नदी नहीं जानती

प्रकाशन :01-11-2007
‘माह के कवि’ क्रांति

नदी नहीं जानती

‘माह के कवि’ क्रांति
 
 
मैं जानती हूँ

नदी के किनारे अब नहीं हैं

मेरे क़दमों के निशान

नदी मगर नहीं जानती

कि मेरे पाँवों में लगी है

आज भी रेत उसकी



कितना अच्छा लगता है

किसी से यूँ भी जुड़े रहना
 
 

 

  

 
         
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