By | September 24, 2018

प्रश्न यह है कि कुरआन पुरी दुनिया के लोगों के लिए हिदायत है या केवल मुत्तकीन के लिए? सुरह बकरा की आयत 2 में अल्लाह का इरशाद है: “यह (कुरआन) मुत्तकीन के लिए हिदायत हैl” इससे पता चलता है कि कुरआन मजीद मुत्तकीन के लिए हिदायत हैl

सुरह बकरा की आयत 185 में अल्लाह पाक का इरशाद है कि यह सभी लोगों के लिए हिदायत हैl अल्लाह पाक का इरशाद है: (شھر رمضان الذی انزل فیہ القران ھدی للناس) (अल बकरा)

अनुवाद: “रमज़ान के महीने में कुरआन नाज़िल किया गया है इस दौरान वह सभी लोगों के लिए हिदायत हैl”

तिबयानुल कुरआन में है: कुरआन ए पाक की सीधे रास्ते पर दलालत है और मुत्तकीन को कुरआन ए पाक के अहकाम पर अमल की तौफीक भी नसीब होती है वह कुरआन ए पाक के अनवार से रौशनी तलब करने वाले और लाभ उठाने वाले होते हैं और कुरआन ए पाक में तदब्बुर और तफ़क्कुर करने से उनके दिमाग की गिरहें खुलती चली जाती हैं और गैर मुत्तकीन के लिए भी कुरआन ए पाक हिदायत है, नेकी और दुनिया की खैर की ओर राहनुमाई है, हालांकि वह इसकी हिदायत को कुबूल नहीं करते और इसके अहकाम पर अमल करके अपनी दुनिया और आखिरत को रौशन नहीं करतेl”

यह भी कि “कुरआन ए पाक में जहां फरमाया गया है कि यह इंसानों के लिए हिदायत है इससे मुराद यह है कि अपने आप में कुरआन ए पाक की हिदायत सारे इंसानों के लिए है और यहाँ जो फरमाया है कि यह मुत्तकीन के लिए हिदायत है इससे मुराद यह है कि परिणाम स्वरूप यह मुत्तकीन के लिए हिदायत है क्योंकि इस हिदायत से वही लाभान्वित होते हैं’ दुसरा उत्तर यह है कि इन दोनों आयतों में संघर्ष नहीं क्योंकि हकीकत में इंसान वही हैं जो मुत्तकी हैं और रहे गैर मुत्तकी तो वह इस आयत का मिसदाक हैं:

ولقد ذرانا لجھنم کثیرا من الجن والانس لہم قلوب الیفقھون بھا ولھم اعین لا یبصرون بھا ولھم اذان لایسمعون بھا اولئک الانعام بل ھم اضل اولئک ھم الغفلون

अनुवाद: “और बेशक हमने दोज़ख के लिए बहुत सारे जिन और इंसान पैदा किए’ उनके दिल हैं जिनसे वह समझते नहीं, उनकी आँखें हैं जिनसे वह देखते नहीं हैं और उनके कान हैं जिनसे वह सुनते नहीं वह चौपायों की तरह हैंl”

इसका तीसरा उत्तर यह है कि हरचन्द कि कुरआन सभी इंसानों के लिए हिदायत है लेकिन चूँकि मुत्तकी इंसानों के उत्तम लोग हैं’ इसलिए उन्ही का तशरीफ़न और तकरीमन उल्लेख किया गया हैl

तकवा का अनुभाग और इसका शाब्दिक अर्थ:

अल्लामा जैब्दी हनफ़ी रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं:

इब्ने सैय्यदा ने कहा कि “तक़वा” असल में ‘वकवा” था यह फाअली के वज़न पर इस्म (हासिल बिल मसदर) है और वकीयत से बना है वाव को ता से बदल दिया’ यह “तक़वा” हो गया इसी प्रकार “तकाह” असल में “वकाह” है और “तजाह” और “तुरास” असल में “वजाह” और “वारिस” हैं “वकाह यकियह” का अर्थ है: किसी चीज को तकलीफ से सुरक्षित रखना और इसकी हिमायत और हिफाज़त करना’ कुरआन ए पाक में है: (سالھم من اللہ من واق) (अल राअद) अनुवाद: उन्हें अल्लाह से बचाने वाला कोई नहीं है: (تاج العروس ج ص ‘ مطبوعہ المطبعۃ الخیریہ ‘ مصر ‘ھ)

अल्लामा रागिब असफहानी रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं:

तक़वा का अर्थ है: किसी डराने वाली चीज से नफ्स को बचाना और उसकी हिफाज़त करना’ और कभी खौफ को भी तक़वा कहते हैं और इसका शरई अर्थ है: गुनाह की गंदगी से नफ्स की हिफाज़त करना’ और यह निषिद्ध कार्यों के छोड़ने से हासिल होता है’ और कामिल तक़वा तब हासिल होता है जब कुछ वैधताओं को भी छोड़ दिया जाए जैसा कि हदीस में है: हलाल स्पष्ट है और हराम स्पष्ट है और इनके बीच कुछ अस्पष्टताएं हैं जिनको बहुत सारे लोग नहीं जानते’ इसलिए जो शख्स अस्पष्ट चीजों से बच गया उसने अपने दीन और अपनी इज्ज़त को सुरक्षित कर लिया’ अल हदीस (सहीह बुखारी जिल्द 1 संपादित कराची) तक़वा के कई स्तर हैं जो निम्नलिखित आयतों से स्पष्ट होते हैं:

आयत ” فمن اتقی واصلح فلاخوف علیہم ولا ھم یحزنون (अल आराफ) (अनुवाद) पस जो लोग गुनाहों से बाज़ रहे और उन्होंने नेकियाँ कीं तो उन पर कोई खौफ होगा और ना वह गमगीन होंगेl

(आयत) “اتقوا اللہ حق تقتہ, (आले इमरान) (अनुवाद) और अल्लाह से डरो जैसा कि उससे डरने का हक़ हैl

(आयत) “وسیق الذین اتقوا ربہم الی الجنۃ زمرا” (अल ज़ुम्र:3) (अनुवाद) और जो लोग अपने रब से डरते थे वह जन्नत की ओर गिरोह डर गिरोह भेजे जाएंगेl (المفردات ص ۔ ‘ مطبوعہ المکتبۃ المرتضویہ ‘ ایران ‘ھ)

तक़वा का शाब्दिक अर्थ:

अल्लामा मीर सैयद शरीफ ने तक़वा की निम्नलिखित परिभाषाएं लिखी हैं:

अल्लाह पाक की आज्ञा का पालन करके नफ्स को अवज्ञा के अज़ाब से बचाना तक़वा है अल्लाह की मासियत के अज़ाब से नफ्स को बचाना तक़वा है अल्लाह पाक के मासवा से स्वयं को सुरक्षित करना तक़वा है’ शरीअत के आदाब की सुरक्षा करना तक़वा है’ हर वह काम जो तुमको अल्लाह से दूर कर दे उससे स्वयं को बाज़ रखना तक़वा है’ नफ़सानी मज़े को छोड़ना और निषिद्ध चीजों से दूर रहना तक़वा है’ तुम अपने नफ्स में अल्लाह पाक के सिवा किसी को ना देखो यह तक़वा है’ तुम अपने आपको किसी से बेहतर गुमान ना करो यह तक़वा है अल्लाह के मासवा को तर्क करना तक़वा है और नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की कौल और फेल से इक्तेदा करना तक़वा हैl (किताबुल तारीफात, मतबुआ अल मतबतुल खैर, मिस्र)

अल्लामा कुर्तुबी रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं:

तक़वा का अर्थ है: किसी अप्रिय चीज से स्वयं को बचाने के लिए अपने और उस चीज के बीच कोई आड़ बना लेना, और मुत्तकी वह व्यक्ति है जो अपने नेक कामों और पुर खुलूस दुआओं से अपने आपको अल्लाह पाक के अज़ाब से बचा ले, ज़र बिन जैश कहते हैं कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसउद (रज़ीअल्लाहु अन्हु) ने एक दिन फरमाया: लोग बहुत हैं लेकिन उनमें बेहतर वह हैं जो तौबा करने वाले हों या मुत्तकी हों, फिर एक दिन कहा: लोग बहुत हैं लेकिन उनमें बेहतर वह हैं जो आलिम हों या इल्म को सीखने वाले हों, अबू यज़ीद बुस्तामी (रहमतुल्लाह अलैह) ने कहा: मुत्तकी वह है जिसका हर कथन और हर कार्य अल्लाह के लिए हो अबू सुलेमान दारानी (रहमतुल्लाह अलैह) ने कहा: मुत्तकी वह है जिसके दिल से कामुकता की मुहब्बत निकाल ली गई हो, एक कथन यह है कि मुत्तकी वह है जो शिर्क से बचे और निफाक से बरी हो, इब्ने अतिया ने कहा: यह गलत है क्योंकि फासिक भी इसी तरह होता है, हज़रत उमर बिन ख़त्ताब (रज़ीअल्लाहु अन्हु) ने हज़रत अबी बिन काब (रज़ीअल्लाहु अन्हु) से तक़वा के बारे में सवाल किया, उन्होंने कहा: क्या आपने काँटों वाला रास्ता देखा है? हज़रत उमर (रज़ीअल्लाहु अन्हु) ने कहा: हाँ पूछा फिर आपने क्या किया? हज़रत उमर (रज़ीअल्लाहु अन्हु) ने कहा: मैंने पांयचे उपर उठा लिए और उनसे बच कर निकला, हज़रत अबी काब (रज़ीअल्लाहु अन्हु) ने कहा: यही तक़वा है, हज़रत अबू दर्दा (रज़ीअल्लाहु अन्हु) ने कहा: तक़वा हर प्रकार की खैर का समग्र है और यह वह चीज है जिसकी अल्लाह पाक ने सबसे पहले वालों और आखीर वालों को वसीयत की हैl (अल जामेउल अहकाम अल कुरआन जिल्द 1- मतबुआ इंतेशारत नासिर खुसरू इरान)

इमाम राज़ी (रहमतुल्लाह अलैह) लिखते हैं:

मुत्तकी वह व्यक्ति है जो इबादतों को अंजाम दे और मना की हुई चीजों से बचे इसमें मतभेत है कि छोटे गुनाह से बचना भी तक़वा है या नहीं, हदीस में है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: कोई बंदा उस समय तक मुत्तकीन के दर्जे को नहीं पा सकता जब तक उन चीजों को तर्क ना कर दे जिनमें हर्ज ना हो इस डर से कि शायद इनमें हर्ज हो, हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ीअल्लाहु अन्हु) ने फरमाया: मुत्तकी वह लोग हैं जो अज़ाब से बचने के लिए नफ्स की चाहत पर अमल नहीं करते और अल्लाह पाक से रहमत की उम्मीद रखते हैंl

इमाम राज़ी (रहमतुल्लाह अलैह) फरमाते हैं: यहाँ तक़वा से मुराद अल्लाह का डर है, क्योंकि अल्लाह पाक ने सुरह निसा और सुरह हज के प्रारम्भ में फरमाया: (आयत) “یایھا الناس اتقوا ربکم” (अन्निसा: अल हज:) अनुवाद: ऐ लोगों! अपने रब से डरोl

निम्नलिखित आयातों में भी तक़वा से मुराद अल्लाह का डर है:

(आयत) “اذ قال لہم اخوھم نوح الا تتقون” (अश्शुअरा:) अनुवाद: जब उनके हम कौम नूह (अलैहिस्सलाम) ने उनसे कहा:

(आयत) “اذ قال لہم اخوھم ھود الا تتقون” (अश्शुअरा:) अनुवाद: जब उनके हम कौम हूद अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा: क्या तुम खुदा से नहीं डरते?

(आयत) “اذ قال لہم اخوھم صلح الا تتقون” (अश्शुअरा:) अनुवाद: जब उनके हम कौम सालेह (अलैहिस्सलाम) ने उनसे कहा: क्या तुम खुदा से नहीं डरते?

(आयत) “اذ قال لہم اخوھم لوط الا تتقون” (अश्शुअरा:) अनुवाद: जब उनके हम कौम लूत (अलैहिस्सलाम) ने उनसे कहा: क्या तुम खुदा से नहीं डरते?

(आयत) “اذ قال لہم اخوھم شعیب الا تتقون” (अश्शुअरा:) अनुवाद: जब शुएब (अलैहिस्सलाम) ने उनसे कहा: क्या तुम खुदा से नहीं डरते?

(आयत) “وابرھیم اذ قال لقومہ اعبدوا اللہ واتقوہ” (अनकबूत) अनुवाद: और इब्राहिम ने जब अपने कौम से कहा: अल्लाह की इबादत करो और उससे डरोl

(आयत) “اتقوا اللہ حق تقتہ” (आले इमरान) अनुवाद” और अल्लाह ने उन्हें कलमा तौहीद पर जमा दियाl

(आयत) “ولوان اھل القری امنوا واتقوا” (अल आराफ) अनुवाद: और अगर बस्तियों वाले ईमान ले आते और तौबा करतेl

(आयत) “ان انذروا انہ لا الہ الا انا فاتقون” (अल नहल) अनुवाद: लोगों को डराओ कि मेरे सिवा कोई इबादत का हकदार नहीं, इसलिए मेरी इताअत करो

(आयत) “واتوالبیوت من ابوابھا، واتقواللہ” (अल बकरा) अनुवाद: और घरों में उनके दरवाज़े से दाखिल हो और अल्लाह की ना फ़रमानी ना करोl

(आयत) “ومن یعظم شعآئر اللہ فانھا من تقوی القلوب” (अल हज) अनुवाद: और जिसने अल्लाह पाक की निशानियों की ताजीम की तो यह दिलों के इखलास से हैl

तक़वा का मुकाम बहुत अज़ीम और बुलंद है क्योंकि अल्लाह पाक ने फरमाया:

(आयत) “ان اللہ مع الذین اتقوا” (अल नहल) अनुवाद: बेशक अल्लाह मुत्तकीन के साथ हैl

(आयत) “ان اکرمکم عنداللہ اتقکم” (अल हुजरात) अनुवाद: बेशक अल्लाह के नज़दीक तुम में से सबसे मुकर्रम वह है जो सबसे अधिक मुत्तकी हैl

हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ीअल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: जो व्यक्ति यह चाहता हो कि वह लोगों में सबसे अधिक मुकर्रम हो वह अल्लाह से डरे और हज़रत अली बिन अबी तालिब (रज़ीअल्लाहु अन्हु) ने फरमाया: गुनाहों पर इसरार ना करना, और इबादत पर अभिमान ना करना, तक़वा है, इब्राहिम बिन अदहम (रहमतुल्लाह अलैह) ने कहा: तक़वा यह है कि तुम्हारी जुबान पर मखलूक का ऐब ना हो, फरिश्ते तुम्हारे कामों में ऐब ना पाएं और अल्लाह पाक तुम्हारे दिल में कोई ऐब ना देखे, अल्लामा वाकदी (रहमतुल्लाह अलैह) ने कहा: तक़वा यह है कि जिस तरह तुम अपने ज़ाहिर को मखलूक के लिए सजाते हो, इसी तरह अपने बातिन को अल्लाह के लिए सजाओ, एक कौल यह है कि अल्लाह पाक को वहाँ ना देखे जहां उसने मना किया है और एक कौल यह है कि जो रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सीरत को अपनाए और दुनिया को पीछे डाल दे, अपने नफ्स को इखलास और वफ़ा का पाबंद करे और हराम और जफा से बचे वही मुत्तकी है (तफसीरे कबीर जिल्द 1- मतबुआ दारुल फ़िक्र बैरुत)

तक़वा और मुत्तकीन से संबंधित हदीसें

इमाम तिरमिज़ी (रहमतुल्लाह अलैह) रिवायत करते हैं:

हज़रत अतिया साअदि (रज़ीअल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: कोई बंदा उस वक्त तक मुत्तकीन में से शुमार नहीं होगा जब तक कि वह नुक्सान ना देने वाली चीज को इस डर से ना छोड़ दे कि शायद इसमें नुक्सान होl यह हदीस हसन गरीब हैl (जामेअ तिरमिज़ी पृष्ठ 354, मतबुआ नूर मुहम्मद कारखाना तिजारत कुतुब, कराची)

इमाम मुस्लिम (रहमतुल्लाह अलैह) रिवायत करते हैं: हज़रत अबू हुरैरा (रज़ीअल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: एक दूसरे से हसद ना करो, तनाजुश (किसी को फ़साने के लिए अधिक मूल्य लगाना) ना करो, एक दुसरे से द्वेष ना रखो, एक दुसरे से मुंह ना फेरो, किसी की बिक्री पर बिक्री ना करो, अल्लाह के बंदे भाई भाई बन जाओ, ‘मुसलमान’ मुसलमान का भाई है, उस पर ज़ुल्म ना करे, उसको रुसवा ना करे, उसको तुक्ष ना जाने, हुजुर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने सीने की ओर इशारा करके तीन बार फरमाया तक़वा यहाँ है, किसी व्यक्ति के बुरे होने के लिए यह काफी है कि वह अपने मुसलमान भाई को बुरा जाने, एक मुसलमान दुसरे मुसलमान पर पुर्णतः हराम है, उसका खून उसका माल और उसका सम्मानl (सहीह मुस्लिम जिल्द 2, मतबुआ नूर मुहम्मद असहल मुताबेअ, कराची)

हज़रत अनस (रज़ीअल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: तुम्हारा रब यह फरमाता है कि मैं ही इस बात का हक़दार हूँ कि मुझी से डरा जाए इसलिए जो व्यक्ति मुझ से डरेगा तो मेरी शान यह है कि मैं उसको बख्श दूँl (सुनन दारमी जिल्द 2, मतबुआ नश्रुस्सुन्नह, मुल्तान)

हज़रत अबूज़र (रज़ीअल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: मुझे एक ऐसी आयत का इल्म है कि अगर लोग केवल इसी आयत पर अमल कर लें तो वह उनके लिए काफी होगी, जो व्यक्ति अल्लाह से डरता है अल्लाह पाक उसके लिए कठिनाइयों से निकलने का रास्ता बना देता हैl (सुनन दारमी जिल्द 2, मतबुआ नश्रुस्सुन्नह, मुल्तान)

अबू नज्रह बयान करते हैं कि जिस व्यक्ति ने तशरीक के दिनों के बीच में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से खुतबा सूना उसने यह हदीस बयान की, आपने फरमाया: ऐ लोगों! सुनो तुम्हारा रब एक है, तुम्हारा बाप एक है, सुनो! किसी अरबी को अजमी पर फजीलत नहीं है, ना अजमी को अरबी पर फजीलत है, ना गोर को काले पर फजीलत है, ना काले को गोर पर फजीलत है, मगर फजीलत केवल तक़वा से है (मुसनद अहमद 5 मतबुआ मकतबे इस्लामी, बैरुत)

हज़रत मुआज़ (रज़ीअल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: शायद इस साल के बाद तुम मुझसे मुलाक़ात नहीं करोगे, हज़रत मुआज़ (रज़ीअल्लाहु अन्हु) रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के फिराक़ के सदमे में रोने लगे, फिर नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मदीना की तरफ मुतवज्जोह हुए और फरमाया: मेरे सबसे अधिक पास मुत्तकी होंगे चाहे वह कोई हों और कहीं हों (मुसनद अहमद जिल्द 5 पृष्ठ 235, मतबुआ मकतबे इस्लामी, बैरुत)

अल्लामा गुलाम रसूल सईदी इसी तिबयानुल कुरआन में सुरह बकरा की आयत 2 की तफसीर के आखिर में तक़वा के दर्जे बयान करते हुए लिखते हैं:

अगर यह एतेराज़ किया जाए कि कुरआन ए पाक का मुत्तकीन के लिए हिदायत होना तहसील ए हासिल है क्योंकि मुत्तकीन तो खुद हिदायत याफ्ता हैं, इसके कई जवाब हैं, पहला जवाब यह है कि मुत्तकीन से मुराद यह है कि जो लोग तक़वा हासिल करने का इरादा करें सो यह किताब उनके लिए हिदायत है, दुसरा जवाब यह है कि हिदायत से मुराद हिदायत पर दवाम और सबात है अर्थात इस किताब के अध्ययन और इस पर अमल करने से मुत्तकीन को हिदायत पर दवाम और सबात हासिल होगा, तीसरा जवाब यह है कि तक़वा के कई दर्जे हैं: (1) नफ्स की कुफ्र और शिर्क से हिफाज़त करना (2) नफ्स की गुनाहे कबीरा से हिफाज़त करना (3) नफ्स की गुनाहे सगीरा से हिफाज़त करना (4) नफ्स की खिलाफे सुन्नत से हिफाज़त करना (5) नफ्स की खिलाफे उला से हिफाज़त करना (6) नफ्स की अल्लाह के गैर से हिफाज़त करना, इसलिए जो व्यक्ति तक़वा के किसी एक मर्तबे पर फ़ाइज़ हो यह किताब उसके लिए तक़वा के अगले मर्तबे के लिए हिदायत हैl (न्यू एज़ इस्लाम से)

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