(1)
काट कर पर पूछते हो आस्माँ है दूर क्या
टूट जाये हौसला होगा न कोई चूर क्या।
हाथ जोड़े भेंट लेकर हर समय सहमा खड़ा
देव ने इतना बनाया भक्त को मजबूर क्या।
चाहिये रोटी हमेशा भूख में इन्सान को
ज़िंदगी बनती नहीं तक़लीफ़ में तंदूर क्या।
झोंकता है जान अपनी चंद टुकड़ों के लिये
चाहता इसके अलावा कुछ नहीं मज़दूर क्या।
सिर्फ़ लुटता रात-दिन वह फोड़ता आँखें रहे
लेखनी करती किसी को इस क़दर मजबूर क्या।
ताज को थामे हुए अन्धे व बहरे हों जहाँ
पूछना बेकार है अर्ज़ी हुई मंज़ूर क्या।
रोशनी ‘गौतम’ अगर इन्सान की अग़वा हुई
यूँ अँधेरा ही रहे चारों तरफ़ भरपूर क्या।
काट कर पर पूछते हो आस्माँ है दूर क्या
टूट जाये हौसला होगा न कोई चूर क्या।
हाथ जोड़े भेंट लेकर हर समय सहमा खड़ा
देव ने इतना बनाया भक्त को मजबूर क्या।
चाहिये रोटी हमेशा भूख में इन्सान को
ज़िंदगी बनती नहीं तक़लीफ़ में तंदूर क्या।
झोंकता है जान अपनी चंद टुकड़ों के लिये
चाहता इसके अलावा कुछ नहीं मज़दूर क्या।
सिर्फ़ लुटता रात-दिन वह फोड़ता आँखें रहे
लेखनी करती किसी को इस क़दर मजबूर क्या।
ताज को थामे हुए अन्धे व बहरे हों जहाँ
पूछना बेकार है अर्ज़ी हुई मंज़ूर क्या।
रोशनी ‘गौतम’ अगर इन्सान की अग़वा हुई
यूँ अँधेरा ही रहे चारों तरफ़ भरपूर क्या।
(2)
ज़ख़्म भरना ही न होता ज़ख़्म भरना
ज़िंदगी है रोज़ थोड़ा और मरना।
ज़िंदगी की सीढ़ियों पर सब फिसलते
चाहते उनपर मगर सब पाँव धरना।
माँगते सब उम्र की तलवार लम्बी
चाहता कोई नहीं सिर पेश करना।
फूल बनकर मुस्कुराना है जवानी
यह बुढ़ापा है मरुस्थल से गुज़रना।
देखता उड़ते हुए गर यह परिंदा
रोक सकता क्या समय का पर कतरना।
रात भर डूबा रहा है आँसुओं में
फूल का मुमकिन हुआ है तब निखरना।
प्यार हो तो सीख लेता है ज़माना
रूठना लड़ना बिगड़ना और मरना।
वायदा होता कभी उसका न झूठा
जानता है जो चतुरता से मुकरना।
थूकना फिर ख़ुद उसी को चाट लेना
और क्या इससे अलग है डूब मरना।
वक़्त प्यारे ! एक पल तो पास बैठो
क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगता ठहरना।
टूटना गौतम बहुत कुछ तोड़ता है
टूटना फिर भी नहीं होता बिखरना।
ज़ख़्म भरना ही न होता ज़ख़्म भरना
ज़िंदगी है रोज़ थोड़ा और मरना।
ज़िंदगी की सीढ़ियों पर सब फिसलते
चाहते उनपर मगर सब पाँव धरना।
माँगते सब उम्र की तलवार लम्बी
चाहता कोई नहीं सिर पेश करना।
फूल बनकर मुस्कुराना है जवानी
यह बुढ़ापा है मरुस्थल से गुज़रना।
देखता उड़ते हुए गर यह परिंदा
रोक सकता क्या समय का पर कतरना।
रात भर डूबा रहा है आँसुओं में
फूल का मुमकिन हुआ है तब निखरना।
प्यार हो तो सीख लेता है ज़माना
रूठना लड़ना बिगड़ना और मरना।
वायदा होता कभी उसका न झूठा
जानता है जो चतुरता से मुकरना।
थूकना फिर ख़ुद उसी को चाट लेना
और क्या इससे अलग है डूब मरना।
वक़्त प्यारे ! एक पल तो पास बैठो
क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगता ठहरना।
टूटना गौतम बहुत कुछ तोड़ता है
टूटना फिर भी नहीं होता बिखरना।
डॉ. गौतम सचदेव
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