दो नवगीत

प्रकाशन :01-12-2006
डॉ. तारादत्त 'निर्विरोध'
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डॉ. तारादत्त 'निर्विरोध'


 

दो नवगीत


 

लहरों से छूट रहे कूल

देवदारु हो गए बबूल मितवा

लहरों से छूट रहे कूल मितवा ।



भीतर से बाहर तक

लील रहे दुख,

रंगों ने छीन लिए

रूपों के सूख ।

आँखों में चुभते हैं फूल मितवा

गंध हुई फूलों की भूल मितवा ।



केसर की क्यारी ने

खुरच दिया मन,

हरी-हरी शाखों के

पिलियाए तृण ।

कटे हुए वृक्ष और मूल मितवा

मलयज की बाहों में धूल मितवा ।

जाएँ कहाँ दूर भी,

कौन है वहाँ ?

एक भीड़, एक भीड़

सब तरह यहाँ ।

गीत-राम रहे न अनुकूल मितवा

शब्दों तक रह गए उसूल मितवा ।


सब उड़ाने आँख भर हैं

यादें के फिर पंख खोले,

उड़ चला मन का विहग आकाश में ।



दूर जाते में कहीं से

देखना यों दूर मुड़ कर ।

सुखद होता है बिछुड़ कर,

प्राण का मिलना उजड़ कर ।

कौन जाने किस क्षितिज पर

हो मिलन, फिर से अलग आकाश में ।



करकते-से सपन टूटे,

मोतियों-से अश्रु लूटे ।

लौट पाते हैं नहीं क्षण,

मिल न पाते पंथ छूटे ।

सोचता पर, रुक न पाता,

चलता हुआ मन तो सजग आकाश में ।



सब उड़ाने आँख भर हैं,

नीड़ सारे शाख भर हैं ।

साँस के कच्चे घरौंदे -

आयु के पर लाख घर हैं ।

पक्षियों के साथ फिर भी

रूप उड़ता पवन के मग आकाश में ।

 

 
     


  

 
         
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