जयपुर में अदम जी मंच संचालन कर रहे थे।
यह जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन में संयोजित कवि गोष्ठी थी। मुझे कविता पढ़ने बुलाने के पहले एक किस्सा सुनाया। किसी नगर में एक बड़े ज्ञानी महात्मा थे। उनका एक शिष्य था, नाम था उसका लौकी नाथ। एक दिन लौकी नाथ मठ छोड़ कर भाग गया। ज्ञानी गुरु ने खोज की लेकिन लौकी नाथ का कुछ पता न चला। सालों के बाद उसी नगर में एक नए संन्यासी आत्मानंद पधारे। उनके प्रवचन की धूम मच गई। ज्ञानी गुरु जी अपने शिष्यों के साथ आत्मानंद का प्रवचन सुनने गए। वहां अपार जनसमूह था। नजदीक जाने पर गुरुजी ने देखा तो बोल पड़े यह तो लौकी नाथ है। किस्सा खत्म कर अदम साहब ने कहा कि मैं बोधिसत्व हो गए अपने लौकी नाथ उर्फ अखिलेश कुमार मिश्र को कविता पढ़ने के लिए बुलाता हूं।
मैं अचानक लौकी नाथ बन जाने से थोड़ा हिल-डुल गया था। लेकिन पढ़-पढ़ा के बाहर आया। दोस्तों ने कुछ ही दिनों तक मुझे लौकी नाथ कहकर बुलाया लेकिन अदम जी तो हर मुलाकात में बुलाते - का हो लौकी नाथ का हाल बा। उन्होंने कभी मुझे बोधिसत्व नहीं कहा। सोच रहा हूं कि अब कौन कहेगा मुझे लौकी नाथ। वे ही कहेंगे। और कोई सुने या नहीं मैं सुन लूंगा।
हिंदी विश्वविद्यालय की अयोध्या कार्यशाला में बड़े उछाह से सबसे मिलने आए। उनके साथ बैठकर कभी लगा नहीं कि एक बड़े कवि के साथ बैठे हैं। न वे बदले न उनकी कविता बदली, न उनका पक्ष बदला। जबकि बदलने और बिकने के लिए कितना बड़ा बाजार मुंह बाए खड़ा है। कह सकता हूं कि जो बदल जाता है वो अदम गोंडवी नहीं होता। उनसे जुड़ी कितनी बातें हैं कितने प्रसंग हैं जिनका कोई अंत नहीं है।
अयोध्या आयोजन में मैं राजसदन (कवि यतीन्द्र मिश्र के पुश्तैनी भवन) में ठहरा था। अयोध्या के जनवादी कवियों-लेखकों में उथल-पुथल थी कि मैं दल बदल कर गया हूं। अदम जी हमसे मिलने आए। लेकिन कार्यक्रम को लेकर बोले कुछ नहीं। चलते-चलते एक महीन चुटकी ली। कहा, राज सदन के मेहमान हो गए हो तो नाराज सदन को भूल मत जाना। मन में पैठ बनाने वाली सहज-सरल बातें अदम साहब राह चलते करते थे। उनके लिए कविता ड्राइंगरूम के अंधेरे कोने में किसी लैंप के उजाले में आसमान से उतरने वाली वस्तु नहीं थी।
वे भीड़-भाड़ में, जनता के बीच कविता सोचते-रचते-जीते थे। आगे के सालों में एक दिन अदम जी जेएनयू में गीता बुक सेंटर पर मिल गए। वही नागरा जूता, कंधे पर दुशाला, सदरी, कुर्ता-धोती और सजल चमकती आंखें। किसी प्रकांड शास्त्रीय संगोष्ठी से वे लौटे थे। बोले कि सब बहुत भौतिकवादी हो गए हैं, जनता की कोई बात ही नहीं करता है। बाद में पता चला कि कई वक्ताओं ने तमाम तरह के भौतिकवाद (द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक आदि) पर घोर मंथन करके उनके दिमाग का माठा मार दिया था। वे बहसों में बात को उलझाने में नहीं, सीधे कहने-करने में यकीन रखते थे। उनका विचलित होना स्वाभाविक था। उन्होंने अपना वो शेर सुनाया था,
उठाओ चाबुक तो झुककर सलाम करते हैं।
ये वो शेर हैं जो सर्कस में काम करते हैं।
वे मुंबई आए थे। किसी गजल संग्रह के विमोचन में। जहां तक याद आता है 2009 की बात होगी। उस आयोजन में मैं केवल उनको देखने-सुनने गया था। वहां उन्होंने मुझे बड़े भावुक मन से गले लगाकर भींच लिया और पूछे ‘जौन पावइ बदे देस छोड़ि के हिआ आए हो कुछ मिलता कि ऐसई गली-गली ढूंढ रहे हो।’ मैं कुछ बोल नहीं पाया। उन्होंने कहा, ‘परदेश में आए हो तो कुछ करो’। फिर दूसरी बातें करने लगे। डेरा अपना है कि भाड़े पर है। घर लेना चाहिए। अंत में बोले कि तुम्हें देख कर अच्छा लग रहा है। मैं उनसे विदा होकर निकल भागा। बाद में पता चला कि आयोजकों ने उनको किराया-भाड़ा भी नहीं दिया। छोटे-बड़े सभी शहरों में एक ऐसा तबका सक्रिय है जिनके लिए जनता और जनवाद दोनों कॅरियर बनाने का साधन हैं।
अदम की लड़ाई इस तरह के जनवाद से भी रही है। इसीलिए वे ऐसे लोगों द्वारा आयोजित समारोहों से लगातार दूर किए गए या खुद किनारे होते गए। लेकिन दूसरी तरफ जन-मन में उनका पता स्थाई हो गया। दुष्यंत कुमार के बाद ऐसा दूसरा सफल जन कवि कौन है। मुंबई में सज्जाद जहीर साहब की जन्मशती की तैयारियां चल रही थीं। उसमें मैं नादिरा बब्बर जी को कुछ सुझाव सलाह देने लगा था। मैंने इंडो-पाक कवि गोष्ठी के लिए अपनी ओर से अदम गोंडवी साहब और अष्टभुजा शुक्ल इन दो कवियों के नाम दिए, जो कि तय हो गए। बाद में पता नहीं क्या और कैसे हो गया। अदम जी और अष्टभुजा शुक्ल का नाम गायब हो गया और नए नाम शामिल हुए।
मैंने लाज के मारे अदम साहब से कहा कि वे टिकट न कराएं। तो वे बोले संसार में कोई एक ही मंच नहीं है, परेशान न हो। मैं सोचता रहा कि कैसे-कैसे लोग हैं। एक तरफ जनकवि का नाम कटाकर खुद को आगे रखने वाले किताबी लोग और दूसरी ओर बीती बात को धूल की तरह झाड़कर, छोटी बातों को भुलाकर आगे बढ़ जाने वाला जन कवि। उन्होंने आगे कभी नहीं पूछा कि क्या हुआ, कैसे हुआ। वे लल्लो-चप्पो करते तो ऐसी मन को छूने वाली बातें कैसे लिख पाते। उनके न होने को हम उनके लिखे में पा सकते हैं।
वे गए हैं लेकिन बहुत कुछ दे गए हैं। हमें कंगाल किया है तो हमारे काव्य-कोष को सदाबहार कविताओं से भर गए हैं। उनमें ऐसी कई बातें थीं जो आज इंसानियत के अजूबाघर में, कवि समाज के म्यूजियम में भी नहीं मिलतीं। नक्कालों की दुनिया में वे एक खुले पारदर्शी और सहज-सच्चे मन के कवि थे। वे रहें न रहें उनकी कविताएं रहेंगी। उनकी कथाएं रहेंगी। (भास्कर से)
बोधिसत्व
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