कहानी ` अपहरण `
पूरी करके सुहास ने सुख का साँस लिया । टाइप करके वह जा पहुँचा बड़े डाकखाने में उसे पोस्ट करने के लिए, सामयिक पत्रिका को । सुबह के दस बजे थे । डाकखाने में लोगों की भीड़ थी । किसीको स्टैम्प खरीदने थे और किसीको पार्सल या रजिस्टर्ड लेटर भेजना था । लम्बी क़तार को देख कर सुहास मुड़ना चाह रहा था लेकिन उसके पाँव ठिठक गये , यह सोच कर कि बड़े डाकखाने में तो भीड़ रहती ही है हर वक़्त । वह क़तार में लग गया । उसके पीछे लगभग पच्चीस साल का नवयुवक आ कर खड़ा हो गया । भला मानस दिख रहा था । वह बड़ी आत्मीयता से सुहास से मुखातिब हुआ - " आज भीड़ कुछ ज़िआदा ही है।"
" जी ।" सुहास ने भी आत्मीयता से उत्तर दिया ।
" लगता है कि आप लेखक हैं ? "
" जी । आपने कैसे जाना है ?
" आपके हाथ में जो बड़ा लिफाफा है उस पर सामयिक पत्रिका का पता लिखा है । उसी से अनुमान लगाया है ।"
" जी , मैं अदना सा लेखक हूँ । कभी - कभार कोई कहानी लिख लेता हूँ । आज तडके ही एक कहानी पूरी की है । उसे छपने के लिए सामयिक पत्रिका को भेज रहा हूँ । "
" कहानी किस विषय पर है ? "
" किसी बच्चे के अपहरण पर है ।"
" उसका शीर्षक भी अपहरण होगा ? "
" जी हाँ । आपने सही अनुमान लगाया है । "
" अरे वाह , मेरे इस उपन्यास का नाम भी ` कहीं फिर अपहरण न हो जाये ` है " , अपना पैकेट दिखाते हुए नवयुवक ने कहा , " मैं भी लेखक हूँ । इसे कनाडा में रह रहे अपने एक मित्र को भेज रहा हूँ । यह अपहरण या आतंक की समस्या बड़ी खौफनाक सूरत अख्तियार कर चुकी है । देशों की सरकारें न जाने क्यों इतनी नर्म हैं ? क्यों नहीं वे अपहरण करने वालों या आतंक वादियों को फाँसी दे देती ? क्यों वे उन्हें जमाई राजाओं की तरह पूजती हैं ? बड़ी अजीब बात है । आपका क्या विचार है ? "
" आप सही फरमाते हैं ।" सुहास मन ही मन में नवयुवक को सराह उठा ।
" आज तो क़तार हिलने का नाम नहीं ले रही है ।" कह कर नवयुवक अपनी घड़ी देखने लगा । सुहास को लगा कि उस नवयुवक को कहीं जाने के लिए देरी हो रही है। उसका अनुमान सही निकला । नवयुवक ने एक बार और घड़ी को देखते हुए घबराहट में कहा, " भाई साब , मेरी ट्रेन छूटने में पंद्रह मिनट रह गये हैं । अनर्थ हो जाएगा अगर मैं मैनचेस्टर सही टाइम पर नहीं पहुँच पाया । बड़ी मुश्किल से नौकरी मिली है मुझे वहाँ । क्या आप मेरा ये पैकेट पोस्ट कर देंगे ? " क्यों नहीं ? " सुहास ने शिष्टता से कहा ।
" ये रहे दस पौंड । बची रकम आप दान पेटी में डाल दीजिये ।
पैकेट पर मेरा पता लिखा है । चिट्ठी लिखियेगा , कहानी भी भेजिएगा ।"
पैकेट और दस पौंड दे कर वह बाहर निकल गया ।
नवयुवक को गए दो - तीन मिनट ही हुए थे कि सुहास के
हाथ में थमे हुए उसके पैकेट से भारी विस्फोट हुआ । देखते ही देखते सुहास के समेत दर्जनों ही लोगों के जिस्म ढेर हो गये । भयंकर आग ने बिल्डिंग को घेर लिया । हाहाकार मचते देर नहीं लगी ।
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