हर महीने डाकिया आता था, मां के दस्तखत लेता था और तीन सौ रूपयों के साथ एक सादा मनीआर्डर कूपन पकडाकर चला जाता था। एकदम खाली मनीआर्डर कूपन ! प्रकाश, मां के नाम दो लाइन की चिट्ठी भी नहीं लिखता था। मगर मां उस खाली कूपन को देखकर संतुष्ट हो जाती थी जैसे उस खाली कूपन से मां को प्रकाश के सुख-दुख का पता चलता था।
मैं पूरी तरह से नाराज हो जाता था। मां को अपने पास रखा। उसका सारा खर्च, रोग, सारी आपत्ति अभियोग, सुख- दुख सब मैं सहन करता था। जबकि प्रकाश ने कोई बोझ न उठाकर केवल तीन सौ रुपए भेजकर मां के दिल में एक अच्छी- खासी जगह बना ली थी, मैं ऐसा नहीं कर सका। पैसा ही सब कुछ होता है क्या ? मेरा मन हो रहा था, मैं गणित में अच्छे अंक पाकर सीधे मनुष्य का गणित नहीं सीख पाया जबकि प्रकाश इतिहास में अच्छे अंक पाकर मनुष्य के हिसाब- किताब में ठीक उतरता था।
मां की मृत्यु के बाद, श्राद्ध करने भी प्रकाश नहीं आया था। उसने मां का श्राद्ध मनाया या नहीं मुंडन करवाया या नहीं, यह भी पता नहीं. केवल एक चिट्ठी भेजी थी कि मां के श्राद्ध में नहीं आ पाऊँगा क्योंकि विदेश ट्रेनिंग में जा रहा हूं। उसके बाद उसने और तीन सौ रूपए नहीं भेजे। भेजने की और जरूरत भी नहीं थी।मगर प्रकाश हर समय गांव के लोगों के बीच चर्चा का विषय बनकर रहता था। अखबारों में अक्सर उसका नाम निकलता रहता था। उसने एक निष्ठावान, आदर्शवादी ऑफिसर के रूप में अपनी इमेज बना ली थी। विभिन्न जिलों में अवस्थापित होने के समय प्रायः उसका छोटे नेताओं से लेकर मंत्री, एम.एल.ए तक सभी के साथ झगडा होता था और बार-बार उसकी बदली होती थी। वह रिश्वत नहीं लेता था , गरीब लोगों के लिए उसके प्राण क्रंदन करते थे और राजनैतिक नेताओं के सामने उसका भिड़ना - ये सारी बातें ओडीशा के सभी शिक्षित और जागरूक नागरिक जानते थे।
प्रकाश की इस इमेज की बात गांव वालों ने सुनी थी। स्कूल के शिक्षक भी बच्चों को अच्छी पढ़ाई कर प्रकाश की तरह अच्छी नौकरी करने का उपदेश देते थे। अंत में हमारी गांव की मिट्टी के लिए प्रकाश गर्व का विषय था। इस गर्व के कारण प्रकाश का उसकी मां के श्राद्ध पर नहीं आने पर भी किसी को खराब नहीं लगा था। जैसे यह बात स्वाभाविक थी। सभी ने मान लिया था, प्रकाश जैसा निष्ठावान देश सेवक ऑफिसर क्या मां की मृत्यु पर आकर अपना समय बर्बाद करेगा ?
सफदरजंग से बस चलकर पहुंची थी कुतुबमीनार के पास। गाइड कुतुबमीनार का इतिहास बताने के बाद कहने लगा, “यहां हमारी बस एक घंटा रूकेगी। आधा घंटा आप कुतुबमीनार में घूमिए और आधे घंटे में पास के किसी होटल में अपना खाना खा लीजिये । उसके बाद हम चलेंगे लोट्स टेंपल और उसके बाद हमारा दिल्ली भ्रमण समाप्त।”
पिंकी कहने लगी, “यहां हम बहुत बार आए हैं। यहां अंकल एक लोहे का खंभा है। पीठ करके अगर दोनो हाथों से उस खंबे को लिपट सकते हो तो आप सबसे ज्यादा भाग्यवान आदमी होंगे। मैने और मम्मी ने बहुत कोशिश की थी। लेकिन नहीं कर पाये। डेडी ने मगर कमफर्टेबली खंबे को उलटे होकर पकड़ लिया था।”
“तुम्हारे डैडी भाग्यवान आदमी है। तुम नहीं जानती हो ?
“सभी भाग्यवान क्यों नहीं होते हैं ? डैडी तो भगवान पर विश्वास नहीं करते। मम्मी का इसलिए डैडी से कई बार झगड़ा होता है। डैडी कहते है इस दुनिया को किसी ने नहीं बनाया। मनुष्य का जन्म कैसे होता है, मृत्यु कैसे होती है, विज्ञान इन सारी बातों को जानता है. मम्मी विश्वास नहीं करती हैं। अच्छा अंकल, डैडी अगर भगवान में विश्वास नहीं करते, तो भगवान ने उनको भाग्यवान कैसे बना दिया ?”
पिंकी के इन सभी प्रश्नों के उत्तर क्या मेरे पास हैं ? प्रकाश हमेशा से प्रेक्टिकल आदमी था। मेरी पत्नी कहती है, उसके पास इमोशन, सेंटीमेंट जैसी चीजें नहीं हैं। वह बहुत हिसाब-किताब वाला आदमी है। गणित को अच्छी तरह जानता है।
गणित का अध्यापक! मैं कैसे मान लेता कि गणित में इमोशन सेंटीमेंट का स्थान नहीं है। मैने तो खोजी थी प्राइम नंबरों की निःसंगता, खोजी थी नेगेटिव नंबरों की शून्यता। देखा था शून्य का भी गणित में स्थान है. शून्य से भी अधिक और चीजें है गणित के पास। ऋणात्मक संख्या से भी बहुत प्राप्ति होती है गणित में।
उस दिन प्रकाश की चिट्टी आई कि मां- बाप के मरने के बाद और वह गांव नहीं आएगा। इसलिए उसके हिस्से की जमीन मैं कैसे भी करके गांव के महाजन रघु साहू के पास बेच दूँ। रघु साहू के पास से पैसा ले जाने की व्यवस्था वह कर देगा।
गांव की जमीन में प्रकाश एक दिन हिस्सा मांगेगा। मेरी कल्पना के बाहर था। प्रकाश के पास तो सब कुछ है। बड़ी नौकरी, रूपए, बंगला, कार, कोठी। इन सबके अलावा वह जमीन बाड़ी में हिस्सा लेगा ?
मेरी पत्नी पत्र पढ़कर गुस्सा हो गई थी। मुझे चिढ़ाते हुई कहने लगी, “जीवन का गणित करते-करते बिता दी। प्रकाश ने केवल एक ही गणित सीखा । हानि- लाभ का ! बस।”
“हाँ, मानता हूँ प्रकाश बहुत प्रेक्टिकल है। किंतु मेरी पत्नी की बात भी अतिशियोक्ति नहीं थी ? मानता हूँ प्रकाश से मैं ईर्ष्या करता हूँ, प्रकाश मेरे लिए कुछ काम का नहीं है। फिर भी वह मेरा भाई है। हम एक छत के नीचे खेलकर बड़े हुए हैं। बचपन में एक साथ खेले हैं। एक साथ लड़े -भिड़े हैं। जब एक मार खाता था तो दूसरा उसके प्रति सहानुभूति जताता था। आज बड़े हो गए हैं तो एक आदमी दूसरे की चिंता नहीं करेगा ? इतना दूर रहने से भी वह समझ नहीं पाया कि गांव की यह जमीन मेरी दुनिया चलाने के लिए कितनी जरूरी है ? वह जरूर राजी हो जाएगा अपना हिस्सा छोड़ने के लिए।
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