दोहा : बंजारन-सी ज़िंदगी

प्रकाशन :01-11-2006
रामेश्वर हरिद
छंद
Writer

रामेश्वर हरिद


बंजारन-सी ज़िंदगी

 
(दोहा)
मिले दर्द की बाँसुरी, कसें कष्ट के तार ।

इस जीवन की बान का होता रहे सुधान ।।



आती-जाती लहर हैं, लहरों का कब अंत ।

सागर-सी इस देह में, अभिलाषायें अनंत ।।



नदी करे निर्माण ख़ुद, साग़र तक की राह ।

क्या है दुर्लभ जगत् में, है यदि उत्कट चाह ।।



सच्चाई का शव पड़ा, छिन्न-भिन्न ईमान ।

ख़ूब प्रसिद्धि पा रही, झूठों की दूकान ।।



सींचे जाते कैक्टस, हैं गुलाब मोहताज़ ।

अपने वाद्य उपेक्षित, छिड़े विदेशी साज़ ।।



रेत-रेत नदिया मिली, ख़ाली, सूख़े कूप ।

कोई दृष्टि निश्छल नहीं, मिला न निर्मल रूप ।।



कस्तुरी हो याद की, या मौसम का घाव ।

बंजारन-सी ज़िंदगी, चलना महज़ स्वभाव ।।



पेड़ों को मिलती नहीं, अपनी ख़ुद की छाँव ।

तेज़ धूप वो झेलते, चैन पा रहा गाँव ।।
     


  

 
         
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