मुझसे कलम छीन लेता है
मेरा डेढ़ बरस का बच्चा.
लौटाता है नहीं प्यार से
आँख दिखाने पर भी
डाँट-डपट बेमतलब उसको
नही किसी का डर भी
उसकी भोली शरारतों के आगे
हर प्रपंच है कच्चा।
लौटाने को कलम बढ़ाकर
हाथ खींच लेता है
“बिल्ली कलम ले गई” कहकर
कहीं छिपा देता है
“गंदा” कहने पर कहता है
“पापा गंदे है,” मैं अच्छा।
पन्नों पर बुन देता है वह
रेखाओं के जाले
और गौर से देखे जैसे
गहरे अर्थ निकाले
समझ नही आते आएंगे
व्यवहारों में खाते गच्चा।
जैसे-तैसे कलम छीन लूँ
लिखने बैठूँ कविता
कभी ताल में आ सकती है
नदी सरीखी शुचिता
रचना, ज्ञान कहाँ दे सकते
बाल-सुलभ मन-सा सुख सच्चा।

मेरा डेढ़ बरस का बच्चा.
लौटाता है नहीं प्यार से
आँख दिखाने पर भी
डाँट-डपट बेमतलब उसको
नही किसी का डर भी
उसकी भोली शरारतों के आगे
हर प्रपंच है कच्चा।
लौटाने को कलम बढ़ाकर
हाथ खींच लेता है
“बिल्ली कलम ले गई” कहकर
कहीं छिपा देता है
“गंदा” कहने पर कहता है
“पापा गंदे है,” मैं अच्छा।
पन्नों पर बुन देता है वह
रेखाओं के जाले
और गौर से देखे जैसे
गहरे अर्थ निकाले
समझ नही आते आएंगे
व्यवहारों में खाते गच्चा।
जैसे-तैसे कलम छीन लूँ
लिखने बैठूँ कविता
कभी ताल में आ सकती है
नदी सरीखी शुचिता
रचना, ज्ञान कहाँ दे सकते
बाल-सुलभ मन-सा सुख सच्चा।
शशिकांत गीते
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