रेत |
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हरजीत अटवाल |
पंजाबी उपन्यास ( धारावाहिक - 16 ) |
अनुवाद : सुभाष नीरव
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मैं ऊपर अपने कमरे में गया, तो जूडी मिल गयी। मेरे से अब वह घुटी-घुटी रहती। उसे देखकर मेरा मूड कुछ रवां हो गया। मैंने आँख मारकर उसका हालचाल पूछा। वह वी.ऐ.टी. वालों की चिट्ठी लेकर मेरे पास आई तो मैं चाय बना रहा था। मैंने पूछा, “चाय पिओगी ?” “क्यों ? वोदका खत्म हो गयी ?” “नहीं, अब टी टोटलर हो गया हूँ।” “क्यों ? किसी ने दिल तोड़ दिया ?” “दिल टूटने पर तो पीते हैं।” “फिर क्यों ? किसी ने शराब छोड़ने की फरमाइश की होगी।” “नहीं, ऐसी बात भी नहीं।” “फिर क्या हुआ कि तू शराब छोड़ रहा है ?” “असल में, बात यह है कि जब पी लेता हूँ, तो चीजें ठीक से दिखाई नहीं देतीं, तेरी तरफ भी अच्छी तरह से नहीं देख पाता।” वह मुस्कराने लगी और फिर, मेरे साथ काम को लेकर बात करने लगी। मेरा ध्यान तो काम में था ही नहीं। रात वाली घटना मेरे सामने घूमे जा रही थी और काफी बोझल लग रही थी। मैंने सोचा कि कंवल को फोन करके बताऊँ। फिर सोचा, उसे क्या तंग करना। धीरे-धीरे बता दूँगा। वह तो अभी घर का बयाना देने की खुशी में ही डूबी होगी। पर यह बात मुझ अकेले से हजम भी नहीं हो पा रही थी। मैंने प्रितपाल को उसके काम पर फोन घुमाया। वह काम पर कम ही मिलता था। उसके लिए सन्देशा ही छोड़ना पड़ता था, पर उस दिन वह मिल गया। मैंने कहा, “कितने बजे काम छोड़ेगा ?” “बारह बजे।” “इधर आ जाना सीधे, ईलिंग को।” “क्यों ? खास बात है ?” “इतनी खास भी नहीं, आएगा तो करुँगा।” वह आया और आते ही कहने लगा, “चल, पब में चलते हैं, ज़रा रिलेक्स होकर बैठेंगे।” “मैंने छोड़ दी यार।” “खैरिअत तो है ?” “नहीं यार, रात को पुलिस ने रोक लिया, लिमिट से ज्यादा पी थी।” “अच्छा, यह तो बहुत बुरा हुआ। पर तू बाज भी तो नहीं आता, गोरी के यहाँ से आ रहा होगा।” मैं कुछ नहीं बोला और उदास हो गया। वह बोला, “कौन-सी बड़ी बात हो गयी, जो तू दिल छोड़े जा रहा है!” “लायसेंस बिना मेरा क्या होगा ?” “यह तो कोई प्रॉब्लम नहीं।” “कैसे ?” “मेरा इस्तेमाल कर ले। तुझे याद है, जब मैं इंडिया से आया था, तो तेरे वाले से ही दो साल काम चलाया था। कभी पकड़ा भी जाता था, तो तेरा ही नाम लिखवा देता था। ज्यादा से ज्यादा, वो डेट आफ बर्थ ही पूछते हैं, फोटो तो है नहीं।” “हाँ यार छोटे, यह तो मैंने सोचा ही नहीं।” “फिर, उठ चल पब में चलें।” “अब मैं छोड़नी चाहता हूँ।” “सियाने कहते हैं कि पी कर छोड़ते हैं।” कहकर उसने अल्मारी में से बोतल उठा ली। फिर, कहने लगा, “छोटा-सा लायसेंस ही गया, तू तो ऐसे उदास बैठा है जैसे हजार पोंड गुम हो गये हों।” मुझे हल्की-सी कंपकंपी छूट गयी मानो प्रितपात को पता चल गया हो कि मैंने कंवल को बीस हजार पोंड घर के लिए दिया था। अगर घर में किसी को भी इस बात का पता चलता, तो बहुत बड़ी लड़ाई तय थी। किरन तो पहले ही जासूसी करती घूम रही थी। और लगता था कि लड़ने के लिए भी कमर कसकर बैठी थी। किरन को मेरी बाहर की किसी भी कारगुजारी का पता नहीं था। उसे मैं जो पैसे घर के खर्च के लिए देता, वह उसमें से भी बचा लेती थी। प्रितपात पूछने लगा, “यह लायसेंस किसके खाते पड़ा है, जूडी के या बीटर्स के?”
इतवार का दिन था और दिन भी बढि़या था। लैस्टर स्क्वेअर में भीड़ का होना कुदरती था। नई फिल्म रिलीज होने जा रही थी, इसका भी रश था। मैंने पहले ही टिकटें बुक करवा ली थीं। नहीं तो इतने रश में टिकटें कहाँ मिलनी थीं। यह फिल्म कमसिन उम्र के बच्चों की बहुत पसंदीदा फिल्म थी। इस फिल्म को लेकर टेलीविजन और अखबारों में काफी चर्चा रही थी। यह फिल्म जिसका नाम ‘मेड इन अमेरिका’ था, एक टीन ऐज लड़की की कहानी थी। ऐसी लड़की की कहानी जो कि ‘स्पर्म बैंक’ के वीर्य से पैदा होती है, बड़ी होकर अपने पिता को खोजने निकलती है। सिनेमा के सामने प्रतिभा की उम्र की लड़कियों की काफी भीड़ थी। लेकिन, प्रतिभा और कंवल अभी तक नहीं आई थीं। यद्यपि फिल्म शुरू होने में काफी समय था, पर मैं उनकी बड़ी बेताबी से प्रतीक्षा कर रहा था। सिनेमा के नज़दीक ही एक कॉफी-मशीन के करीब खड़ा होकर मैं उनका इंतजार कर रहा था कि कंवल ने आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैंने पलट कर देखा, वे दोनों मेरे सामने खड़ी थीं। प्रतिभा भी मेरी ओर देखकर मुस्कराई। कंवल की तरह ही उसके गालों में भी गड्ढ़े पड़ रहे थे। मेरा मन कर रहा था कि उसे सीने से लगा लूँ, पर कंवल द्वारा बताई गयी बातों को याद करके डर रहा था। मैंने उसकी ओर टेढ़ा-सा मुँह बनाया, जैसे उसके बचपन में किया करता था और कहा, “हैलो बहन जी, क्या हाल है तुम्हारा ?” वह कुछ कहे बगै़र मुस्कराई। मैंने दोबारा पूछा, पर वह कुछ न बोली और मुस्कराती रही। मैं कॉफी ले आया और हम खड़े-खड़े ही पीने लगे। मैंने प्रतिभा के करीब जाकर कंवल से कहा, “देख जान, मेरे और प्रतिभा के हाथ एक जैसे हैं, एक जैसा चेहरा, आँखें, नाक, इस लड़की ने तो मेरा सब कुछ चुरा लिया है।” प्रतिभा हँसने लगी। मैंने फिर कहा, “यह लड़की तो बिलकुल मेरे जैसी है, कहीं मेरी बहन तो नहीं यह ?” “आई एम नॉट योर सिस्टर।” “नहीं, तू मेरी सिस्टर ही है, किसी से पूछकर देख।” मैंने वहाँ से गुजर रही दो गोरी स्त्रियों से कहा, “लुक लेडीज़, यू थिंक दिस गर्ल इज़ माई सिस्टर ?” “ओ श्योर, आई कैन बैट, शी इज़ योर सिस्टर।” एक गोरी ने कहा, तो उसके साथ वाली दूसरी ने भी पुष्टि कर दी। फिर, वे हँसती हुईं आगे बढ़ गयीं। प्रतिभा पीछे हटते हुए कंवल की ओट में हो गयी और बोली, “आई एम नॉट योर सिस्टर।” “यू आर, यू कांट डिनाय इट।” “आई कैन, बिकॉज आई एम योर डॉटर। दैट्स वाई, आई लुक लाइक यू।” “ओह हो, मैं तो भूल ही गया, तू मेरी डॉटर है डॉटर। सॉरी, मैं तो सिस्टर ही समझता रहा। मैं भूल ही गया था।” “गो टू डॉक्टर!” “हाँ- हाँ, कल ही जाऊँगा। हाँ, मेरी डोटर, क्या हाल है तेरा ?” “आई एम फाइन।” “यू फाइंड दा वे ईजीली ?” “नो प्रॉब्लम।” फिर, हम तीनों सिनेमा की ओर बढ़े। प्रतिभा के साथ चलना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। फिल्म देखने के दौरान वह हम दोनों के बीच में बैठी। फिल्म देखने के बाद, मैं फिल्म और इसके कलाकारों के बारे में बातें करने लगा। मैं प्रतिभा के साथ बातें करने के लिए घर से तैयार होकर आया था। संगीत और फिल्मों से अधिक और कौन-सी ऐसी चीज थी जिसकी इस उम्र में उसे दिलचस्पी हो सकती थी। हम बातें करने लगते, तो कंवल खुद को अकेला महसूस करने लगती और कहती, “तुम बाप-बेटी को मेरा ध्यान ही नहीं कि मैं भी साथ हूँ।” “जान, तेरे बग़ैर हम कैसे।” मैं कहता तो कंवल मेरे कंधे पर सिर रख देती। फिल्म के बाद हमने ‘प्लैनेट हालीवुड’ में खाना खाया। यह जगह थी तो मंहगी, पर इस रेस्ट्रोरेंट की एक अपनी खासियत थी। यह हॉलीवुड के कलाकारों द्वारा स्थापित किया गया रेस्ट्रोरेंट था। यहाँ बड़े-बड़े एक्टरों की निजी वस्तुएँ नुमायश के तौर पर रखी हुई थीं। फिर, हॉलीवुड से भी कोई न कोई एक्टर आया रहता। यही कारण था कि हमेशा ही यहाँ भीड़ बनी रहती। यहाँ आकर प्रतिभा बहुत ही खुश थी। रेस्ट्रोरेंट में पृष्ठभूमि में चल रहे गीत के विषय में मैंने उससे पूछा, “यह चार्ट में नंबर वन है न ?” “यहाँ का नहीं, अमेरिका का।” “यहाँ का कौन-सा है ?” फिर, वह मुझे यहाँ के चार्ट के सबसे ऊपर वाले गीत के बारे में बताने लगी। गायकों के नाम और उनके दूसरे गीतों के बारे में भी। नए आये गीतों की दूसरी एल्बमों के बारे में भी हम बातें कर रहे थे। कंवल ऊब गयी लगती थी। वह कहने लगी, “सारी बातें आज ही कर लोगे! अगली बार के लिए भी छोड़ दो।” “जान, इतने बरसों बाद अपनी बेटी से मिला हूँ, इतनी-सी बातों से भला मेरा पेट कहाँ भरेगा!” हम टोटनहैम जा रहे थे। मेरे पास अब फीअस्टा कार ही थी। दूसरी बी़.एम.डब्ल्यू. मैंने बेच दी थी और बेचकर जो पैसे मिले थे, उन्हें प्रतिभा वाले उसी अकाउन्ट में डाल दिया था, जहाँ से निकलवा कर हमने घर खरीदने में खर्च कर दिये थे। कंवल को मैंने कार ड्राइव करने पर लगा दिया, यह कहकर कि मैं प्रतिभा के साथ पिछली सीट पर बैठकर बातें करना चाहता हूँ। मैं उससे उसके स्कूल और उसकी पढ़ाई को लेकर बातें करने लगा। मैंने उसकी सहेलियों के बारे में पूछते हुए कहा, “कोई फास्ट फ्रेंड भी बनाई है ?” “मेरी कोई फ्रेंड नहीं।” उसने पंजाबी में कहा और रोने लगी। कार चलाते हुए कंवल कहने लगी, “चुप कर बेटे, चुप कर।” पर प्रतिभा चुप न हुई। मैंने उसके सिर पर हाथ रखकर रोने का कारण पूछना चाहा, तो वह एकदम कह उठी, “डोंट टच मी।” उसका व्यवहार एकाएक बदल गया। मेरे लिए यह सब अचम्भे से भरा था। कितने घंटे हो गये थे मिले। अच्छी-भली खुश थी। कंवल, जो उसके बारे में बताती रही थी, पहले सब झूठ लगा, पर अब उसे इतना बदला हुआ देखकर मुझे अजीब लग रहा था। मैंने कंवल से पूछा, ऑल ऑफ सडन क्या हो गया?” “ऑल योर फाल्ट।” “कैसे ?” “तू हमें छोड़ गया था। यह सहेलियों को कैसे बताये कि डैडी कहाँ गया। इसकी इंडियन क्लासफैलोज़ के पास डैडी हैं, इसलिए यह किसी को फेंड नहीं बनाती।” कंवल ने कार रोक ली थी। कंवल द्वारा एक-दो बार कहने पर प्रतिभा चुप हो गयी थी। कंवल का इस तरह मेरे पर इल्ज़ाम लगाना मुझे अच्छा नहीं लगा, पर मैं कुछ न बोला। मैंने प्रतिभा से कहा, “मैं कल तेरे स्कूल चलूँगा, तेरे टीचर्स और सारे क्लासफैलोज़ से मिलकर आऊँगा।” प्रतिभा एकबार फिर भड़क उठी और बोली, “यू, जस्ट लीव मी अलोन, ओ.के.।” |
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