|
हिन्दी के
लिए विंडोज़ 98
त्यागना होगा
भेंटवार्ताः
सृजन-गाथा
भाषा-गौरव
रवि रतलामी
समकालीन हिंदी इंटरनेट में जाना पहचाना नाम है । उनकी उपस्थिति अंतरजाल पर
एक लेखक के रूप में भी है और ग़ज़लकार के रूप में भी । आप हिंदी का कोई भी
म हत्वपूर्ण
शब्द सर्च इंजन में डालिए-जानकारी खंगालने के लिए । आपको उपलब्ध कराई गई
सूची में कहीं न कहीं रवि रतलामी या रवि श्रीवास्तव का नाम और उनके द्वारा
प्रयुक्त हिंदी का काम दिख ही जायेगा । वे अंतरजाल पर उस दौर से सक्रिय
इंजीनियर हैं जब कम्पयूटर और इंटरनेट पर हिंदी देखने को लोग तरस जाते थे ।
मूलतः छत्तीसगढ़ की सोंधी मिट्टी के गंध से सने रवि ज्ञान को सीमित रखने के
आदी नहीं वे उसे संपूर्ण विश्व में बाँटने के पक्षधर रहे हैं । रवि जी
हिंदी के कई प्रतिष्ठित वेबसाईटों के नियमित स्तम्भकार भी हैं । उन्होंने
सृजनगाथा डाट काम के आग्रह पर
तकनीकी चर्चा (अंतरजाल) नामक ज्ञानवर्धक स्तम्भ लिख रहे हैं । वे दो करोड़
लोगों द्वारा प्रयुक्त और भारत के नवोदित राज्य छत्तीसगढ़ की प्रमुख
भाषा-छत्तीसगढ़ी में आपरेटिंग सिस्टम बनाने वाले प्रथम टेक्नोक्रेट हैं, इस
नाते छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ के विकास में ऐतिहासिक योगदान देने वाले भी ।
कुछ दिनों पहले ही उन्हें विश्व की सबसे बड़ी साफ्टवेर कंपनी माइक्रोसाफ्ट
द्वारा सर्वेश्रेष्ठ ब्लागर्स के रूप में अलंकृत किया गया है । उन्हें
“सृजनगाथा”
की बधाई । प्रस्तुत है उक्त अवसर पर उनसे हुई आत्मीय चर्चा
के अंश-
- आपके
ब्लॉग (http://raviratlami.blogspot.com
) को विश्व की सबसे बड़ी
सॉफ़्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ़्ट-भाषा इंडिया द्वारा सर्वश्रेष्ठ हिन्दी
ब्लॉग के रूप में पुरस्कृत किया गया है । इसके लिए सृजनगाथा परिवार से बधाई
स्वीकारें ।
रवि
रतलामी-
इंटरनेट
पर भारतीय
भाषाओं के प्रचार प्रसार के लिए माइक्रोसॉफ़्ट ने 9 भारतीय भाषाओं में
पुरस्कार दिए हैं। हिन्दी के पाँच ब्लॉगों को विभिन्न श्रेणियों में
पुरस्कार मिला है, जिनमें मेरा ब्लॉग भी शामिल है । इंटरनेट पर हिन्दी की
मौजूदगी बढ़ाने तथा हिन्दी उपभोक्ताओं को मदद करने के उद्देश्य से 2004 से
प्रायः प्रतिदिन सम-सामयिक टिप्पणियों तथा तकनीकी लेखों को इंटरनेट पर
उपलब्ध करवाने की दिशा में ब्लॉग के माध्यम से मैंने एक प्रयास किया था जो
अब भी जारी है।
-
कम्प्यूटरों के हिन्दीकरण पर भी आपने अच्छा खासा कार्य किया है
। उसकी जानकारी देना
चाहेंगे ?
रवि रतलामी
- कंप्यूटर से मैं तब से जुड़ा हुआ हूँ जब उस पर हिन्दी लिखने के जुगत
भिड़ाए जाते थे । शुक्र है कि अब स्थिति वैसी नहीं है । भारत की अधिकांश
जनता अंग्रेज़ी से नावाकिफ है और जब तक कम्प्यूटर इंटरफेस उनकी अपनी भाषा
में नहीं लाए जाते, वे कम्प्यूटरों का इस्तेमाल कभी भी नहीं कर पाएंगे ।
इसी बात को ध्यान में रख कर बहुत से स्तरों पर बहुत से कार्य किये गए हैं ।
मैंने व्यक्तिगत स्तर पर भारत की नामी संस्था इंडलिनक्स (http://www.indlinux.org)
के साथ जुड़कर स्वयंसेवी आधार पर लिनक्स अनुप्रयोगों का
अच्छा खासा अनुवाद कार्य पिछले चार वर्षों के दौरान किया है जिसके फल
स्वरूप लिनक्स का हिन्दी संस्करण तमाम विश्व में विभिन्न कंपनियों द्वारा
जारी किया गया है ।
-
हिन्दी के रचनाकारों की उपस्थिति इंटरनेट पर दर्ज करवाने के प्रयास भी आपके
द्वारा किए जा रहे हैं । जरा उसके बारे में बताइये ?
रवि रतलामी
- इंटरनेट आज के समय का सबसे सस्ता और सर्वत्र उपलब्ध प्रकाशन स्थल है।
दुःख इस बात का है कि हिन्दी का रचनाकार जगत् इस से पूर्णतः अनभिज्ञ है ।
इसके पीछे एक कारण तो यह है कि लोगों तक इंटरनेट युक्त कम्प्यूरों की सीमित
पहुँच होना है। दूसरा कारण यह है कि लोग नई तकनॉलाज़ी को अपनाने में
उत्साही नहीं हैं । इंटरनेट पर हिन्दी के लिए उपभोक्ताओं को अपना पुराना
विंडोज़ 98 ऑपरेटिंग सिस्टम त्यागना होगा । विंडोज 98 पर इंटरनेट की
यूनिवर्सल फ़ॉन्ट युक्त यूनिकोड हिन्दी चल नहीं पाती है और इंटरनेट का उचित
लाभ हिन्दी के प्रयोग हेतु नहीं मिल पाता । इसी बात को ध्यान में रख कर एक
ब्लॉग स्थल रचनाकार (http://rachanakar.blogspot.com
)
बनाया गया है जिसमें हिन्दी के तमाम रचनाकारों की रचनाओं को इंटरनेट पर
प्रकाशित किया जा रहा है जो किसी वजह से अपना वजूद इंटरनेट पर स्वयं दिखा
पाने में असमर्थ होते हैं । वैसे, स्थिति में तेजी से परिवर्तन हो रहा है,
लोग जल्दी ही सीख रहे हैं और उम्मीद है कि आने वाले समय में प्रत्येक
रचनाकार अपनी रचना इंटरनेट पर स्वयं ही प्रकाशित कर सकेगा ।
- रवि
जी, भविष्य की क्या योजनाएँ हैं?
रवि रतलामी
- मैं सदैव से छत्तीसगढ़िया रहा हूँ । यहाँ की मिट्टी की महक सदैव मुझे
आकर्षित करती है. मेरा सपना है कि छत्तीसगढ़ी भाषा में ऑपरेटिंग सिस्टम (http://cg-os.blogspot.com
) हो,
उसमें कार्य करने को अनुप्रयोग हों । गनोम 2.1 डेस्कटॉप युक्त छत्तीसगढ़ी
लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम वर्ष भर की मेहनत से तैयार हो सकता है । हमारे पास
तमाम तकनीकी कौशल इसके लिए है । हमने हिन्दी के लिए कार्य किया ही है । इस
कार्य के लिए कुछ आर्थिक संबल की आवश्यकता है। देखते हैं कब यह सपना पूरा
होता है।

|