साक्षी

प्रकाशन :01-07-2011
मूल ओडिया : पदमज पाल
अनुवाद : दिनेश माली
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“हुज़ूर! मैं गीता पर हाथ रखकर शपथ लेता हूँ जो भी कहूंगा सच कहूंगा।”

वकील महाशय अपने चश्मे को थोड़ा नीचे करते हुए उस आदमी को देखने लगे जैसे किसी सांप ने अपना फन उठाया हो। इसके बाद सिर से लगाकर पैर तक उसका सारा शरीर ऐसे हिलने लगा जैसे वह सब समझ गया हो, जान गया हो कि वह आदमी शैतान है, झूठा साक्षी है।

“तुम्हारा नाम क्या है?”

“गिरधारी साहू”

“तुम क्या करते हो?”

“श्रीमान, कुछ नहीं।”

“तो क्या सारा समय बाजार में घूमते हो?”

“नहीं, सर। अपने काम के लिए तो समय मिलता नहीं है, मैं क्यों बाजार में खाली घूमूंगा।”

“तब सारा समय घर पर रहते हो?”

“नहीं, खेतों में मजदूरी का काम करता हूँ।”

“अभी-अभी तो तुमने कहा था तुम कुछ नहीं करते हो?”

गिरधारी हकबकाकर वकील की ओर देखने लगा। असहायता के भाव से वह कहने लगा, “मुझे और मत घुमाओ, श्रीमान। इतने लोगों, साहबों तथा वकीलों के सामने मेरा गला सूख जाता है। हृदय की धड़कन बढ़ जाती है। मुझे लग रहा है कि मैं गिर जाऊंगा! मुझे छोड़ दीजिए।”

“तुम तो उस दिन बाजार में घूम रहे थे?”

“नहीं, सर।”

“तब तुमने कुछ भी नहीं देखा?”

“नहीं, सर।”

“फिर तुम्हारा नाम साक्षी में कैसे आया?”

“सर, मेरी औरत ने मुझे रहने नहीं दिया, हर समय परेशान करने लगी।”

अचानक वकील सीधी बात पर आकर गिरधारी को और कुछ कहने का मौका नहीं देकर पूछने लगा,“तुम्हारी औरत तुम्हें जबरदस्ती साक्षी दिलवा रही है। मगर तुम उस दिन तो बाजार में थे तो तुम्हारी औरत ने कुछ देखा था।”

“माई लॉर्ड। यह पाइन्ट नोट किया जाए। गिरधारी साहू एक मिथ्या साक्षी है। वह अपनी औरत के दबाव पर साक्षी देने आया है।”

गिरधारी साहू घबरा गया। अचानक उसके मुंह से निकल पड़ा, “नहीं सर, मैं कभी भी कोर्ट-कचहरी के चक्कर में नहीं पड़ा । इन सभी जगहों पर मुझे आने में बहुत डर लगता है। मैंने इसलिए नागमणि बाबू को मना भी किया था। मैं यह काम नहीं कर सकता हूँ। मैं कुछ भी नहीं कह सकता।”

इस बार जज ने अपनी कुर्सी पर आराम से बैठते हुए सहज भाव से कहा, “नहीं, तुम डरो मत। सब सही-सही बात कहो। तुम्हारी साक्षी बहुत ही महत्वपूर्ण है।”

गिरधारी इस बार थोड़ी हिम्मत जुटाकर कहने लगा, “हुजुर, मुझसे और कुछ भी मत पूछो। मुझे छोड़ दीजिए। मेरे हाथ-पांव कांप रहे हैं। मुझे और कुछ दिनों की मोहलत दे दो, मैं सब बता दूंगा। आज....” गिरधारी हाथ जोड़कर विकल भाव से जज और वकील के सामने प्रार्थना करने लगा।

जज साहब ने नाजर की ओर देखते हुए कहा- “इस साक्षी को फिर एक बार बुलवाने के लिए तारीख़ निश्चय करो। आज उसे जाने दो।”

-“हाँ तुम जाओ।” वकील महाशय का आदेश पाकर गिरधारी साहू कृतकृत्य होकर कोर्ट को दंडवत करने लगा। जब तक वह कटघरे से नीचे नहीं उतरा तब तक वह चैन की सांस नहीं ले पा रहा था। वह अपने को ढकेलते हुए कोर्ट के बरामदे में बैठ गया।

कोर्ट के बाहर और भीतर बहुत लोग थे। बाहर कोलाहल हो रहा था। गिरधारी साहू एक घड़ी चैन की सांस लेने के बाद बेसब्री से नागमणि बाबू को खोजने लगा। लेकिन उनके अलावा बाकी सब लोग वहां दिखाई दे रहे थे। वह वकील जो उसके साथ जिरह कर रहा था,वह उससे कुछ ही दूरी पर खड़े होकर सिगरेट सुलगा रहा था। उसके पास खड़े होकर हँसते हुए उनका मुवक्किल घन राऊत कुछ पूछ रहा था। मोहरीर भी वहीं फाइल लेकर खड़ा था। वे सब लोग खुश थे। विरक्त भाव से वहां से मुंह मोड़ लिया गिरधारी ने। उसने देखा, उसके पास दो पुलिस वाले खड़े थे। वे उसको सुनाते हुए कह रहे थे,“साला डर रहा था। घर में इतने कानून कायदे दिखा रहा था, जैसे दुनिया का सारा कानून जानता हो। यहां साला दूसरों के खर्चे से आया केस को बिगाड़ने के लिए।”

“अरे तूने उसका मर्डर होते समय देखा नहीं था?”

“गिरधारी खड़ा होकर कहने लगा, “हाँ, सर, देखा था।”

“देखा था तो और पत्नी ने कहा, मां ने कहा, बाप ने कहा क्यों कह रहा था, बे?” पुलिस वाले क्रोधित हो गए थे।

“सर, मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था।”

“साला, उधर से कुछ माल मिला है क्या?” एक पुलिसवाले ने अंगुलियों को परस्पर रगड़ते हुए कहा ।

“सर, जगन्नाथ की सौगंध। यहां धर्म-कोर्ट कचहरी लगी हुई है। ये सारी बातें गिरधारी के लिए नहीं है।”

और कुछ सुनने के लिए पुलिस वाले राजी नहीं थे। गिरधारी हताश हो गया और मुंह घुमाकर आवाज देकर नागमणि बाबू को खोजने लगा। उसके पास न तो गांव जाने के लिए पैसे थे और न ही खाना खाने के लिए। क्या करेगा, वह समझ नहीं पा रहा था। वह केवल आत्मग्लानि से भरकर छटपटाते हुए नागमणि बाबू को खोज रहा था।

उसके इतने पास कोर्ट बरामदे में जो नागमणि बाबू खड़े हुए थे देखकर वह अपने आप पर विश्वास नहीं कर पा रहा था। वह उनको देखते ही अपने आपको अपराधी सोचने लगा। उसके पास जाने का साहस और इच्छा नहीं थी। वह वहां केवल इधर-उधर हो रहा था।

“गिरिया भाई, आओ खाना खाएंगे।” कुछ समय बाद उसे नागमणी बाबू का सूखा स्वर सुनाई पड़ा और वह चलने लगा। गिरधारी उसके पीछे- पीछे चलने लगा।

वे दोनों अन्नपूर्णा होटल के अंदर चले गए। बाल्टी से मग में पानी लेकर हाथ मुंह धोकर एक लंबे बेंच और डेस्क के बीच में बैठ गए।

“नागू बाबू! भले ही आपको झूठ लग रहा हो, मगर मेरे लिए सत्य बात है, मेरा दिमाग खराब हो गया था।” गिरधारी अपने आपको समझाने की कोशिश करने लगा। “लक्ष्मी को छूकर कह रहा हूं अगर झूठ कहता हूं तो सात पीढ़ी तक खाने को अन्न का दाना नसीब न हो।”

“क्या खाओगे? मछली!” नागबाबू सारी बात अनसुनी करते हुए पूछने लगे।

ऐसा व्यवहार देखकर गिरधारी के खाने की इच्छा नहीं हुई। वह नाराजगी और पश्चाताप के स्वर में कहने लगा, “आप मुझ पर नाराज हो?”

“बेटे के मरने के दिन से मैं और आमिष नहीं हूँ। एक आमिष और एक निरामिष मील।” नागूबाबू ने बैरे को आदेश दिया।

गिरधारी रोने जैसे हो गया। वह अपने को खूब छोटा समझकर कहने लगा, “जो हो गया सो हो गया, नागूबाबू! जो भूल होनी थी वह हो गई। तुम्हारे साथ आने से न तुम्हारा न मेरा, किसी को कुछ भी फ़ायदा नहीं हुआ। घर जाकर मुझ पर किया हुआ खर्च मैं तुम्हें लौटा दूंगा।”

नागूबाबू, पहला कौर मुंह में डालते-डालते रूककर गिरधारी साहू की तरफ देखने लगे। वह भारी आवाज में कहने लगे, “हाँ, अगर तुम मेरे सारे पैसे लौटा दोगे तो भी मेरे बाईस साल के बेटे को नहीं लौटा पाओगे।”

गिरधारी मुट्ठी भर चावल को चुपचाप मसलने लगा।

“तुम चाहते तो जो कुछ देखा था कोर्ट में कह सकते और उन दुष्ट लोगों को दंड मिलता। जो तो तुमने कही नहीं। पता नहीं क्यों, वे सारी बातें नहीं कही, क्या तुम सोचते हो मुझे पता नहीं है? मुझे सब पता है।”

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 दिनेश माली
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