|
|
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||||
|
|
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||||
|
|
|
||||||||||||||||
|
“कुली
!”
पुकारते ही
कोई मेरे अंदर चौंका । एक आदमी आकर खड़ा हो गया मेरे पास
सामान सिर पर लादे मेरे स्वाभिमान से दस क़दम आगे बढ़ने लगा वह जो कितनी ही यात्राओं में ढ़ो चुका था मेरा सामान
मैंने उसके चेहरे से उसे कभी नहीं पहचाना केवल उस नंबर से जाना जो उसकी लाल कमीज़ पर टँका होता
आज जब अपना सामान ख़ुद उठाया एक आदमी का चेहरा याद आया
कुंवर नारायण
हम अपने पूर्वजों की अस्थियों में रहते हैं-
हम उठाते हैं एक शब्द
और किसी पिछली शताब्दी का वाक्य-विन्यास
विचलित होता है, हम खोलते हैं द्वार और आवाज़ गूँजती है एक प्राचीन घर में कहीं-
हम वनस्पतियों की अभेद्य छाँह में रहते हैं कीड़ों की तरह
हम अपने बच्चों को छोड़ जाते हैं पूर्वजों के पास काम पर जाने के पहले
हम उठाते हैं टोकनियों पर बोझ और समय हम रुखी-सुखी खा और ठंडा पानी पीकर चल पड़ते हैं, अनंत की राह पर और धीरे-धीरे दृश्य में ओझल हो जाते हैं कि कोई देखे तो कह नहीं पायेगा कि अभी कुछ देर पहले हम थे
हम अपने पूर्वजों की अस्थियों में रहते हैं-
अशोक वाजपेयी
सारा गाँव अपने घरोंदों में रात भर जागता है चोरों की आहट सुनता है
गाँव में कोटवार नहीं है
मुर्गा है
रात बीत जाने पर आता है सब मुर्गियाँ उसी के भरोसे हैं उनके बीच वह कलगी से पहचाना जाता है
यहाँ कचरे के टापू हैं इन्हीं के पीछे से सूरज निकलता है चूजों के साथ मुर्गियाँ निकलती हैं टापुओं पर चढ़ जाती हैं
गाँव का कुत्ता कान खड़े करता है मुर्गियाँ के झुंड पर झपटता है सब की सब दड़बों में छिपती है
ध्रुव शुक्ल
दरअसल कविता आँख है जिसमें भीतर की दूनिया बाहर दिखाई देती है दरअसल कविता हथियार है जिसमें बाहर की लड़ाई भीतर लड़ी जाती है दरअसल कविता क्या है ? कविता है या आँख या हथियार दरअसल कविता एक नन्हीं गौरेया है जिसकी चोंच में सारा आकाश है डॉ. बल्देव
ममाखियों के घरौंदे में हाथ डाल और जान जोख़िम में
लाया हूँ ढेर सारा शहद
पर एक शर्त है शहद के बदले में तुम्हें देना होगा अपना सारा नमक
सुधीर सक्सेना
मुँह अँधेरे बुहारी गयी सड़क में जो चमक है- वह मैं हूँ !
कुशल हाथों से तराशे खिलौने गेखकर पुलकित होते हैं बच्चे
बच्चे के चेहरे पर जो पुलक है- वह मैं हूँ !
खेत की माटी में उगते अन्न की खुशबू - मैं हूँ !
जिसे झाड़-पोंछकर भेज देते हैं वे उनके घरों में भूलकर अपने घरों के भूख से बिलबिलाते बच्चों का रुदन रुदन में जो भूख है- वह मैं हूँ !
प्रताड़ित-शोषित जनों के क्षत-विक्षत चेहरों पर घावों की तरह चिपके हैं सन्ताप भरे दिन उन चेहरों में शेष बची हैं जो उम्मीदें अभी - वह मैं हूँ !
पेड़ों में नदी का जल धुप-हवा में श्रमिक-शोणित गंध बाढ़ में बह गयी झोंपड़ी का दर्द सूखे में दरकती धरती का बाँझपन वह मैं हूँ सिर्फ मैं हूँ !!!
ओमप्रकाश वाल्मीकि
सुबहें.................. सोनजुही-सी लगती दुपहर गुलमोहरी संझा चंपक गंध बिखेरे रातें-मधु लहरी ऐसे में गीतों की गुन-गुन रोके नहीं रुके ऊपर चंदा
लौट-लौटकर
बादल ओट छुपे भर-भर अंजुरी हवा बिखेरे ओस भरे अर्चन कहीं दूर से आये थिरकती बंशी की गुंजन खंजन नयन-रेशमी पलकें बैरागी सपने मन के तार दर्द की वीणा बंध कसे अपने यादों के सिलसिले भटकते बोझिल तनहाई कातर स्वर में सिसके जैसे हौले शहनाई हौले.... श-ह-ना-ई
रमाशंकर तिवारी
मिलकर बिछुड़ जाना बिछुड़कर मिल जाना कितना सुखद लगता है पल-पल के जीवन में हर पल अनजाना-सा लगता है
वही मसकान
वही शरारत ठिठकी-सी निगाह बहुत कुछ कह गई उस दिन उसी मोड़ पर जिस दिन मिली थी कनॉट प्लेस में तुम मिलने से पहले की दशा मैं हीं जानता हूँ तुम भी तो अनजान नहीं थी रह-रहकर फूल खिल उठता है क्यारी में बिना खाद के साथ-साथ बतियाना इतराना, छोड़ना, छुड़ाना, छेड़ना कितना अच्छा लगा था हम दोनों के यही शरारत बनी रही उम्र भर मैंने लौ पर हथेली टिका दी और तुमने हथेली में लौ सुलगा दी उसी दिन फिर उसी मोड़ पर
लालित्य ललित
|
|||||||||||||||||
|
'हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।' - महात्मा गांधी |
|
|||||||||||||||
|
|||||||||||||||||
|
|||||||||||||||||