सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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अंक-3, अगस्त, 2006   

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संस्कार

 

 

 

 

कविता का समाजिक संघर्ष


प्रेमशकर

 

स भ्रांति से मुक्त हो लेना चाहिए कि रचना के लिए किसी ऐसे शांत, निश्चित समय की अपेक्षा होती है जहाँ रचनाकार परम स्थिरचित्त होकर अपनी एकांत कला-साधना में संलग्न हो सके । कई बार स्वर्णयुग की कल्पना तक कर ली गई जबकि वह इस दृष्टि से एक मिथ्या धारणा कि उसका आगमन सबके लिए नहीं होता और मुख का भोक्ता विशिष्ट गर्ग-प्रायः राजाश्रय में पालित-पोसित । ऐसा भी नहीं कि समृद्ध समय-समाज में रचना की उँचाइयाँ नहीं होतीं । होती हैं, पर उसका स्वरूप संघर्षशील समाज-समय से भिन्न होता है । कालिदास अथवा शेक्सपियर की रचना अपेक्षाकृत अधिक सम्पन्न समय का परिचय देती है, पर उनके भीतर मनुष्य का जो अंतःसंघर्ष उपस्थित है, वह कृतित्व को लंबी आयु देता है,  और हर युग में उसके कुछ पाठक होते है । दृश्य का दूसरा पक्ष वह जो रचना के लिए अधिक चुनौती-भरा कि जब खुली हवा में सांस ले पाना भी कठिन, तब रचनाकार अपने संकल्प के बल-बूले पर कैसे सर्जनरत होता है ?  सामंतवाद से आगे बढ़कर, पूँजीवादी समय में शोषण की प्रक्रिया तेज़ और किसी अर्थ में अधिक चतुर हो जाती है । बाहर से दिखाई देने वाली सुविधाओं के भीतर साम्राज्यवाद का मंसूबा राज्य-विस्तार का होता है । बाज़ार की तलाश में दौड़ती, पूँजी का निरंतर विस्तार करती साम्राज्यवादी शक्तियाँ  विश्व भर में फैल जाना चाहती हैं, जिसके कारण युद्ध भी होते हैं । एक दौर था जब व्रिटेन के नेता दावा करते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्यास्त कभी नहीं होता । पर उस समय भी एशिया-अफ्रीका में रचना की संभावनाएँ निश्शेष नहीं हो गई थीं और रचनाकारों ने अपने दयित्व का निर्वाह पूरी क्षमता से किया था। बीसवीं शताब्दी के मध्य में अनेक देशों में जागरइ आया और भारतचीन जैसे बड़ी जनसंख्या वाले राष्ट्र अपने पैरों पर खड़े हुए,  तब यह रचनाशीलता के लिए भी नए प्रस्थान का समय था। माओत्सेतुंङ की एक कविता है : देख रहा हूँ, बदल गए हैं/    नवदृश्यों में दृश्य पुराने/  यहाँ-वहाँ काँचन पक्षीगण/ चहक रहे, गाते हैं गाने/ अबाबील शर-सी उड़ती हैं /जलस्त्रोतों की कल-कल ध्वनि है/ और नभोन्मुख मार्ग दूर तक चढ़ता जाता ।

 

औपनिवेशिक समाजों की राजनीतिक-आर्थिक परतंत्रता में भी, सचेत-सजग कवि रचना के लिए मनोवांछित परिवेश बनाने का प्रयत्न करते हैं । यह कार्य सरल नहीं होता क्योंकि सत्ता के विरोध में खड़े होना पड़ता है और रचना-कर्म जोखिम-भरा होता है । खतरों का यह जीवन एक प्रकार से रचनाशीलता से तदाकार हो जाता है, यद्यपि कई बार साम्राज्यवादी आतंक के कारण उसे पहचानना आसान नहीं होता । हिंदी के ही संदर्भ में देखें तो औपनिवेशिक समाज में कविता में स्वतंत्रता की कठिनाइयाँ सामने आती हैं । उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय नवजागरण की शुरुआत हुई और अठारह सौ सत्तावन के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष के बाद सामाजिक सुधार और राजनीतिक आंदोलन लागभग साथ-साथ चलते हैं । भारतीय नेतृत्व कई स्तरों पर काम करता दिखाई देता है । वह समृद्ध परंपरा वाले राष्ठ्र को हीन भावना से मुक्त करने का प्रयत्न करता है तथा इतिहास-दर्शन-रचना आदि पर नई दृष्टि डाली जाती है । इसके साथ ही उन कारणों पर विचार किया जाता है जिससे हम साम्राज्यवादी शक्तियों से पराभूत हुए । यह सामाजिक सुधार की प्रबल भावना है जिसका दौर राममोहन राय से लेकर महात्मा गांधी तक फैला हुआ है और जिसने भारतीय कविता पर अपने पर अपने दबाव छोड़े  हैं । जब स्वतंत्रता आंदोलन में गति आई और गांधी के व्यक्तित्व से उसे जनोन्मुखता मिली,  तब इसमें अन्य तत्व भी प्रविष्ट हुए । भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद से लेकर सुभाषचंद्र बोस तक को यह विश्वास कि आजादी के लिए हिंसा का उपयोग भी किया जा सकता है। दूसरी दिशा समाजवाद की है, जिसे मार्क्सवाद तथा लोकतांत्रिक समाजवादी विचारों ने भारत में सक्रिय किया । इस प्रकार भारत में जब साम्राज्यवाद हर प्रकार के शोषण में लगा था, सामाजिक चेतना, भीतर-भीतर ही सही, पर कई स्तरों पर क्रियाशील थी जिसे रचनाओं में देखा जा सकता है ।

 

औपनिवेशिक समाज में जिन प्रतिभाओं ने कविता को संभव बनाया, उनके संकल्प और साहस को सराहना होगा । समय-समाज के सही साक्षात्कार के बिना रचना में प्रामाणिकता नहीं आती, इसे आज़ादी की पहली लड़ाई के समय की पीढ़ी जानती थी। यदि हम आधुनिक हिंदी साहित्य के आरंभ के लिए इसी ऐतिहासिक क्षण को प्रस्थान के रूप में स्वीकार कर लें तो रचना का यह प्रथम चरण अठारह सौ सतावन से उन्नीसवी शताब्दी के अंत तक फैला हुआ है । बाहर से देखने पर ब्रिटिश साम्राज्य भारत में कुछ प्रगति लाने की कोशिश करता दिखाई देता है, पर इसमें उसके निहित स्वार्थ थे । भारत के सही विकास में उनकी  रुचि नहीं थी और वे प्रशासनिक दृष्टि से यातायात आदि की कुछ सुविधाएं जुटाना चाहते थे, जिसमें पढ़े-लिखे  बाबुओं की फ़ौज़ खड़ी करना भी शामिल । भारत ने नए युग में प्रवेश किया ,जिसे मार्क्र्स अभिनव सामाजिक क्रांति के सूत्रपात के रूप में देखता है । उन्नीसवीं शती में सामाजिक सुधार आंदोलनों की प्रक्रिया तेज़ हुई, जिनमें प्रमुख हैं ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन, आर्य समाज, थियासाफ़िकल सोसायटी आदि ।  भारत ने मध्य काल से आधुनिक समय में प्रवेश करने का प्रयत्न किया पर साम्राज्यवद के निहित स्वार्थ तथा यथास्थितिवादी शक्तियों ने इस परिवर्तन में बाधा उपस्थित की । परिणाम यह कि आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रथम चरण में, जिसे भारतेंदु युग कहकर संबोधित किया जाता है, एक द्वंद्व की-सी स्थिति दिखाई देती है । एक दूसरी समस्या यह भी कि धर्म-जाति-भाषा आदि में बंटे समाज में राजनीतिक संगठन का कार्य सरल नहीं होता । इसके लिए भारत को महात्मा गांधी की प्रतीक्षा करनी पड़ी, जिन्होंने देश का मनोबल ऊपर उठाने का वैचारिक प्रयत्न किया और स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनाधार दिया ।

 

आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रथम चरण में कविता की पहली लड़ाई उस निगतिकालीन सामंती परिवेश से थी, यहाँ रचना राजाश्रय में सिमट गई थी, और उसका जीवन-संपर्क शिथिल हो गया था। इस दृष्टि से आधुनिक कविता की पहली पीढ़ी का महत्व ऐतिहासिक है, क्योंकि उनका संघर्ष कई धरातलों पर था । एक ओर उन्हें उस शरीरवाद और चाटुकारिता से मुक्त होना था जो विकेन्द्रित सामंतवाद की प्रवृत्ति है,  दूसरी ओर साम्राज्यवादी अंकुश के भीतर, रचना को नई सामजिक चेतना का वाहक बनाना था । एक विचित्र प्रकार के आत्मसंघर्ष से गुजरती हुई यह कविता जिस राष्ट्रीय चेतना का संकेत करती है, उसकी पहचान इसीलिए किंचित कठिन, क्योंकि यहाँ द्वैत भी है, और कविता का स्वर उतना मुखर भी नहीं, जितना कि अगले दौर में हुआ । भारतेंदु युग के रचनाकारों ने अपनी सामाजिक चेतना व्यक्त करने के लिए हास्य-व्यंग्य का सहारा लिया और स्वयं भारतेंदु ने अंधेर नगरी जैसी व्यंग्य रचना लिखी जिसकी प्रासंगिकता हर उस समय-समाज में होगी, जहाँ न्याय नहीं मिलता । अंधेर नगरी, चौपट  राजा/टके सेर भाजी, टके सेर खाजा - पंक्तियाँ साम्राज्यवादी सत्ता पर तीखा व्यंग्य हैं, पर उसकी ध्वनि इससे आगे भी जाती है । हम स्वीकारते हैं कि राष्ट्रीय भावना का स्वर आगे चलकर अधिक प्रखर हुआ, पर उसकी भूमिका प्रथम चरण में निर्मित होती है । राधाचरण गोस्वामी की हमारो उत्तम भारत देस अथवा प्रेमघन की धन्य भूमि भारत सब रतननि की उपजावनि आदि में राष्ट्रीय भावना के संकेत हैं । भारतेन्दु पीड़ा के  साथ कहते हैं कि पै धनि बिदेस चलि जात, यहै अति ख्वारी। भारतेंदु युग के लेखक अपनी बात कहने के लिए इतिहास-पुराण का भी सहारा लेते हैं जिससे वे नई राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करना चाहते हैं । भारतेंदु युग के काव्य में भक्तिभावना की जो वापसी हुई, वह भी एक प्रकार से रीतिकालीन देहवाद से मुक्ति का प्रयत्न है और भारतेंन्दु  ने  इस माध्यम से जातीय सौमनस्य पर बल दिया: मसजिद मंदिर गिरजों में देखा मतवालों का जो दैर/अपने अपने रंग में रँगा दिखाया सबका तौर । इस प्रकार आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रथम चरण में कवियों ने साम्राज्यवादी परिवेश के भीतर कविता को संभव बनाया और वह सही देशज प्रस्थान दिया कि आगे की अधिक प्रखर चेतना अभिव्यक्ति पा सके।

 

बीसवीं शताब्दी के सन्धिस्थल पर राजनीतिक सक्रियता बढ़ती है । 1914 में गांधी अफ्रीका से भारत लौटते हैं और स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा मिलती है। प्रायः तिलक के ऐतिहसिक वक्तव्य का उल्लेख किया जाता हैः स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे । इससे प्रखर राष्ट्रीयता का बोध होता है । गांधी सत्य-अहिंसा पर बल देते हैं और इस प्रकार राष्ट्रीय चेतना की दो प्रमुख दिशाएँ हैं । नवजागरण की जो प्रक्रिया उन्नीसवीं शताब्दी में आरंभ हुई थी, वह बीसवीं शताब्दी में अधिक  प्रखर हुई और कविता का स्वर अधिक मुखर हुआ। देश प्रेम की भावना इस कविता में प्रमुखता पाती है और इसे कई प्रकार से व्यक्त किया गया । इस समय के प्रमुख कवि मैथिलीशरण गुप्त और अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध रामकृष्ण कथा को माध्यम बनाकर इन नायकों को नया व्यक्तित्व देते हैं । प्रिय-प्रवास की राधा का चित्र हैः सच्चे स्नेही अवनिजन के देश के श्याम जैसे/राधा जैसी सदय-हृदय विश्व प्रेमानुरक्ता । मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि कहकर संबोधित किया गया और उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया । वे राष्ट्रीय भावना के सबसे मुखर कवियों में हैं और प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति में विश्वास रखते हैं: मानस-भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती/ भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती । इन पंक्तियों से भारत-भारती का आरंभ होता है और कवि अपनी सामाजिक व्यथा व्यक्त करते हुए कहता हैः स्वच्छंदता से कर तुझे करने पड़ें प्रस्ताव जो/ जग जाएँ तेरी नोंक से सोए हुए हों भाव जो । यहाँ कवि की मुख्य चिंता भारतीय समाज की अवनत स्थिति है और काव्य के समापन अंश भविष्यत् खंड तथा विनय में कामना की गई है कि भारत प्राचीन गौरव प्राप्त कर सकेगा । ध्यान दें कि मैथिलीशरण गुप्त की कविता का पूरा ताना-बाना राष्ट्रीय भावना, समाज-सुधार, गांधीवादी नैतिकता से निर्मित है । इतिहास-पुराण के चरित्रों को लेते हुए भी वे इसी राष्ट्रीय चेतना से परिचालित हैं और पंचवटी की सीता स्वावलंबन की मूर्ति बनती हैः स्वावलंबन की एक झलक पर न्यौछावर कुबेर का कोष । मैथिलीशरण गुप्त ने बीसवीं शताब्दी के आरंभ की कविता का सामजिक प्रतिनिधित्व किया, इसमें संदेह नहीं, पर इस समय के अन्य कवि भी हैं जिनमें साम्राज्यवाद से मुक्ति पाने की कामना मुखर हुई है ।. इनमें कुछ प्रमुख नाम हैं रामनरेश त्रिपाठी, बालमुकुन्द गुप्त, गोपालशरण सिंह, गिरिधर शर्मा कविरत्न, गयाप्रसाद शुक्ल सनेही, राय देवीप्रसाद पूर्ण, श्रीधर पाठक, नाथूराम शर्मा शंकर आदि। इस समय का नेतृत्व आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से किया और हिंदी खड़ी बोली कविता को वह प्रशस्त पीठिका दी जिस पर आगे की रचनाशीलता संभव हो सकी । साम्राज्यवाद से टकराता यह अधिक मुखर स्वर है ।

 

स्वतंत्रता संघर्ष और मुक्ति आंदोलन की गति ज्यों-ज्यों तेज़ होती है, साम्राज्यवादी दमन और भी निर्मम होता जाता है, जिसे खंदकों की आखिरी लड़ाई कहा गया है । 1920 से गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करते हैं और इसे गाधी युग का आरंभ कहा जाता है । सत्य-अहिंसा पर बल देते हुए उन्होंने अपना असहयोग आंदोलन इसलिए बापिस ले लिया क्योंकि वह उग्र हिसक हो गया था। गांधी को आदर देते हुए भी,  ऐसे राजनीतिज्ञ हैं जिन्होंने उनकी नरम विचारधारा से अपनी असहमति व्यक्त करते हुए अधिक उग्र राष्ट्रीयता की माँग की । किसान मजदूरों की साझेदारी बढ़ी और समाजवाद की बात की गई, जिसका समर्थन जवाहरलाल नेहरू ने भी किया । 1925 के अंत में भारतीय साम्यवादी दल का सम्मेलन हुआ और समाजवादी दल ने पहले कांग्रेस में ही रहकर काम किया, फिर 1934 में आचार्य नरेंद्रदेव की अध्यक्षता में समाजवादियों का पहला सम्मेलन हुआ । इस प्रकार स्वतंत्रता आंदोलन में वामपंथी विचारधारा सक्रिय होती है । 1920 से आज़ादी मिलने तक हिंदी कविता का वृत्त पहले स्वच्छंदतावाद और फिर प्रगतिवाद से गुज़रता है ।

 

प्रश्न किया जा सकता है कि जब भारतीय समाज में स्वतंत्रता संघर्ष की गति तेज़ हो रही थी और उसमें सामान्यजन की हिस्सेदारी बढ़ रही थी, तब हिंदी में रूमानी अथवा स्वच्छंदतावादी प्रवृत्तियों का आगमन कैसे हुआ और उसका औचित्य क्या ? शिक्षा के प्रचार-प्रसार से मध्यवर्ग का प्रभावी होना और प्राकूपूँजीवाद के रूप में व्यक्ति की महत्ता की स्वीकृति कुछ ऐसे कारक हैं जो हिंदी स्वच्छंदतावादी आंदोलन की पीठिका में मौजूद हैं । पर इसी के साथ भारतीय नवजागरण के दबाव भी हैं, जिसका आरंभ उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ और जो बीसवीं शताब्दी में भी सक्रिय रहा । प्रसाद, निराला, पंत ने निजता का उपयोग करते हुए, वैयक्तिक अनुभूतियों के प्रकाशन की छूट ली, जहाँ उदात्त प्रेम-सौंदर्य भावना को प्रमुखता मिली । पर हिंदी स्वच्छंदतवादी काव्य छायावाद का एक सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष भी है  जिसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए । प्रसाद अपने नाटकों में भारतीय इतिहास पर नई दृष्टि डालते हैं और कविता-कहानी में भी पुरागाथा का उपयोग करते हैं । स्कंदगुप्त तथा चंद्रगुप्त नाटकों में राष्ट्रीय भावना, प्रकारांतर से ही सही, पर पूरी सजगता में मौजूद है । वहाँ हिमालय के आंगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार जैसा गीत है जिसकी समापन पंक्तियाँ हैं  : जिएँ तो सदा उसी के लिए, यही अभिमान रहे ,वह हर्ष/ निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष । चंद्रगुप्त नाटक में चाणक्य और दाण्ड्यायन भारतीय बौद्धिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं और यहाँ अरुण यह मधुमय देश हमारा तथा हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती/ स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतन्त्रता  पुकारती जैसे राष्ट्रीय भावना के गीत हैं । साम्राज्यवादी अंकुश में रचना को संभव बनाने के लिए स्वच्छंदतावादी कवियों ने अपने वैयक्तिक संवेदनों का उपयोग तो किया,  पर उसे वृहत्तर मानवीय संदर्भ से संबद्ध किया । उनका काव्य अहं की परिक्रमा करके नहीं रह जाता, जो दुर्घटना आगे चलकर प्रयोगवादियों के साथ हुई । पंत आरंभ में प्रकृति को अपना मुख्य काव्य-विषय बनाते हैं और फिर परिवर्तन जैसी अनेक आयामी कविता रचते हैं, जिसे पूर्ण कविता कहा गया । निराला आरंभ से ही अधिक विस्तृत भूमि पर रचनारत हैं और अपने प्रथम कविता संकलन परिमल में ही वैविध्य का परिचय देते हैं । उनका संवेदन-संसार स्वच्छंदतावादियों में सबसे व्यापक है और यमुना जिसे प्रायः कृष्णकाव्य की रसिक रेखाओं से जोड़कर देखा जाता है, निराला में एक नई अर्थ-ध्वनि का संकेत करती है, जिसमें समय-संदर्भ उपस्थित हैं  :  कहाँ उछलते अब वैसे ही ब्रज-नागरियों के गागर ? / कहाँ भीगते अब वैसे ही बाहु,  उरोज, अधर,अम्बर ।

 

सामाजिक दबावों में रचना का रूपांतरण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और जो रचनाकार इस वास्तविकता को नहीं स्वीकरता, वह विश्वसनीय नहीं बन पाता । भारत में आज़ादी की लड़ाई तेज़ हुई और नई क्रांतिकारी शक्तियों का उदय हुआ, जैसे किसान-मज़दूर । साम्राज्यवादविरोधी संयुक्त राष्ट्रीय मोर्चे की स्थापना का प्रयत्न भी हुआ और 1934 के केन्द्रीय विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला। 1936 के लखनऊ अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने समाजवादी लक्ष्य की घोषणा करते हुए संयुक्त जनप्रिय मोर्चे की आवश्यकता पर बल दिया । इस प्रकारर साम्राज्यवादी शक्ति से टकराते हुए भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ने एक नए चरण में प्रवेश किया,  जहाँ कल्पनाकी गई कि नया भारत कैसा होगा और इस सिलसिले में समाजवाद को लक्ष्य रूप में स्वीकारा गया । 1936  में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में प्रेमचंद का ऐतिहासिक भाषण हुआ जिसमें उन्होंने साहित्य के सामाजिक उद्देश्य पर बल दिया । स्वतंत्रता आंदोलन की तरह प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में प्रेमचंद का ऐतिहासिक भाषण हुआ जिसमें उन्होंने साहित्य के सामाजिक उद्देश्य पर बल दिया । स्वतंत्रता आंदोलन की तरह प्रगतिशील लेखक संघ के आरंभ में मध्यवर्ग प्रभावी था, संभवतः जिसे लेकर निराला ने व्यंग्य भी किए । पर बदलते सामाजिक परिदृश्य, विशेषतया स्वतंत्रता आंदोलन में , सामानजन की बढ़ती हुई हिस्सेदारी न रचना को गहरे स्तर पर प्रभावित किया । हिंदी स्वच्छंदतावादी काव्य का नया रूपान्तरण हुआ, गद्य में जिसकी शुरूआत प्रेमचंद की परवर्ती रचनाओं के सामाजिक यथार्थ से हो चुकी थी। और यह गाधीवाद से समाजवाद तक की यात्रा का विकासक्रम है ।

 

चौथे दशक में भारतीय स्वतंत्र ता संघर्ष प्रखर होता है और पाँचवें दशक में निर्णायक दौर में पहुँचकर अपना राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त करने में उसे सफलता मिलती है । साम्राज्यवाद से टकराते हुए, निराला उन सामाजिक कारणों की पड़ताल करते हैं जिनसे शोषण, असमानता, अन्याय, अत्याचार को बढ़ावा मिलता है । निराला ने अपनी गद्य रचनाओं में सामाजिक यथार्थ के विवरण प्रस्तुत किए और द्वितीय अनामिका, कुकुरमुत्ता,  अणिमा, बेला, नए पत्ते में उसे संवेदन-स्तर पर व्यक्त किया, यहाँ तक कि अपने आक्रोश के लिए व्यंग्य तक का सहारा लिया । कुकुरमुत्ता का तीखा व्यंग्य हैः अबे, सुन बे, गुलाब।/भूल मत पाई जो खुशबू, रंगोआब/ खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट/ डाल पर इतराता है कैपिटलिस्ट । आज़ादी के ठीक पहले 1946  में प्रकाशित निराला का कविता संकलन नए पत्ते किसान-जीवन का दस्तावेज़ कहा जा सकता है जहाँ संवेदनशील कवि ने किसानों की दुर्दशा का वर्णन किया है । इसका पूरा ताना-बाना ही किसानी जीनव से निर्मित है : खरीफ की निराई, झुकी रीढ़, पीला चेहरा, जेठ की दुपहर, अरहर के पेड़, खेतिहर कुत्ता, ज़मींदार-साहूकार-बनिया, खलिहान, खेत-अलिहान, झुलसी जनता, कुम्हार, ढोर आदि । और पात्र भी यहीं से पाए गए है  : भकुआ चमार, लच्छू नाई, बदलू अहिर, मन्नी कुम्हार, मँहगू, झींगुर आदि प्रेमचंद के कथा-साहित्य की याद दिलाते हुए । सुमित्रानंदन पंत के परवर्ती काव्य-युगांत, ग्राम्या में भी ग्रामजीवन पर दृष्टि डाली गई, पर यथार्थ अपनी पूरी प्रखरता में नहीं आ पाया । इस प्रकार साम्राज्यवाद से टकराते हुए हिंदी स्वच्छंदतावादी काव्य इस बाध्यता का अनुभव करता है कि वह सामाजिक यथार्थ के नए वृत्त में प्रवेश करे ।

 

औपनिवेशिक समाज में कविता की स्वतंत्रता एक वैचारिक प्रश्न तो है ही, उसका गहरा संबंध संवेदनशीलता से भी है, जिसके बिना कविता में न तो ऊर्जा आती है , न विश्वसनीयता । हिंदी प्रगतिशील चेतनाप्रगतिवादी काव्य के प्रस्थान रूप में यदि हम निराला के परवर्ती काव्य को स्वीकार करें, तो कम से कम संवेदना वाले पक्ष का सही रूप हमें मिल जाता है । फिर आता है विचारधारा का प्रश्न और उसमें संदेह नहीं कि समाजवादी अवधारणाओं ने साम्राज्यवाद से टकराने में हिंदी रचनाशीलता को काफ़ी प्रेरण दी । स्वच्छंदतावादी प्रवृत्तियों से जुड़े हुए  कवि शिवमंगल सिंह सुमन में रुमानी भावनाओं के साथ प्रगतिवादी स्वर भी हैं । आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा ले रही कवियों की पंक्ति साम्राज्यवाद से सीधे ही टकराना चाहती है, जिसकी शुरुआत मैथिलीशरण गुप्त ने की थी और जिसे बालकृष्ण शर्मा नवीन, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, सियारामशरण गुप्त, दिनकर आदि ने नया विस्तार दिया । ऐसा लगता है जैसे हिंदी स्वच्छंदतावाद के बाद की पीढ़ी ने राष्ट्रीय चेतना को संवेदन के गहरे स्तर पर व्यक्त करने का प्रयत्न किया, वह वर्णनात्मकता से बाहर आई । माखनलाल चतुर्वेदी की बहुउद्धृत कविता पुष्प की अभिलाषा को सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में प्रस्तुत क्या जा सकता है, जहाँ कवि व्यक्ति-राग से राजाश्रय  तक की इच्छाओं का निषेध करता हुआ, बलिदान भाव को सर्वोपरि महत्त्व देता है : मुझे तोड़ लेना बनमाली,  उस पथ में देना तुम फेंक/ मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक। दिनकर हिमालय के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति करते है  : मेरे नगपति, मेरे विशाल/ साकार, दिव्य गौरव विराट/ पौरुष के पुजीभूत ज्वाल/  मेरे जननी के हिम-किरीट/  मेरे भारत के दिव्य भाल ।

 

साम्राज्यवाद से जूझते हुए हिंदी कविता जब प्रगतिवाद के सामाजिक यथार्थ युग में प्रवेश करती है तो उसे निराला के विद्रोही स्वर से प्रेरणा मिलती है । पर विचारधारा में मार्क्र्सवाद-लेनिनवाद उसे दार्शनिक-वैचारिक आधार देता है और कविता का स्वर अधिक जुझारू भी बनता है । नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, मुक्तिबोध आदि की पीढ़ी इसका प्रतिनिधित्व करती है और विचारणीय यह कि आज़ादी के बाद भी इसकी आवश्यकता इस रूप में अनुभव की गई कि समतावादी समाज बनना चाहिए । इन कवियों की लंबी सूची है केदारनाथ सिंह और धूमिल से लेकर राजेश जोशी, अरुण कमल आदि तक । इसे हम मुक्तिबोध की पीढ़ी का नया विन्यास कह सकते हैं जहाँ राजनीति भी कविता को उद्वेलित करती है । नए साहित्य के संदर्भ में मुक्तिबोध ने रचनाकार के मानवतावाद (अथवा मानववाद ) पर बल देते हुए कहा है कि कला की स्वतंत्रता जीवन सापेक्ष्य है और उनकी कविताएँ इसे प्रमाणित करती हैं । ओ काव्यात्मन् फणिधर कविता की पंक्तियाँ हैं :  किंतु एकत्र करो / प्रज्वलित प्रस्तरों को/ वे आते ही होंगे लोग/ जिन्हें तुम दोगे/ देना ही होगी पूरा हिसाब/ अपना सबका मन का, जग का। वास्तविकता यह है कि हिंदी का प्रगतिवादी काव्य अपने ढंग से, साम्राज्यवाद से टकराया , इस मुद्दे पर कि वह पूँजीवादी शोषण की निर्मम प्रक्रिया है और इससे मु्क्ति पानी ही होगी । कवियों ने आस-पास के  सामान्यजन पर संवेदन भरी दृष्टि डाली और उनमें जो गहरे स्तर पर अभिव्यक्ति दे सके, उनका स्वर निराला या नेरुदा की तरह प्रामाणिक बना। कविता के साथ अपने उपन्यासों में नागार्जुन ने सामान्यजन को विष&