देखकर मौसमों के असर रो दिये
सब परिंदे थे बे-बालो-पर रो दिये।
बंद हमको मिले दर-दरीचे सभी
हमको कुछ भी न आया नज़र रो दिये।
काम आये न जब इस ज़माने में कुछ
देखकर हम तो अपने हुनर रो दिये।
कांच का जिस्म लेकर चले तो मगर
देखकर पत्थरों का नगर रो दिये।
हम भी महफ़िल में बैठे थे इक आस ले
उसने डाली न हम पर नज़र रो दिये।
फासलों ने हमें दूर सा कर दिया
अजनबी-सी हुई वो डगर रो दिये।

सब परिंदे थे बे-बालो-पर रो दिये।
बंद हमको मिले दर-दरीचे सभी
हमको कुछ भी न आया नज़र रो दिये।
काम आये न जब इस ज़माने में कुछ
देखकर हम तो अपने हुनर रो दिये।
कांच का जिस्म लेकर चले तो मगर
देखकर पत्थरों का नगर रो दिये।
हम भी महफ़िल में बैठे थे इक आस ले
उसने डाली न हम पर नज़र रो दिये।
फासलों ने हमें दूर सा कर दिया
अजनबी-सी हुई वो डगर रो दिये।
उड़ गए बालो-पर उड़ानों में सर पटकते हैं आशियानों में।
जल उठेंगे चराग़ पल भर में
शि्ददतें चाहिये तरानों में।
नज़रे बाज़ार हो गए रिश्ते
घर बदलने लगे दुकानों में।
धर्म के नाम पर हुआ पाखंड
लोग जीते हैं किन गुमानों में।
कट गए बालो-पर, मगर हमने
नक्श छोड़े हैं आसमानों में।
वलवले सो गए जवानी के
जोश बाक़ी नहीं जवानों में।
बढ़ गए स्वार्थ इस क़दर ‘देवी’
एक घर बंट गया घरानों में।
|
|
|||||||||||

