हम पहले सृजन को लें। सृजन एक प्रक्रिया है, बनाने की प्रक्रिया। इस प्रक्रिया को मनुष्य अपनाता है, वही कुछ बनाता है। उसे बनाने की कुछ सामग्री होती है, कुछ उपकरण होते है, उनका एक उद्देश्य होता है। उद्देश्य के आधार पर वह कला की श्रेणी में आता है, तो सामग्री और उपकरण के आधार पर संगीत, चित्र, मूर्ति, वास्तु, साहित्य और साहित्य में भी काव्य, नाटक, कथा आदि कहा जाता है। इसमें संगीत सबसे सूक्ष्म होता है और वास्तु सबसे स्थूल। सृजन निर्माण से भिन्न होता है। निर्माण स्थूल होता है। उसका उद्देश्य तात्कालिक उपयोग होता है। सृजन सूक्ष्म होता है और उद्देश्य दूरगामी परिणाम होता है, क्योंकि वह मूल्यों की स्थापना करता है।
यह स्थापना सौंदर्य के माध्यम से होती है और मंशा वृहत्तर मानवता का कल्याण होती है। यह काम साहित्य में अधिक होता है। उसकी सामग्री शब्द है और उपकरण विधाएँ मूल्यबोध के लिए शब्द से महत्वपूर्ण 'अर्थ' होता है और अर्थ शब्द के प्रयोगकर्ता की सामर्थ्य पर ही नहीं, ग्रहण करनेवाले - कहिए - अर्थापन करनेवाले के सामर्थ्य पर भी कुछ निर्भर करता है। इसलिए हो सकता है कि सृजन करनेवाले और ग्रहण करनेवाले के बीच एक फाँक हो। पर यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि सही बात तक पहुँचने के लिए अर्थापन के कई उपकरण हैं, कई रास्ते हैं। सृजन चिंतन से भी भिन्न होता है। चिंतन विवेक की देन होता है, वह 'है' के आधार पर एक 'चाहिए' की व्यवस्था रचता है, तर्क उसका माध्यम होता है। उपलब्धि दर्शन होता है। तब सृजन का आधार अनुभूति होती है, इस अनुभूति के आधार पर वहाँ चाहत की दुनिया रची जाती है।
माध्यम संवेदना होती है। उसका संबंध मन की दुनिया से अधिक हृदय की दुनिया से होता है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि विवेक व अनुभूति में फाँक होता है। सृजन में अनुभूति, विवेक और कल्पना की अपनी-अपनी भूमिका होती है। मूल्यों का महत्व जीवन में इसलिए नहीं होता कि वे जीवन में पूरे के पूरे उतार लिए जाते हैं; बल्कि इसलिए होता है कि एक पूरा समुदाय उन्हें महत्वपूर्ण मानता है, उन्हें जीवन का उद्देश्य मानता है - व्यक्ति के भी और समुदाय के भी; उससे भी बढ़ कर वह आचरण का मानदंड मानता है। वे मनुष्य की गरिमा की प्रतिष्ठा करते हैं। उस गरिमा में संवेदनाजन्य आत्मा की प्रतिष्ठा हेतु सृजनकर्ता का दायित्व बहुत वेदनापूर्ण होता है, जिसका निर्वाह उसे सृजन के हर क्षण करना पड़ता है। कलाकार के लिए वे ही क्षण अर्थवान होते है और हमेशा ही आत्मोपलब्धि के क्षण की तरह चमकते रहते हैं। यह आत्मोपलब्धि रहस्यवादियों की उस साधना से भिन्न होती है, जिसमें वे इतने आत्मकेंद्रित हो जाते हैं कि उन्हें मनुष्य की नियति से कुछ भी लेना-देना नहीं रह जाता। वे सीधे उसका अतिक्रमण कर विराट ब्रह्म का साक्षात्कार कर उसी में पूर्णत्व प्राप्त करने लगते है।
यह आत्मोपलब्धि आत्मरति से भी भिन्न होती है जो यह मानती है कि सबसे विच्छिन्न हो कर सिर्फ अपना गौरव मंडित करना ही सब कुछ है। मानवीय गरिमा की वास्तविक प्रतिष्ठा तब होती है, जब समानता वहाँ शर्त की तरह उपस्थित होती है। समानता शुभेच्छा से आती है। फिर भी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और नैतिक धरातलों पर इस समानता की स्थापना के लिए संघर्ष जरूरी हो जाता है। यह संघर्ष और स्थापना तभी संभव हो सकते हैं जब विकल्पों की संभावना हो। इन विकल्पों का सृजन स्वतंत्रता से होता है और स्वतंत्रता के लिए होता है। उसके लिए सद्भाव जरूरी होता है। जो सिद्धांत और उससे जुड़ा सृजन मानव नियति को पूर्व निर्धारित मान लेता है, वह मनुष्य के इस विकल्प की स्वतंत्रता और संकल्प की गरिमा छीन लेता है। सृजन उससे लड़ता है। कहता है कि मानवीय गौरव की प्रतिष्ठा इसी में है कि हम मनुष्य को विवेक और संकल्प शक्ति से युक्त मानें, इतिहास का निर्माता और अपनी नियति का अधिनायक मानें।
हम मनुष्यता पर आते हैं। मनुष्यता अक्सर ही संकट में पड़ी रहती है। एक संकट हटता है तो दूसरा संकट आ जाता है। आज फिर उसके लिए एक नया संकट पैदा होता दिख रहा है और सृजन को उससे तालमेल बिठाना है। जब हम रसेल होवान का उपन्यास 'रिडले वाकर' (1980) पढ़ते है, डेविड प्रिन का उपन्यास 'पोस्टमैन' (1985) और कामार्क मैकार्थी का उपन्यास 'द रोड' (2006) पढ़ते हैं, तो पाते हैं कि ज्ञानोदय के द्वारा रचित मनुष्य की प्रगति और विकास की सभी योजनाएँ आज इतनी संकट में हैं कि उनका अंत ही आ गया है। सच पूछिए तो मनुष्य की मूलभूत अवधारणा ही संकट में है; और यह संकट वास्तविक है।
इसकी अभिव्यक्ति माइक जैक्सन की फिल्म 'द थ्रेड्स' (1984) और जॉर्ज मिलर के धारावाहिक 'मैड मैक्स' की 'द रोड वारियर' श्रृंखला (1980) में इस तरह से हुई है कि भविष्य में सारे नगर उजाड़ हो जाएँगे, सड़कें युद्धभूमि बन जाएँगी और मनुष्य की आशाएँ अजनबी लगेंगी। और यह पूरा वितान मनुष्य का अपना ही रचा हुआ है। फिर जिस प्रौद्योगिकी पर उसने भरोसा करना सीखा था, वह उसके विरुद्ध हो गई है। प्रौद्योगिकी और उससे जुड़े मनुष्य द्वारा रचित शत्रु अधिक हृदयहीन है, अदृश्य है और सर्वत्र मौजूद है। हवा, पानी, आकाश, धूप जैसे हमारे जीवन के स्रोत, हमारा भोजन और आवास, हमारी जीवन शैली और मनोरंजन, हमारे साथ के पशु-प्राणी और लोग सभी बीमारी, जरा, जहर और पागलपन से ग्रसित हो गए हैं। हमारी दुनिया वास्तविक न रह कर आभासित बन गई है और आदमी मनुष्य न रह कर साइबोर्ग बन गया है।
साइबोर्ग यानी, 'A human being prosthetically enhanced, or hybridized with electronic or mechanical components, which interact with its own biological system.' कुछ उत्तर-मानववादियों की दृष्टि में यह साइबोर्ग मनुष्य और मशीन, विशेषतः संगणक पर अनिवार्यतः निरंतर बढ़ती जा रही निर्भरता, के कारण अंतःपरतंत्रता का रूपक है। आभासित दुनिया के बाहर वास्तविक दुनिया में यह प्रौद्योगिकी शक्तिशाली राष्ट्रों के आंतरिक जीवन और बाह्य नीतियों को इस तरह से संचालित कर रही है कि मनुष्य जाति ही नहीं, उसके साथ रहनेवाले पशु-परानी और घास-फूस व स्वयं पृथ्वी खतरे में पड़ गई है। जलवायु वैज्ञानिक जेम्स लवलाक का कहना है कि धरती को खोद कर, जल को सुखा कर और वातावरण को प्रदूषित कर हम कुछ इस तरह से जीने लगें है कि मनुष्य का जीवन बहुत तेजी से विनाश की ओर बढ़ने लगा है। स्वयं धरती किसी ग्रह के टकराने से नष्ट नहीं होगी, होगी भी तो बहुत बाद में।
उसके बहुत पहले ओजोन की फटती हुई पर्त, समुद्र का बढ़ता हुआ पानी, और धरती के पेट से निकलती हुई गैस, फटते हुए ज्वालामुखी यूँ ही विनष्ट कर देंगे। लेकिन तब लवलाक इससे बहुत निराश नहीं है। कहता है कि धरती साकल्यवादी (holistic) है, एक आत्मचालित अस्मिता है, जिसका हर हिस्सा चाहे वह सजीव (animate) जीवन हो या निर्जीव (inanimate) पदार्थ, आपस में संबंधित है। यह सर्वपारी पर्यावरणीय व्यवस्था एक गाइया (Gaia) है, जो अपना संतुलन बना कर रखना जानती है, उसे पुनर्प्राप्ति करने की क्षमता रखती है और उसके लिए यदि एक प्राणियों की जाति विनष्ट हो जाती है तो ऐसा करने में वह चूकती नहीं। हो सकता है कि इस बार वह प्राणी मनुष्य ही हो। उसके स्वर से स्वर मिलाता हुआ जॉन ग्रे कहता है कि मनुष्य तमाम प्राणियों में एक प्राणी ही है और उसे अलग से बचा कर रखने के लिए पृथ्वी के पास कोई कारण नहीं है। वह नहीं रहेगा तो पृथ्वी बच जाएगी। एक समय आएगा जब पृथ्वी मनुष्य को भूल ही जाएगी।
उसकी जगह दूसरे प्राणियों का जीवन चलता रहेगा। यानी राष्ट्रों की आंतरिक नीतियों के कारण मनुष्य का जीवन ही खतरे में है। इस खतरे के प्रति कौन आगाह करेगा, उससे कौन बचाएगा? सृजन ही न ! राजनीतिविज्ञानी के रूप में जॉन ग्रे कहते हैं कि शक्ति के प्रमाद में डूबे विकसित देश अपनी शक्ति के प्रमाद में भौतिक समृद्धि को और बढ़ाने के लिए तमाम दूसरे आर्थिक रूप से पिछड़े देशों को अधीन करते जा रहे हैं। जिनको नहीं कर पा रहे हैं उन पर युद्ध ही लाद दे रहे हैं, वह भी मानवता के नाम पर हस्तक्षेप को न्यायोचित ठहरा कर। उनका दार्शनिक नॉम चोम्स्की इसे वन-सैन्य मानववाद का नाम देता है और उसे न्यायोजित ठहराने के लिए कोसोवो के संदर्भ में लिखता है, 'The NATO bombings undertaken with humanitarian intent, open a new era in which the reigning superior power and its junior partner (U.S.A and U.K.) suffused with previously undetectable nobility, promise to lead the way to a new era of humanism and justice.' नॉम चोम्स्की भूल जा रहा है कि इससे विश्व की शक्तियों का नए सिरे से दो कैंपों में ध्रुवीकरण होता जा रहा है।
इस्लामिक और गैर-इस्लामिक देशों का मोर्चा गठित होने की संभावना निरंतर बढ़ती जा रही है। आतंकवाद ही नहीं, आणविक युद्ध की भयावहता धरती से आकाश तक घनीभूत होती जा रही है। उसकी अभिव्यक्ति 'War of Terror', 'The Clash of Civilizations', 'The axis of Evil', 'Operation Shock and Awe' जैसे पल्प फिक्शन, टेबोलाइड शीर्षकों और 'प्लेस्टेशन गेम्स' में हो रहा है, जिनमें दिखाया जाता है कि सभ्य दुनिया बर्बर दुनिया से लड़ने निकल पड़ी है स्वतंत्रता और जनतंत्र के झंडे तले, बिना यह सोचे कि जिससे वह लड़ने जा रही है उसके भी अपने कुछ जीवन मूल्य है और जरूरी नहीं है कि सबके जीवन मूल्य एक ही हो जाएँ। निश्चय ही ऐसा मानववाद वरेण्य नहीं है। जरेड डायमंड अपने उपन्यास 'थर्ड चिंपैंजी' (1992) में कहता है कि मानव-पशु को जगत के केंद्र में रखने मात्र से यह पृथ्वी की समस्त समृद्धियों का उत्तराधिकारी नहीं बन जाता, क्योंकि यह इतना 'त्रुटिहीन' नहीं है कि उस संपदा को सँभाल सके। इस तरह के मनुष्य को केंद्र में किसने रखा है?
ज्ञानोदय के संत ह्यूम, दिदरो और कंडारसेट ने। उसके प्रतिकार में युवा मार्क्सवादी विचारक मुराद सैफुलिन कहता है कि यह सारी विडंबना पश्चिम के बूर्जुआ देशों और उनके अनुयायियों के लिए है, उन्हीं का रची है। इस उत्तर- मार्क्सवादी काल में - जो उत्तर-आधुनिकतावादी काल के बरक्स खड़ा हो रहा है - विश्वास है, वे जानते हैं, 'The man of future will be a reasonable, humane, ordering and active, capable of appreciating beauty, full of integrity - all human powers combined of spiritual and physical perfection. Asserting himself as a social being 'Man' will remain a personality, a personal 'I' with its inimitable individuality, a social being.' वह पलट कर हॉब्स के जंगली जगत में नहीं जाएगा, जहाँ उसका जीवन 'solitary, poor, nasty, brutish and short' था। यह काम कौन करेगा? उसे मनुष्यता का जामा कौन पहनाएगा? आगे का सृजन ही न !
आज मनुष्यता की समस्याएँ दो तरह की हैx : एक सर्वव्यापी, जो सभी राज्यों और राष्ट्रों के लिए है, दूसरी उन राज्यों और राष्ट्रों की अपनी-अपनी। पहली कोटि की समस्याएँ सूक्ष्म और स्थूल दोनों किस्म की हैं। राज्य और राष्ट्र की सीमाओं के पार स्वयं मनुष्यता, उसकी वेदना, दुर्भाग्य और दरिद्रता, संकट और तनाव का संकट है। एक दूसरा संकट धर्म की, संस्कृति की, जीवन शैली की, विशेष मूल्यबोधों की सीमाओं का है। उन पर या तो जरूरत से ज्यादा जोर दिया जा रहा है, या फिर एकदम से नजरअंदाज ही कर दिया जा रहा है। इसे समस्त मनुष्यता का मनोवैज्ञानिक संकट कहा जा सकता है। समस्या उचित मानवीय संबंधों की है जिसे समानता के आधार पर बनना है। अमर्त्य सेन का कहना है कि आगे राष्ट्रों और राज्यों का उत्थान-पतन इस समस्या के 'विजन' पर निर्भर करेगा। एक तरफ ईश्वर की इच्छा शक्ति को पूरी तरह से नकारे जाने और दूसरी तरफ वैज्ञानिक विकास की यांत्रिकता की असफलता के बाद यह 'विजन' पूरी तरह से बाधित हो गया है।
सृजन को इसका उत्तर ढूँढ़ना है। अमेरिका का शिक्षा-दार्शनिक जॉन बेली कहता है कि सृजन का उत्तर 'must be transmitted into individual consciousness - the consciousness of free individual who collaborates with other men of goodwill for the benefit of whole.' इस समानता और सद्भावना की तरफ मनुष्यता बढ़ रही है। दुनिया के हर देश में ऐसे लोगों के समूह हैं जो मनुष्यता के हित के लिए चिंतित हैं। वे समानता और सद्भावना की बड़ी जिम्मेदारी को स्वीकार कर रहे हैं और इस समस्या से दो-चार होने की क्षमता विहित कर रहे हैं। जरूरत है उसे और विकसित करने की, जिससे कि वे अपनी कटिबद्धता में और दृढ़ हो सकें। सृजन को उसकी सौंदर्यपरक अभिव्यक्ति करनी है, उन जीवन स्थितियों का चरित्र निर्मित करना है जो आगामी मनुष्यता की विशेषता बने।
राज्यों और राष्ट्रों के आपसी संबंधों की ठोस समस्या दो तरह की है, एक अंतरराष्ट्रीयता की, दूसरी सह-संबंध और अंतःप्रक्रिया की। अंतरराष्ट्रीय एकता के रास्ते में तीन कठिनाइयाँ हैं। एक है शक्तिशाली अनुदार, प्रतिक्रियावादी समूहजनित, जो अपने अतीत को अधिक से अधिक अनुरक्षित रखना चाहते हैं। इन समूहों के पास शक्ति तो बहुत है, पर दूरदृष्टि यानी विजन नहीं है। दूसरी कठिनाई तमाम तरह की फैनेटिकल विचारधाराओं की है। तीसरी कठिनाई लोगों के ऐसे समूहों की है, जो सिर्फ युद्ध के बाद कुछ दिनों तक ही शांति और आर्थिक डिसास्टर के बाद सुरक्षा की कामना करते हैं। बाकी समय ये आपसी भिड़ंत में लगे रहते हैं, जिसका उपयोग शासक वर्ग उन्हें विश्व की वास्तविक समस्या से अनजान बना कर रखने में और यथास्थिति को बढ़ावा देने के लिए करता है। सृजन का हस्तक्षेप यहाँ यह बताने में होगा कि कभी भी पुरानी स्थितियों में न तो बहुत दिनों तक रहा जा सकता है, न ही उनमें लौटा जा सकता है, चाहे वे आर्थिक हों या धार्मिक, सामाजिक हों या सांस्कृतिक, राजनीतिक हों या नैतिक। इसलिए इनका समाधान ढूँढ़ने के लिए उन स्थितियों पर चोट करनी ही होगी, जिन्होंने मनुष्यता को इस जकड़बंदी में धकेल दिया है।
यह मनुष्यता को 'spiritual welfare' की ओर ले जाएगा, जहाँ स्पिरिचुएलीटी का मतलब उचित मानवीय संबंधों की रचना होता है, धरती पर सच्ची शांति की स्थापना होता है। यह तात्कालिक समस्याओं का समाधान कर विश्व नागरिकता की ओर संक्रमित जन समुदाय को जगा कर एकता, शांति और सुरक्षा की ओर ले जाएगा। इसे हर देश के नागरिकों की शुभेक्षा के बल पर उचित मानवीय संबंध बनाकर ही पाया जा सकता है। राष्ट्रों के सह-संबंध और अंतःप्रक्रिया की समस्याएँ वास्तव में उनकी मनोवैज्ञानिक समस्याएँ हैं। किसी भी राष्ट्र की आत्मा की पुंसता या क्षमता उसके प्रभाव से विदित होती है। राष्ट्र-केंद्रित विचार सरणियाँ - जिनका निर्माण राष्ट्र की सीमाओं के भीतर शताब्दियों से सोचने, उसका एक उद्देश्य बनाने, आकांक्षा पालने से होता है - उन उद्देश्यों को बनाती हैं, जो उनके निवासियों के जीवन को अनुशासित करते हैं। यदि यह सब लोगों को आपस में सहयोगी बनाता है, उनकी सद्भावना को विकसित करता है तो वांछनीय है।
यदि यह सब लोगों को अकड़ू बनाता है, आक्रामक बनाता है, अलगाववादी बनाता है, दूसरे राष्ट्र के लोगों को नीची निगाह से देखता है, उनकी बेमतलब आलोचना करता है तो जगत की मनुष्यता की एकता में खलल डालता है। वह अवांछनीय है। ऐसा सोचने और करने की पुरानी आदतों पर नियंत्रण पाना कठिन है। सृजन को यही हस्तक्षेप करना है। अंतरराष्ट्रीयता की एक तीसरी समस्या वैश्वीकरण की देन है। बाजारवाद से जुड़ कर एक तरफ पूरे विश्व को एक गाँव में रूपांतरित कर रही है तो दूसरी तरफ अस्मिता के नाम पर कई तरह की स्थानिकताओं और बहुलवाद को उत्साहित कर रही है। क्षेत्र, जाति, लिंग, भाषा, मत, समृद्धि आदि के विवाद उसी की देन हैं। मनुष्यता को एक तरफ आर्थिक शोषण तो दूसरी तरफ सामाजिक विभेद की दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। भारत जैसे देश में धर्मनिरपेक्षता और आंतरिक तथा बाह्य तीन तरह के आतंकवाद से सामना करना पड़ रहा है। चीन जैसे देशों में राजनीतिक जनतंत्र की माँग जोर पकड़ रही है। ऐसे में सृजन की भूमिका उनको बढ़ावा देने में नहीं, समरसता पैदा करने में होगी, वहीं वर्चस्व की राजनीति से, चाहे वह वैश्विक हो या स्थानीय, टकराना पड़ेगा।
हमारे देश में प्रशासन के मानवीय चेहरे के नाम पर कानून व प्रशासन को कमजोर किया जा रहा है तो इसलिए कि अपराधी से नेता बने लोगों को नए उभरते धनाढ्य वर्ग को राष्ट्रीय संपदा लूटने की अकूत छूट मिल सके, उसे भी सृजन को आचक्षु करना होगा। अगली समस्या पूँजी, श्रम और रोजगार के सह-संबंधों की है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने जिस उत्पादन ऊर्जा का विस्फोट किया है, उससे पुराने आर्थिक मूल्य और जीवनयापन के परिचित स्तर डगमगा गए है। इससे भविष्य का रूप ग्रहण करने जा रहा है, वह प्रछन्न है। इतना जरूर जाहिर है कि उसका एक स्वरूप तात्कालिक है, दूसरा भावी, विकसनशील।
तात्कालिक रूप से हम पाते हैं कि बड़े वित्तीय हित इस ऊर्जा के विस्फोट से होनेवाले उत्पादनों पर अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहेंगे और अपने लाभ कमाने के आगे वृहत्तर मानवता को इसके लाभ से वंचित कर रखना चाहेंगे, उसे महँगा बनाते जाएँगे। इससे आपसी संघर्ष बढ़ेगा। दूसरा स्वरूप यह होगा कि उससे एक विशाल जन समुदाय की श्रमशक्ति एक 'सरप्लस' में रूपांतरित हो जाएगी। उसे काम में बाँध कर रखने के लिए श्रम के घंटों को घटा कर भी अधिक मजदूरी देनी पड़ेगी। यानी एक समस्या पूँजी की होगी, दूसरी श्रम की। एक शुद्ध स्वार्थहित के नियंत्रण का है, जो एक लंबे समय से मनुष्य के जीवन को नियंत्रित करके रखे हुए है, दूसरी अवकाश के सही और रचनात्मक उपयोग का है। इस तरह से बढ़े अवकाश के घंटों में व्यस्त रहने के लिए नए साधनों का निर्माण जरूरी होगा - कला माध्यमों से ले कर मनोरंजन के साधनों तक का। यानी एक का संबंध सभ्यता से है - नए युग के सही ढंग से काम करने का है, दूसरे का संबंध संस्कृति से है, अवकाश का उपयोग रचनात्मक ढंग से करने का है। सृजन को इन दोनों समस्याओं से जूझना होगा। फिर यह सृजन के रूप को भी तय करनेवाला है।
पूँजीवादी यानी अगड़े देशों में अपनी जरूरत की पूर्ति के लिए जिस तरह की कला व साहित्य की जरूरत होगी, पिछड़े व विकासशील देशों में उससे भिन्न होगी। दोनों ही तरह के देशों में होने वाले सृजन को अपनी इन जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा। इससे जो तनाव पैदा होगा उसके भी शमन के लिए सृजन को जगह बना कर रखना होगा। उदाहरण के लिए मैं कह सकता हूँ कि आज श्रमिकों का आंदोलन पूँजीवादी रूप ग्रहण कर चुका है। वहीं पूँजीवादी देशों में भी निर्णय जन के हाथों में निरंतर खिसकता जा रहा है। दोनों में ही शिक्षा और अनुभव के स्तर की अपनी भूमिका है। उससे समेटनेवाले और विभेद करनेवाले दोनों ही तरह के जो निर्णय हो रहे है, उनसे उत्पन्न अपनी समस्याएँ है। सृजन को उनसे जूझना होगा। पाँचवीं समस्या अल्पसंख्यकों की है, चाहे वह जाति आधारित हो या धर्म आधारित। यह समस्या अपने ही देश के भीतर अपने ही नागरिकों की है तो अपना देश छोड़ कर जा चुके दूसरे देशों में बसे व्यक्तियों की भी है।
दृष्टि मूल देश और स्थान तथा रहने के स्थान और देश के आधार पर दो तरह की हो जाती है। वैसे तो यह समस्या काफी पुरानी है, धार्मिक-सामाजिक स्तर पर। पर आज उसका राजनीतिक-आर्थिक इस्तेमाल नई तरह की ईष्या और घृणा उत्पन्न कर रहा है, उसे बढ़ा रहा है, संरक्षण दिया जा रहा है। कहना न होगा कि जहाँ नस्ल और जाति के संदर्भ में नीग्रो और अछूतों की मुक्ति के लिए विशेष ध्यान देने की जरूरत है, वहीं उसे वोट बैंक में तब्दील कर देने पर वह घृणा और ईर्ष्या बढ़ती जा रही है। इसी तरह धर्मनिरपेक्षता की एक व्याख्या सभी धर्मों को पहले बराबर संरक्षण, फिर अल्पसंख्यकों के हित को निहित स्वार्थ बना कर उन्हें वोट बैंक में तब्दील करने से दूसरी तरह की समस्या पैदा हो रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस ईर्ष्या और घृणा का विस्फोट आतंक के रूप में, जातीय संघर्ष के रूप में हो रहा है,
जिसकी परिणति निर्दोष लोगों की बेमतलब की सामूहिक हिंसा में हो रहा है। इसे निर्बल के लड़ने के नए ढंग के नाम पर न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। इसे न्यायोचित ठहरानेवाली तमाम प्रगतिशील शक्तियों से सामान्य जन कटता जा रहा है और काउंटर-वायलेंस की संभावना बढ़ती जा रही है। अल्पसंख्यकों की तरफ से जब तक राष्ट्रीयता की चेतना और मनुष्यता के अंतरराष्ट्रीय पक्ष पर जोर नहीं बढ़ेगा, समस्या के ज्यो-की-त्यों बने रहने की पूरी संभावना है। हम पाते है कि तमाम धार्मिक संगठनों की कल्याणकारी जीवंतता कब की समाप्त हो चुकी है। मनुष्यता का कल्याण इन संगठनों से नहीं, इनके प्रवर्तक सत्यदर्शकों की स्पिरिट से होनेवाला है। इन तमाम बातों को उजागर करने के लिए सृजन का हस्तक्षेप जरूरी है।
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