दिग्वलय

प्रकाशन :13-05-2011
मूल ओडिया : जगदीश मोहंती
अनुवाद : दिनेश माली
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मेरी शादी बहुत ही सामान्य तरीके से हुई थी। जन्मपत्री देखकर संबंधियों द्वारा। शादी से पहले गांव में एक पंचायत बुलाई थी। मैं शादी से पहले भले ही लड़की देखने गया था, मगर संकोचवश उसे अच्छी तरह नहीं देख सका। कुछ भी प्रश्न नहीं पूछ पाया था। घर वाले कई बार जाकर देखकर आ गए थे लड़की को। सभी ने अपनी राय दी। मेरी राय किसी ने भी नहीं ली थी। विधि सम्मत मेरी शादी हो गई थी।

बी.एड. करते समय विजयलक्ष्मी नाम की लडकी के साथ मेरी घनिष्ठता बढ़ी थी। नहीं, हमने कभी भी एक दूसरे का चुंबन नहीं किया। केवल एक बार प्रभात सिनेमा में मेटनी शो देखने गए थे। लेडीज हॉस्टल के गेट के सामने चार बजे तक गपशप करते रहे। बस यही हमारा रोमांस था। किसी ने भी मुँह खोलकर शादी की बात नहीं की थी। ट्रेनिंग के बाद एक दूसरे को चिट्ठी दने का मौका भी नहीं मिला। मगर सुहागरात को स्त्री का मुँह देखने के बाद मन में ख्याल आया था, विजयलक्ष्मी के साथ अगर शादी होती तो अच्छा होता।

मगर विजयलक्ष्मी को नहीं पाने का गम धीरे-धीरे मैं भूल गया था। पहले प्यार को केवल रोमांटिक उपन्यास के नायक ही भूल नहीं पाते हैं। मैं तो बहुत कुछ भूल चुका था। कभी भी विजयलक्ष्मी को खोने के गम ने मुझे नहीं तडपाया । जबकि प्रकाश की शादी अलग ढंग से हुई थी। उसके आई.ए.एस होने के बाद लड़कियों के पिताओं का घर पर जमघट लगा रहता था। हमे विश्वास नहीं हो रहा था कि बड़े - बड़े स्टेटस वाले लोग हमारे घर के बरामदे में जूता खोलकर पांव धोकर घर के भीतर चूडा- दही और केले खाकर तृप्त होने की जम्हाई लेने का स्वांग भरेंगे। पिताजी प्रफुल्लित होकर प्रत्येक प्रस्ताव के बाद मिलने वाले दहेज के सामानों की लिस्ट बनाने लगे। माँ सुंदर पढ़ी - लिखी बहू के पैर दबाने की कल्पना में खुश थी। मैं उस समय उनकी उन कल्पनाओं से उम्मीद नहीं करने के लिए समझा रहा था। प्रकाश के प्रेम संबंधों के बारे में मुझे जानकारी थी और जैसे मैं विजयलक्ष्मी की बात किसी को कह नहीं पाया था उसी तरह यह भूल प्रकाश न करें मैं चाह रहा था। आखिरकर वह अपनी प्रेमिकाओं में से किसी के साथ शादी कर ले। माँ और पिताजी के सारे गुणा-भाग को झूठा साबित कर प्रकाश जिसके साथ शादी करेगा, यह सुनकर मैं भी आश्चर्य चकित हो गया था। क्योंकि उसने अपने कॉलेज जमाने की किसी भी प्रेमिका के साथ शादी करने का प्रस्ताव नहीं रखा था। वरन् एक सीनियर आई .ए.एस ऑफिसर की बेटी के साथ शादी करने का प्रस्ताव रखा था। उसके निर्णय को सभी ने स्वीकार कर लिया था।कटक के बारबाटी स्टेडियम के क्लब हाऊस में शादी हुई थी। सारी व्यवस्था प्रकाश के ससुर ने ही की थी। हम सब केवल दर्शक थे। अच्छे कपड़े पहनकर गांव से जाकर कटक के एक होटल में रूके थे। शादी के दिन क्लब हाऊस के सामने हंसमुख बनकर खड़े हुए थे और अनजान अतिथि- अभ्यागत को नमस्कार करते- करते हीन मान्यता साफ झलक रही थी। शादी के बाद, सुहागरात भी गांव में नहीं मनाई गई थी। हम सभी सुहागरात के पहले ही गांव को लौट आए थे। दावत खाने की गांवों की आशा अधूरी रह गई थी। वे बाद में कानाफूसी कर रहे थे, भरोसे के साथ कह नहीं सकते। प्रकाश उस समय हमारे अंचल का सबसे उज्ज्वल रत्न के रूप में गिना जाता था।

प्रकाश शादी के बाद दो- तीन बार गांव आया था। पहली बार अपनी पत्नी के साथ फिर अकेले-अकेले। पहली बार उसकी पत्नी को लेकर हम सब चिंतित थे। बहू आएगी, रसोई करके खिलाएगी,पाँव दबाएगी, साथ में ले जाकर पास- पड़ोस में घुमायेंगे , ये सारी आशा माँ ने पहले से ही छोड़ रखी थी। बल्कि नई बहू को किसी तरह की दिक्कत न आएँ, उसके लिए तैयारी की जाने लगी। यह देखकर मेरी पत्नी ईर्ष्या में जलने लगी थी।
प्रकाश कार में आया। शायद एक रात गांव में रूका। सुबह वे लोग भुवनेश्वर चले गए थे। प्रकाश की पत्नी को मैदान जाने में असुविधा न हो, उसके लिए बरपाली पैखाना तैयार किया गया था। बांस की पट्टी से अस्थायी स्थान पर कुँए के पास बनाया गया था। प्रकाश की पत्नी ने उन दोनों का उपयोग तक नहीं किया। सुबह के नित्यकर्म करे बिना ही वे चले गए। प्रकाश ने कहा था, दो तीन घंटे में भुवनेश्वर पहुंच जाएंगे। वहां सर्किट हाऊस में रिजर्वेशन की हुई है। नित्यकर्म वहीं पर कर लेंगे।

राजघाट, विजयघाट, शक्तिस्थल इत्यादि देखने के बाद फिर हम बस में बैठ गए। बस का गाइड कहने लगा, अब हम जंतर मंतर देखने जाएंगे, वहां से एक नंबर सफदरगंज के ऐतिहासिक जगहों पर देखेंगे। वहां से 1984 मसीहा में इंदिरागांधी को उनके दो अंगरक्षकों ने गोली मार दी थी ।
पिंकी पूछने लगी, सिंहासन के लिए एक आदमी दूसरे आदमी का खून क्यों करता है, अंकल ? इतिहास की किताब में केवल सत्ता को लेकर संघर्ष। एक आदमी दूसरे को मारकर उसकी जगह पर बैठता है।

“इसलिए बेटी, मुझे इतिहास अच्छा नहीं लगता है। मनुष्यों की अवहेलना, गणित की संख्या, अंक ये सारी चीजें अपने भीतर देखने से लगता है कि इनकी भी एक दुनिया है। मनुष्यों की तरह उनको भी बहुत दुख, शोक, प्राप्ति- अप्राप्ति का चक्कर रहता है। मगर उनके जीवन में एक नियम है,एक श्रृंखला है। वे अपने स्वार्थ के खातिर कोई नियम तोड़ते नहीं है।”

“सही में अंकल ? मैथेमेटिक्स इतना इंटरेस्टिंग है ?”

“तुम प्राइम नंबर पढ़ती हो ? इंटिजर ? अलजेबरा में इंटिजर ?”

“प्राइम नंबर पढ़ी हूँ। मगर अभी तक अलजेबरा नहीं पढी।

“देख, प्राइम नंबर सबसे अकेली संख्या है, कहो ? एक को यदि हम ईश्वर या पिता कहकर पुकारेंगे तब उसको छोड़कर और कोई गुणनांक या फेक्टर नहीं। तुम बड़ी होकर पढ़ोगी इंटिजर के बारे में। वहां देखोगी जन्म से ही अनेक संख्याएं निःस्व होती है। केवल निःस्व ही नहीं, उनके पास यथेष्ट कोई वजूद भी नहीं। यह सब सोचने से मुझे कितना असहाय लगता है।”

“रियली अंकल ! मैथ में इतना चार्म है ?”

प्रकाश गणित में अच्छा नहीं था। इतिहास में अच्छे नंबर लाता था। किस साल, किस तारीख को किसका जन्म हुआ, किसकी मृत्यु हुई, कब कहां कौन सा युद्ध हुआ था, कम्प्यूटर की तरह वह बता सकता था। मेरा ठीक उलटा था। प्रकाश हर चीज में मुझ से उलटा था। पिताजी की मृत्यु के बाद एक बार गांव आया था, अकेले। उसकी पत्नी नहीं आई थी। श्राद्ध के समय मुंडन भी करवाया था। मगर तेरह दिन के बाद बिल्कुल नहीं रूका। विधवा बूढ़ी मां को मिले बिना ही चला गया था। हालांकि हर महीने मां के लिए तीन सौ रुपए का मनीआर्डर करना नहीं भूलता था।

सत्तर के दशक में, महीने में तीन सौ रूपए बहुत होते थे। मां पैसे पाकर कृत- कृत्य हो जाती थी जैसे पुत्र को जन्म देकर उसका जीवन सार्थक हो गया हो।

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 दिनेश माली
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