सृजन-गाथा

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अंक-3, अगस्त, 2006   

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरणकथोपकथनभाषांतरसंस्कारपुस्तकायन

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इस अंक के प्रमुख आकर्षण

(स्वतंत्रता दिवस पर विशेष)

 

कविता

आदमी का चेहरा- कुंवर नारायण  

पूर्वजों की अस्थियों में-अशोक वाजपेयी

मुर्गियाँ- ध्रुव शुक्ल   

कविता- डॉ. बल्देव

शर्त- सुधीर सक्सेना

वह मैं हूँ- ओमप्रकाश वाल्मीकि

सुबहें सोनजुही- रमाशंकर तिवारी

उसी मोड़ पर- लालित्य ललित

 

   

 

देश का छंद

आह्वान- अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ

नवीन कल्पना करो- गोपाल सिंह  

जवानों से- बालकवि बैरागी

एक तुम हो- माखनलाल चतुर्वेदी

मेरे प्यारे देश- रामधारी सिंह दिनकर

मातृ-वंदना- राम प्रसाद बिस्मिल

देश की धरती- रामावतार त्यागी

वही हुआ करता है देश- डॉ. शेरजंग गर्ग

बढ़े चलो, बढ़े चलो- सोहन लाल द्विवेदी

चंदन है इस देश की माटी-हरिमोहन 

 

छंद

गीत-  डॉ. चित्तरंजन, महेश चंद्र द्विवेदी

ग़ज़ल- कुमार पाशी

नवगीत- प्रो.प्रेमशंकर रघुवंशी

रुबाई- गुलशन मदान

दोहाभानुदत्त त्रिपाठी मधुरेश

हाइकु- कृष्णकुमार अजनबी

 

 

भाषांतर

पंजाबी- दावा/ निरूपमा दत्ता            

गुजराती- वर्षा/जयंत पाठक   

बांग्ला- मेरा काम/ सुभाष मुखोपाध्याय

अँगरेज़ी- कोहरा/ कार्ल सैंडवर्ग         कन्नड़-तेरे न रहने से/एच. एस. शिवप्रकाश

उड़िया- हे शताब्दी /सीमा मिश्र

छत्तीसगढ़ी-अँजुरी भर घाम/चेतन भारती

वल्गारी- जाड़ा/ ईवान वाज़ोव

 

लघुकथा

हकदार- कमलेश भारतीय

टक्कर- मुकेशकुमार जैन पारस

ज़नाजे की भीड़- डॉ. सुधीर शर्मा

बजट - डा. सतीश दुबे  

 

 

बचपन

पापा जल्दी घर आना / जीवन सिंह

दो कविताए / रत्ना सोनी

बादल / दिव्या माथुर

न्दा मामा/ कीर्ति कुसुम

बाल कहानी

सबसे प्यारा उपहार / संदीप कपूर

 

व्यंग्य

नया मेघदूत / शरद जोशी

 

प्रसंगवश.....राही मासूम रज़ा

  तुलसी का रामचरित मानस

 

अंतरजाल.....रविशंकर श्रीवास्तव

-कॉमर्स में कैरियर

 

मीडिया-विमर्श..... संजय द्विवेदी

 किस पर हम कुर्बान   

 

विचार.....पं.गिरधर शर्मा

साहित्य की एक विधा है तंत्र

 

लोक-आलोक.....डा.तृषा शर्मा

पारंपरिक बरतनों का साम्राज्य  

 

हिन्दी-संसार.....पूर्णिमा वर्मन

खाडी देशों में हिंदी का विका

 

मूल्यांकन..... लालसालाल तरंग

 विश्वसनीय छांदस कविताएं

 

कृति-समीक्षा

आस्था को बल देता रचना कर्म

एकांत श्रीवास्तव/ समीक्षक-रजत कृष्ण

 

 तल्ख संदर्भों की विश्वसनीय कहानियाँ डॉ.विश्वमोहन/ समीक्षक-डॉ.बा.शे.तिवारी

 

प्रवासी  

देवेंद्र नारायण शुक्ला/ समीक्षक-वेदप्रकाश

          

 

ललित निबंधों में-

वंदे मातरम्


अमृत राय

कैसे-कैसे रसायन तूने हमारी घुट्टी में घोलकर पिलायें माँ, हम कभी उबर थोड़े ही सकते हैं । बहुत बड़ा मातृऋण है तेरा क्योंकि वही तो चीज है जिसके चलते हम सब कुछ जो हम पर पड़ती है इतने मजे से हँसते-हँसते झेल जाते हैं और चूँ भी नहीं करते। ओ3म् शांतिः शांतिः शांतिः । सब तेरी ही करामात है जो इस देश का कारखाना इतने आराम से चल रहा है, कहीं कोई रगड़ा नहीं झगड़ा नहीं।

 

 

भारत होने का अर्थ


डॉ.युगेश्वर

भारत का अर्थ है प्रकाश की खोज। ज्ञान का अनुसंधान । इसीलिये वैदिक ऋषि की प्रार्थना है तमस नहीं ज्योति की ओर । ज्योति, प्रकाश श्रेष्ठ है । तम का ठीक उलटा । केवल रोशनी नहीं । चमकदार एवं तेजस्वी रोशनी । लगता है कहीं असंख्य दीप जल रहे हैं । सनातन, शाश्र्वत दीप । ऋषि इसी दीप ज्योति की ओर बढ़ने का संकेत करता है । तमस से ज्योति को ओर बढ़ना भारत का सनातन विचार है ।

 

 

कहानियों में-

थैंक यू, अंकल


सतीश जायसवाल

मदालसा उठी और किसी के उठने सेपहले तैयार हो गई । लेकिन दुर्घटनाग्रस्त     हो गई। इस दुर्घटना ने मदालसा के मन को क्षतिग्रस्त कर दिया । लेकिन इसका असर सीधे उसके दिमाग पर पड़ा ।

 

 

मरता हुआ पेड़


शंकर

सबसे बड़ी खुशी पेड़ के हिस्से में आयी थी। उसके नीचे पूरे कस्बे में घूम-घूमकर ताबीज और चमकीले पत्थर बांटनेवाले एक फकीर ने कहीं से आकर अपना डेरा डाल लिया था और एक मेहनती जवान ने कहीं नौकरी नहीं मिलने पर एक छोटा-सा सस्ता खुला स्कूल खोल लिया था।

 

 

संस्मरण

रूपंकर मौन की यात्राः भोरमदेव

 इंदिरा किसलय

 

 

संस्कार

कविता का समाजिक संघर्ष

प्रेमशकर

 

 

कथोपकथन

 सुप्रसिद्ध कहानीकार कमलेश्वर से

गिरीश पंकज की बातचीत

 

विषम स्थिति में लेखक जितना सोच रहा है और कर रहा है, वह बहुत बड़ा काम है। कथनी से उसकी करनी में अगर थोड़ा फर्क दिखता है तो उसका कारण आर्थिक ही है। लेकिन वह जो लिख रहा है वह इसलिए कि देश में वैचारिक क्रांति हो, जो अब तक नहीं हुई है। सच्चा लेखक वैचारिक क्रांति का पक्षधर होता है।

    राजनीति में अक्सर बेहिसाब से विचार बदलते रहते हैं। जबकि साहित्य की शक्ति आस्था में होती है। मैं चाहता हूँ कि कोई भी लेखक अपने समय और यथार्थ से प्रतिबद्ध होने के बाद आस्था और यथार्थ से प्रतिबद्धता खत्म होती जाती है।

 

 

माइक्रोसॉफ्ट से सम्मानित टेक्नोक्रेट रवि रतलामी से खास चर्चा

इंटरनेट आज के समय का सबसे सस्ता और सर्वत्र उपलब्ध प्रकाशन स्थल है। दुःख इस बात का है कि हिन्दी का रचनाकार जगत् इस से पूर्णतः अनभिज्ञ है । इंटरनेट पर हिन्दी के लिए उपभोक्ताओं को अपना पुराना विंडोज़ 98 ऑपरेटिंग सिस्टम त्यागना होगा । विंडोज 98 पर इंटरनेट की यूनिवर्सल फ़ॉन्ट युक्त यूनिकोड हिन्दी चल नहीं पाती है और इंटरनेट का उचित लाभ हिन्दी के प्रयोग हेतु नहीं मिल पाता ।

 

 

 

 

पुरातन अंकों से

कहानी

 

हँसते-खेलते- शंशाक

निदान-अनंत चौरसिया

कौए के पीछे बैलगाड़ी- राजेन्द्र अवस्थी

 

 

ललित निबंध

 

सड़क पर दौड़ते ईहामृग- डॉ. एस.एस. दुबे

'रोजमर्रा'- डॉ.शोभाकांत झा

 

 

व्यंग्य

 

'एक और महाभारत'-  शशिकांत

प्रेस क्लब में रावण- विनोदशंकर शुक्ल

 

 

संस्मरण में

प्रेमचंद परिवार के जीवित सदस्यों में सबसे वरिष्ठ कृष्ण कुमार राय का लेख

 

संस्कार में

कविता का कथ्यः अंतदृष्टि और जगत-दृष्टि

 डॉ.प्रभाकर क्षोत्रिय

शिल्प, कविता का औपचारिक माध्यम नहीं है, अंतर्वस्तु का प्रतिरूप है । कविता इसी के ज़रिये मूर्त और व्यक्त होती है । वस्तु या विचार जब तीव्र अनुभूति में तरंगित होते हैं तो वे तत्काल सौंदर्य-प्रतिरूपों में ढल जाते हैं । इसलिए कविता के कथ्य को उसके शिल्प से या शिल्प को कथ्य से जुदा नहीं किया जा सकता । फिर भी अगर उनका अलग-अलग विश्लेषण किया जाता है तो केवल उनके संबंधों की पूर्णता पहचानने के लिए ही । काव्यालोचन के लिए विश्लेषण एक ज़रूरी प्रक्रिया है- ठीक वैसे ही जैसे रचना के लिए संश्लेषण ज़रूरी होता है ।

 

 

साहित्य के एकांगी प्रवक्ता और उत्सुक पीढ़ी

विजय देव

आखिर पूरा सच क्या है ? इस सच को कौन रचता है ? इसकी परिधि क्या है, आयाम क्या है ? इस प्रश्न का समुचित उत्तर जाने बिना न तो साहित्य का सच प्रकट होता है, न साहित्य की आलोचना का ।  साहित्य के नाम पर पहले पाठ्यक्रम आते हैं फिर आता है बाज़ार ! जो कुछ हासिल होता है उसमें एक तो चिकने पृष्ठों पर सस्ती फिसलन भरी कृतियां जो मनोरंजन करती हैं, मनोरंजन साहित्य की एकक विशेषता हो सकती है लेकिन सिर्फ मनोरंजन साहित्य की एक विशेषता हो सकती है लेकिन सिर्फ मनोरंजन साहित्य नहीं हो सकता ।

 

 

विचार

प्रजातंत्रः राजनीतिक शत्रुता-पर्याय तथा सीमाएं- सत्यनारायण शर्मा

 

 

कथोकपथन

डॉ.बालाशौरि रेड्डी से बातचीत

डॉ.श्यामसुंदर दुबे से अंतरंग बातचीत

 

 

  

 

 

2006 के आगामी विशेषांकों

हेतु रचनाएं आमंत्रित

प्रवासी अंक

कविता विशेषांक

हिंदी विशेषांक

लघुकथा विशेषांक

ललित निबंध विशेषांक

 

 

अपनी बातकविता