| छंद | ||
डॉ. तारादत्त 'निर्विरोध' |
|
|
दो नवगीत |
||
लहरों से छूट रहे कूलदेवदारु हो गए बबूल मितवालहरों से छूट रहे कूल मितवा । भीतर से बाहर तक लील रहे दुख, रंगों ने छीन लिए रूपों के सूख । आँखों में चुभते हैं फूल मितवा गंध हुई फूलों की भूल मितवा । केसर की क्यारी ने खुरच दिया मन, हरी-हरी शाखों के पिलियाए तृण । कटे हुए वृक्ष और मूल मितवा मलयज की बाहों में धूल मितवा । जाएँ कहाँ दूर भी, कौन है वहाँ ? एक भीड़, एक भीड़ सब तरह यहाँ । गीत-राम रहे न अनुकूल मितवा शब्दों तक रह गए उसूल मितवा । सब उड़ाने आँख भर हैंयादें के फिर पंख खोले,उड़ चला मन का विहग आकाश में । दूर जाते में कहीं से देखना यों दूर मुड़ कर । सुखद होता है बिछुड़ कर, प्राण का मिलना उजड़ कर । कौन जाने किस क्षितिज पर हो मिलन, फिर से अलग आकाश में । करकते-से सपन टूटे, मोतियों-से अश्रु लूटे । लौट पाते हैं नहीं क्षण, मिल न पाते पंथ छूटे । सोचता पर, रुक न पाता, चलता हुआ मन तो सजग आकाश में । सब उड़ाने आँख भर हैं, नीड़ सारे शाख भर हैं । साँस के कच्चे घरौंदे - आयु के पर लाख घर हैं । पक्षियों के साथ फिर भी रूप उड़ता पवन के मग आकाश में ।
|
||
|
|
|||||||||||

