नक्सलवादी कविता: दूसरा दौर

प्रकाशन :18-12-2010
श्रीप्रकाश मिश्र
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आलोकधंवा की कविता की कुछ मीमाँसा हम पहले कर आए हैं। उनकी एक कविता है 'कपड़े के जूते'। उसकी कुछ पंक्तियाँ हैं:

जब तारे छिटकने लगते हैं/ और शाम की टहनियाँ उन पुराने जूतों में भर जाती हैं/ तो उन्हीं धुंधले और ख़तरनाक रास्तों पर स्वप्र के/सूदूर चक्के तेज़ घूमते हुए आते हैं और/आदमी की नींद में रोशनी और जड़े फेंकते हुए / कहाँ-कहाँ फेंक दी गई और छोड़ दी गई और /बेकार पड़ी चीज़ों को एक /हरियाली की तरह बटोर लाते हैं। जो सबसे बाद की कविता मेरे सामने हैं उसकी आरंभिक पंक्तियाँ हैं:

जब चांद के नीचे/ जंगल पुकार रहे थे जंगल को/ और पीछे छूट गए बारहसिंगों को/निर्जन मोड़ पर ऊँची झाडिय़ों में /ओझल होते हुए/ क्या वे अभी तक बचे हुए हैं/ पीली मिटटी के रास्ते और खरहे... आलोकधन्वा तो पहले ही दौर के सम्मानित कवि रहे हैं, दूसरे दौर में जो कवि सामने आए उनमें मदन कश्यप का विशेष नाम है। इस अति यथार्थवादी रंग को वे भी अपनाते हैं लिखते हैं-

हिमालय को हिमालय की जगह ही रहना चाहिए/ और समंदर को समंदर की जगह/ नदियों को इसी तरह बहकर आना चाहिए, हिमालय से समंदर तक...

वहाँ से निकलकर ठंडी हवाएं वेशक आएं हम तक/ पर देवदार के जंगल को/ देवदार के जंगल की तरह ही होना चाहिए और/ घाटियों को घाटियों की जगह यहाँ भी यथार्थ को देखने का अंदाज वही है। कोई आशा इस पैमाने में ढलकर क्या रुप लेती है, उसका एक उदाहरण है निलय उपाध्याय की कविता का यह अंश:

इसके पहले कि/निरर्थक चकाचौंध हमारे रक्त में समा जाए/ इसके पहले कि हमारी चीखों पर बज उठे उत्सवधर्मी नगाड़े/चलो, चलो पोंछ लें पांव के निशान और लौट चलें/ ग्रह नक्षत्रों और जीवन के महान आकर्षण के बीच/चलो पड़ताल करें वह रास्ता जो/आगे बढऩे की होड़ में कहीं छूट गया है।

इस दौर की कविता के रचाव का एक दूसरा सिरा भी है। उसे हम वीरेन डंगवाल की कविता में देख सकते हैं। लिख तो वे काफ़ी समय से रहे थे, लेकिन सही पहचान बनी 1991 में जब उनका संग्रह 'इसी दुनिया में' आया। उसकी पहली ही कविता का अंश है

कैसी ज़िंदगी जिये/ अपने ही में गुत्थी रहे/ कभी बंद हुए कभी खुले/ कभी तमतमाए और दहाडऩे लगे/ कभी म्याऊँ बोले/ कभी हँसे/ दुत्कारी हुई खुशामदी हंसी/अक्सर रहे ख़ामोश ही/ अपने बैठने के लिए जगह तलाशते घबराए हुए । ज़ाहिर है कि इस कविता के अर्थायन के लिए कुछ अलग से नहीं कहा जाना है कोई निहितार्थ नहीं खोला जाना है। सबकुछ एकवाचन में भी स्पष्ट होने लगता है।

(3) इस कविता ने कविता के लिए कई नए थीम दिए। विषय वस्तु दिए। यह कविता की वापसी का प्रभाव ही था कि स्त्री, लड़कियाँ, बुआ, दिदिया, माँ, बाप जैसे रिश्ते चिडिय़ा, पेड़, बच्चे जैसी मासूम उपस्थितियाँ, जूते, हाथ, कारीगर जैसे उपकरण इस कविता में आए। लेकिन ताव भिन्न था। गोरख पांडेय ने चिडिय़ा को लेकर चिडिय़ा में भी गानेवाली मैना को लेकर भोजपुरी में एक गीत लिखा: एक दिन राजा मर लें आसमान में उड़त मैना/ ताहि के घरे ले आइलें मैना ना। आगे बताया कि राजा ने उसे कुंवर को खेलने को दिया, कहा कि यह उड़ती है, नाचती है, गाती है, कुंवर बड़े खुश हुए कि यह तो बहुत सुपर खिलौना है। एक दिन खेलते-खेलते कुंअर ने उसकी पांख नेाच डाली और कहा कि अब तू उड़ मैना।' इसी तरह एक दिन पाँव तोड़ दी और कहा कि अब तू नाच मैना। इसी तरह एक दिन नटई दबा दिया और कहा कि 'अब तू जाव मैना।' गीत में उन्होंने सामंती समाज में स्त्री के दर्द को चित्रित किया। थोड़ा ध्यान दें तो यह किसी भी पुरूष वर्चस्व वाले समाज में स्त्री के दर्द का चित्रण है। मैना का यदि प्रजा से, जनता से पहचान करें तो यह पूरे वर्ग का दर्द है। चिडिय़ा के प्रतीक और वास्तविकता को जितना विस्तृत फलक इस कविता में मिला, वह कविता की वापसी से जुड़ी कविता में दूभर है।

फिर भी इस दौर के नक्सलाइट ग्रुप के सभी कवियों की कविता में चिडिय़ा ऐसी नहीं है कौवा पक्षी के घराने का ही प्राणी है। उसे लेकर वीरेन डंगवाल लिखते हैं- वे जमा हो रहे हैं चारों दिशाओं से/ गलीज फडफ़ड़ाहट से भरा है आकाश/ जैसे उनका डैना हो फकत ऐसी ख़ुशी।

कृतज्ञता पलती है/उनकी पिद्दी सी देह में/तंदुरुस्ती की तरह।

निश्चय ही कौआ यहाँ संघर्ष का प्रतीक नहीं है। न ही मासूमियत का। यदि कोई भाव पैदा करता है तो वितृष्णा का, बीभत्सता का। इसका उत्तर बह शोषक वर्ग का भी नहीं हे। तो भी जीवन में कौआ तो है ही और यहाँ उसके एक रूप का वर्णन है। ऐसा ही रुप निर्माण पहले दौर की कविता में जो जुझारुपन था उसे भोथर करता है। वीरेन डंगवाल इससे हटते हैं तो वे सौंदर्य के एक दूसरे छोर पर पहुँच जाते हैं- इस तरह बदहवासी में मत टकराओ गौरैया/ खिड़की के काँच से शीशे से/ तुम्हारी चोंच टूट जाएगी/ और नाख़ून उचट जाएंगे।

मुझ पर संदेह मत करो गारैया/लो, मैं खिड़की खोलता हूँ/ जाओ, बाहर उड़ जाओ/ धूप में अपने बदन को फुलाओ/ और मटमैली ऊन का गुच्छा बन जाओ।

निश्चय ही यहाँ गौरैये को मुक्त करना आदमी के दुख को मुक्त करने जैसा नहीं है जो गोरख पांडेय का अभिप्रेय होता।

इसका मतलब यह नहीं है कि वीरेन डंगवाल जन संघर्ष में डूबे कवि नहीं हैं। वे कविता में एक नया विषय लाते हैं हाथी। हाथी सामान्यत: शुभ और शक्ति का प्रतीक है। उसे वे जनता से प्रतीकित करते हैं। शक्ति के रूप में भी और किसी दूसरे के हाथ में अशुभ से नियंत्रित हो जाने में भी। उसे चेताते हुए कहते हैं।

ऐसे भी भोले ना बन जाना साथी/ जैसे होते हैं सरकस के हाथी/

हाथी के उपकरण बन जाने पर वे बड़ी मारक कविता लिखते हैं: पकड़े जाने के बाद/ हाथी के बदन, ताक़त और/ उन दाँतों का इस्तेमाल मालिक करते हैं/ जिन्हें हाथी ने बनाया था/ बहुत मेहनत और प्यार के साथ

व्यक्तिगत जीवन में दुख की गठरी और संबंधों के जीवन में सबकुछ लुटा देने वाली स्त्री की परंपरागत, सामान्यीकृत और समाँतर कविता की छवि से मुक्त होकर इस कविता में स्त्री आई तो उसकी एक नई छवि गढ़ी गई एक स्वतंत्र छवि रिश्तों से दूर रखकर उसे स्वायत्त बनाया गोरख पांडेय ने उसे दुख का भोक्ता ही नहीं संघर्ष में कूद पडऩेवाली भी चित्रित किया था। दोनों में संतुलन बनाकर और उसके लिए थोड़ा निरपेक्ष रहते हुए दूसरे कवियों ने उसकी भिन्न-भिन्न छवि गढ़ी। निलय उपाध्याय ने उसकी छवि श्रम में देखा लिखा: चूल्हा फूँकते/झुकी हुई पीठ हो तुम/ गोइठे की मद्धिम आँच पर/ रात को/ रोटियों सी गोल करती तुम।

वीरेन ने लिखा: अपने नरक की बेतरतीबी में ही ढूंढेगी वे अपनी अपरिहार्यता की तसल्ली, खीझ भरी /प्रसन्नता के साथ

आलोकधन्वा ने लिखा: सिर्फ़ जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है/ वह कुछ भी कर सकती है/ कितना आतंकित होते हो/ जब स्त्री बेख़ौफ़ भटकती है /ढूँढती हुई अपना व्यक्तित्व/एक ही साथ वेश्याओं, पत्नियों और प्रेमिकाओं में ज़ाहिर है कि यह कविता चरित्रहीनता, निर्लज्जता, विज्ञापन के लिए देह और परिवार की टूट का दर्शन नहीं गढ़ती जैसा कि बुर्जुआ स्वीकार करता है । उसने तो नारी मुक्ति की उष्मा को ही छीन लिया है। यह कविता श्रम और संघर्ष के वृहत्तर और उच्च मूल्य में स्त्री की भागीदारी रेखांकित करती है। बलिदानी भावना, औदात्य, जीवन के विभिन्न रूपों और प्रश्नों के प्रति ममत्त्वपूर्ण आत्मीयता कात्यायनी की कविता की स्थाई सामग्री बनकर उभरीं। रेनू शुक्ल ने लिखा कि घर गृहस्थी, चूल्हा चौका भले ही भारतीय स्त्री की अब तक स्थाई चित्र गढ़ा हो, आज वह उद्दाम जिजिविषा को लेकर आगे बढ़ रही है। उनके कविस्वर में जो उष्मा और लय है, उसे अलग से लक्ष्य किया जा सकता है, लिखती हैं: आइल क्रांतियाँ तोहरे द्वारे लपक के पकड़ बबूनी/ साड़ी छोड़ लहंगा छोड़, छोड़ टिकुली नथुनी/ पेंट पहिरी के गोती मार, दांव से तोड़ थुथुनी/आगे-आगे बासंमती हुई पीछे से अईहें रघुनी उन्होंने परंपरा से बंधकर जीवन जीने के नाम से मुक्त करने की बात कही है। इस तरह की तुलना लगभग सभी काव्य को लेकर किया जा सकता है।

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 श्रीप्रकाश मिश्र
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