियाँ ज्ञान बढ़ाती हैं। मार्श हैरियर रंगदार छाया प्रदान करते हैं तो नर व मादा आस्ट्रिच, दोनों के अण्डे देने की जानकारी तो होश उड़ा देती है। आस्ट्रिच नाम के इस पक्षी के अलावा अन्य परिन्दों की रोचक जानकारी भी इस पुस्तक में है। सी-हार्स नामक समुद्री जीव को ‘समुद्री घोड़ा’ ही कहा जाता है मगर वास्तव में वह मछली है, जो घोड़ेनुमा होती है। इसके अलावा अनेक प्रकार की मछलियों की जानकारी पाठकों को अपने साथ बाँधे रहती है। अपने जीवन का हिस्सा हो चुके मुर्गे, बिल्ली, कोयल जैसे जीव भी यहाँ अपनी अनूठी जानकारियों के कारण अनोखे ही लगते हैं। कोई पक्षी संगीत भी बजा सकता है, यह सुनने में ही अजीब लगता है मगर कुक्कुट एक ऐसा पक्षी है, जो कुशल ड्रम वादक है। व्हेल सहित अन्य कई पक्षी संगीत का शौक रखते हैं। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (499) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 4 मार्च 2010
समीक्षक-डॉ. प्रवीण खुराना

'महान हैं हम नारियाँ'


कविता, (675 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 4 मार्च 2010,
मधु अरोड़ा

'टुकड़ा टुकड़ा नारी'


कविता, (412 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 4 मार्च 2010,
मधु अरोड़ा

मधु अरोड़ा


कविता, (233 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 3 मार्च 2010,
प्रतिनिधि - मुंबई

पंकज त्रिवेदी


कविता, (227 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 3 मार्च 2010,
प्रतिनिधि -सुरेन्द्र नगर (गुजरात)

कहानी संग्रह - कब्र का मुनाफ़ा तेजेन्द्र शर्मा

तेजेन्द्र शर्मा के सद्य: प्रकाशित कहानी संग्रह ‘कब्र का मुनाफ़ा’ में सन्निहित कहानियों सामाजिक और पारिवारिक विसंगतियों को जिस तरह सामने लाती हैं और जैसा मार्मिक चित्रण करती हैं, वैसा कम ही देखा जाता है। वे विसंगतियों के शिल्पी हैं। उनकी सभी कहानियों एक दूसरे से बहुत अलग हैं। वे प्रश्नोऔर समस्याओं को तो उठाते ही हैं मन की कोमल संवेदनाओं को भी कुशलता से चित्रित करते हैं। इस संग्रह में कुल 13 कहानियों हैं जो हमें लगभग इतनी ही दुनियाओं की सैर कराती हैं। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (535) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 3 मार्च 2010
समीक्षक : मधु अरोड़ा

पति - पत्नी


कविता, (396 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 3 मार्च 2010,
कवि कुलवंत सिंह

बजट: कितनी हक़ीक़त, कितना फ़साना ?

वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा 26 फरवरी को पेश किए गए आम बजट को लेकर कुछ लोगों द्वारा ख़ूब नुक्ताचीनी करते हुए जो हो-हल्ला मचाया गया, उसकी कोई ख़ास वजह नज़र नहीं आती। यह बात सही है कि पिछले कुछ समय से महँगाई जिस कदर सारे रिकार्डों को ध्वस्त करते हुए आसमान छू रही है, ऐसे में आम आदमी को यूपीए सरकार से राहत की बहुत उम्मीद थी और यह स्वीकार करने में कोई गुरेज़ भी नहीं होना चाहिए कि इस बजट में सरकार ने लगभग सभी वर्गों को रियायतों की कुछ न कुछ सौगात तो दी ही है। आगे पढ़िये...

राजकाज, (478) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 3 मार्च 2010
योगेश कुमार गोयल

सुधा ओम ढींगरा


राजकाज, (204 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010,
प्रतिनिधि - भोपाल

संजय द्विवेदी


राजकाज, (267 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010,
प्रतिनिधि - भोपाल

डॉ. हरेकृष्ण मेहेर


राजकाज, (984 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010,
प्रतिनिधि - ओड़िशा

शरीफ़ बदमाश

अगले दिन के अख़बारों में प्रमुखता से यह खबर छपी कि- अमुक गैंग का एक शातिर बदमाश पुलिस ने अपनी सक्रियता से धर दबोचा। अपने को विश्वविद्यालय का छात्र बताने वाला उक्त बदमाश काल-गर्ल्स रैकेट का शहर में सूत्रधार था और उसके कमरे से तमाम आपत्तिजनक वस्तुयें बरामद हुयी हैं। यह भी संज्ञान में आया है कि चंद पैसों के लालच में आरोपी बदमाश बड़े-बड़े होटलों एवं अमीर लोगों को जवान लड़कियाँ सप्लाई करता था और प्राप्त पैसे से गुलछर्रे उड़ाता था। सौदेबाजी में प्रयुक्त मोबाइल फ़ोन एवं गर्ल्स हॉस्टल के आस-पास अक्सर देखी जाने वाली हीरो होण्डा मोटरसाइकिल भी पुलिस ने उस बदमाश के पास से प्राप्त की है। आगे पढ़िये...

कहानी, (487) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 3 मार्च 2010
कृ्ष्ण कुमार यादव

भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता

धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) जीवन का एक आधुनिक दृष्टिकोण है। यह दृष्टिकोण मूलतः पाश्चात्य जगत की पैदाइश है। राज्य के धर्म (चर्च) से अलगाव सिद्धान्त के पश्चात आधुनिक राज्य निर्माण की परिस्थितियों में मानव इतिहास और राजनैतिक संस्थाओं के नियंता रूप में ईश्वर नहीं, बल्कि स्वयं जन या जनसमुदाय को मान्यता दी गई। इस प्रकार धर्मनिरपेक्षता आधुनिक बौद्धिकता का कारगर सैद्धान्तिक हथियार बन गई और परिणामस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति के निजी जीवन में धर्म व अन्धविश्वास की बजाय विज्ञान और बुद्धि को महत्व मिलना शुरू हो गया। आगे पढ़िये...

आलेख, (517) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 2 मार्च 2010
कृ्ष्ण कुमार यादव

कृष्ण कुमार यादव


आलेख, (333 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010,
सृजनगाथा

न्यू जर्सी में ‘नवतरंग’ का विमोचन और काव्य गोष्ठी

इस अवसर पर हिन्दी यूएएसए के संस्थापक श्री देवेन्द्र सिंह एवं रचिता सिंह भी उपस्थित थे। श्रीमती रचयिता सिंह ने कि "जब तक हम मिलकर हिन्दी भाषा के लिए काम नहीं करेंगे, तब तक आने वाली पीढ़ियों को उनकी विरासत देने का प्रयास सफल नहीं होगा" श्री देवेन्द्र सिंह ने हिन्दी के कार्यों का विवरण देते हुए उनमें और सक्रियता का संकल्प लिया। आगे पढ़िये...

हलचल, (424) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
देवी नागरानी

राजनीतिक संकट के कई आयाम

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक संकट के कई आयाम हैं-जिन्हें अखिल भारतीय स्तर पर आए संकट से अलग नहीं देखा जा सकता । वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर के आने के पहले चीज़ें बहुत हद तक सीधी सपाट थी । नये दौर ने उन्हें अने अनुसार ढालने का प्रयास किया । जब तक चीज़ें ढलती, तब तक उदारीकरण का दौर खुद ही संकट में फॅंस गया । आगे पढ़िये...

राजकाज, (346) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
विश्वजीत सेन

नए साल की शुभकामनाएँ !


कविता, (422 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010,
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

धुआँ
कविता, (378) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010,
मनीष कुमार जोशी

मनोज भावुक का ग़ज़ल संग्रह लोकार्पित

मॉरिशस भोजपुरी संस्थान की संस्थापक डॉ सरिता बुद्वू , भोजपुरी समाज के अघ्यक्ष अजीत दूबे एवं अखिल विश्व भोजपुरी समाज विकाश मंच जमशेदपुर के बी एन तिवारी उर्फ भाई जी भोजपुरिया ने संयुक्त रूप से युवा कवि मनोज भावुक के लोकप्रिय व बहुचर्चित गजल संग्रह "तस्वीर ज़िंदगी के" के द्वितीय संस्करण का लोकार्पण किया। आगे पढ़िये...

हलचल, (414) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
मनोज भावुक

हंगरी में लहराता हिंदी का परचम

पूर्वी योरोप के इस छोटे से देश में आजकल भारतीयों की संख्या बहुत अधिक भले ही न हो पर यहाँ के निवासी न केवल भारत से परिचित हैं अपितु भारतीय संस्कृति और सभ्यता के लिए उनके हृदय में बेहद सम्मान का भाव है। भारत-भ्रमण बहुत से हंगरी-निवासियों का सबसे बड़ा स्वप्न है।   आगे पढ़िये...

हिंदी-विश्व, (430) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
डॉ. गीता शर्मा

छत्तीसगढ़ में युवा रचना शिविर

यह माना जाता है कि कवि – कथाकार व कलाकार जन्मजात होते हैं । लेकिन ऐसा नहीं है । एक रचनाकार बनने के लिये साधना करनी पड़ती है और विधिवत अध्ययन करना पड़ता है । यह न भी किया जाये तो कवि को कवि बनने से कोई रोक नहीं सकता लेकिन उसकी रचना में परिपक्वता आने में समय तो लग ही जाता है । इस उद्देश्य को ध्यान में रख कर हमारे देश के विभिन्न लेखक संघों और साहित्य सम्मेलनों द्वारा लेखक शिविर या रचना शिविर आयोजित किये जाते रहे हैं । आगे पढ़िये...

हलचल, (320) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
शरद कोकास

बगरो बसन्त है


कविता, (442 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010,
अशोक सिंघई

रंग


कविता, (399 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010,
अशोक सिंघई

किताबों में क्रांति

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के डेढ सौ साल का जश्न देशभर में मनाया गया । दिल्ली में राष्टीय स्तर के कई भव्य आयोजन एवं इसको लेकर कई गोष्ठियाँ भी आयोजित की गई, जहाँ विद्वानों ने जमकर बहस- मुबाहिसे किए । अख़बारों और पत्रिकाओं ने अपने कई पन्ने आज़ादी की पहली लड़ाई को समर्पित किए । पत्र पत्रिकाओं के अलावा इस मौक़े पर कई किताबें भी प्रकाशित हुई । लेकिन किताबों के प्रकाशन में भी एक बार फिर से हिंदी प्रकाशन जगत अँगरेज़ी से पिछड़ता नज़र आया । जिस तरह से अँगरेज़ी के प्रकाशकों ने योजनाबद्ध तरीके से भारतीय स्वतंत्रता की पहली लड़ाई के विभिन्न पहुलुओं पर किताबें प्रकाशित की वो काबिले तारीफ़ है । हिंदी में भी कई किताबें प्रकाशित हुई लेकिन इसमें लेखकीय प्रयास ज़्यादा, प्रकाशकीय परिश्रम कम नज़र आया । आगे पढ़िये...

आलेख, (371) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
अनंत विजय

रेप

जयंत की यह बात सुनकर सुपर्णा अचंभित रह गई उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने कसकर उस पर तमाचा मर दिया हो। उनके हँसते-हँसते यह कहने का अंदाज कुछ इस तरह था कि सुपर्णा अपने अन्तर्मन में घोर अपमान अनुभव करने लगी।उसने पलटकर मद्धिम रोशनी में जयंत के चेहरे को देखने की कोशिश की,पर उनका चेहरा अँधेरे में नहीं दिखाई दे रहा था । अगर इस समय कोई सुपर्णा के चेहरे की तरफ़ देखता, तो उसके चेहरे पर जयंत के प्रति घृणा के भाव स्पष्ट दिखाई देते।वह अपने अपमान के जहरीले घूँट किसी तरह पी गई। उसे लगने लगा मानो किसी ने अभी-अभी उसके साथ रेप किया हो। आगे पढ़िये...

भाषांतर, (1207) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
मूल लेखक : सरोजिनी साहू, हिंदी रूपांतरण : दिनेश माली

प्राचीरों में क़ैद पानी

हमारे पास पानी के कितने रंग हैं। कितने संदर्भ हैं। कितने संबंध हैं। कितने संवाद हैं। कितने पनघट हैं। कितने घाट हैं। कितनी यात्राएं हैं। कितनी स्मृतियां हैं। कितने अनुष्ठान हैं। कितने पर्व हैं। कितने प्रसंग हैं। कितने उत्सव हैं। कितने अर्घ हैं। कितने आचमन हैं। कितने तीर्थ हैं। कितने विसर्जन हैं। कितने चिंतन हैं। कितने सन्यास हैं। कितने योग हैं। कितने संयोग हैं। कितने राग हैं। कितने कलकल हैं। कितने कलरव हैं। कितने स्नान हैं। कितने दीपदान हैं। कितने फूलों से भरी झबरिया है। कितने मंत्रों से भरी डगरिया है। कितनी धाराएँ हैं। कितनी सहस्त्रधाराएँ हैं। कितनी पद-यात्राएँ हैं। कितनी परिक्रमाएँ हैं। कितनी मानताएँ हैं। कितनी मान्यताएँ हैं। कितनी कथाएँ हैं। कितनी गाथाएँ हैं। कितनी कन्हुक-क्रीड़ाएँ हैं। कितने वांशीरव हैं। कितने मिलनातुर ज्ञेता हैं। कितने प्रतीक्षारत द्वापर हैं। कितने वरुण, जलधार बनकर बहते रहे। कितने इन्द्रधनुष सपनों में रंग भरते हुए आकाश होते रहे। आगे पढ़िये...

ललित निबंध, (428) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
डा. श्रीराम परिहार

मीडिया और स्त्रीत्व

फैशन पत्रिकाओं और स्त्री पत्रिकाओं की भाषा इस तरह की होती है कि स्त्री अपनी व्यक्तिगत छवि को निखरे रूप में पेश कर सके। सच यह है कि कॉस्मेटिक का स्टाइल हर दस साल बाद बदल जाता है।इसके कारण मेकअप में भी कुछ न कुछ नये परिवर्तन आ जाते हैं।खासकर चेहरा सजाना बड़ी स्टाईलाइज गतिविधि है। इसमें सेल्फ एक्सप्रेशन की बहुत कम गुंजाइश है। आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (503) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
जगदीश्वर चतुर्वेदी

संताप की लहरों के बीच व्यक्ति और समाज

करीब आधी सदी की पत्रकारिता में पहली बार छत्तीसगढ़ करीब आधी सदी की पत्रकारिता में पहली बार छत्तीसगढ़ में स्कूली बच्चों के मनोरोगी बनने और हताशा में आत्महत्या करने की खबरें सुनने तथा पढ़ने को मिल रही हैं। ये खबरें आहत करती हैं। उद्वेलित करती हैं। पाँचवी, छठवीं या आठवीं-दसवीं के किसी विद्यार्थी द्वारा पढ़ाई से जुड़े किसी कारणवश आत्मघाती कदम उठाने पर लगता है, यह प्रायः प्रत्येक संस्था की सामूहिक विफलता का परिणाम है। परिवार, शिक्षा-संस्थान, नीति-निर्माता, प्रशासन, समाजशास्त्री, विचारक और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता सबके लिए यह चिंतन तथा चिंता का विषय है।में स्कूली बच्चों के मनोरोगी बनने और हताशा में आत्महत्या करने की खबरें सुनने तथा पढ़ने को मिल रही हैं। ये खबरें आहत करती हैं। उद्वेलित करती हैं। पाँचवी, छठवीं या आठवीं-दसवीं के किसी विद्यार्थी द्वारा पढ़ाई से जुड़े किसी कारणवश आत्मघाती कदम उठाने पर लगता है, यह प्रायः प्रत्येक संस्था की सामूहिक विफलता का परिणाम है। परिवार, शिक्षा-संस्थान, नीति-निर्माता, प्रशासन, समाजशास्त्री, विचारक और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता सबके लिए यह चिंतन तथा चिंता का विषय है। आगे पढ़िये...

आलेख, (428) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
श्री रमेश नैयर

शिक्षा और प्रलय के बीच एक रेस

एक जगह ग्रेग लिखते हैं, “हम लोग अफ़गानिस्तान के हर गाँव और कस्बे में, जहाँ बच्चे शिक्षा के लिए तरसते हैं और माँ-बाप ऐसे स्कूलों के निर्माण का सपना देखते हैं जिनके दरवाज़े न सिर्फ़ उनके बेटों बल्कि बेटियों के लिए भी खुले होंगे, आशा की एक किरण जगा सके थे। इन जगहों में वे जगहें भी ख़ास तौर पर शामिल थीं जो कलाश्निकोव धारी ऐसे मर्दों के घेरे में हैं जिनकी पूरी ताक़त इस झूठ को ज़िन्दा रखने में खर्च होती है कि क़ुरान शरीफ में यह सीख दी गई है कि जो लड़की गणित पढ़ना चाहे उसके चेहरे पर तेज़ाब फेंक देना चाहिये। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (396) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
समीक्षक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

हिंदी पत्रकारिता के प्रकाश पुंज विद्यार्थी

सरफ़रोशी की तमन्ना रखने वाले महान क्रांतिकारी सरदार भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, रोशन सिंह ठाकुर, रामकृष्ण खत्री आदि का कोई ठोस अथवा नियमित आय स्त्रोत नहीं था। समय-समय पर गणेश शंकर विद्यार्थी ने इनके लिये आजीविका के साधन जुटाकर इनकी सक्रिय सहायता की का एक पैर तो जेल में ही रहता था विद्यार्थी जी ऐसे क्रांतिकारियों के परिवारों की समय-समय पर यथासंभव आर्थिक सहायता भी की। आगे पढ़िये...

हस्ताक्षर, (512) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 1 मार्च 2010
ओ.पी.हरयाण

   

Powered by DiY |  Copyright srijangatha.com 2009

उत्तम दृश्यमान के लिए अनुशंसित स्क्रीन आकार १०२४×७८६ या अधिक
अनुशंसित वेब ब्राऊज़र : इन्टरनेट एक्सप्लोरर संस्करण ८, मोज़िल्ला सीम॔की संस्करण २, मोज़िल्ला फ़ायरफॉक्स संस्करण ३.६

Unique Visits :
Sitemap - XML