हमारे यहाँ बाबा कबीर ने सोलहवीं सदी में कहा था, ‘कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी ।’ तो उनका अनुभव और समय की माँग इसमें छलक रही थी । भाषा और संस्कृति का प्रश्न उनके सम्मुख भी मुँह बाये खड़ा होगा । लेकिन इतना अवश्य है कि यह इतने विकराल रूप में कदापि नहीं होगा । क्यों कि उनके समय में संस्कृति ग्लोबल गाँव में तब्दील नहीं हुई थी । उनकी जहाँ तक भी नज़र जाती थी अपने ही लोग दिखाई देते थे । किन्तु आज ऐसा नहीं है, परिस्थितियों ने एक नई चुनौति प्रस्तुत की है । जिसके चलते भाषा और संस्कृति दोनों के सम्मुख कई सारे प्रश्न मुँह बाये खड़े हो गये ।
अमीर खुसरू ने भी देशी बोलियों तथा उर्दू फारसी के मिलाप से ‘हिन्दवी’ भाषा की शुरूआत की जो बाद में खड़ी बोली हिन्दी तथा उर्दू के लिए एकैक केंद्रिक उद्गम सिद्ध हुई । वास्तव में लोकजीवन ही नवजागरण की दिशा तय करता है । इटली के ग्रामीण अंचल की बोली में महाकवि दान्ते ने महाकाव्य रचकर उसे इटली की राष्ट्रभाषा बना दिया । इसी तरह जायसी और तुलसीदासजी ने अवधी में महाकाव्य रचकर उसमें भाषा की मानक क्षमताओं के बीज अंकुरित किये । इंग्लैण्ड के चॉसर ने अपने क्षेत्र की अनगढ़ बोली को माँजते हुए उसे ब्रिटेन की राष्ट्रभाषा के सम्मुख खड़ा कर दिया । कहने का तात्पर्य है कि लोकचित्त, लोक व्यवहार और लोक आवश्यकताएं ही बोलियों को धीरे धीरे भाषाओं की ओर अग्रसर करती है । इस यात्रा में एक खबरदारी की ओर टी.एस. इलियेट ने आगाह करते हुए कहा है, ‘भाषा और काव्य भाषा में तीन आवाज़ें हुआ करती है । पहली आत्म ‘मैं’ की ; दूसरी ‘मैं तुम’ की; तीसरी ‘मैं तुम वह’ की । कहना न होगा भाषा संस्कृति की जबान का प्रतिरूप ही है ।
‘संस्कृति’ पर साँप सीढ़ी वाली बहस में न उलझते हुए फिलहाल हम आर्थिक सामाजिक रूपायन पर उसारी गई वैचारिक संलग्नता अर्थात कई धाराओं वाली ज्ञान की गंगाओं को तथा विचारधाराओं के कई समुच्चयों को ही संस्कृति मान लेते है ।
किन्तु वर्तमान समय की बाजारू गलाकाट प्रतियोगिता और सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में कई संस्कृतियों और उनकी भाषाओं के सम्मुख आसन्न संकट खड़ा हो गया है । तथा कुछ लोग इसी की आड़ में भाषा और संस्कृति का शिकार करने निकल पड़े हैं हालांकि यह काम बरसों बरस से अंजाम दिया जाता रहा है । आज के तथाकथित वैश्विकरण के दबाओं के चलते भाषा के सम्मुख कई सारी बदकारियाँ आन खड़ी हुई है जिसके चलते दूसरी भाषा और संस्कृति को हथियाने की मुहिम आरंभ हो चुकी है । इसी के चलते दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में दूसरे नम्बर की भाषा हिन्दी की लिपि देवनागरी पर आसन्न संकट के बादल मंडरा रहे हैं । उसके सम्मुख यह खतरा उसके अपने ही मीडिया और उस अंग्रेजीपरस्त जमात से है जो लगातार पश्चिम की ओर लोलुप नज़र से देखता है और उसी की संस्कृति में रमते हुए कभी लिपि की दुरूहता तो कभी बाजार की मांग की दुहाई देते हुए उसे अंग्रजी की बैसाखियों पर टिकाने के लिए एक सांस्कृतिक मुहिम छेड़े हुए हैं । और उसे बेजान भाषा में तब्दिल करने पर उतारू हैं और अब तो हिन्दी में अँग्रेजी की अपराजेयता का बिगुल बजाते बहुराष्ट्ीय कम्पनियों के दलालों ने, विदेशी पूँजी को पचाकर मोटे होते जा रहे, हिन्दी के लगभग सभी अख़बारों को यह स्वीकारने के लिए राजी कर लिया है कि अब इसकी नागरी लिपि को बदल कर, रोमन करने का अभियान छेड़ दीजिये और वे अब इस तरफ कूच कर रहे हैं । उन्होंने इस अभियान को अपना प्राथमिक एजेंडा बना लिया है । क्योंकि बहुराष्ट्रीय निगमों की महाविजय, इस सायबर युग में रोमन लिपि की पीठ पर सवार होकर ही बहुत जल्दी सम्भव हो सकती है । यह विजय अश्वों की नहीं, चूहों की पीठ पर चढ़कर की जानी है । जी हाँ, कम्प्यूटर माऊस की पीठ पर चढ़कर
साथ ही यह जानना भी कष्टसाधक है कि हमें भाषाई दलालों द्वारा यह दलीलें दी जा रही है कि ‘दो भाषाओं का मिलन हो रहा है ।’ जिसे ‘हिग्लिश’ कहा जा रहा है । अब यह पूरे भारत के गली कुचों में बोली जाने लगी है । दरअस्ल, यह भाषा का शार्टकट है और इसे किसी नितिगत फैसले के तहत हमारे मीडिया और कान्वेन्टी शिक्षा पद्धति को अपनाने के लिए मजबूर किया गया है । इस हेतु अरबों खरबों डारल का बजट भी खर्च किया जा रहा है । वास्तव में उनकी मंशा भाषा के माध्यम से एक पूरी की पूरी संस्कृति को कब्जाने की है । इसके लिए उन्होंने मल्टी नेशनल कम्पनियों को मुखौटे के रूप में आगे किया हुआ है । जिन्हें वे लम्बे प्रयास के चलते हमारे ही लोगों में से जयचन्द के रूप में ढूंढने में कामयाब हुए । वे ही लगातार अंग्रेजी की विरूदावलीयाँ गा गाकर गला फाड़ते रहते हैं । किन्तु ये भूल जाते हैं कि चीनी और जापानी जो कि चित्रात्मक लिपियों वाली भाषा ने अंग्रेजी की बैसाखी के बगैर ही इक्कीसवीं सदी के ज्ञान विज्ञान को अपनी चित्रात्मक लिपियों वाली भाषा में विकसित कर लिया है ।
आज जब संसार में व्यापार, तकनालॉजी, आर्थिक क्षेत्र के संदर्भ में बात होती है तो कहा जाता है कि ‘इकोनॉमी एंड टेक्नालॉजी हेज शिफ्टेड अमेरिका टू जापान । हालांकि, कुछ लोग तो अब जापान के साथ चीन का भी नाम लेने लगे हैं । क्योंकि वह शीघ्र ही सूचना टैक्नालॉजी पर कब्जा करने वाला है । जबकि हिन्दी की नागरी लिपि जो संसार भर की तमाम लिपियों में श्रेष्ठ और वैज्ञानिक है, को अंग्रेजी का रास्ता साफ करने के लिए निर्दयता के साथ मारा जा रहा हैं वे अपने धूर्त मुहावरे में बताते हैं कि अखबार इस तरह हिन्दी को नष्ट नहीं कर रहे हैं, बक्कि ग्लोबल बना रहे हैं । जिस हिन्दी को राष्ट्र् संघ की भाषा सूची में शामिल नहीं करवा सके, उसे हिंग्लिश बनाकर ग्लोबल बनाएंगे ? और हिंग्लिश बनकर, हिन्दी ग्लोबल होगी कि वह अंग्रेजी के ‘महात्स्य’ के पेट में पहुंच जाएगी ? यह भाषा के विकास के नाम पर खेला जाने वाला शताब्दि का सबसे बड़ा छल है । दअस्ल, इसी नीति के चलते वे हमें और हमारी संस्कृति को आने वाली कई सदियों तक अपने काबू में रखने का सपना संजो चुके है ।
बकोल सैम पित्रोदा देश में सिर्फ एक प्रतिशत लोग ही हैं जो अंग्रेजी जानते हैं । यह वक्तव्य कितना चैकाने वाला है कि हमें अफ्रीकी उपमहाद्वीप बनने की तैयारी करना है । प्रसंगवश यहाँ भाषिक उपनिवेश के सिद्धान्तकार का पूवोक्त कथन याद आ रहा है वे कहते हैं अभी तक हमारा ध्यान अफ्रीका पर केन्द्रीत था, अब हम एशिया पर एकाग्र कर रहे हैं । अन्त में अफ्रीका महाद्वीप के स्वाहिली लेखक की पीड़ा को भारतीय उपमहाद्वीप या कि एशिया के देशों की पीड़ा का पर्याय बनाना है । उसने कहा कि जब ये नहीं आये थे तो हमारे पास हमारी कृषि, हमारा खानपान, हमारी वेशभूषा, हमारा संगीत और हमारी कहे जाने वाली संस्कृति थी इन्होंने हमें अंग्रेजी दी और हमारे पास हमारा कहे जाने जैसा कुछ नहीं बचा । हम एक त्रासद आत्महीनता के बीच जी रहे हैं । यह वक्तव्य काफी भयावह हो सकता है किन्तु इसमें भविष्य की पदचाप अवश्य सुनाई दे रही है ।
यह भी विर्विवाद है कि जब किसी भाषा का लिखना, पढ़ना, बोलना और व्यवहृत होना कम होता जाता है तो निश्चित मानिये वह अपने आप ही प्राणहिन होती चली जाती है । उदाहरण के लिए हम हडप्पा काल और मोहनजोदारियो काल की चित्र लिपि को ले सकते है । जो आज तक भी अवकूटित नहीं हो सकी है । ऐसा लगता है लिपि से उनके अक्षर देवता कूच कर गये हैं । जिस तरह से देवताओं की पूजा अर्चना और आराधना आस्थाविहिन हो जाती है तो वे कूच कर जाते हैं जैसे ग्रीक, मिस्री, पर्शियन तथा कुछ वैदिक देवगण ।
भाषा भी मिथकों की तरह ही जन्म लेती है और मरती है । और उनके साथ संस्कृति भी । तभी तो आधुनिक युग में जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन, सुनीति कुमार भट्टाचार्य, रामविलास शर्मा तथा धीरेन्द्र वर्मा जैसे विद्वानों ने भाषा परिवारों पर बड़ा काम किया है । जो भाषिक एटलस के रूप में हमारे सम्मुख है । इसे हम भाषिक संस्कृति के आरंभिक प्रस्थान कलश कह सकते हैं । मशहूर फ्रांसीसी संरचनावादी विचारक क्लाद लेवी स्ट्स ने मिथक और भाषा तथा परिवार के ढाँचे को लेकर काफी काम किया है । और परिणामतः पाया कि इनमें समानता और सादृश्यता है ।
किन्तु आज वैश्विकरण के दबावों तले भाषा अपने रूप में भारी मन से साँस लेती नज़र आती है । और लगातार कोशिश की जा रही है कि समृद्ध भाषा या कि ग्लोबल भाषा शेष रही भाषाओं को शने शने लील जाये । अन्तरराष्ट्रीय दबाव के चलते हिन्दी के सम्मुख भी इसी तरह का खतरा मंडरा रहा है । उसकी अपनी लिपि देवनागरी को तोड़ने-मरोड़ने की कवायद आरंभ हो चुकी है । इस कार्य की सुपारी मीडिया ने ली है और वह इसमें अपनी अहम भूमिका निभा रहा है । साथ ही अंग्रेजीपरस्त जमात भी अपनी पूरी शक्ति के साथ लगी है । जबकि सच्चाई तो यह है कि हमारे भविष्य में ही हमारा इतिहास हर वक्त मौजूद रहता है । इतिहास से अलग होकर हम रह ही नहीं सकते । इतिहास से विलग होने का मतलब है सांस्कृतिक रूप से मृत हो जाना है । सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अनाथ हो जाना है । किन्तु सच तो यह भी है कि नव उपनिवेशवाद का तगादा भी यही है कि हम केवल उसकी और ही देखते रहे । उससे इतर कुछ भी न देखे । उनका तो इतना भी आग्रह रहता है कि सोचने का काम आपकों करना ही नहीं है, वह हम पर छोड़ दीजिये । हम आपके बारे में भी सोच लेंगे ।
आज अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भाषा की राजनीति खेली जा रही है । उदाहरण के रूप में हम देख सकते है कि पिछले दिनों, अमेरिका में ग़रीब लोगों की आँख खोल देने वाली पुस्तक छपकर आयी है, जिसे न लिखने के लिए सी.आई.ए. ने एक मिलियन डॉलर रिश्वत देने की पेशकश की थी । लेकिन, लेखक ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और साहस जुटाकर प्रायश्चित के रूप में लिख ही डाली यह पुस्तक ‘कन्फेशन आव एन इकोनोमिक हिटमैंन’। नोम चोमस्की और डेविड सी.कोर्टन जैसे बुद्धिजीवियों ने, लेखक को उत्साहित करते हुए कहा कि इसका प्रकाशन शेष संसार का तो हित करेगा, बल्कि, इससे अमेरिका का भी हित ही होगा । इसलिए इसका छपना जरूरी है ।
बहरहाल, पुस्तक के लेखक जॉन पांर्कन्स ने उसमें विस्तार से बताया कि किस तरह बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिये अमेरिका ने तीसरी दुनिया के ग़रीब मुल्कों के आर्थिक ढाँचे को तहस नहस कर दिया है नतीजतन वे सामाजिक सांस्कृतिक स्तर पर भी विपन्न हो गये । कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे ही बहुराष्ट्रीय निगमों और विश्व बैंक के पूर्व कर्मचारी हिन्दी के अख़बारों के ‘तथाकथित सम्पादकीय पृष्ठों पर कब्जा करते जा रहे हैं । वे इन दिनों हमारे हिन्दी के समाचार पत्रों द्वारा इस भूमंडलीय युग के चिन्तक और राष्ट् निर्माता बन गये हैं । भारत में अँग्रेजी के अश्वमेध में भिड़े ये लोग, अँग्रेजी की अपराजेयता का इतना बखान करते हैं कि सामान्यजन ही नहीं, कई राजनेताओं और शिक्षाविदों को लगता है, जैसे आर्थिक प्रलय की घड़ी सामने है और उसमें अब केवल अँग्रेजी ही सत्स्यावतार है । अतः हमें लगे हाथ उसकी पीठ पर इस आर्यभूमि को चढ़ा देना चाहिये, वर्ना यह रसातल में डूब जायेगी । इसलिए हिन्दी को छोड़ो और अंग्रेजी का दामन थामो । इस विचार ने हिन्दी के शब्दों से निर्लज भिड़न्त शुरू कर दी है और वे विज्ञापन, वाणिज्य, कानून, विज्ञान और केरियर के ग्राफ में काफी आगे निकल गये हैं । दरअस्ल, भाषा बहते नीर की तरह स्वच्छन्द होती है । लेकिन वह अपने तटबंधों को तोडती नहीं है बल्कि उनको संवारती चलती है ।
जबकि विडम्बना यह है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के धूर्त दलालों के दिशा निर्देश में, संसार की इस दूसरी बड़ी बोले जाने वाली भाषा से उसकी लिपि छीनकर, उसे रोमन लिपि थमाने की दिशा में हिन्दी के सभी अख़बार जुट गये हैं । वे हिन्दी का क्रियोलीकरण कर रहे हैं । उन्होने यह स्पष्ट धारणा बना ली है कि वे अब हिन्दी के लिए हिन्दी का अख़बार नहीं निकाल रहे हैं, बल्कि अँग्रेजी के अख़बार की नर्सरी का काम कर रहे हैं । क्योंकि, देर सबेर इसी को ही तो भारत की राष्ट्रभाषा बनाना है । प्राथमिक शिक्षा के लिए विश्व बैंक द्वारा प्राप्त धन का यही तो आख़री सुफल है, क्यों कि आगे जाकर समूचि आरम्भिक शिक्षा के कायान्तरण के कर्मकांड को पूरा किया जाना एक अघोषित शर्त है, जिसमें हिन्दी के कई अख़बार मिल जुलकर आहुतियॉ दे रहे हैं । वे स्वाहा स्वाहा करते हुए हिन्दी की आहुति चढ़ा रहे हैं । उन्होने अपने हिन्दी समाचार पत्रों में, बच्चों के लिए निर्धारित पृष्ठों पर अँग्रेजी सिखाने का श्रीगणेश कर दिया है । यह एजुकेशन फॉर आल का उद्घोष ‘इंगलिश फॉर आल’ ही है । क्योंकि, आज इ.एल.टी.(इंगलिश लर्निंग और टींचिग) उद्योग की धनराशि रक्षा बजटों के आसपास पहुँचने की तैयारी में है ।
यह भी विचारणीय है कि भाषा और संस्कृति हमारे भावात्मक मिलन की पवित्र भूमियां है । ‘भाषा’ अनेक रूपा होते हुए भी हमारी राष्ट्र्ीय एकता की प्रतीक है । हम जानते हैं कि भाषाओं में रचित साहित्य अपने समय की संस्कृति का आईना होता है । और वही भाषा के कंधे पर सवार होकर सदियों की यात्रा करता है । दरअस्ल, भाषा वह नदी है जो अनवरत बहती रहती है । संप्रेषण और संचार के माध्यम उसके लिए परों का काम करते हैं और एक किनारे से दूसरे तक पहुंचने के लिए सेतु का भी । दरअस्ल, हमें उसके भाव जगत और बौद्धिक जगत से गुजरना होता है । और यही यात्रा भावना के पंखों पर सवार होकर भाषा करती है ।
किसी भी देश और संस्कृति की ज़बान भाषा ही होती है । किन्तु भाषा के व्यावयायिक आग्रह भी महत्वपूर्ण होते हैं । इन आग्रहों के निर्वाह से ही भाषा फलती, फूलती और पनपती है । भाषा के इस बहुरूपी विकास में कई तत्व कार्य करते हैं । जिसमें मीडिया की अहम भूमिका होती है । ये ही इसमें लगातार स्पेस का निर्माण करते हैं । जो आगे जाकर भाषा के विकास की धारा को निर्धारित करता है । देश की आज़ादी के होम में महात्मा गांधी के नेतृत्व में इसी देश ने अपनी भाषा को एक महत्वपूर्ण हथियार की तरह भी इस्तेमाल किया और अंग्रेजी साम्राज्यवाद को बाहर का रास्ता दिखाया था । स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी पत्रकारिता का योगदान स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जा चुका है । ‘निज भाषा’ की शक्ति को गांधी से बेहतर कौन जानता था । कई बार तो यह भी लगता है कि इन बिचैलियों ने भी गांधी जी से ही प्रेरण ली है । क्योंकि वे भाषा की मारकता को अच्छी तरह से जान चुके हैं कि ‘इस देश में वैश्विक स्तर के आर्थिक साम्राज्यवाद की स्थापना के लिए पहले स्थानीय सांस्कृतिक पहचान चिन्हों को मिटाना होगा । भाषा को नष्ट करने की दिशा में ‘हिंग्लिश’ की शक्ल में चलाया जाने वाला यह आंंदोलन रूपी घोड़ा अटूट बाजारवाद की तरफ ही दौड़ता जायेगा । इसमें जरा भी संदेह नहीं है
किन्तु वर्तमान समय में दिक्कत यह है कि बाजारीकरण के चलते जिन पर भाषा के विकास का महत्वपूर्ण जिम्मा था वे ही उसके विनाश की सुपारी ले बैठे । और उन्होंने अपने काम को बखूबी अंजाम देना आरंभ कर दिया । इसके लिए उन्होंने हिन्दी के शब्दों को निकालकर उसके स्थान पर अंग्रेजी के शब्दों से पाट दिया । और इस तरह वे लिपि के खात्में की नर्सरी में खाद बीज तैयार करने में जुट गये ।
यह निर्विवाद है कि किसी भी देश और काल में भाषा के व्यावसायिक आग्रह महत्वपूर्ण होते हैं । इन आग्रहों के निर्वाह से ही भाषा फलती फूलती और पनपती है । मीडिया इसमें महत्ती भूमिका निभाता है । पर वह तो पहले से ही अपने निजि स्वार्थों के चलते इसकी लिपि के खात्मे की सुपारी ले बेठा है । इस कारण हिन्दी की देवनागरी के लिए यहाँ पर लगातार स्पेस कम होता जा रहा है और उसके स्थान पर ‘हिग्लिश’ को प्रतिस्थापित किया जा रहा है । और उसे भी एक निर्धारित समय के पश्चात रोमन लिपि से स्थानान्तरित किया जाना तय है । यह विश्व विजय पर निकले आकाओं के विज्ञापनों के लिए तो कारगर साबित हो सकती है किन्तु एक पूरी की पूरी संस्कृति को भी लील जायेगी इतना तय है । लेकिन इससे उन्हें कोई मतलब नहीं है, उन्हें तो केवल अपनी बेलेंसशीट के आकड़ों में भारी उलटफेर करना है । जिसके लिए वे कुछ भी करने पर उतारू हैं।
दरअस्ल, यही वह समय है जब हम सब मिलकर सोचें कि भौतिक अनेकता तो फिर भी राजनीतिक या कि परिस्थितिजन्य हो सकती है किन्तु मानव मन की तो केवल और केवल एक ही पुकार होती है मानव की भलाई । भाषा इसके लिए ज़बान का काम करती है । भावों के संचार हेतु उसे सैकड़ों हज़ारों वर्षों की यात्रा करनी पड़ती है तब कोई भाषा अपने मुकल्लमलन रूप को ग्रहण कर पाती है । और इसके साथ ही सभ्यता आकार लेती है । किन्तु भाषा को भष्ट करने की मुहिम विचारों के निष्फल करने की कवायत भी है । हमारे सम्मुख वो हिमालय खड़े कर रही है जिनके पार झांकना न केवल दुर्गम है अपितु अभेद्य भी । इन ग्लेशियरों को स्खलित होने में फिर न जाने कितनी सदियाँ लग जायेगी ।
कहना न होगा, एक सोची समझी नणनीति के तहत एक सौ बीस करोड़ लोगों के दिमाग में जबर्दस्ती घर करने के इरादे से मीडिया और कान्वेन्ट की विशालकाय फेक्ट्री में तैयार कर परोसी जा रही है एक ऐसी लिपि जो भाषाई हमलावरों के द्वारा तैयार की गई नीति का हिस्सा है । इतिहास गवाह है जिस भाषा के शब्दों को किसी नीति या कि षडयंत्र के तहत स्थानापन्न किया जाता है । वह जल्दी ही जीवाष्म में तब्दील हो जाती है । इसके दुनियाभर में कई उदाहरण मिल जायेंगे । भाषा वही जीवित रहती है जो लोक संस्कृति और लोक भाषा से अपने लिए शब्द संग्रहित करती है और उर्जा भी । वही उसके जीवन के लिए आक्सीजन भी बनते हैं । हमें अपनी लोक भाषाओं के समृद्ध खजाने की पड़ताल करनी होगी तभी हम भाषिक संस्कृति के द्विग्विजय रथ के सारथी बन पायेंगे । नही तो आने वाली पीड़ियां हमें कभी माफ नहीं करेगी । अपनी बात के निचोड़ के रूप में ‘शकील का यह शेर दृष्टव्य है,
मेरा अज्म इतना बुलंद है कि पराए शोलों का डर नहीं,
मुझे खोफ आतिश ए गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दे ।
रमेश खत्री
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