| छंद | ||
रामेश्वर हरिद |
बंजारन-सी ज़िंदगी |
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(दोहा) |
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| मिले दर्द की बाँसुरी, कसें कष्ट के तार । इस जीवन की बान का होता रहे सुधान ।। आती-जाती लहर हैं, लहरों का कब अंत । सागर-सी इस देह में, अभिलाषायें अनंत ।। नदी करे निर्माण ख़ुद, साग़र तक की राह । क्या है दुर्लभ जगत् में, है यदि उत्कट चाह ।। सच्चाई का शव पड़ा, छिन्न-भिन्न ईमान । ख़ूब प्रसिद्धि पा रही, झूठों की दूकान ।। सींचे जाते कैक्टस, हैं गुलाब मोहताज़ । अपने वाद्य उपेक्षित, छिड़े विदेशी साज़ ।। रेत-रेत नदिया मिली, ख़ाली, सूख़े कूप । कोई दृष्टि निश्छल नहीं, मिला न निर्मल रूप ।। कस्तुरी हो याद की, या मौसम का घाव । बंजारन-सी ज़िंदगी, चलना महज़ स्वभाव ।। पेड़ों को मिलती नहीं, अपनी ख़ुद की छाँव । तेज़ धूप वो झेलते, चैन पा रहा गाँव ।। |
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