खिड़की खोली,
दर्शन किये प्रभात के,
सूर्य की किरणे पड़ी जब,
हिम शिखर पर,
विस्तार ज्योतिपुंज का,
मेरे द्वार पे।
ये नोकील पेड़
देवदार के,
प्रहरी बने खड़े हैं,
पर्यावरण के बहार के।
एक सौ तीन सुरंगे,
पार करती
घूमती चढ़ती हुई,
रेल की ये पटरियां,
दौड़ती हैं जिन पर
सुन्दर, सजीली गाड़ियां।
अति सुखद है यात्रा,
शिवालिक पहाड़ की।
ऊंचे नीचे, टेढे-मेढे,
रास्ते पहाड़ के,
रेंगते हैं इन पर वाहन प्रवाह से
ऊंचे शिखर, नीची वादी,
सौन्दर्य रचनाकार के।
जीवित हूं या स्वर्ग में,
भ्रम मुझे होने लगा है,
मुग्ध मुदित मन मेरा,
होने लगा है।
चारों ओर फैला है,
बादलों का एक घेरा,
छू लिया है बादलों को,
मुट्ठी में बन्द किया है,
पागल आशिकों को।
शाम ढली पुलकित हुई मैं,
ठंडी बयार से,
तन मन शीतल हो रहा है
रात्रि के प्रहार से।
तारों भरा आसमां
नीचे कैसे हो गया,
आकाश ऊपर भी नीचे भी,
फिर मुझे कुछ भ्रम हो गया।
स्वप्न है या यथार्थ,
यथार्थ कबसे इतना सुखद हो गया।
ऊपर निगाह ङाली तो बादलों के घेर थे,
बूंदें गिरी मौसम ज़रा नम हो गया
यह सुख फिर कहीं खो गया।
सूखी चट्टानें, कटे पेड़,
देखकर मन विचलित हो गया।
सीढियों पर उगती फ़सल देखकर,
फिर दिल ख़ुश हो गया।
धरती के इस स्वर्ग को बचायेंगे,
ये पेड़ देवदार के।
दर्शन किये प्रभात के,
सूर्य की किरणे पड़ी जब,
हिम शिखर पर,
विस्तार ज्योतिपुंज का,
मेरे द्वार पे।
ये नोकील पेड़
देवदार के,
प्रहरी बने खड़े हैं,
पर्यावरण के बहार के।
एक सौ तीन सुरंगे,
पार करती
घूमती चढ़ती हुई,
रेल की ये पटरियां,
दौड़ती हैं जिन पर
सुन्दर, सजीली गाड़ियां।
अति सुखद है यात्रा,
शिवालिक पहाड़ की।
ऊंचे नीचे, टेढे-मेढे,
रास्ते पहाड़ के,
रेंगते हैं इन पर वाहन प्रवाह से
ऊंचे शिखर, नीची वादी,
सौन्दर्य रचनाकार के।
जीवित हूं या स्वर्ग में,
भ्रम मुझे होने लगा है,
मुग्ध मुदित मन मेरा,
होने लगा है।
चारों ओर फैला है,
बादलों का एक घेरा,
छू लिया है बादलों को,
मुट्ठी में बन्द किया है,
पागल आशिकों को।
शाम ढली पुलकित हुई मैं,
ठंडी बयार से,
तन मन शीतल हो रहा है
रात्रि के प्रहार से।
तारों भरा आसमां
नीचे कैसे हो गया,
आकाश ऊपर भी नीचे भी,
फिर मुझे कुछ भ्रम हो गया।
स्वप्न है या यथार्थ,
यथार्थ कबसे इतना सुखद हो गया।
ऊपर निगाह ङाली तो बादलों के घेर थे,
बूंदें गिरी मौसम ज़रा नम हो गया
यह सुख फिर कहीं खो गया।
सूखी चट्टानें, कटे पेड़,
देखकर मन विचलित हो गया।
सीढियों पर उगती फ़सल देखकर,
फिर दिल ख़ुश हो गया।
धरती के इस स्वर्ग को बचायेंगे,
ये पेड़ देवदार के।
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