पूज्य पिताजी बचपन में
जब मुझको मार दिया करते,
ले गोदी में चाचा चाची तब
जी भर प्यार किया करतॆ।
जब किसी पड़ोसी के बच्चे को
ठोक पीट मैं घर आता,
तो मुझे बचाने वही लोग
माँ सॆ मनुहार किया करते।
बचपन का वो भीगा सावन
कागज की वे खाली नावें,
हम भरे लबालब पानी से
आंगन के पार किया करते।
मैं बड़ी बहिन की कलम किताबें
यहां वहां बिखरा देता,
तो उसका मेरा समझौता
भैया हर बार किया करते।
वे लड्डू पेड़े मिट्टी के
वे बाँट तराजू लकड़ी के,
अपने हाथों से दादाजी
खुद ही तैयार किया करते।
गुड्डा गुड़ियों की शादी में
सारा घर आमंत्रित होता,
सब आठ आने की टाफी का
सुंदर उपहार दिया करते।

जब मुझको मार दिया करते,
ले गोदी में चाचा चाची तब
जी भर प्यार किया करतॆ।
जब किसी पड़ोसी के बच्चे को
ठोक पीट मैं घर आता,
तो मुझे बचाने वही लोग
माँ सॆ मनुहार किया करते।
बचपन का वो भीगा सावन
कागज की वे खाली नावें,
हम भरे लबालब पानी से
आंगन के पार किया करते।
मैं बड़ी बहिन की कलम किताबें
यहां वहां बिखरा देता,
तो उसका मेरा समझौता
भैया हर बार किया करते।
वे लड्डू पेड़े मिट्टी के
वे बाँट तराजू लकड़ी के,
अपने हाथों से दादाजी
खुद ही तैयार किया करते।
गुड्डा गुड़ियों की शादी में
सारा घर आमंत्रित होता,
सब आठ आने की टाफी का
सुंदर उपहार दिया करते।
पी. दयाल श्रीवस्तव
12 शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा,
(म.प्र.) 480001
मो.- 9713355846
pdayalshrivastava@rediffmail.com
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