| छंद | ||
डॉ. रमेश बुधौलिया |
श्रेष्ठतम कृति कहीं तुम कलाकार की |
|
(गीत) |
||
| मैं सजाऊँ तो कैसे सजाऊँ भला श्रेष्ठतम कृति रहीं तुम कलाकार की । हार फीका लगे जो गले में पड़ा रंग सारे प्रकृति के वसन में सजे सादगी में सही छवि रही देह की ऊपरी साज सारा मलिन ही करे मैं सजाऊँ तो कैसे सजाऊँ भला श्रेष्ठतम कृति रहीं तुम कलाकार की । न समता छटा से अलक की रही चन्द्रमा से नहीं मेल मुख का रहा हरिन की न आँखें रहीं, आँख सी गमन भी न गज का गमन सा रहा है कठिन साम्य किससे बताऊँ भला श्रेष्ठतम कृति रहीं तुम कलाकार की । खींचता हूँ लकीरें न खिंचती सही रंग-रोगन न उसमें भरा जा सके इस तरह छवि बदलती रहे भावनी रूप रेखा पकड में न कुछ आ सके सब कलाएँ थकी की थकी रह गईं देखकर भंगिमा प्यार अभिसार की । साज सिंगार रितुएं न कर पा रहीं तुम उन्हें दान देतीं रहीं कान्ति का क्षुब्ध सरिता रही बावली प्रीति की तुम दिखाती रहीं पथ उसे शान्ति का लुब्ध सारे नयन कुछ न कर पा रहे क्या बनक है बनी रूप सिंगार की । बोल सादे तुम्हारे मधुर गान से क्या से क्या न करे मोहिनी रूप की तन सिहरने लगे तमतमाने लगे आँच लगने लगे कुनकुनी धूप की भूलकर विश्व सारा तुम्हीं में रमा सुधि रही एक जगती कि गलहार की । कौन से पुण्य थे जो मिला साथ ये तुम मिलीं तो मुझे हर नियामत मिली म्लान होवे नहीं मुख कुमुद का कभी बस संजोता रहूँ भावना यह दिनी दे सकूँ क्या तुझे सोच पाता नहीं वस्तु ऐसी नजर में न उपहार की। मैं सजाऊँ तो कैसे सजाऊँ भला श्रेष्ठतम कृति रहीं तुम कलाकार की । |
||
|
|
|||||||||||

