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दूरदर्शन विषमता का जहर फैला रहा
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कमलेश्वर
भेंटवार्ताः
गिरीश पंकज
हिंदी कहानी में आम
आदमी की पीड़ा को स्वर देने तथा उसके हक की लड़ाई के लिए निरंतर सक्रिय
रहने वाले कथाकारों में कमलेश्वर का नाम सबसे आगे है। आम आदमी के कथाकार
कमलेश्वर की कहानी में एक ओर जहाँ महानगरीय विसंगतियाँ दिखती हैं वहीं
क्रमशः ह्रास होते हो
रहे
जीवन मूल्यों के प्रति गहरी चिन्ता भी परिलक्षित होती है। कमलेश्वर की
कहानियों में अधिकांश का सरोकार आम आदमी से है। समतावादी समाज की इच्छा
रखते हुए वह चाहते हैं कि आम आदमी की हालत बेहतर हो, वह अपने अधिकारों के
प्रति सजग रहे। पिछले दिनों दिल्ली में कमलेश्वर से भेंट हुई। प्रस्तुत है
महत्वपूर्ण अंश-
संपादक
प्रश्न – आपके लेखन का मूल उद्देश्य क्या है
?
उत्तर –
देश और समाज में परिवर्तन की इच्छा। मैं चाहता हूँ कि आम आदमी को ज्यादा
मानसिक संतोष और सम्मान मिल सके। क्योंकि आज के जो हालात हैं उसमें आम आदमी
सर्वाधिक असंतुष्ट है और इस कराण अलग-थलग पड़ गया है। मेरी इच्छा है कि वह
देश की मूल धारा में शामिल हो सके और यह काम लेखक बेहतर कर सकते हैं कम से
कम मैं तो सतत कोशिश कर रहा हूँ।
प्रश्न –
क्या आप समझते हैं कि लेखन का समाज पर व्यापक असर पड़ता है
?
उत्तर –
सार्थक लेखन का तो बहुत असर पड़ता है। यह सार्थक लेखन बहुत तरह का होता है।
कहानियों का ज्यादा असर होता है क्योंकि कहानियाँ ज्यादातर पाठकों को जल्दी
समझ में आती हैं। कविता में चूँकि चीजें कभी अमूर्त होती हैं, इसलिए पाठक
उसके प्रतीकों अथवा बिंबों को नहीं समझ पाता, जबकि कहानी सीधी सपाट होती
है। कहानी का असर शिक्षित एवं साक्षर दोनों वर्ग पर होता है।
प्रश्न –
लेकिन इस दौर में कुछ ऐसी कहानियाँ भी आईं जिसमें बेहद उलझाव है। कलाबाजी
के नाम पर बिंबों प्रतीकों में फंसी कहानियाँ साधारण पाटकों के पल्ले ही
नहीं पड़तीं, इसमें आपकी भी कुछ कहानियाँ शामिल हैं...।
उत्तर –
आप ठीक कहते हैं लेकिन लेखक के सामन कई बार कुछ ऐसे विषय आते हैं जिसे
सीमित कर देना उसके लिए मुश्किल हो जाता है, तब वह बिंबों एवं प्रतीकों का
सहारा लेता है, खुद मैंने ऐसा किया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एसी
कहानियाँ समझ से परे होती हैं। ऐसी कहानियाँ भी पाठकों को समझ में आती हैं।
क्योंकि इन कहानियों में भी एक जुड़ाव होता है समाज से, परिवेश से।
प्रश्न –
लेखक का किसी राजनीतिक दल से प्रतिबद्ध होना किस हद तक जरूरी है
?
उत्तर –
राजनीति में अक्सर बेहिसाब से विचार बदलते रहते हैं। जबकि साहित्य की शक्ति
आस्था में होती है। मैं चाहता हूँ कि कोई भी लेखक अपने समय और यथार्थ से
प्रतिबद्ध होने के बाद आस्था और यथार्थ से प्रतिबद्धता खत्म होती जाती है।
धीरे-धीरे लेखक अपने दल से बुरी तरह प्रतिबद्ध हो जाता है। विचार शुद्धता
इतनी संकीर्ण हो जाती है कि कुछ लोग अपनी अपनी संस्थाओं के लिए कहानियाँ
लिख रहे हैं। पार्टी के लिए मिशन तो रहता है, लेकिन रचनात्मकता नहीं रहती।
प्रश्न –
समकालीन कहानी लेखन पर आपके विचार।
उत्तर –
कुछ लोग तो बहुत अच्छा लिख रहे हैं। आम आदमी की परेशानियाँ उनकी रचनात्मकता
का आधार हैं। लेकिन कुछ कहानियों में केवल यथार्थ एवं संघर्ष के तथाकथित
नुस्खे ही नजर आते हैं। इनमें रचनाधर्मिता का अभाव है। एक परिपाटीबद्धता
है।
प्रश्न –
लेखक की कथनी और करनी के भेद पर आपका क्या मंतव्य है
?
उत्तर –
आज जो कथनी और करनी में भेद दिखाई देता है उसका मुख्य कारण यह है कि
स्थितियाँ दारुण हो गई हैं। लेखक भयानक दौर से गुजर रहा है। आर्थिक रूप से
औसत जिंदगी कठिन हो गई है। सम्मानजनक जीवन बिताना दूभर हो गया है। देश के
प्रति निश्चिंत होकर जीना मुश्किल हो गया है। इस विषम स्थिति में लेखक
जितना सोच रहा है और कर रहा है, वह बहुत बड़ा काम है। कथनी से उसकी करनी
में अगर थोड़ा फर्क दिखता है तो उसका कारण आर्थिक ही है। लेकिन वह जो लिख
रहा है वह इसलिए कि देश में वैचारिक क्रांति हो, जो अब तक नहीं हुई है।
सच्चा लेखक वैचारिक क्रांति का पक्षधर होता है।
प्रश्न –
व्यंग्य लेखन पर आपके विचार
?
उत्तर –
व्यंग्य में तात्कालिक स्थितयों को उठाया जा सकता है। व्यंग्य लेखन बहुत
सार्थक काम कर रहा है। बहुत हद तक वह कहानियों की कमी को साहित्यिक स्तर पर
पूरा कर रहा है। दरअसल व्यंग्य लेखन वैचारिक होते हुए मनोरंजक शैली है।
इससे लेखक अपने उद्देश्य को आसानी से संप्रेषित कर सकता है।
प्रश्न –
आप मूलतः साहित्यकार हैं, लेकिन पत्रकारिता से भी आजकल आपका गहरा संबंध है।
पत्रकारिता और साहित्य में मूलभूत फर्क क्या है
?
उत्तर –
साहित्य घटनाओं अथवा हादसों पर नहीं जीता, पत्रकारिता जीती है। वैसे
पत्रकारिता और साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं। लेखक को जो कुछ तात्कालिक रूप
से कहना होता है उसके पत्रकारिता का सहारा लेता है। लेकिन जो मार्मिक
स्थितियाँ होती हैं उसे वह साहित्य में उठाता है। दोनों जन-मन में जुड़े
हुए हैं।
प्रश्न –
कमलेश्वरजी, इस समय आप कुछ पत्रिकाओं में स्तंभ लिख रहे हैं, जिनमें आपका
कथाकार झलका जरूर है लेकिन स्वतंत्र रूप से आपकी कहानियाँ दिखाई नहीं पड़
रहीं, ऐसा क्यों ?
उत्तर –
कुछ कहानियाँ मेरे दिमाग में हैं, जिन्हें अवश्य लिखूँगा। अपने समय के
प्रश्नों से मुजे जोड़ती हैं और जो छन कर आता है, जो विचार, जो यातनाएं,
तकलीफें होती हैं –
वे मेरे साहित्य में काम आता है। मेरी कहानियों में मेरी पत्रकारिता का
अनुभव नजर आएगा आपको।
प्रश्न –
नए लेखकों के लिए आपका संदेश
?
उत्तर –
नए लेककों को चाहिए कि वे अपने समय के यथार्थ को पहचान कर उसकी जो अमूर्तता
है उसे तोड़ने की कोशिश करें। समाज में मूल्य एवं विश्वास इतने उलझ गए हैं
कि औसत आदमी सही गलत नहीं समझ पाता
–
इसी तात्कालिकता को लेखन में पड़े परिप्रेक्ष्य में उठाना चाहिए।
प्रश्न –
आप तो दूरदर्शन के उच्चाधिकारी रह चुके हैं तब और अब के दूरदर्शन में कितना
विकास हुआ है ?
उत्तर –
तकनीकी विकास हुआ है वैचारिक नहीं। थोड़ा बहुत जो विकास पहले हुआ था, वह
रुक गया है। पंडित नेहरु ने दूरदर्शन के लिए जो भूमिका निर्धारित की थी, वो
यह थी कि दूरदर्शन सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनेगा, लेकिन आज यह भूमिका
तो छूट गई और उसके साथ सत्ता और उद्योग का ही प्रचार चल रहा है। दूरदर्शन
के कार्यक्रम समाज में विषमता पैदा कर रहे हैं। आदमी और आदमी के बीच
मध्यमवर्गीय समाज की कमर तोड़ रहा है यह दूरदर्शन।
प्रश्न –
और ये वयस्क फिल्में ?
उत्तर –
वयस्क फिल्में दिखाने की शुरुआत दरअसल पश्चिमी दूरदर्शन का अंधानुकरण मात्र
है। वहाँ तो रात को ‘पोर्नो’
फिल्में दिखाई जाती हैं। हमारे यहां तो अभी गनीमत है। ये टीवी वाले पश्चिमी
ढर्रे पर चल रहे हैं। ये फार्मूला हिन्दुस्तान में नहीं चल सकता। जाने कब
हमारा दूरदर्शन सामाजिक उत्थान की दिशा में बढ़ेगा।

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