सृजन-गाथा

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन

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अंक-3, अगस्त, 2006   

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पुस्तकायन

 

कृति-समीक्षा.....

 

आस्था को बल देता रचना कर्म/ कवि-एकांत श्रीवास्तव/ समीक्षक-रजत कृष्ण

 तल्ख संदर्भों की विश्वसनीय कहानियाँ/ कहानीकार- डॉ.विश्वमोहन/ समीक्षक-डॉ.बा.शे.तिवारी

प्रवासी /कवि- देवेंद्र नारायण शुक्ला/समीक्षक-वेदप्रकाश वटुक          

 

 

कविता देवेन्द्रकीः वाणी जन-जन की


वेदप्रकाश वटुक

भाई देवेन्द्रनारायण शुक्ल से मेरा परिचय दो दशकों से ऊपर का है । उस समय से है, जब वे स्वप्न-सुन्दरी के बिना सूना जीवन बिता रहे थे-अमेरिका के नव आप्रवासी के रूप में, जब उन की स्नेह पवण, संवेदनशील भाभी निर्मला जी उस स्वप्न-सुन्दरी की खोज कर रही थीं । आज वे अपनी संगीता के साथ गृहस्थ्ी का दायित्य के कारण मैं यह बात दृढ़ता के साथ कह सकता हूँ कि वे सरल निष्कलुष ह्रदय के ही नहीं , अत्यन्त आकर्षक व्यक्तित्व के धनी हैं  । सान्फ्रान्सिस्को बे खाड़ी क्षेत्र में वे आपने दो आगजों के परिवारों के असीन प्रेम के साथ जीवन-यापन करते हुए प्रवास में पंचवटीबसा रहे हैं । सदाचार की त्रिमूति शुक्ल बन्धु इस क्षेत्र में पारिवारिक आर्दष की कल्पना को साकार रुप दे रहे हैं । अपने बौध्दिक कम त्रों में सफल होने के साथ-साथ मातृभाषा हिन्दी के पति भी वे पूर्णतः समपित हैं। वस्तुतः उनसे मेरा परिचय भी तभी  हुआ था, जब दो दशक पूर्वइस क्षेत्र में स्व. कुँअर चन्द्र्प्रकाशसिंह द्वारा स्थपित अंतराष्ट्रीय हिन्दी समिति की स्थनीय शाख की स्थापना की गई थी, जिसमें शुक्ल-बन्धुओं की प्रनुख भूनिका थी। तभी से काव्य-गोष्ठियों में देवेन्द्र के काव्य का रसास्वादन करने का सौभाग्य मुझे मिला है ।

 

      देवेन्द्र, जैसा मैनें कहा, शुक्लत्रयी साहीत्य-साहीणू की एक धरा हैं। उनके एक बड़े भाई डॉ.श्यामनारायण शुक्ल सफन इंजिलियर होने का साथसाथ सनज सेवी ते हैं ही, हिन्दी के संस्मरण साहीत्य के कृत्कार भी हैं। दूसरे भाई आदित्यनारायण कथाकार है । साहीत्य की गंगा-यमुना के धारा में सरस्वती सुत देवेन्द्र की काव्यधारा सिलकर साहीत्य-संगन का तीर्थ बनाती है, जसमें स्नान कर हम पुण्य पाते रहे हैं ।

 

देवेन्द्र के सरल स्वभाव और आकर्षक व्यत्तित्व की भांति ही उनका काव्य भी मनमोहक है । वे जब काव्यपाठ करते हैं, तो आत्म-विभोर होकर और श्रोता सुनते हैं तो तन्मय होकर । उनकी व्यंग्य-कविताओं की पंक्ति-पंक्ति पर मिक्त रुप मे हँसते हिए दैद देते हैं । कवि और श्रोता का यह तादात्म्य भरा संबंध किसी भी सभा को जीवन्त बना देता है, सरस और आनन्दमय ।

 

देवेन्द्र की रचना विविध-आयामी है। गेय और अगेय, छंदमुक्त और छन्दवध्द, कैसी भी रचना वे करे, उनकी काव्य-घारा में गार रस भी है,भक्ति भी है और उपदेशात्मक सूक्तिकोष भी । किन्तु मूलतः वे हास्य-व्यंग्य को ही श्रोता उनकी विशिष्ट पहचान मानते हैं। उनका पैना व्यंग्य श्रोताओं को हँसाता और गुदगुदाता ही नहीं, सतत् हास हुए मानवीय मापदण्डों के पति आकोश भी उत्पन्न करता है । सामाजिक विसंगतियों के उकेरती हुई उनके काव्य की पंत्तियाँ दर्प के समान हमारे सामाजिक और राजनैतिक चरित्र की विद्रुपता को उजागर करती हैं । स्वयं पर हँसकर वे हमारे सांस्कृतिक दर्प को चूर-चूर करते हैं । भारत में रहकर अमेरिका का कांचममृग हमें उसका पीछा कर आपनी जड़ों से उखाड़कर विदेश के भावमा-मरुभू में ले आता है, जहाँ हम पनःआत्मा के रोप नहीं पाते । वहाँ हम भारतीय की असफल खोझ करते हैं । वह  ते अनुपलब्ध है ही,प्रवास में रहकर हनें जिस  ग्राम वासिनी भारतमाता की कल्पनात्मक स्मृति तड़पाती है, वह भी अब लुप्त होती हुई पाते हैं । हम अपने सपनों का भारत जीना चाहते हैं ,जो पग-पग पर स्वार्थपरता, पदलोलुपता और भ्रष्टजीवन की विभीषिका से ग्रस्त है । इस प्रकार देश-विदेश सभी की भूमि से विस्थापित प्रपासियों के त्रिशंकु जीवन पर उनकी कविताएँ निरंतर चोट करती हैं, गंभीर घाव करती हैं । देशी-विदेशी परिवेश में भाँति-भाँति की राजनैतिक-सांस्कृतिक भूमिका निभाते हुए भी सब हमाम में नंगे दिखाई देते है । पंचतंत्र के नाटक की वीभत्सता ऐसी हैं कि उसमें भगवान राम भी समाज का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते । जातिवाद,वंशवाद, भाषावाद और अनेक वादों पर होतेवाद-विवाद में न कहीं भारतीयता दिखती है, न मानवता । कभी-कभी तो उन्हें सारा इतिहास ही निराशा के तमस से भरा लगता है

 

यही दुर्भाग्य रहा है भारत के साथ

इसका शासन रहा है अन्धों के हाथ

 

      इतिहास को वे सतत् द्रौपदी के चीरहरण का अभिनय-क्षेत्र पाते हैं, जहाँ सिद्धन्तों की आड़ में गव-भरे योद्ध कुछ सिक्कों में बिककर अन्याय के पति मौन रहते हैं । सत्ता के लिए दल-बदल है, सेवा के नाम के लूटमार है । राष्ट्रभक्ति के नाम में युवा सैनिक प्राण नेयौछावर करता है, हर विषम स्थिति में जीता है और सत्तधारी नायक नेता    ऐश्वर्य का जीवन जीता है, कफन तक की दलाली करता है । कवि देश के विरोधाभासी चरित्र को उजागर करता है, जहाँ भारतीय संस्कृति को विश्वसंस्कृति से आकान्त है, हिन्दी को विश्वभाष का पद दिलाने का थोथा गजन है और देश के उच्चतम न्यायालय से स्वभाषा का निष्कासन । प्रवासी भारतीयों की देशभक्ति पर उंगली उठाने वाले देश की दीमकों की तरह खा रहे हैं । अभिजात्य वर्ग अंग्रेजी/ विदेशी के असीम भक्त होकर शासित वर्ग को स्वदेशी और मातृभाषा-प्रेम का पाठ पढ़ा रहे हैं । सतेता पाने के लिए,सत्ता पर अधिकार जमाये रखने के लिए गोडसे के भक्त गाँधी की समाधि पर पुष्पमालीएँ अर्पित करते हैं .

 

देवेन्द्र की कविताएँ उन लोगों की भावनाओं को मुखरित करती हैं , जो अपनी बात नहीं कह पाते । उनकी कविताओं में मूक को वाणी मिलती है,गूँगी आत्मा की अनुभति को सार्थक शब्द मिलते हैं । साथ ही ये कविताएँ उन दोगले चरित्रों को भी नंगा करती है,जो भाषा का व्यवहार उसके साथ स्वार्थ सिद्धि के लिए व्यभिचार करके करते हैं।     देवेन्द्र नारायण शुक्ल सही अर्थो में जवकवि हैं । जन की आत्मा के कवि हैं । जनवाणी में जन की भीवना को मूर्त रूप देते हैं । उनकी कविता माधुर्य भरी वाणी में कटु सत्य को भाषित-परिभाषित करने वाली प्रेयसी की भाँति ग्राहय है । उनकी सूक्तियाँ साधू-सन्तों के शुष्क उपदेश न होकर मिमयी औषधि के समान हैं, जो रोगी को भाती भी हैं और स्वस्थ भी करती हैं । एक शब्द में इन कविताओं में सही दशी भी है और उचित दिशा भी ।

 

 

 

 

 

'भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है।' - नलिनविलोचन शर्मा

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