नवगीत भारतीयता और आधुनिकता का काव्य-रूप है:माहेश्वर तिवारी

प्रकाशन :08-01-2012
योगेन्द्र कुमार वर्मा ‘व्योम’
हिन्दी साहित्य में जब-जब नवगीत की संवेदना और युगीन संदर्भों के साथ-साथ भाषागत सहजता व आंचलिक मिठास की चर्चा होती है, हिन्दी नवगीत के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के सृजनात्मक उल्लेख के बिना न तो वह पूर्ण होती है और ना ही उस चर्चा का कोई महत्व रहता है । हिन्दी नवगीत के वह महत्वपूर्ण और अद्वितीय हस्ताक्षर श्री माहेश्वर तिवारी हैं । 22 जुलाई 1939 को बस्ती (उ.प्र.) में जन्मना श्री तिवारी की अब तक 4 नवगीत कृतियों - ‘हरसिंगार कोई तो हो’ , ‘नदी का अकेलापन’, ‘सच की कोई शर्त नहीं’ और ‘फूल आए हैं कनेरों में’ के अतिरिक्त नवगीत की कई पांडुलिपियाँ प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं । नवगीत के संदर्भ में श्री तिवारी से महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर बातचीत की युवा गीतकवि योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ ने - संपादक।

नवगीत आपकी दृष्टि में क्या है और इसकी क्या-क्या शर्तें व मर्यादायें हैं ?

 नवगीत भारतीयता से जुड़ा और आधुनिकता तथा वैज्ञानिक बोध से जुड़ा वह काव्य-रूप है जो छायावादोत्तर गीत-धारा से, गेयत्व को छोड़कर शेष सभी रूपों में आधुनिक मनुष्य का गीत है । इसमें प्रेम के नाम पर न तो मध्यकालीन परकीया भाव है और न कुहासे से भरी कल्पनाशीलता । इसमें सजग सामाजिक बोध और घर-आँगन का विश्वसनीय चेहरा है । आधुनिकता से उपजीं विकृतियों के प्रति भी चौकन्नी जागरुकता, राजनीतिक, आर्थिक विसंगतियों के प्रति एक प्रतिपक्ष का भाव तो इसमें है ही, सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें भारतीय संस्कृति और देशी ज़मीन के प्रति गहरे सरोकार भी हैं । यह समकालीन अन्य तमाम रूपों की तरह आयातित काव्य-रूप नहीं है । यह निजत्व से जुड़ा होकर भी उस आत्माभिव्यक्ति से मुक्त है जो कभी-कभी कविता के धरातल से खिसककर डायरी के रूप में सामने आ जाता है ।

आपका सबसे प्रथम् नवगीत कौन सा था तथा कब और कहाँ प्रकाशित हुआ ?
मैंने जिस समय गीत लेखन आरंभ किया उस समय ‘नवगीत’ शब्द चर्चा में नहीं था । तार-सप्तक के कवियों ने तथा उससे बाहर के प्रयोगवादी व नई कविता के कवियों ने जो गीत लिखे उन्हें कुछ समय तक नई कविता के गीत और नया गीत के नाम से जाना-पहचाना जाता रहा । सन् 1960 के बाद नए गीत कवियों की रचनाओं के लिए ‘नवगीत’ शब्द केन्द्र में आया । मेरे जिस गीत को लेकर मुझे नवगीतकारों में शामिल किया गया, वह है - ‘आओ हम धूप-वृक्ष काटें/इधर-उधर हल्कापन बाँटें’ । यह गीत पहली बार वाराणसी से प्रकाशित ‘मराल’ पत्रिका में सन् 1964 में छपा और चर्चित हुआ ।

गीत से नवगीत तक की यात्रा में हिन्दी कविता ने कौन-कौन सी उपलब्धियाँ हासिल कीं ?
कई पड़ाव आए गीत से नवगीत तक की यात्रा में, गीत कभी प्रगीत बना, स्वच्छंदावादी गीत बना और फिर वह सन् साठ के बाद नवगीत बना । गीतों में प्रकृति-मनुष्य से अलग एक इकाई थी किन्तु नवगीत में वह सहचरी बन गई । भवानी प्रसाद मिश्र के गीत ‘सतपुड़ा के घने जंगल/ऊँघते अनमने मंगल’ और ‘आज पानी गिर रहा है/घर नयन में तिर रहा है’ जिस नए गीत की आहट देते हैं वह गीत से नवगीत के प्रस्थानक बिन्दु के रूप में स्वीकारा जा सकता है । इस अंतर को तत्कालीन ‘नीरज’ और वीरेन्द्र मिश्र के गीतों के माध्यम से भी जाँचा परखा जा सकता है । वीरेन्द्र मिश्र ने अपने पीड़ा वाले गीत में कहा है - ‘पीर मेरी कर रही ग़मगीन मुझको/और उससे भी अधिक तेरे नयन का नीर रानी/और उससे भी अधिक हर पाँव की जंजीर रानी’ जबकि नीरज लिख रहे थे - ‘देखती ही न दर्पण रहो प्राण तुम/प्यार का यह मुहूरत निकल जाएगा’ । गीत वैदिक ऋचाओं के रूप में उपजा और वह लोक जीवन तथा लोकमानस से होकर नवगीत तक आया । कुछ लोगों का मत है कि नवगीत नई कविता की अनुकृति से उपजा, यह मिथ्या भ्रम है । महाप्राण निराला की सरस्वतीवंदना में ‘नव-गति, नव-लय, ताल छंद नव’ ही नवगीत का बीजमंत्र कहा जा सकता है ।

कहा जाता है कि नई कविता से मुकाबले के लिए गीत को नवगीत का आवरण ओढ़ना पड़ा, क्या पारंपरिक गीत में वह सामर्थ्य नहीं कि वह नई कविता को ललकार सके ?
नवगीत नई कविता से मुकाबले के लिए ओढा गया कोई आवरण नहीं है । कविता के इतिहास में यथार्थ के दबाव से इसका जन्म हुआ । तब स्वच्छंदतावादी धारा में लिजलिजी भावुकता या देहवादी आकुलता से सराबोर रोमानी गीत लिखे जा रहे थे जो गाने के लिए तो ठीक कहे जा सकते हैं, जीने के लिए नहीं । जब पूर्ववर्ती परंपरावादी गीत जीवन-यथार्थ, ऐसा यथार्थ जो बेडरूम के यथार्थ से अलग त्रिलोचन शास्त्री के शब्दों में, ‘मुझे जगत जीवन का प्रेमी/बना रहा है प्यार तुम्हारा’ वाला यथार्थ था, से अपना मुँह मोड़कर खड़ा था, नई कविता के लोग जिस गीत को केन्द्र में रखकर गीत-कविता को धकियाते और गरियाते रहे वह नई कविता को ललकारने की स्थिति में ही कहाँ था ।

स्व. डॉ.शम्भूनाथ सिंह द्वारा संपादित नवगीत दशक श्रंखला तथा नवगीत अर्द्धशती के संदर्भ में कहा जाता है कि इन ऐतिहासिक समवेत संकलनों में तत्कालीन कुछ महत्वपूर्ण नाम सम्मलित नहीं हो सके, इसकी क्या वज़ह रही ?
यह बात बिल्कुल सच है कि नवगीत दशक तथा नवगीत अर्द्धशती में कुछ महत्वपूर्ण रचनाकार छोड़ दिए गए या छूट गए । ऐसा तार सप्तक, दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक में भी हुआ था और पिछले दिनों साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘श्रेष्ठ गीत संचयन’ में भी यह कमी पाई गई । ऐसा प्रायः संपादक की निजी रुचि और संकलनों की सीमाओं के कारण भी होता है । नवगीत दशक-एक के प्रकाशन के बाद स्व. ठाकुरप्रसाद सिंह ने सबसे पहले इस बात को लेकर एतराज किया था कि उसमें कुछ ऐसे नाम हैं जो नहीं होने चाहिए और कुछ ऐसे महत्वपूर्ण नाम हैं जो होने चाहिए थे । एक बात यह भी है कि नवगीत दशक के प्रकाशन की प्रक्रिया 1968 में ही आरंभ हो गई थी और उस समय मात्र एक ही संकलन की योजना आर्थिक सहयोग के आधार पर तैयार हुई थी । उसमें कई नाम ऐसे थे जो बाद में दशकत्रयी में शामिल नहीं किए गए । उस संकलन की फ़ाइल संपादक की अपनी व्यस्तताओं और कुछ के आर्थिक सहयोग से इंकार कर देने के कारण फ़ाइलों के ढ़ेर में दबी रह गई । डॉ. सुरेश जब डॉ. शम्भूनाथ सिंह के निर्देशन में शोधकार्य में जुटे तो वह फाइल उनके हाथ लग गई तो डॉ. शम्भूनाथ जी से चर्चा उपरान्त तीन नवगीत दशकों के प्रकाशन की योजना बनी । इस योजना में मेरा नाम पहले दशक के रचनाकारों की सूची में था लेकिन जब आयुक्रम से चयन की बात आई तो मेरा नाम खिसककर दूसरे दशक में आ गया । बहरहाल स्व. राजेन्द्रप्रसाद सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, रवीन्द्र भ्रमर, शलभ श्रीराम सिंह जैसे प्रमुख लोगों का नाम दशक त्रयी में न होना हमारे लिए भी असहज कर देने वाला था । हमने अपने-अपने ढंग से अपनी आपत्तियाँ संपादक तक पहुँचायीं पर कोई सुनवाई नहीं हुई बल्कि स्व. ठाकुरप्रसाद सिंह तथा मुझे अपने एक लेख में डॉ. शंभूनाथजी ने नवगीत का शत्रु तक सिद्ध कर दिया लेकिन अपनी इस ग़लती का एहसास बाद में उन्हें भी हुआ और नवगीत अर्द्धशती में वीरेन्द्र मिश्र तथा शलभ श्रीराम सिंह को शामिल करने को वह तैयार थे किन्तु उन दोनों रचनाकारों की ओर से न तो कोई सकारात्मक उत्तर मिला और न रचनात्मक सहयोग । इससे नवगीत दशकों और नवगीत अर्द्धशती में एक अधूरापन तो रहा लेकिन इससे उनकी ऐतिहासिकता को नकारा नहीं जा सकता ।

आज कई वरिष्ठ गीत कवि नवगीत के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं और नवगीत को ख़ारिज़ कर देते हैं, यह आपकी दृष्टि में कितना उचित या अनुचित है ?
 ऐसे लोगों को लेकर मन में कोई अमर्षभाव नहीं जगता है । ऐसे लोगों के संदर्भ में मुझे अपने गाँव का एक प्रसंग याद आता है । मेरे गाँव में एक चौबे जी थे, वह करेला शब्द सुनते ही चिढ़ जाते और क्रोध में आकर बोलने वाले को गरियाने लगते थे । लेकिन उनके मन में करेले को लेकर जो चिढ़ थी, वह आकार के प्रति थी या स्वाद के प्रति यह कोई नही जान पाया । हिन्दी के कुछ वरिष्ठ कवि जो नवगीत के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं, वे मुझे करेला बाबा के रूपान्तरण ही लगते हैं । उनके विषय में सोचकर स्व. रूपनारायण त्रिपाठी की पंक्तियाँ याद आती हैं - ‘कोई उनकी नज़र में उठता तो/हूक उठती कि हाय हम न हुए’ । जिस नवगीत को बाबा नागार्जुन, डॉ. विद्यानिवास मिश्र, आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री, डॉ. विजय बहादुर सिंह, कविवर भवानी प्रसाद मिश्र जैसे लोगों ने सराहा, उसमें कुछ तो है । गीत और नवगीत को लेकर झगड़ा करने वाले यह भूल जाते हैं कि नवगीत कोई ऊपर से टूटा आकाश-कुसुम नहीं है, वह परंपरा से ही उपजी नवता है । गीता के शब्दों में उसे ‘वस्त्राणि जीर्णानि यथा विहाय नवीन गृह्णाति नरोपाणि’ कहा जाता है । जब मनुष्य नवीन शरीर धारण करता है तो उसे नया नाम मिलता है लेकिन होता तो वह मनुष्य ही है । फिर नए और पुराने में जो स्वाभाविक द्वंद्वात्मक विकास है उसे तो सहजता से ही लेना चाहिए ।

वर्तमान में लिखे जा रहे नवगीतों में अभिनव प्रयोग के नाम पर सपाटबयानी भी परोसी जा रही है, क्या यह नवगीत के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है ?
नवगीत एक बिंबप्रधान काव्य-रूप है । उसमें सहजता तो अभिप्रेय है लेकिन सपाटबयानी नहीं । सपाट सिर्फ़ गद्य हो सकता है कविता नहीं । सहज होने और सपाट होने में अंतर है । कविता की एक विशेषता यह भी कही जाती है कि वह जितना व्यक्त करती है उतना ही अनकहा भी छोड़ देती है । दरअसल यह अनकहा ही तो कविता है ।

एक प्रमुख दैनिक समाचारपत्र ‘दैनिक जागरण’ में प्रकाशित अपने आलेख में आपने सहज गीत के संदर्भ में महत्वपूर्ण बातें कही हैं, सहज गीत नवगीत से कैसे और कितना भिन्न है ?
सहजगीत में मैंने ऐसी रचना की बात उठाने का प्रयास किया जो अभिव्यक्ति की सहजता से जुड़ी हो । देखने में यह आता है कि कुछ लोग अतिशय प्रयोगशीलता के मोह में इस बात को भूल जाते हैं कि सम्प्रेषणीयता भी रचना की एक महत्वपूर्ण विशेषता है और भाषा, बिंब रचना के कारण दुरूहता के शिकार हो जाते हैं । ऐसी रचनाएँ चौंकाती ज़्यादा, भाती कम हैं और उनका अपने पाठक या श्रोता से सहज-संवाद नहीं बन पाता । वे इस प्रयास में विद्यापति, सूर, तुलसी के कुलगोत्र से हटकर केशवदास के कुलगोत्र में शामिल हो जाते हैं मेरी अवधारणा में सहजगीत में वे सारे गीत-रूप समाहित हैं जो अभिव्यक्ति में सहज और सम्प्रेषणीय हैं । नवगीत और सहजगीत में सिर्फ़ शब्द का अंतर है । नवगीत भी सहजगीत हो सकता है और सहजगीत नवगीत । कुछ लोग नवगीत के नाम पर कार्बन लेखन करते हैं और वे सहज-मौलिकता की परिधि से बाहर चले जाते हैं । एक महत्वपूर्ण बात है कि अपने आरंभिक काल में नवगीत ने लोकजीवन से नई ऊर्जा ग्रहण की लेकिन कुछ लोगों ने उसे नवगीत का प्रतिमान मानकर इतने आंचलिक प्रयोग किए विशेषतः भाषा के स्तर पर कि वे सम्प्रेषणीय नहीं रह गए । इसी तरह कुछ भाषाविदों ने तत्सम शब्दाबली के प्रति इतनी गहरी रुचि दिखलाई कि उनकी रचनाओं को समझने के लिए कभी-कभी पढे-लिखे लोगों को भी शब्दकोषों का सहारा लेना पड़ा । दरअसल इनसे मुक्त गीत ही नवगीत है, गीत नवांतर है, जनवादी गीत है जिसे मैं सहज गीत मानता हूँ ।

आपके नवगीतों में कथ्य और बिंबों में नयापन तथा भाषा में एक अलग तरह की मिठास एक साथ गुंथी हुई होती है, ऐसा कैसे कर लेते हैं आप ?
मैं अपने कथ्य अपने समकालीन जनजीवन से उठाता हूँ । मुझे बिंब और भाषा के लिए किसी द्राविड़प्राणायाम की आवश्यकता महसूस नहीं होती । हमारे आसपास होती बतियाहट, जीवन के रस में डूबी शब्द संपदा स्वयँ यह मिठास भर देती है । कविता में मैंने भवानी प्रसाद मिश्र और ठाकुरप्रसाद सिंह से मिठास को पहचानना और अपनाना सीखा है, मैंने कुमार गंधर्व, पं. जसराज, किशोरी अमोनकर से संगीत की मिठास को अपने में महसूस किया है और फिर उसे अपने शब्दों, बिंबों में पिरोने का प्रयास किया है । जिस तरह गन्ने से मिठास पाई जाती है ऊपर का सख़्त छिलका, गांठें हटाकर । उसी तरह मैंने जीवन के खुरदुरेपन में भी मिठास पाने का प्रयत्न किया है । मैंने जीवन में रिश्तों को बहुत महत्व दिया है । सबको प्यार, अपनापन देने और सबसे पाने का आग्रही रहा हूँ । यह मिठास वहाँ से भी मिलती है । मेरे लिए घर मिठास का सबसे बड़ा श्रोत है । वहाँ से भाषा भी मिलती है और विचार भी ।

आप लम्बे समय से कविसम्मेलनीय मंचों से जुड़े रहे हैं, आज भी उसी ऊर्जा के साथ आपकी उपस्थिति मंचीय गरिमा में बृद्धि कर रही है । कृपया बताएँ कि आज अकविता के संक्रमण काल में क्या मंचों पर फिर से गीत का वही स्वर्णिम समय वापस लौटने की आशा की जा सकती है ?
आप जिसे अकविता कहते हैं, मैं उसे कवित्वहीनता मानता हूँ । मैंने छठे दशक के उत्तरार्ध से कविसम्मेलनों में जाना आरंभ किया था । उस समय जो कवि मंचों पर उपस्थित रहते थे वे साहित्य जगत के प्रतिष्ठित लोग थे । पत्र-पत्रिकाओं, पाठ्य-पुस्तकों से लेकर मंचों तक । सन् 1962 के बाद वह सिलसिला क्षीण होता गया । अब तो मंच पर उपस्थित लोगों में एकाध अपवाद को छोड़ दिया जाए तो मंचों पर अभिनेताओं व जोकर कवियों की ही भीड़ है । सही कविता को अपदस्थ करने का अनवरत प्रयास ज़ारी है लेकिन मैं निराश नहीं हूँ । निराश होना मेरे स्वभाव में नहीं है । कविता लौटेगी फिर मंचों पर गीत के रूप में भी और अन्य रूपों में भी, ऐसा मेरा विश्वास है ।

आपने भोजपुरी में भी रचनाकर्म किया है, नवगीतों को आंचलिक भावभूमि पर उसी भाषा में पगाकर प्रस्तुत किया जाता रहा है, वर्तमान में रचे जा रहे नवगीतों में आंचलिक भाषा की क्या भूमिका है तथा नई कोंपलों से आंचलिकता के संदर्भ में क्या-क्या आशाएँ की जा सकती हैं ?
आंचलिकता रचना में नवता लाती है लेकिन वह दाल में छौंक या बघार की सीमा तक ही होनी चाहिए । किन्तु जब आंचलिकता को ही पूरी दाल बनाने की कोशिश किसी रचना में हो तो वह कविता का दोष बन जाती है और रचना का प्रयोजन ही नष्ट हो जाता है । अपने आरंभिक काल में नवगीत के कई रचनाकारों ने यह काम किया लेकिन वह लोक- जीवन, लोक-प्रकृति, लोक-स्वर के स्तर पर और कुछ हद तक शब्द प्रयोग के स्तर पर भी । बहुत से लोग उसे शब्द तक ही सीमित कर देते हैं, इससे सम्प्रेषणीयता बाधित होती है । आंचलिकता को ऐसे लोग फै़शन के तौर पर लेते हैं, यह उचित नहीं है । शब्द को उसके परिवेश के साथ उठाना चाहिए ।

आपका विपुल सृजन और आपकी अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ किसी को भी आपसे ईर्ष्याभाव रखने लिए उकसा सकती है, फिरभी ऐसा क्या है जो आपको लगता है कि अभी करना बाक़ी है ?
सृजन का मूल्यांकन संख्या के आधार पर नहीं उसकी गुणात्मकता के आधार पर होना चाहिए । यह गुणात्मकता निरंतर सृजनशीलता से ही पाई जा सकती है । रचना में ठहराव या जो रच चुके हैं उसी को उपलब्धि मान लेना आत्महत्या है । मुझे महसूस होता है कि अब तक मैंने जो लिखा है उससे कहीं ज़्यादा अभी अनलिखा ही रह गया है । संभवतः माहेश्वर तिवारी को जो और जैसा लिखना था, वह अभी नहीं लिख पाए हैं इसीलिए उसतक पहुँचने और उसे लिखने के क्रम में ही लिखना ज़ारी है । हर रचना एक उपलब्धि है लेकिन उससे आगे जो है उसे पाने तक लिखना है । हो सकता है इस जीवन में संभव न हो तो अगले जीवन में भी उसके लिए प्रयासरत रह सकूँ, यही कामना है । एक बड़ी कविता लिखना चाहता हूँ गीत के रूप में, कुछ प्रबंधात्मक भी और वह जब तक न मिल जाए लिखते रहना है ।

गीत को केन्द्र में रखकर संकल्परथ, शिवम, उत्त्तरायण, समान्तर आदि अनेक पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं, हाल ही में इंटरनेट पर भी ‘गीत-पहल’ नाम से पूर्णतः गीत नवगीत को समर्पित पत्रिका शुरू हुई है और ‘पूर्वाभास’, ‘सुनहरी क़लम से’, ‘छांदसिक अनुगायन’आदि अनेक ब्लॉग्स भी है, इन प्रयासों से गीत के भविष्य को आप किस तरह देखते हैं ?
गीत केन्द्रित पत्रिकाएँ और इंटरनेट पर गीत-पहल ही नहीं कविता-कोश, सृजनगाथा,अनुभूति सहित ब्लॉग्स- पूर्वाभास, सुनहरी क़लम से, आदि मेरे विश्वास के ही तो कारक हैं ।

नवगीत के संदर्भ में नई पीढी की दशा और दिशा के विषय में आपका मत क्या है और नई पीढी से नवगीत के भविष्य के प्रति आपकी अपेक्षाएँ क्या हैं ?
गीत-लेखन साधना की अपेक्षा रखता है । नए लोग शार्टकट अपनाना चाहते हैं इसीलिए आज गीतकवि कम संख्या में सामने आ रहे हैं । एक समय तो यश मालवीय और विनोद श्रीवास्तव तक आकर लगा कि नवगीत लेखन की परंपरा ख़त्म हो गई लेकिन यशोधरा राठौर, योगेन्द्र ‘व्योम’, जयकृष्ण ‘तुषार’, आनंद ‘गौरव’, देवेन्द्र ‘सफल’, शैलेन्द्र शर्मा, आनंद तिवारी, अवनीश सिंह चौहान, मनोज जैन ‘मधुर’ की रचनाशीलता के रूप में फिर नवगीत की डालों में कल्ले फूटते नज़र आने लगे हैं । नई पीढी से अपेक्षा है कि वह चकाचौंध (ग़ज़ल, दोहा आदि) से निकलकर गीत से, नवगीत से जुड़कर अपनी भारतीय कविता की जड़ों की ओर लौटे । यह लौटना पीछे लौटना नहीं, ठहराव से निकलकर आगे बढ़ना होगा । कविता को उसकी अपनी ज़मीन से जोड़ना होगा ।

कृपया अपने जीवन का कोई रोचक संस्मरण सुनाइये ?
जीवन तमाम प्रसंगों से भरा है । इस समय एक प्रसंग याद आ रहा है - सुल्तानपुर (उ.प्र.) के राजकीय इंटर कॉलेज में कविसम्मेलन था । संयोजक कथाकार स्व. गंगाप्रसाद मिश्र थे । उनसे मेरा पारिवारिक रिश्ता था । कविसम्मेलन में देर से पहुँचने के कारण जिन कपड़ों में था उन्हीं में सीधा मंच पर पहुँच गया ।मंच पर पहुँचते ही काव्यपाठ करना पड़ा । कविता पढ़कर मंच से उठकर चाय पीने के लिए आया । मैंनें कविसम्मेलन में अपना याद वाला गीत पढ़ा- ‘याद तुम्हारी जैसे कोई कंचन कलश भरे/जैसे कोई किरन अकेली पर्वत पार करे’ । चाय पी रहा था तो एक वयोबृद्ध सज्जन पास आए और ऐसा सवाल कर बैठे कि उनकी आयु और प्रश्न सुनकर मैं चौंक गया । उन सज्जन ने बड़ी गंभीरता से कहा - ‘तिवारीजी, मेरी एक जिज्ञासा है’ मैंने सहमति में अपना सिर हिलाया तो पूछ बैठे - ‘यह घटना कहाँ की है और यह किरन कौन है? क्या वह आपके साथ नहीं थी उस पहाड़ पर’ मैंने जैसे तैसे उन्हें टाला, और जब कवि मित्रों से उसकी चर्चा की तो सभी ठहाका मारकर हंस पड़े ।



 योगेन्द्र कुमार वर्मा ‘व्योम’
एस-49, सचिन स्वीट्स के पीछे,
दीनदयाल नगर फ़ेज-प्रथम,
काँठ रोड, मुरादाबाद (उ0प्र0)
मो.-9412805981
vyom70@yahoo.in
 
         
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