चंद्रशेखर रेल्वे प्लेटफार्म पर खड़ा कभी आने वाली ट्रेन को देखने की कोशिश करता और कभी अपने छूटे हुए घर को निहारता। फिर एकाएक उस जगह के बारे मे सोचने लगता जिसके बारे मे उसे कुछ मालूम नही है। सोचता, अगर कोई काम-धंधा नही मिला तो? कोई खैरात मे खाने को तो देगा नही। सिर छुपाने के लिए भी तो जगह चाहिए। प्लेटफार्म मे आखिर कोई कितनी रात गुजारेगा। घर से निकाल देने का जो सामर्थ्य उसके गुस्से मे था वह अब क्षीण होता जा रहा था। स्वयं की सुरक्षा का भय बहुतेरो का गुस्सा इसी तरह ठण्डा कर दिया करता है।पर घर वापस जाए भी तो किस मुँह से; जब घर के लोग मना रहे थे तब तो वह माना नही।
वह इसी तरह गहरी सोच मे डूबा था कि धड़धड़ करती ट्रेन प्लेटफार्म पर आकर खड़ी हो गई। अब तो उसे जाना ही पड़ेगा। उसका गुस्सा अब तक गहरे दुख मे बदल चुका था। दोनो आँखे सजल हो गई, आँसुओ के दो बूँद टप से जमीन पर गिरे। भारी मन से सूटकेस उठाने के लिए झुका । तभी पीछे से किसी ने उसे छुआ, 'चंद्रशेखर। घर, घर होता है। किसी काम-धंधे का ठिकाना करके जाते तो बात अलग थी। इस तरह दर-दर की ठोकरे खाने से जिदगी नही सँभलती। चलो, घर लौट चलो। 'चंद्रशेखर पीछे मुड़कर देखा, उसके बड़े भाई साहब थे। दोनो एक-दूसरे की आँखो मे देखते रहे और ट्रेन अगले गन्तव्य के लिए आगे बढ़ गई। चंद्रशेखर को ससम्मान वापसी पर संतोष था और उसके बड़े भाई साहब को उसे लौटा लाने का फक्र।
सुरेँद्र कुमार पटेल
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