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संवेदनशील
मानव का विश्वसनीय
आश्रय स्थलः छांदस कविताएं
लालसालाल तरंग
यह
सर्वज्ञ है कि एक युग था कि कोलाहल की दुनिया को तजकर छायावाद की सागर लहरी
अंबर के कानों में प्रेमकथा कहते न थकती थी। फिर, हिन्दी कविता को मादक
स्वप्न लोक से
उतारकर यथार्थ की कठोर धरती पर लाने वाला प्रगतिवाद आया जो
देश-विदेश की उथलपुथल से घिरकर राजनीत ि के दलदल में फंसता गया । इस तरह
हिन्दी कविता का जो स्वरूप हमारे सामने है लिश्चितःउसमें से छंदबद्ध
कविताएँ... गीत, नवगीत आदि ही जनग्राहृय हैं । मैं यह मानता हूँ कि फलहाल
जिन लोगों के हाथ में सत्ता है, जिन लोगों के हाथ में विश्वविद्यालयीय अथवा
साहित्यिक-सांस्कृतिक सरकारी संस्थाएं हैं और जो छात्र-छात््राओं के
अध्ययन, पठन-पाठन के कोर्स का निर्धारण करते हैं ,मुट्ठी भर ऐसे तत्व
पाश्चात्य साहित्य
–संस्कृति
के कअन्ध अनुकरण में भारतीय समाज की सहज इचिछाओं, समझ, ग्राहृयता और आमजन
की पसंद को जड़ से उखाड़ फेंकने के पश्चिमी साहित्य संस्कृति और सभ्यता के
प्रचारकों-प्ररकों के दूषित उदृश्यों की पूर्ति में लगे हुए हैं-जाने या
अनजाने। यह ठीक वैसे ही है जैसे मुट्ठीभर अंग्रेजों द्वारा भारतवर्ष जैसे
बड़े से बड़े देशों पर शासन करना और भारतवर्ष के 2प्रतिशत लोगों द्वारा
बारतवर्ष की 98 प्रतिशत आम जनता की हिन्दी चाह, ज्ञान और प्रयोग पर
अंग्रेजी का अनिवार्य प्रयोग तथा वर्चस्व थोपे रखना । यहाँ अगर
‘गदर’
(एक जनगीतकार, नक्सली नेता जिससे पुल्स तक डरती है) की बात को कोट किया जाय
तो यह प्रासंगिक होगा “अब
तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां Team
dictate
करती हैं
क्योंकि उनके पीछे उनकी सरकारों की शक्ति है । हमारे देश के बुद्धिजीवी यह
सब देखकर भी देखना नहीं चाहते ।”
(जनसत्ता विशेषांक 1997 पृ. 135) मैं इसलिए इसे प्रासंगिक मानता हूँ कि
वस्तुतः आज सरकारी तंत्र की बात छोड़ दें तो भी कुछ विद्वानों
,साहित्यकारों और कवियों ने अपने साहित्य के माध्यम से साहित्य में सत्य
खोजने का प्रयास कम पर सत्ता का वृत बनाने का प्रयास अधिक किया है । आज
विमर्श में अप्रत्याशित बदलाव आया है जो तथ्यों ,सत्य और बास्तविकता से
हटकर हठधर्मिता, पूर्वाग्रह, पुरस्कारों की भूख, छपास की भूख और साहित्य
में हीरो बनने की भूख अधिक लिए हुए है । बल्कि साथ ही अपनी किसी भी स्तर की
पुस्तर को विक्रय का व्यापक फलक बनाना बी इसी में शामिल है । कैलाश वाजपेयी
का कथन मुझे सौ प्रतिशत सत्य लगता है कि
“साठोत्तरी
पीढ़ी के बाद ऐसा लगता है कि न तो कवियों को हिन्दी कविता की पारंपरिक
छांदिक लयात्मकता विशेष का संज्ञान है और न ही वे इस संदर्भ में पूरी तरह
सक्रिय दिखाई देते हैं । सामान्य पाठक उनकी इस तरह की रचना के प्रति निरंतर
उदासी होता जा रहा है । स्वच्छंदता के नाम पर हिन्दी कविता में यह भी हुआ
है कि लगभग गद्यपरक शैली में निबंध जैसी दीखती शब्दावली को कविता के नाम पर
प्रसारित किया जाता है । ... कविता को छंदों की ओर लौटना होगा, नहीं लौटेगी
तो खत्म हो जाएगी ।”(साहित्य
अमृत, , अगस्त-2000 पृ. 36 )
कविता (छंद मुक्त) में प्रतीक और बिंबों के नएपन की, तीखेपन की तथा
ऐतिहासिकता की दुहाई दी जाती है जबकि गीत, नवगीतों या छान्दस कविताओं में
इनकी कमी नहीं है । एक उदाहरण द्रष्टव्य है
“
फिर सामने चुनाव है /
गदहों का नेतानुमा बर्ताव है /
जनतंत्र की खाल के भीतर /
लोकतंत्र के पहिए हैं /
बड़े बड़े कट आउट हैं /
पर सबके सब छुट भइए हैं”
(‘उसके
विरुद्ध’
पुस्तक से-राजा राम सिंह)
ठाकुर प्रसाद सिंह के नवगीतों में ,मथाली जीवन के संदर्भ मिलते हैं।
लोकजीनव का एक अनछुआ सैन्दर्य बोध, सामाजीकता तथा लयात्मकता को एक नई
दिशा मिली उस समय के नवगीतों में। शंभुनाध सिंह की बिंबधर्मिता ने लोक के
नए संदर्भों तथा नगर के उबऊपन जीवन में बचो हुए जीवन की हरीतिमा के माध्यम
से नवगीत को आगे बढ़ाया । नईम ने मालवा के संदर्भ को आधुनिक लय का संगर्भ
बमाया। देवेन्द्र कुमार, ओमप्रकाश, उदभ्रांत के नवगीतों में लोकानुभव की
ताजगी गा्रम्य जीवन की यर्थात और आधुनिक जीवन की टूटन की तीखा एहसास है।
देवेन्द्र शर्मा इन्द्रके नवगीत और दोहों ने छांदस कविताओं केइतिहास को एक
अलग दिशा दी। जोवात स्वयं सिध्दि बन गई उसे दोहराना क्या, तथापि अप्रासंगिक
नहीं है कि आठवेंओर नवें गशक में नवगीत हिन्दी कविता की एक प्रमुख
प्रवृत्ति बन गया। शंभुनाथ सिंह के साथ अमरनाथ
क्षीवास्तव, दयाशंकर तिवारी,, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, शांति सुमन, नचिकेता,
देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, गुलाब सिंह, नरेश सक्सेना, रानसेंगर, क्षीकृष्ण
तिवारी, सुधांशु, सूर्यभान गुप्त, डॉ.सुरेश, अनूप अशेष, उमाकांत मालवीय,
माहेश्वर तिवारी, बुध्दिनाथ मिश्र आदि अनेक ने इस विधा को शक्ति प्रदान की
और कुछ कर रहे हैं परन्तततु गीत नवगीत और कविता छंद मुक्त के विषय में
अनायास, व्यर्थ और अप्रसांगिक टकराव आज भी चल रहा है।
‘वागर्थ-74’
में दिए गए मंगलेश डबरान के साक्षात्कार में उभरा अनाप-शनाप बयान खेद और
चिंता का विषय है। रमेष रंजक का मानना है कि.......
“कविता
अक गंभीर समाज सापेक्ष कर्म है और गीतों में भी इस कर्म की सशक्त
एभइव्यक्ति होतीत है।”
‘नए
गीत का उद्भव और विकास’
(रमेश रंजक) में लेखक ने 1935 से 1970 की गीत, नवगीत यात्र पर खुलकर चोट की
है । यह उक्त अवधि की गीत रचना विधा का गंभीर विश्लेषण है ।
“....गीतों
ने कविता की गंभीरता को नष्ट किया है और विचारों के दरवाजे बंद किए हैं ।
ऐसी कवितासिप्फ मनोरंजनकारी होती है, समाज और मनुष्य का हाल नहीं बतलाती और
इस तरह अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती और इसे लिखने लावे व्यावसायिक और
पेशेवर लोग होते हैं ( वागर्थ 74,मंगलेश डबराल के एक साक्षात्कार का कुछ
वाक्य) और ‘कविता
में प्रतिरोध बचा है’
विषय पर मंगलेश डबराल से शशिकांत की बातचीत (मंथरा रा. स. 30.12.01 )में
सरांशतः निम्न बातें उन्होंने कहीं हैं-
कविता की दुनिया में नई बात शायद यही है कि वह कुछ और विस्तृत हुई है । कुछ
और फैली है उसका कैनवास कुछ और बढ़ा है ।
कविता अब अधिक लोकतांत्रिक हुई है और उसमें महिलाओं, दलितों की कभी स्पष्ट
तो कभी अस्पष्ट आवाज तेजी से आ रही है ।
हमारे देश की कभी स्पष्ट तो कभी अस्पष्ट आवाज तेजी से आ रही है ।
हमारे देश
की सच्ची कविता भारत में एक साथ चल रही अमरीकीकरण और तालिबानीकरण की
प्रक्रियाओं का विरोध कर रही है ।कविता को अपने समय के यथार्थ और अपने समय
के रुपक-दोनों की खोज करनी होती है । उपर्युक्त दोनो बातों का उद्मगम कहाँ
से है ?
ज्वलंत
प्रश्न है यह ।
हालांकि व्यापक दृष्टि से कहा जा सकता है कि समकालीन गीतों । नवगीतों की
प्रकृति समाजधर्मी है । ये समाज से ही विषय सामग्री ग्रहण करते हैं । इनमें
एक बहाव होताहै, संबंधों के स्पर्श की सुगंध होती है ।
“सबके
दावेदार”
(आजमगढ) के संपादक का मानना है कि
‘समकालीन
गीतों में समय की जटिल वास्ताविकता और जनसमस्याओं की निवैर्यक्तक
अभिव्यक्ति का भरा हुआ संसार उभरा है, किन्तु आलोचना इसका ठीक-ठीक
मूल्यांकन करने में तटस्थ नहीं रही ।’
(‘समकालीन
गीत और आलोचना’
विषयक गोष्ठी, आजमगढ़ (उ.प्र.). मई- 2002, पंकज गौतम) राष्ट्रीय और
अन्तर्राष्ट्रय साहित्यिक, हमले हमारी संस्कृति और साहित्य पर हो रहे हैं
उनसे कैसे बचा जाय ?
इस विषय पर चिंता न करके यहाँ पर हर विधा को लेकर आपसी टकराव है । यूनिस्को
द्वारा की ऐसी चिंताओं को रेखांकित किया गया है । पूरनचंद जोशी इन्हीं
चिताओं की ओर संकेत करते हुए मानते हैं, कि मीडिया से जो सांस्कृतिक हमला
हो रहा है वह सैनिक या राजनैतिक हमले से अधिक खतरनाक है । (सांस्कृतिक
विकास, और संचार क्रांति पुस्तक से, हंस जुलाई 2002 पृ.8)
“लय
की पाशर्वर्ती आंतरिक गूंज, जो विशेष घुमावदार लय का निर्माण करती है ,अपने
अन्तर्मुखी स्वभाव के कारण रचनाकार की बड़ी गहरी पर्तों में से निकलती
बार-बार अपने रूप शब्दों को रागात्मक परिवेश की ओर खींचती है इसको नए धरातल
पर लाने के लिए प्रयत्नशील रहती है।”
(हरापन टूटेगा नहीं पृ.-7) कथ्य, भाष, बिंग, प्रतीक की दृष्टि से रमेश
रंजक के अंतिम संकलनों... ‘हरापन
टूटेगा नहीं’
‘मिट्टी
बोलती है’
और ‘इतिहास
दुबारा लिखो’
में पूर्णता है । “धूप
में जब भी जले है पांव सीना तन गया”
(माहेश्वर तिवारी ) इससे आगे जाकर विपत्तियों से न घबराकर उनसे लड़ने की
बात करते हैं । रमेस रंजक ‘धूप
में जब भी जले हैं पांव सीना तन गया, और आदमकद हमारा जिस्म लोहा बन गया’
दोनो में शक्ति है जो सचमुच विचारणीय है ।
डॉ. कमला प्रसाद भी मानते हैं कि ‘गीतों
के लिए अब काफी संभावनाएं बढ़ी हैं । प्रासंगिक सौन्दर्य बोध से गीतकारों
का परिचय हो जाने से उन्हें जमीन की सही पकड़ हो गई है । बस्तुगत यथार्थ से
रचनाकार चुड़ने हो गई है । बस्तुगत यथार्थ से रचनाकार जुड़ने लगे हैं तथा
सामान्य जन की बाषा और शिल्प की सारवस्तु के प्रति रुचि विकसित हुई है ।
वैचारिक दृष्टि से प्रतिबद्ध रचनाकारों के लिए गीत और कविता का अंतर नहीं
रहा ।”
अगर डबराल से साक्षात्कार को किसी अंश तक सार्थक माना जाय तो निराला के
‘आराधना’
और ‘अर्चना’
के गीत भी बेकार माने जाएंगे । डबराल के अलावा कौन कवि लेखक या समीक्षक
‘आराधना’
और ‘अर्चना’
कीतों को कूड़ा कह सकेगा, फिर त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, बच्चन, सुमन,
भवानीप्रसाद मिश्र और नागर्जु तक के गीतों को, शलभ श्रीरामसिंह, माहेेशवर,
मुकुट विहारी सरोज, वीरेन्द्र मिश्र आदि सैकड़ों गीतकारों की रचनाओं को
रेखांकित किया जाय या नहीं । कहने के लिए कविता मुक्तछंद 90 प्रतिशत जनता
के दुखदर्द ,तनावपीड़ा, धुटन, संत्रास, अक्रोश और अन्य आक्रामक
मनःस्थितियों को समेटती है, परन्तु जनता की कविता कब बनीं
?
मैं इस
बात से भी सहमत हूँ कि छंदमुक्त कविताओं में कुछ ऐसी भी हैं जो अपना प्रभाव
छोड़ती हैं जिनमें तुक भले न हो पर वे लयात्मकता को ढोती हैं । उनमें
संवेदनात्मकता और प्रवाह होता है पर डबराल ने गुजरात हादसे पर एक तथाकथित
जबरदस्त कविता लिखी जो (हालांकि यह गद्य ही है ) 17 मार्च 2002
‘जनसत्ता’
दिल्ली में छपी, और बाद में ‘समकालीन
जनसत’
अप्रैल जून 2002 में भी साभार छपी
‘उद्भव
पुस्तिका’में
भी वे ही कविताएं छपीं । हाँ, यह ठीक है कि इस पृष्ठभूमि का काव्य कैनवास
रचा जाना चाहिए । (गुजरात का यह दुर्भाग्य है कि वहाँ पुनः भाजपा सरकार
बनी) तथ्य तो उजागर होने ही चाहिए पर वागर्थ 74 के साक्षात्कार में डबराल
साहब ने जो आरोप गीतों/ नवगीतों पर लगाया है क्या गुजरात से संबंधित किसी
गीत में इनकी कविता से कम फोर्श मिला । श्री अटल जी के अप्रेल -2002 की
गुजरात यात्रा से लौटने पर एक बंद द्रष्टव्य है..
“मर्माहत
जीवन का कैसा संदर्श ?
रोना धोना
कुछ भी बुबुले से कम नहीं/ हवाओं से विमर्श”
(हथेली पर अंगारे, लालसा लालतरंग) डबराल को गीतों/ नवगीतों में मात्र
मनोरंजन दिखता है, मनुष्य और समाज का हाल नहीं दिखता ,जिम्मेदारी नहीं
दिखती । और तो और सबसे बड़ा झूठ कि गीत, नवगीत लिखने वाले व्यावसायिक और
पेशेवर लोग होते हैं । यह स्पष्ट कर दूँ क् वैचारिक स्तर पर मैं डबराल से
शतप्रतिशत सहमत होते हुए भी इस मुद्दे पर बिल्कुल अलग हूँ । नई कविता या
मुक्त छंद की कविता लिखने वाले सिर्फ अपने दोस्तों, परिचितों और अपने
आलोचकों जो नई कविता ही लिखते हों की कविताएं पढ़ते हैं । उन्हें अनायास ही
अपनी योग्यता और अपने लिखने पर घमंड हो जाता है । वे गीत /नवगीत या गजल तो
बिल्कुल पढ़ते ही नहीं, हां साक्षात्कार में शेखी जरूर बघार लेते हैं और
अनाप-शनाप बकते रहते हैं । इन कवियों में मात्र 3-4 प्रतिशत कवि ही होंगे
जो अपने प्रथम काव्य संकलन से आगे किसी तरह का नयापन या काव्य में विकास की
स्थापना किए हों बाकी सभी केवल पहले के संकलनों में परिमार्जन ही करते हैं
। कथ्य में कोई बदलाव नहीं मिलता, शिल्प में थोड़ा सा परिर्वतन मिलता है ।
मैंने डबराल की तीनों पुस्तकों को दोबारा एक लंबे अरसे के बाद देखा।
अब
अगर “हम
जो देखते है”
के पृष्ठ 30 से 46 तक के लंबे-लंबे गद्य ही मानक कविता हैं तो मेरा दावा है
कि आम जनता उन पृष्ठों को पलटने में एक सेकेन्ड का समय भी नहीं लगाएगी ।
बल्कि ऐसे कवियों के लिए डबराल की ही कविता सार्थक सिद्ध होगी
“रहते
हैं इस शहर में कई सफल कवि/एक खर्राटेदार नींद के बाद वे जागते हैं/नहा
धोकर बैठते हैं कविता लिखने/टहलते हैं सिर्फ बगीचों में सोचते हुए-जो सफल
है वही कवि है । (घर का पता पृ. 49) ऐसा नहीं है कि छंद मुक्त सभी कविताएं
ही ऐसी ही हैं पर अधिकाशतः ऐसी ही हैं या फिर असहज, बौद्धिक ,ऐतिहासिक
विदेशी संदर्भों से भरपूर कथ्य और शिल्प तता बिंब में भी भारी हैं जो आम
लोगों की समझ से परे होती हैं । जगदीश चतुर्वेदी की एक कविता देखें.......
“बन
खंडोंमें आग दहक रही है और सारा देश जल रहा है
भुखमरी की
आग में-विधवाएं अपने नन्हें बच्चे को सीने से चिपकाए ताक रही है
आसमान.....कोई भी गाज भी गिरती है कि धरती फट जाए और समा जाएं तमाम संतृप्त
परिवार-चुपचाप, नींद में गाफिल हैं औघड़ भगवान”
(‘नवें
दशक की कविता यात्रा’
पृ. 40 सं. दर्शन सेठी-प्रताप सहगल शीर्षक-नए मसीहा का जन्म) यह सपाट बयान
है और सीधे सीधे गद्य है ।
अगर
गीत/नवगीतों को देखा जाय तो सभी मुद्दे,अपने सभी तत्वों के साेथ कविता की
गंभीरता को बनाए रखे हैं, संगर्ष करना,विसंगति का विरोध करना,व्यवस्था का
विरोध, आम जनता से चुड़ी समस्याओं का हाल सुनाते और उपचार बताते हुए पूरी
जिम्मेवारी निभाते हैं । पूर्ण अव्यावसायिक और गैर पेशेवर लोग हैं इनके कवि
। गीत/वलगीतों की शाश्वतता, आमस्वीकृति, मानवीय सरोकारों के प्रति इनकी
प्रतिबद्धता आदि को अस्वीकार कर अनाप शनाप, अण्ड बण्ड और निम्नकोटि की
बातें कहकर अपने अर्जित साहित्यिक प्रतिशअठा पर डबराल ने एक बड़ा सा
विचारणीय धब्बा लगा दिया है । उन्होंने देवेन्द्र इन्द्र की पुस्तकें जरूर
पढ़ी होंगी । नवगीतों /गीतों पर इधर एक से एक पुस्तकें आई हैं । इन्द्र जी
ने कथ्य और शिल्प ही नहीं दिया बल्क इस आन्दोलन में बढ़चढ़ कर संघर्ष किया
है लड़ाई लड़ी है ।
गीत या नवगीत वास्तव में आदिमतम माने गए और शायद इसीलिए आदमी के वे
“आदिम
मित्र”
भी कहके जाते हैं
“संवेदना
का तार मानव मन से जहाँ भी दूटता है या जुड़ता है वहाँ गीत पहले मानस में
उभरकर संबल देते हैं ।”
ठीक वैसे ही जैसे
‘कविता’
शब्द का मानव मस्तिष्क पर प्रथमदृष्टया जो अर्थवत्ता झनकती है वह गीत-नवगीत
या छंदयुक्त किसी अन्य विदा के रूप में ही होती है । और गद्य कविता ही
कविता कही जाय, फिर गीत, नवगी, गजलें ,मुक्तक आदि किस श्रेणी में रखें
जाएंगे
?
नवगीतों में आद्योपांत भावगत और बस्तुगत अन्विति होती है । कवि किसी एक बोध
को केन्द्र में रखकर पंक्तियों-बंदो के माध्यम से लक्ष्य और उद्देश्य को
व्याख्यायित करता चलता है । नवगीतों में केन्द्रीय कथ्य की सापेक्षता का
नियोजन होता है, परिचित परिवेश के जाने-पहचाने बिंबों के माध्यम से प्रकृति
सौन्दर्य और अन्य संवेदनाओं को स्वर दिया जाता है । एक छोटी सी
छंदमुक्तकविता उदाहरणीय है ।“जो
मैं होता/ तोता होता / तो मैं क्या होता”
(‘वचन’
पृ.62 जुन 2002) और इसी पत्रिका के पृ.-4 पर विष्णुकांत शास्त्री कहते हैं-“अब
मुक्त छंद लिखना कोई बहादुरी नहीं है । इन दिनों लिखे गए छंद अनगढ़ गद्य
के उदाहरण हैं । हिन्दी कविता में छंदों की वापसी स्वीकारी जानी चाहिए ।”
क्योंकि डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी भी मानते हैं
“....नई
कविता का अध्ययन तो और कठिन है । प्रेषणीयता का प्रश्नचिन्ह उस पर उसके
जन्म काल से ही लगाया गया है जो आज भी ज्यों का त्यों लगा हुआ है । नई
कविताओं में कुछ तो ऐसा है जो बहुत कोशिश करने के बाद भी पूरी समझ में नहीं
आता (‘कुछ
अलग से’
समकालीन हिन्दी कविता) फिर
“जो
मैं होता.....”
जैसी प्रयोगवादी किन्तु अनुपयोगी कविता का क्या अर्थ
?
क्रमशः
1,2.
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