रंगपुर के छोटे स्टेशन पर तीन लोग अधिकारी सहज गुस्ताख से खड़े थे। दूर से आये हुए देहाती लोग,अन्य गाँवों के यात्री और पहली बार ही गाड़ी में मुसाफ़री करने आयी हुई स्त्रियाँ, सैंकड़ों में भी अलग थलग नजर आनेवाले तीन गृहस्थों की ओर बारबार देखकर, आपस में कुछ चोरी छिपे बातचीत कर लेती थीं।

पर उस जगह पर पॉइंट्समेन कौन है? अपनी साहबनुमा टोपी को हाथ में घुमाते हुए एक युवक ने सवाल किया। उसकी सवाल करने का अंदाज कहा रहा था कि वह उन सब से बड़ा अधिकारी था।

लम्बे सूखे हुए मुँहवाले एक प्रौढ़ (वयस्क) ने विनयपूर्वक उत्तर दिया:` साहब! वहाँ पच्चीस वर्ष से एक ही आदमी रहता है।’

`पच्चीस वर्ष!’

तीसरा आदमी जो न तो कारकून था और न ही अधिकारी सा- मध्यम पदाधिकारी सा लगता था, उसने मुस्कुराकर हाँ कहा।

`और उस आदमी से आप नियमित काम की अपेक्षा रखते हैं?’ युवा अधिकारी ने अपनी बेंत की छड़ी को जमीं में खोंसकर उसे मोडते हुए कहा।

दोनों में से किसी ने जवाब नहीं दिया। अंत में वह कारकुन सा आदमी बोला:`साहब! बुढा आदमी है। अब वह नौकरी के पच्चीसवें वर्ष में कहाँ जायेगा?’ अब उसे निबाह लेने में ही हम सबकी भलाई है।’’

युवा अधिकारी ने अपने होंठ शख्ती के भाव सहित दबाये। अपनी छड़ी से एक कंकड़ दूर तक उडाकर उसने कहा: `आदमी से हमारी कोई निस्बत नहीं है। काम से काम है। उसे जहाँ जाना है जाये। हमें तो मात्र यही देखना है कि वह काम कैसा करता है।

कारकुन का फीका चेहरा कुछ और फीका पड़ा। उसका हृदय निखालिस था। पंद्रह वर्ष की अवस्था से वह कारकुन रहा है। उसने कुछ काली करतूतें करके नहीं पर अनेक अधिकारियों की अधीनता में मृदुल स्वभाव रखकर शिरस्तेदारी प्राप्त की थी। अत: उसमें अपना कोई तेज या प्रभाव तो नहीं था तथापि अच्छा स्वभाव होने के कारण उसका कुछ अच्छा करने का अभिगम रहता था। साहब के होठों की सख्ती को देखकर उसने बहुत नरमी के साथ कहा: `भैया बद्रीनाथ वहां पच्चीस साल से नौकरी कर रहा है।’

`और उसकी अभी क्या उम्रह है?’

`होगी कोई अंदाजन सत्तावन –अट्ठावन की।’

तब तो वह काम के लायक नहीं है!’ साहब ने फैसला सुनाया। साहब के मन में अभी अधिकारी का मद भी है। चतुर शिरस्तेदार ने इस बात को समझ लिया। अत: फिर कभी समझायेंगे,ऐसा सोचकर वह चूप रहा।

हुआ कुछ ऐसा था कि रंगपुर स्टेशन से करीब दो–एक मिल की दूरी पर रेल की पटरियाँ सड़क को काटकर जा रही थी। इसलिए उस क्रोसिंग के पास रेलवे सत्ताधीशों ने एक छोटा सा कमरा बांधकर एक आदमी को वहां रखा था। बद्रीनाथ भैया आज पच्चीस वर्ष हुए, उसी जड़ और जबरदस्त लकडे को गाड़ी के आने-जाने के समय नीचे रख देता था और गाड़ी के चले जाने के बाद उठा लेता था। कुछ समय पहले उसकी असावधानीवश एक दुर्घटना होते होते रह गई। रंगपुर स्टेशन पर ट्राफिक सुप्रिन्टेंडंट,ट्राफिक इन्स्पेक्टर और शिरस्तेदार आज उसकी बात कर रहे थे।

ऐसे में स्टेशन पर गाड़ी आई और साहब अपने डिब्बे में बैठ गए। बैठते हुए भी अपने बदमिजाज स्वभाव को ख़ुशी हो रही हो ऐसे कारकुन के साथ वही बात बारबार कर रहे थे: `उस जगह पर किसी अनुभवी या किसी हुशियार व्यक्ति को नियुक्त करना पड़ेगा।’

उनके आखिरी शब्द गाड़ी की सिटी में डूब गए। दोनों कनिष्क अधिकारियों ने सलामी दी और गाड़ी रवाना हो गई।

शिरस्तेदार विनायकराव हमेशा गाँव की उस सड़क पर दो-तीन मिल सैर करता था। उसकी रुपे के हत्थेवाली छड़ी, पुराना सम्हालकर रखा हुआ रेशमी दुपट्टा, दक्षिणी पगड़ी और चप्पल इस रास्ते पर विगत दस वर्ष से नियमित यात्रा करते थे। बद्रीनाथ के कमरे तक जाकर वे दो घडी बैठकर सुस्ता लेते थे। रावसाहब को आया हुआ देखकर भैया भी अपनी छोटी सी बाडी(बगिया) से बाहर निकलकर ठंडा पाणी भरकर रखता था,बाद में दोनों परदेशी अपने अपने सुख-दु:ख की बातें करते रहते थे और इस प्रकार शाम बीत जाती थी।

आज भी विनायकराव के धीमे कदम उस तरफ मुड रहे थे। धीर धीरे वह वहां पहुंचे पर भैया को नहीं देखकर, कुछ आश्चर्य अनुभव करते हुए, अपनी हमेशा की चौकी पर बैठा। गहन विचार करते हुए वह वह भैया की सुन्दर कृति को निहार रहा था।-भैया ने अपने कमरे के पीछे बाड़े(बगिया) जैसा बनाकर उसमें गेंदा,कनेर,केल और पपीते लगाये थे। एक करेली का और एक सेम का,ऐसे दो लतामंड़प भी बनाये थे। कमरे के दरवाजे के पास कुछ मिर्ची की पौध,अजवाईन,धनिया और तुलसी की क्यारियां थी। आगे के हिस्से में दो-चार छोटे छोटे फूलबेलें चढ़ाकर मंडप जैसा बना लिया था। उसके इर्दगिर्द कुछ बांस लगाकर खपाचें बांधकर दीवार बनायीं थी और नीचे जमीन एकदम स्वच्छ बना रखी थी। उसमें भैया की एक बकरी बंधी रहती थी। विनायकराव,भैया का घर और उसका कलाविधान देखता रहा।

ऐसे में भैया के घर से आठ-दस वर्ष की एक लड़की बाहर आई। विनायकराव को देखकर तुरंत वापस लौटी और भैया से कहा:`भैयादादा! बाहर कोई बैठा हुआ है!’

`कौन है?’-ऐसा कहते हुए भैया बाहर आया।

आज आठेक दिन हुए,वह कुछ अस्वस्थ सा था। तो इस तरफ विनायकराव भी एकाध हप्ता हुआ,

इस तरफ आये नहीं थे। अत:विनायकराव होंगे,यह बुढऊ को याद रहा नहीं। बाहर आते ही उन्होंने विनायक

-राव को देखा।

`ओहो! पानी बेटा! यह तो हमारे रावसाहब हैं। ठंडा पानी लाओ,चलो’। भैया अपनी नित्य आदत के अनुसार विनायकराव के पास जा बैठा। दोतीन बिलौटे उसके शरीर से सटते हुए घुमने लगे।

विनायकराव को दिल फटा जा रहा था। भैया को इस जगह से कितना प्यार है, इस बात का सही अंदाज तो उसे आज ही हुआ। आसपास नागफनी(थूअर) की बाद हो,बाबुल का पेड़ हो या बेर का पौधा हो पर प्रत्येक पेड़ को उस कलाविधान में अपना योगदान करनेवाला बनाकर भैया ने दो चार पल बीताने को मन कर जाये ऐसी छोटी सी सुन्दर बाड़ी(बगिया) बनायीं थी।

पर आज तो उसने कुछ नया ही नजारा देखा। भैया ने,किसी बाड़ीवाले की लड़की को पुत्रीवत लाड़ से बुलाया, राव को यह दृश्य नया लगा, क्योंकि पानी को उसने आज ही देखा था।

`भैयादादा! यह लड़की किसकी है?’आज विनायकराव `भैया’ बोल नहीं सका।

यह तो बाडीवाले की है। बेचारी आठ दिन हुए,वह बकरी दूह देती है। ईश्वर उसका कल्याण करे!’

पानी ठंडे पानी का चमकता-दमकता हुआ लोटा लेकर आई थी। छोटी सी आठ-दस वर्षीया लड़की

की आँख में काजल ऐसा तो सुरेख ढंग से निकला हुआ था कि विनायकराव की दृष्टि वहां जमी की जमी रह गई।

`भैयादादा! अब जाती हूँ,हाँ।’

‘टिलाडी को दूह लिया?’

टिलाडी भैया की बकरी का नाम था। भोले भैया ने टीका देखकर उसका नाम टिलाडी रखा था।

यदि इन्सान के ऐसे नामकरण हों तो इन्सान भी पशु से बेहतर लगे और शब्द भी यथार्थाक्षर: हो जाये।

`हाँ,भैयादादा!’

`ठीक है। जाओ,कल जल्दी आ जाना हाँ।’

पानी चल दी,पर कुछ देर हुई नहीं कि वह वापस लौटी:

`भैयादादा! चार दिन बाद दीवाली है। क्या आपको लपसी पिसवाना नहीं है?’

वृद्ध भैया हर्षित हुआ। उसने मीठी हंसी बीखेर दी: मुझे और लपसी?’

`ऐसे थोड़े ही होता है? सब लोग खायेंगे-जूठायेंगे और क्या आप नहीं खायेंगे?’

विनायकराव ने नि:श्वास छोड़ा।

`ठीक है, ले, थोड़े से गेहूं ले जा लेकिन बहुत मोटा नहीं पिसना।’

`ना,दादा! मैं तो झीना ही दलती हूँ।’

पाणी बिदा हुई। किसान की वह लड़की भैया को इतनी ममातापुर्वक चाह रही थी- विनायकराव को आज ही इस बात का पता चला। उसने धीरे से कहा :`भैयादादा! आप यह नौकरी अब छोड़ दीजिये। अब उम्र भी हुई है।’

अब मुझे कितने वर्ष निकालने हैं? भैया ने जवाब दिया,`ज्यादा से ज्यादा पांच।’

`इसीलिए कहता हूँ कि अब भजन करो!’

`अब इस उम्र में मैं किसका सहारा थामूं! लड़का प्लेग का शिकार हुआ; उसकी बहु भाग गई,अब तो एक मात्र पेट ही है तो भगवान जब तक चलाये तब तक काम करते रहना है और खाना है।’ बद्रीनाथ ने जवाब दिया। विनायकराव का अंत:करण भैया के जवाब से और अधिक आर्द्र होता जा रहा था। वह जाने के लिए खड़ा हुआ तब उसे अचूक लगा कि भैया को उसकी बाड़ी के प्रति माँ से अधिक प्यार था।

दूसरे दिन ट्राफिक इन्स्पेक्टर बराबर नियम से ऑफिस में उपस्थित हुए थे; सामने अपना माथा झुकाए विनायकराव खड़ा था।

`क्यों राव! आप उस भैया बद्रीनाथ की जगह पर किसे बदल रहे हो?मैंने देखा है कि वह बुढा सारा वक्त पेडपौधों को निराने के पीछे बीताता है!’ साहब ने अपनी अवलोकन शक्ति से आश्चर्य अनुभव करने से शुरुआत करके बाघ की सी तीखी नजर से उस विनायकराव की ओर देखते रहे।

राव के मन में कुछ उलझन चल रही थी। एकबार तो उसे अपनी जेब से त्यागपत्र का कागज भी कुछ बाहर आया हुआ नजर आया; पर तुरंत उसके हाथ-पैर कांपने लगे और उसने साहब की ओर झुककर सलाम की।

`विनायकराव!’ बिल्ली जैसे चूहे से खेलती है ऐसे साहब ने पासा फेंका।`आपने क्या सोचा?’

विनायकराव ने विचार करके कुछ जोश तो कुछ रोष करते हुए कहा: `यह नहीं होगा!’

साहब ने होठ चबाये:`क्या?’

हमेशा की गुलामी–कमजोरी अपना जोर ज़माने लगी। राव ने होशोहवास खों दिया। उतायली में भूल हो गई-इस बात को वह समझ गया। वह कही गई बात को बदलने में माहिर होने के कारण तुरंत बोला;` साहब! यह तो मैं किसी और विचारों में उलझा हुआ था। भैया बद्रीनाथ की जगह पर कालू को रखना बेहतर होगा!’

`हाँ,और बद्रीनाथ भैया को चौबीस घंटे का नोटिस दे दो!’

`बहुत बेहतर!’शिरस्तेदार झुककर सलामी देकर बाहर चला गया।

फिरभी विनायकराव ने वृद्ध भैया को कुछ तो मदद की। दूसरे दिन भैया को साहब की हुजुर में लाने के लिए उसने एक खबर भेजी बुढा हाजिर हुआ। साहब अपने कमरे में अधिकारी के रुआब से उतने ही अकड़कर बैठे हुए थे। भैया को देखते ही कहा;`तुम्हारा नाम भैया बद्रीनाथ?

`जी हाँ,साहब!’

`तुम बड़े बूढ़े हो गए हो सरकार की नौकरी की,अब तो आराम लीजिये!’

`जी हाँ,साहब! यह सफेदी नौकरी में ही आयी है।’

`अच्छा!’

भैया तो इस उम्मीद में था कि साहब लम्बी नौकरी के लिए कुछ इनाम देने की सोच रहे होंगे। ऐसे में साहब ने कागज से मुंह उठाकर उसकी तरफ रुख करके समाचार दे दिए:`अच्छा। तुम विनायकराव कूं मिलो। तुम्हारा हिसाब करने के लिए हुक्म दे दिया है,अब तुम आराम लीजिये!’

वज्रपात हुआ हो ऐसे भैया मूढ़ की तरह साहब के सामने खड़ा रहा। अपनी हद में दुर्घटना होने से रह गई,वह बात उसे याद आई। साहब इसलिए उसे बरतरफ कर रहे हैं। आख़िरकार यह बात उसकी समझ में आ गई। वह आर्द्र होगया,`साहब! आज अब…’

साहब बद्रीनाथ की और देखता रहा। बद्रीनाथ ने कुछ आगे बढ़कर कहा;` साहब! आप मेरा बुढ़ापे में मेरा भव क्यों बिगाड़ रहे हैं?अब मुझे कौन रखेगा?’

`बूढ़े,बेटा तो है ना?’

`जी,ना! प्लेग…’बद्रीनाथ ज्यादा बोल नहीं सका।`मेरा झोंपड़ा और पेड़-पौधे ही मेरे बच्चे है,अब आखिरी दो-चार वर्ष वहां गुजार लेने दीजिये।’

`अ फुलिश सेंटीमेंटलिस्ट!(मूर्ख रोतल(रो पड़नेवाला) साहब ने उस बुढऊ के शब्दों को मानसशास्त्र में तौलकर देखा।

`ठीक ,ठीक,सोचेंगे,अभी तो जाओ।’

पर भैया बद्रीनाथ तो विनायकराव से मिले बिना धीमी चाल से अपने झोंपड़े पर गया। जिस जमीन के साथ वह बालक की भांति पच्चीस वर्ष तक खेला था,उस जमीन को अब कुछ दिन के लिए छोड़ते हुए उसका दिल कांप रहा था।

दूसरे दिन विनायकराव टहलने के लिए गया। बद्रीनाथ की नौकरी का वह आखिरी दिन था। भैया चौकी पर ही विनायकराव का रास्ता देख रहा था।

`का?काय होईल का? उसने बड़ी आतुरता के साथ विनायकराव से पूछा।

`नहीं,तुमाला जावें लागेल। दूसरा मनुष्ययांची नेमणुंक ढाली।’

बद्रीनाथ भावुक हो गया,लेकिन साहस करके बोला:कल सुबह?’

`हाँ।’

विनायकराव तुरंत भैया के पैरों में गिर पड़ा!

`अरे,अरे! रावसाहब,यह क्या?’

`भैयादादा! यहाँ से सीधे मेरे घर आ जाना। मुझे अपने बेटे जैसा समझकर मेरे साथ रहिये।’

`अरे रावसाहेब!’ भैया फीका हंसा,`यह आपकी उदारता है पर मैं तो यहीं कहीं इस जमीन के पास रहूँगा।’

विनायकराव ने सोचा कि दूसरे दिन भैयादादा को समझायेंगे। दोनों जब उठे तब भैया ने अश्रु सहित विनायकराव को गले से लगा लिया। दो-तीन बिलौटे तो उसके बूढी देह पर खेल रहे थे।

`रावसाहब! मैं इन्हें आपको सौंप रहा हूँ हाँ!;’बुढा इतना ही कहा सका और दोनों विलग हुए।

दूसरे दिन सबेरे दिन उगा नहीं उगा कि विनायकराव आ गया था। पानी भी बकरी को दुहने के लिए उपस्थित हो गई थी। विनायकराव चौकी पर बैठा क्योंकि भैया अभी तक बाहर नहीं आया था। अंतत: थककर पानी ने दरवाजा खटखटाया। किंवाड तो खुला ही था।

`भैयादादा! ओ भैयादादा! किसान की बेटी का स्नेहिल स्वर एकांत खेत में स्पष्ट रूप से चीख रहा था।

`भैयादादा! चलिए,चलिए टिलाडी को दुह रही हूँ!’

पर भैयादादा ने जवाब दिया नहीं।

पानी ने अपनी आवाज को थोडी ऊँची करके कहा,` और यह रही आपकी दीवाली की लपसी,दादा!’

अब विनायकराव उठकर वहां गया। झोंपड़े में अडिग और खड़े होकर वृद्ध भैयादादा ओढ़कर आराम से सोये हुए थे।बिलौटे उसकी देह से सटकर खेल रहे थे। मेमने तो उसके बिछौने के पास बैठकर करुण स्वरों में मिमिया रहे थे।

विनायकराव की आँखें डबडबा आई और भीतर गया।

पानी दादा की देह को हिलाकर हंस रही थी। अभी भैयादादा `रुक,अभी पकड़ता हूँ’ कहकर ऊठेंगे ऐसे विनोद की आश के साथ खुश होती हुई हंस रही थी। विनायकराव ने पास जाकर शरीर को खूब टटोला और जोर से चिल्लाये:`भैयादादा!’

झोंपड़ी से कोई निकाले नहीं इसलिए भैयादादा अडिग सोये रहे।

विनायकराव की आवाज फट गई और उसकी आँखें चूने लगी। उसने पानी की और मुड़कर कहा,

`पानी! अब भैयादादा नहीं बोलेंगे।’और कभी मान नहीं सकते छोटी लड़की ने भैयादादा की देह के पास जो रुदन किया, वह आज भी मुझे जब याद आता है तब मेरे जीवन में बिजली जैसे झटके लगते हैं। अनंत समय और अगाध आकाश को भेदकर वह स्वर बारबार सुनाई देगा।

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भैयादादा की बाड़ी में अब कभी भी ऐसी सफाई रहती नहीं है। फाख्ता, बैठते थे,गोरैया गातीं और कोयल बाड और बेलों के अन्दर चली जाती रहती थी -ऐसी सृष्टि अब वहां नहीं है। काम करनेवाली आत्मा के बदले काम करनेवाली काया है। बीसवीं शताब्दी को काव्यमय जीवन से क्या लेना-देना?संस्था…को व्यक्ति के निजी भव्य जीवन से क्या निस्बत? यंत्रवाद नियमित जड़त्व के बदले में रसमय चैतन्य का क्या करे? इस यंत्रवाद में एक दिन यह जगत भी यन्त्र जैसा होकर रहेगा।

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