दिन हुआ बूढ़ा हलाकू

प्रकाशन :23-03-2012
शशिकांत गीते
हो गया है
इन दिनों क्यों
बेवज़ह मौसम लड़ाकू।

हो चली है
ख़त्म सारी
मान्यताएँ सुबह की
चल पड़ी हैं आँधियाँ
सर्द औ’
गूँगी ज़िबह की
सड़क पर दौड़ता
पागल समय
ले हाथ में चाकू।

ढल गई है
दोपहर
अपनी छिपाए प्रौढ़ता
सूर्य
ठंडी धूप का
आँचल नहीं है छोड़ता
साँझ के चिन्ह
चेहरे पर
दिन हुआ बूढ़ा हलाकू।


  शशिकांत गीते
 
         
टिप्पणी लिखें

 

लेखक की प्रविष्टियाँ

वाक्यांश खोजें





Bing


Site Search Site Search