|
कभी पारंपरिक बरतनों का साम्राज्य था
डा.तृषा शर्मा
भारतीय
संस्कृति में पकवानों की परंपरा ने इसका गौरव बढ़ाया है और पकवान
विशुद्ध
रूप से बनते हैं घरों की रसोइयों में । छत्तीगसढ़ की संस्कृति मेहमानवाजी
और पहुना-सत्कार के लिए सदियों से लोकप्रिय है । गाँवों में उत्सव और अन्य
अवसरों पर बरतन । छत्तीसगढ़ के गाँवों में आज में आज भी अनेक ऐसे बरतन
प्रचलित हैं जो व्यंजन विशेष के लिए ही काम आते हैं । छत्तीसगढ़ के इतिहास
और पुरातत्व में समृद्ध बरतनों का उल्लेख है जो यहाँ की इस परंपरा को साबित
करते हैं। शहरों में आधुनिक बरतनों ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है
और अधिकतर घरों से अब काँसे या पीतल के बरतन गायब हो गए हैं । इसके बाद भी
पारंपरिक रूप से जीवन को उत्सव जैसे जीते संयुक्त परिबारों में आज भी
पुराने बरतन प्रचलित है या उनके घरों की शान ।
विवाह समारोह में भी अनेक जातियों में आज भी इन पारंपरिक बरतनों के बिना
शादियाँ नहीं होती और ये बरतन दहेज की गरिमा को बढ़ाते हैं । फूलकाँस की
थाली में और कोपरा में जब बाराती या समधी के रिश्तेदार भोज करते हैं तो अलग
ही शान बनती है । अब न तो खाने वाले ताकतवर बचे हैं और न खिलानेवाले दिलदार
। ऐसे में ये पारंपरिक बरतन गुम होते जा रहे हैं । कहीं हैं भी तो पेटियों
में कैद दुर्लभ वस्तुओं की तरह ।
छत्तीसगढ़ में अनेक पारंपरिक बरतन और सहायक बरतनों का प्रयोग प्रचलित था।
छत्तीसगढ़ के घरों में अनाज को मापने के लिये कई प्रकार के बर्तनों का
उपयोग किया जाता है जिसे विविध नामों से जाना जाता है और उनकी मापने की
मात्रा भी भिन्न होती है । कटुवा –
अनाज मापने का का पात्र है । खांडी
–अनाज
मापने का एक पात्र होता है जो बीस काठे के बराबर होता है । काठा
–यह
भी अनाज मापने का एक पात्र होता है जिस की धारण क्षमता लगभग एक सेर के
बराबर होती है । इसी तरह कुरो भी अनाज मापने का एक पात्र है जो लगभग एक
किलो के बराबर होता है। पैली-अनाज मापने के लिए धातु का बना एक पात्र है
जिसमें लगभग एक किलोग्राम अन्न आता है । ताँबी-यह ताँबे या पीतल का घड़े
जैसा पात्र है जो लगभग एर सेर अनाज को मापने के लिये काम में लाया जाता है।
कोहई-घी मापने का एक छोटा पात्र है जिसमें लगभग एक पाव घी मापा जा सकता है
।
इसी तरह पाली भरकर रखने के लिये भी कई तरह के बर्तनों का उपयोग किया जाता
है। करिया हंडा इमसें अहम भूमिका निभाता है छत्तीसगढ़ की बुजुर्ग महिलाएँ
लड़का होने पर खुश होकर हंडा आ गया ये कहती हैं और शादी में दहेज में इसे
अवश्य दिया जाता है गुंड-पीतल आदि का बना हुआ संकरे मुँह का बरतन होता है
जो पानी रखने के काम आता है । इसी तरह गुंडी भी पानी रखने का एक पात्र है
किन्तु यह छोटा होता है । तमही एक प्रकार का ताँबे का छोटा घड़ानुमा पात्र
है । गंगार चौड़े मुँह का एक बड़ा धातु पात्र है जो पानी रखने के काम में
लाया जाता है । डंकी जिसे आचमनी भी कहा जाता है, पानी निकालने के काम आता
है । इसीतरह डुमा भी पानी निकालने का एक पात्र है ।
भोजन पकाने के लिये भी कई प्रकार के वर्तनों का उपयोग किया जाता है ।
तबेलिया-यह अल्यूमोनियम का सँकरे मुँह का बना होता है जो दाल पकाने के काम
आता है । बटलोही भी काँसे से बना हुआ एक भारी पात्र है जो सँकरे मुंह का
होता है जिसमें भात पकाया जाता है । कुड़ेरिया-पीतल का भीरी बरतन होता है
जो सब्जी बनाने में प्रयुक्त होता है । कटाव भी पीतल की बनी डंडी वाली
कड़ाही है जिसमें सब्जी पकाई जाती है । रसोईघर में और बहुत से बर्तनों की
आवश्यकता होती है जिसमें सब्जी पकाई जाती है । रसोईघर में और बहुत से
बर्तनों की आवश्यकता होती है जिसमें बगोना-जो एक चौड़े मुँह का बर्तन होता
है । बटकी–काँसे
का बना हुआ कटोरे जैसा पात्र होता है जो बनी हुई दाल या सब्जी को रखने के
काम आता है । बटुवा या बौटका भी एक धातु पात्र है जिसे तसला भी कहा जाता है
। सैकमा-यह एक प्रकार का बरतन है जिसकी तली कम गोल और मुँह काफी खुला होता
है। कोपरा-पीतल का बना हुआ होता है जो आटा गूँथने के काम आता है जिसे परात
भी कहा जाता है। पीतल की छोटी परात को कोपरी कहते हैं । खाने के लिए
प्रयुक्त होने वाले बर्तनों में टाढ़ी प्रमुख है जो फूल काँस हुई थाली है
आज भी हमारे बुजुर्ग इसी में खाना पसंद करते हैं । थरकुलिया-ये फूल काँस की
बनी हुई छोटी थाली है । बटकी-इसे कटोरी भी कहा जाता है जो दाल या सब्जी
खाने के काम आता है । माली इसे प्लेट या मलिया भी कहा जाता है लोटा-ये खाना
खाते समय पानी रखने के काम आता है । गिलास-इसे पानी पीने के लिए उपयोग किया
जाता है । बरनी-ये चीनी मिट्टी या काँच का ढक्कनदार पात्र है जो अचार या
चटनी रखने के काम आता है ।
छत्तीसगढ़ के पारंपरिक बर्तनों में सहायक बरतनों की लम्बी श्रृंखला है ।
डुआ चम्मच जैसा ही रहता है लेकिन बड़ा । इसमें अनेक आकार भी पाए जाते हैं ।
यह दाल-सब्जी परोसने के काम आता है । झारा को करछुल भी कहा जाता है । झारा
तो पूरे देश में भी प्रचलित है । यह एक छिद्रदार चम्मचनुमा बरतन है जो
चावल, इत्यादि निकालने या तलने वाली चीजों के लिए काम आता है । छत्तीसगढ़ी
चीला बनाते चम्मच जैसा ही पीतरपतिया नामक बरतन का उपयोग होता है। चीला
बनाने का तवा भी अलग ही रहता है। रायगढ़ के पारंपरिक बरतन कुछ अलग ही
प्रकार के होते हैं । परसुल सब्जी काटने का हँसिये से भिन्न आकार का औजार
है जो रसोई में उपयोग में आता है । गमेला भी एक प्रकार का बरतन जैसा है जो
कभी-कभी रसोई के भी काम आ सकता है ।
कजरौटी काजल रखने का काँसे या पीतल का पात्र है । हाथ से बनाये हुए काजल
इसमें रखने की परंपरा थी। अब तो काजल भी नहीं लगाये जा रहा है तो ऐसे
पात्रों का लोप होना स्वाभाविक है । मिट्टियों के बरतन का प्रचलन भी
छत्तीसगढ़ में होता था लेकिन इसकी चर्चा पृथक से करना जरूरी है।
अब
ये पारंपरिक बरतन प्रचलन और मंहगाई के कारण बाजार से भी गायब होते जा रहे
हैं । लोग इनके प्रयोग से बच रहे हैं और स्टील तथा प्लास्टिक के बरतन की
कीमत कम होने के कारण घर-घर में इसका ही प्रचलन बढ़ा है । संस्कृति की
पहचान पारंपरिक बरतनों के प्रचलन की पुनः आवश्यकता है क्योंकि अब हमें
शहरों से गाँवों की ओर लौटना होगा यानी पुनः उसी संस्कृति की ओर जो सामासिक
थी और भेदभाव छोड़कर इन बरतनों के साथ उत्सव मनाने का अवसर देती थी ।

|